क्षत्रियों में आज तक मेरे जीवनकाल में कुशाग्र सिंह सेंगर भैया से बड़ा Buddhism का जानकार व्यक्ति कोई नहीं मिला अगर आप भी सही मायने में बुद्धिज़्म को जानना और समझना चाहते हैं तो कुशाग्र भैया के यूट्यूब चैनल से जरूर जोड़ें
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The Mughal Empire was embedded in a web of ties with many Hindu communities.
Their Indianness was shaped through interactions with numerous communities—Brahmins, Banias, Jats, Marathas, Gujjars, Kayasthas and others—not Rajputs alone.
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रामदेनी सिंह
जन्म: 1904 (सारण)
1921 में स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े, बाद में HSRA के क्रांतिकारी बने। हाजीपुर ट्रेन खजाना लूट सहित कई अभियानों में भाग लिया
4 मई 1932 को उन्हें फांसी, वे आधुनिक बिहार के इतिहास में ब्रिटिश सरकार द्वारा फाँसी दिए गए पहले बिहारी क्रांतिकारी थे
शूटरों के उस्ताद और अर्जुन-द्रोणाचार्य अवार्ड से सम्मानित जसपाल राणा जी का इस दुनिया से जाना भारतीय खेल जगत के एक सुनहरे अध्याय का अंत है। इस दुखद घड़ी में उनका जाना हमें याद दिलाता है कि कैसे उनकी जादुई पिस्टल शूटिंग ने 90 के दशक में पूरे देश को इस खेल का दीवाना बना दिया था। असल में, जसपाल जी की अचूक निशानेबाजी और अद्भुत एकाग्रता कोई इत्तेफाक नहीं थी। राजपूत समाज के खिलाड़ी अक्सर कभी इस बात का ढिंढोरा नहीं पीटते या दिखावा नहीं करते कि कैसे उनकी क्षत्रिय योद्धा विरासत ने उन्हें खेल के मैदान पर चमकना सिखाया है, लेकिन इतिहास गवाह है कि आपकी पारिवारिक पृष्ठभूमि और सांस्कृतिक परिवेश आपके भीतर के खिलाड़ी को तराशने में सबसे बड़ी भूमिका निभाते हैं। जैसे हरियाणा के जाटों का खेती-किसानी और देहाती अखाड़ों का बैकग्राउंड उन्हें कुश्ती में अजेय बनाता है और जैसे शुरुआती दौर में महाराष्ट्र के मराठी ब्राह्मणों का तकनीक और जिमखाना कल्चर पर ध्यान देने की वजह से क्रिकेट पर दबदबा था, ठीक वैसे ही राजपूतों की सदियों पुरानी अस्त्र-शस्त्र विद्या और घोड़ों की समझ ने उन्हें शूटिंग, घुड़सवारी (Equestrian) और पोलो जैसे खेलों में देश का अगुआ बनाया।
जसपाल राणा जी ने राष्ट्रमंडल खेलों में 9 गोल्ड मेडल जीतकर और मनु भाकर जैसी चैंपियन तैयार करके इसी परंपरा को आगे बढ़ाया था। खेलों में राजपूती विरासत आज भी देश के कोने-कोने में गूंजती है: चाहे वह दिल्ली की अत्याधुनिक डॉ. करणी सिंह शूटिंग रेंज हो, जहां आज के युवा निशाना लगाना सीखते हैं, ग्वालियर का ऐतिहासिक कैप्टन रूप सिंह स्टेडियम हो या फिर देश का सबसे बड़ा खेल सम्मान 'मेजर ध्यानचंद खेल रत्न पुरस्कार' हो या 'रणजी', 'दिलीप ट्रॉफी' जैसे सम्मान। ये तमाम राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मैदान और ट्रॉफियाँ इस बात का सबूत हैं कि इन क्षत्रिय सूरमाओं ने भारतीय खेलों की जो मजबूत बुनियाद रखी थी, उसकी चमक आज भी बरकरार है। जब-जब भारत अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर पोडियम पर तिरंगा लहराएगा, जसपाल राणा जी का नाम और उनका यह अदम्य जुझारूपन हमेशा हमारी यादों में जिंदा रहेगा। उस्ताद जसपाल राणा जी को भावभीनी श्रद्धांजलि, आपकी विरासत अमर रहेगी।
@jaspalrana2806@rajnathsingh
Kshatriya Parishad supports honorable Shankersinh Vaghela, the former CM of Gujarat, when he says that it is high time we know our heritage but stop living in the past - instead invest in your future.
A wonderful endeavour by Dungar Singh Sodha, a youth from Barmer.
