@Abhinav_Pan बा�� बिगड़ गई बात बनाने में,
यार हिचकते हाथ मिलाने में।
चौकीदार चुरा ले गया ज़ेवर,
लोग बिजी थे फूल लगाने में।
ख़तरे में मुस्तक़बिल बच्चों का,
लोग मगन हैं बस पैमाने में।
सेहत बन गई खूब सियासत की,
अख़बार लगे पाँव दबाने में।
_ रोहित गुस्ताख़
@kasakk25@snehal4676@vishvictory ग़मों में ज़िंदगी का क्या करेंगे
लबों की ख़ामुशी का क्या करेंगे
मोहब्बत डाइरी में लिख चुके हैं
अमाँ अब शायरी का क्या करेंगे
–रोहित गुस्ताख़