अहमदाबाद में प्लेग फैला।
मजदूर शहर छोड़कर भागने लगे। फैक्ट्रियां बन्द होने का खतरा था। सेठो ने दांव खेला- मजदूरी दोगुनी कर दी।
जो केवल पेट और तन भर का कमाते थे, उन्हें उम्मीद दिखी। रुक गए, जान पर खेलकर। चिमनियों से धुंआ नही रुका। प्लेग के बावजूद अहमदाबाद की मिलें चलती रही।
और जब प्लेग खत्म हो गया,
मजदूरी वापस घटा दी गई।
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मजदूरों ने विरोध किया। गांधी से सहायता मांगी। गांधी ने मलिकों बात की। वे नही माने, तो मजदूरों के साथ बैठकर उन्होंने हड़ताल का आव्हान किया।
मिलें रुक गयी।
अब सेठों ने फिर दांव खेला।
जो मजदूर, हड़ताल में शामिल थे, उन्हें नौकरी से निकालने लगे। मजदूर डर गए। हड़ताल से खिसक कर वापस काम पर लौटने लगे। अब गांधी ने वो किया..
जो अनोखा था।
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अनशन पर बैठ गए। सेठों के खिलाफ नही, अपने ही उन समर्थकों के खिलाफ, जो मिलो में जाकर वापस काम करने लगे थे। अब मजदूरों को शर्म आयी।
एक एक कर सारे लौट आये।
गांधी ने अनशन तोड़ा।
अहमदाबाद की मिलो की वो हड़ताल, ऐतिहासिक थी। चंपारण में किसानों की लड़ाई लड़ने के बाद, गांधी का यह दूसरा समर था- मजदूरों के लिए।
अपने ही देशवासी सेठों से लड़ गए। धनपतियों को झुकना पड़ा। मजदूरी की नई दरें तय हुई।
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नेहा का यह उदास मुखमण्डल देखकर बुरा लगा।
जिनके संघर्ष के शामिल होने गयी, उन्ही में से किसी ने मुंह पर स्याही फेंक दी। कारण पूछने पर वामपन्थी, देशद्रोही, उमर खालिद समर्थक होने के इल्जाम धर दिये।
लेकिन आंदोलन, एक्टिविज्म, न्याय की लड़ाई में ऐसा अक्सर होता है। कि जिसके लिए आप लड़ते हैं, वही कम्प्रोमाइज्ड हो जाता है।
कारण भय, भ्रम, या लोभ- कुछ भी हो, मगर यह लड़ने वाले के बिलीफ सिस्टम को तोड़ता है।
उदास करता है।
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कभी गांधी ने इसका स्वाद चखा, आज नेहा ने चखा है। लेकिन इस युवा लड़की ने जब संघर्ष, औऱ नेतृत्व की राह, राह चुनी है, तो उसे ऐसे बिट्रियल का से निराश नही होना चाहिए।
कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदाचनम!! 1918 में अहमदाबाद के गांधी की तरह, अपने भीतर की रोशनी पर, अपने उद्देश्य की पवित्रता पर यकीन रखकर वह आगे बढ़ती रहे। यही संदेश है।
और शुभकामनाएं हैं।
जंतर -मंतर प्रोटेस्ट से चर्चित हुए मोहम्मद इरफ़ान की हम लोग कुछ आर्थिक मदद करना चाहते हैं . हालांकि इरफ़ान ने बार -बार इंकार ही किया है
लेकिन कुछ लोग उसकी मदद करना चाहते हैं . इरफान की सहमति के बाद उसके नाम से मिलाप पर एक फंड रेजिंग अकाउंट बनाया गया है .
अपने हिस्से का 20000 देकर मैंने शुरुआत की है .
आप भी अगर इस लड़के की मदद करना चाहते हैं तो मिलाप के इस लिंक के जरिए कर सकते हैं .
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@askrajeshsahu Ye chutiya bna rha h sbko
Aur jo bula rha h esko wo bda chutiya hai rajesh. Bhai ji
Competition exam aise hi hote h
Khud frusated hai pdne k bajay bskloli krta h
Apna failure kisi aur pe thop rhe h
@richaanirudh Sirf aankh terka kar k aur muh banane wali hai madam aap
Bachho ka dukh nhi dikhta hai
Bdi chinta hi rhi hai ground reporter ka to aap kyo nhi us tome virodh ki jab studio se student ko atanlawabi bola jaa rha hai deshdroh bol jaa rha hai
Kyoki aap privilege class ki hai.
रेलवे में बड़े पद से रिटायर हुए एक एक्सपर्ट से बात हो रही थी। चूंकि मैं रेलवे मामलों का कोई विशेषज्ञ तो नहीं हूं लेकिन उन्होंने Modi जी की बहुप्रचारित हाइड्रोजन ट्रेन के बारे में जो बताया उसे साझा कर रहा हूं :
"430 किग्रा हाइड्रोजन से 10 डिब्बों की नान एसी ट्रेन 420 किलोमीटर लगातार जा सकती है। मगर जितनी बिजली (24 हजार यूनिट) ख़र्च कर इतना हाइड्रोजन बनाया गया उससे 10 डिब्बों की यही ट्रेन इलेक्ट्रिक ट्रैक पर 1200 किलोमीटर से ज्यादा चल सकती है। जींद-सोनीपत के 89 किलोमीटर ब्राड गेज रेल ट्रेक को ओवरहेड इलेक्ट्रिक ट्रैक में बदलने का खर्च 100 से 110 करोड़ रुपए आता। रेलवे ट्रैक का विद्युतीकरण करने में 1.1-1.3 करोड़ रुपए प्रति किलोमीटर का औसत खर्च माना जाता है। मगर एक डीएमयू को हाइड्रोजन ट्रेन में बदलने पर 112 करोड़ रुपए खर्च आया है। इतने में तो पूरे जींद-सोनीपत रूट का विद्युतीकरण हो जाता।"