On his Balidan Diwas, we pay our humble tributes to the Baba Banda Singh Bahadur.
Born as Lachman Dev in the Manhas Kshatriya family of Rajauri, Banda Singh Bahadur transformed from an ascetic into one of the greatest warrior-leaders of Indian history.
Inspired by Guru Gobind Singh in 1708, he led a relentless struggle against Mughal oppression and achieved historic victories, including the Battle of Chappar Chiri (1710), establishing his authority across large parts of Punjab.
Captured after years of resistance, he refused to abandon his convictions despite torture and martyrdom. On 9 June 1716, he embraced sacrifice with unmatched courage, leaving behind a legacy of valor, justice, and unwavering faith.
Remembering Raghuvansh Prasad Singh on his Jayanti.
A five-time MP from Vaishali, distinguished mathematician, professor, socialist and the architect of MGNREGA, he dedicated his life to the upliftment of farmers, labourers and the rural poor. Instrumental in bringing the sacred relics of Lord Buddha to Vaishali, he combined intellect with humility and public service.
In an age of rhetoric, Raghuvansh Babu spoke with facts, statistics and conviction.
Tributes to a rare statesman whose legacy continues to inspire. 🙏
#RaghuvanshPrasadSingh #Jayanti #MGNREGA #Vaishali
सूर्यवंश की बैस शाखा के कुलदीपक, कन्नौज के अधिपति, दुनिया का पहला गणतंत्र स्थापित करने वाले वैशाली के महादानवीर महाराजाधिराज शिलादित्य हर्षवर्धन जी को उनकी 1436वीं जयंती पर शत् शत् नमन ।
#क्षत्रिय_सम्राट_हर्षवर्धन_बैस#SamratHarshvardhanBais
आज हिंदी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर हम गाज़ीपुर उत्तर प्रदेश की भूमि पर जन्मे हिंदी पत्रकारिता जगत के महानायक सुरेंद्र प्रताप सिंह जी को नमन करते हैं।
हम आशा करते हैं कि हमारे समाज में भी युवक आपसे प्रेरणा लेकर पत्रकारिता जगत में सफलता हासिल करें।
On the auspicious occasion of Alha Jayanti (25 May 2026), Kshatriya Parishad extends its heartfelt greetings to the proud Banafar Rajputs, a distinguished sept of the Yaduvanshi Rajputs.
On this sacred day, we are also pleased to announce the launch of https://t.co/FDoClipw4n — a dedicated platform to preserve history and boost networking among Banafar rajputs.
https://t.co/4KFS8qNFbt
जय क्षात्र धर्म !
Samrat Prithviraj Chauhan was remembered with such pride that even 665 years after his death, the rebels of the Indian Rebellion of 1857 raised the slogan "Prithviraj Ki Jai" while marching to Red Fort against British rule.
Zee 5 OTT पर हाथरस 16 Days नाम की सीरीज़ रिलीज़ हुई है। मुझे लगता है कि यदि आप इसको देखेंगे तो आपको वही नरेटिव फिर से मिलेगा देखने को, जो लगातार मीडिया द्वारा दिखाया गया। सुशांत सिंह राजपूत मामले से सारा नेशनल मीडिया हाथरस पहुँच गया, देश का सबसे बड़ा मीडिया ट्रायल हुआ आरोपियों के ख़िलाफ़। उनको गिल्टी टिल फाउंड इनोसेंट माना गया, Retributive theory of punishment के तहत।
लेकिन इसके बाद भी चार में से तीन आरोपी बाइज्जत बरी हो गए, एक को ग़ैर इरादतन हत्या में जेल हुई। मैं सबसे पहले रिपोर्टर्स में से एक था जो हाथरस पहुंचे थे दिल्ली से। पूरा घटनाक्रम मीडिया की आँखों से अलग देखा, ग्राउंड रियलिटी कुछ और थी।
आप सबसे अनुरोध है कि मेरे द्वारा लिखी किताब “हाथरस फ़ाइल्स” ज़रूर पढ़ें अगर सच्चाई जाननी है तो।
Link: https://t.co/0Bvf3CxaGo
The memory of Samrat Prithviraj Chauhan was so cherished by Hindustanis that more than 665 years after his death, when the rebel troops of the 1857 freedom struggle marched on to The Red Fort to resist British imperialism, their slogan was : “ 𝐏𝐫𝐢𝐭𝐡𝐯𝐢 𝐑𝐚𝐣 𝐊𝐢 𝐉𝐚𝐢 ”.
महान क्षत्रिय सम्राट, देवतुल्य पृथ्वीराज चौहान के अवतरण दिवस की सभी को हार्दिक शुभकामनाएँ। सम्राट पृथ्वीराज दिल्ली राज्य के सम्राट थे, जिसकी सीमाएँ सरहिंद तक फैली थीं। कुछ फैक्ट्स जान लीजिए:
१) उस समय दिल्ली एक अलग राज्य था, देश की राजधानी नहीं।
२) पृथ्वीराज रासो एक काव्य है, इतिहास की किताब नहीं, ये समकालीन नहीं है क्योंकि इसमें १० प्रतिशत से ज़्यादा शब्द फ़ारसी हैं जो उस समय भारत में नहीं बोली जाती थी।
३) सम्राट पृथ्वीराज चौहान सम्राट अनंगपाल तोमर के दौहित्र नहीं थे, युद्ध के बाद तोमर राजपूतों से दिल्ली चौहान राजपूतों के पास गई।इसके बाद भी तोमर अप्रत्यक्ष रूप से सत्ता में रहे और उनकी सेना में कमाण्डर या सेनापति के ओहदे पर कई युद्ध लड़े। दिल्ली के पास के गाँव जैसे साठा-चौरासी में जो ८४ गाँव तोमर राजपूतों के हैं, वो उन्हीं तोमरों के वंशज हैं। क्षत्रियों को कालांतर में राजपुत्र फिर राजपूत और ठाकुर कहा जाने लगा।
४) सम्राट जयचन्द्र गहरवार से सम्राट पृथ्वीराज का कोई युद्ध नहीं हुआ था, ना ही सम्राट जयचंद ने मोहम्मद ghori को कोई हमला करने का न्यौता दिया था।
५) संयोगिता नाम की महिला का कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं है।
६) सम्राट पृथ्वीराज की सीमाएँ, सम्राट जयचंद्र के राज्य से नहीं मिलती थीं।
अधिक जानकारी के लिए सम्राट जयचन्द्र गहरवार पे बनायी गई ये विडियो ज़रूर देखें: https://t.co/A5cvWQZqLk
भूमिहार समाज से आने वाले कन्हैया कुमार पर देशद्रोही गतिविधियों में शामिल होने के आरोप के कारण गिरफ्तार करके जेल भेजा गया लेकिन जेल से आने के बाद भूमिहारों ने कन्हैया को अपने जात से बार (Ostracize) नहीं दिया। बल्कि इससे उलट भूमिहारों ने कन्हैया को हाथों हाथ लेकर प्रमोट किया। उदय शंकर, सतीश के. सिंह और अजीत अंजुम जैसे मीडिया में उच्च पदों पर आसीन भूमिहारों ने अपनी नौकरी दांव पर लगा कर कन्हैया को बाँकी खबरों को ब्लैक आउट करके नॉन स्टॉप दिखाया। फटेहाल माली हालत में कन्हैया को दिल्ली में सर्वाइव करने के लिए भूमिहार समाज से आने वाले जेएनयू के दर्जनों प्रोफेसर अपनी सैलरी का 1/10 हिस्सा हर महीना को देते थे। देशद्रोह का आरोप लगते समय कन्हैया भले सीपीआई के सदस्य थे लेकिन जदयू, कांग्रेस, राजद, सपा, भाजपा सहित सभी दलों के भूमिहार नेता प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से कन्हैया कुमार का साथ दिए थे। यहां तक कि जिस भाजपा सरकार ने कन्हैया कुमार के ऊपर देशद्रोही का मुकदमा दायर किया उस भाजपा के एमपी भोला सिंह कन्हैया को मीडिया के सामने आकर भगत सिंह कहे थे। यह होती है एक समाज की चेतना! भूमिहार समाज कन्हैया कुमार के पीछे मजबूती से खड़ा रहा तो उसको ब्राह्मण बुद्धिजीवियों का भी साथ मिला। दो समाज अपना इंटेलेक्चुअल कैपिटल लगाकर कन्हैया कुमार को नैशनल हीरो की तरह प्रोजेक्ट किया। तब जाकर मुसलमान कन्हैया के पीछे आए। भूमिहार समाज के कन्हैया के साथ पैसा, लॉबी के द्वारा बैक बोन की तरह खड़ा होने के कारण कन्हैया कुमार आज देश में भूमिहार समाज से आने वाला सबसे बड़ा चेहरा है। कन्हैया के बाद भूमिहार समाज के जो भी नाम हैं उनका दायरा बिहार, यूपी और झारखंड के कुछ जिले तक है, कन्हैया को पैन इंडिया में लोग जानते हैं।
भूमिहार समाज के उलट राजपूत समाज है। राजपूत समाज की बेटी और बहू नेहा सिंह राठौर मोदी विरोध की मुखर आवाज है। सरकार से सवाल करना देशद्रोह नहीं होता है। लेकिन राजपूत समाज के ज्यादातर युवा नेहा सिंह राठौर को देशद्रोही का सर्टिफिकेट बांटते रहते हैं। अरे भाई भारत में रहने वाला हर नागरिक देश भक्त है। कोई सोना या नशीली पदार्थ की तस्करी नहीं करता है, कश्मीर को भारत का अंग मानता है, बंदूक और बारूद की बात नहीं करता है, भारत के संविधान में विश्वास करता है तो उसके देशभक्ति पर क्वेश्चन मार्क लगाने का हक आपको किसने दे दिया है? इतना ही नहीं कई बेगैरत राजपूत ऐसे हैं जो नेहा और उसके पति हिमांशु सिंह को राजपूत मानने के लिए तैयार नहीं हैं। कुछ मूर्ख नेहा को तेली और उनके पति हिमांशु भैया को लोधी कहते हैं। नेहा सिंह राठौर और उनके पति 24 कैरेट राजपूत हैं। इसी तरह कई लोग संघी एजेंडा में आकर दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री आतिशी सिंह के नाम में मार्लेना लगे होने यहूदी कहते थे। संजय सिंह को जब टिकट ब्लैकिया कहा जाता है तो ये लोग मौन रहते हैं। यही कारण है कि पिछले दस साल में कन्हैया कुमार, चंद्रशेखर आजाद "रावण", जिग्नेश मेवानी जैसे दूसरे समाज के युवा अपने समाज के सपोर्ट के दम पर राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बनाकर स्थापित हुए हैं लेकिन इस लिस्ट में एक भी राजपूत युवा नहीं है। राजपूत समाज को अपने समाज की प्रतिभा को पहचानने का सेंस ही नहीं है। पता नहीं नैरेटिव के इस महीन खेल को मोटी बुद्धि वाले राजपूत कब समझेंगे। सारा खेल नैरेटिव का है। और नैरेटिव के इस खेल में सोशल और इंटेलेक्चुअल कैपिटल की बहुत महत्वपूर्ण भूमिका होती है। जो बुद्धिजीवी दिवंगत अमर सिंह को दलाल कहता है वही बुद्धिजीवी राजीव शुक्ला को चाणक्य से सुशोभित करता है। धीरू भाई अंबानी के पे-रौल काम करने प्रणव मुखर्जी ट्रबल शूटर हो गए और अमर सिंह दलाल! सारा खेल इंटरप्रेटेशन का है। राजपूत युवाओं को समझना चाहिए कि जिस नेहा सिंह राठौर को आप देशद्रोही कह रहे हैं वह भी आपके दिमाग में प्लांट करवाया गया है। नेहा सिंह राठौर दूसरे समाज की बेटी और बहू होती तो उसके समाज के लोग कांग्रेस, सपा, राजद में लॉबिंग करके मनोज झा, इमरान प्रतापगढ़ी की तरह राज्यसभा में भिजवा दिए होते।
:~ राजीव सिंह जादौन
कल अपने बचपन के मित्र जैन साहब के होटल के शुभारंभ समारोह में जाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उपहार स्वरूप मैंने उन्हें 24 तीर्थंकरों की सुंदर तस्वीर भेंट की। यह देखकर वे अत्यंत प्रसन्न हुए। वास्तव में, हमें सदैव ऐसे उपहार देने का प्रयास करना चाहिए, जिनमें हमारी परंपरा, संस्कृति और आध्यात्मिक मूल्यों की झलक दिखाई दे।
Gayatridevi's stepson , (Brig.) Bhavani Singh joined the Armed forces, raised the 10th Parachute regiment of the Indian Army, led from the front in the Battle of Chhachro (1971) as Colonel, became a Maha Vir Chakra recepient.
Compare it to Indira's sons. None of them joined Armed forces. Both were spoilt brats. One gave India Emergency, the other created LTTE. Indira herself created the Khalistan problem.
Most South Asian dynasties gracefully accepted their end, but the Kashmiri Pandit aristocratic family that lived under their shadows, climbed the ladder of power using the rhetoric of "ending dynasties", is yet to give up their own dynasty. Thus, weakening opposition and permanently harming democracy.
Aura belongs to those who silently worked over centuries and abdicated knowing that their time was over, not to those who grabbed power using rhetoric and now hold onto it using hypocrisy. Nehru's grandfather Gangadhar was a Mughal kotwal, his tau Nandlal was Diwan of Khetri estate, his wife's family were high officials in Jaipur State. Nehru-Gandhi family, which lived as aristocrats under many dynasties, is yet to make room for a competent leadership in INC. So much for their love of "democracy".