What an absolutely brilliant masterpiece ! I have seen a lot of movies,but never one so raw,so real, so poignant. Thought in Nawada, Shot in Nawada - the makers and actors should take a bow. It is on Youtube, please watch- it'll open portals into lives unknown.
मुंबई आकर समझ आया कि घर में बड़ी खिड़की का होना भी आपके जीवन में लग्ज़री का होना है. आपके फ्लैट में हॉल का थोड़ा सा बड़ा हो जाना जीवन में प्रतिष्ठित हो जाना है.
अगर सीलिंग दस फ़ीट से ज़्यादा है, तो बधाई हो…! आपका क़द दुनिया में ऊँचा हो चुका है। अगर घर में बालकनी है तो बस आप क़िला फ़तेह करने ही वाले हैं.
और अगर आपकी खिड़की से एक किलोमीटर दूर भी समन्दर दिखता है, तो आपको क्या टेंशन है ? सो जाइए। आप तो सी फ़ेसिंग में रहते हैं महाराज, अगला घर वर्ली-बांद्रा में लेने की सोच रहे हैं या अलीबाग में बंगला बनवाएँगे?
पिछले दिनों की बात है। एक ब्रोकर ने मेरे राइटर दोस्त को घर दिखाते हुआ कहा, “साहेब इस घर में धूप भी आती है…।”
मैनें मजाक किया, “अकेले आती है कि ब्वायफ्रेंड के साथ ?
ब्रोकर हँसने लगा… “मजाक नहीं सर, धूप आती है तभी वन बीएचके का किराया इकतीस हज़ार है और डिपाजिट डेढ़ लाख है.”
घर लेने गया मेरा लेखक दोस्त, जो उस समय “सोनम की सुहागरात” नामक साइंस फ़िक्शन फ़िल्म एक नए प्रोड्यूसर को बेचने के बाद पनवेल में फ़ार्म हाउस बनवाने के सपने देख रहा था, उसने कहा, “भैया ये थोड़ा ज़्यादा ही बड़ा घर हो गया. साइज छोटा करिए न. शादी भी नहीं हुई हैं, रात को अकेले डर लगता है. “
मैं हँसने लगा… और दोस्त की भावना का अनुवाद किया. जिसका भावार्थ ये था कि भैया ये डार्क कहानी लिखने वाला राइटर है, इसको धूप से एलर्जी हैं. इसकी स्किन को म्हाडा वाले अंधकारमयी घर ही शूट करते हैं. पच्चीस हजार तक में दिखाइए.”
बहरहाल. मजाक से इतर…
पिछले एक साल से जब भी मुंबई से बलिया जाता हूँ, ये किस्सा याद आ जाता है। तीस पर मेरी माँ नीचे से चिल्लाती है, “दिन भर छतवा पर का करेला हो ?”
अब माँ को कैसे समझाऊँ कि माँ तुम्हारे छत पर जो है. वो इस देश के करोड़ों लोगों को बड़े नसीब से मिलता है..थोड़ा छत पर खड़े हो लेने दो. निहार लेने दो इस चढ़ते चैत को.
देखो न, सारे पंत, निराला मेरे सामने नाँच रहे हैं. किट्स और मिल्टन कविताएँ लिखने बैठे हैं. जरा सा रुको. क्या ये छपरा जाने वाली छह बजिया सिटी बजा रही है ? तब तो केदारनाथ सिंह मांझी के पुल पर बैठकर लिख रहे होंगे.
“मेरी बस्ती के लोग सिर्फ़ इतना जानते हैं
कि दुपहर की धूप में
जब किसी के पास कोई काम नहीं होता
तो पके हुए ज्वार के खेत की तरह लगता है
माँझी का पुल”
लेकिन जानता हूँ कि माँ नहीं देख सकती माँझी के पुल को, पके हुए ज्वार के खेत की तरह..सोचता हूँ कि ये सब कहने से भी क्या ही फ़ायदा. माँ को इसका महत्व कभी समझ नहीं आएगा. बहुतों को समझ नहीं आता.
आदमी का स्वभाव ही अजीब है. जब तक किसी चीज का अभाव न हो आदमी उसके महत्व को स्वीकार नहीं कर पाता.
लेकिन मुझे समझ आ गया है कि आज आपको साफ़ हवा, आसमान और खेत नसीब है, तो बधाई हो प्रभु…. आप एक लग्ज़री लाइफ़ जी रहे हैं. 😄
अतुल
बलिया
(तस्वीर अपने घर की छत से )
बस्ता बंद
प्रशांत किशोर ने कहा था कि जन सुराज अर्श पर होगी या फर्श पर। दूसरे वाला सही निकला। फर्श पर संभावनाएं हैं। ज़मीन से जुड़े रहेंगे। अर्श वालों को धड़ाम से गिरने की आशंका बनी रहती है। फर्श वाले मस्त सोते हैं, ज्यादा लोगों से गले मिलते हैं, हाथ मिलाते हैं। बिहार के लोग सतहत्तर साल से फर्श पर मस्त सोते हैं और अर्श के ख्वाब देखकर उठते हैं। सामान पैक करते हैं और ट्रेन से जहां काम है वहां चल निकलते हैं। हर पाँच साल इनको अर्श के सपने दिखाए जाते हैं। चाव से देखते हैं, चुनाव से देखते हैं। घर से घाव को लगाव से देखते हैं। समृद्धि के सपने अभाव से देखते हैं। फिर अचानक एक तमन्ना हवा में उछाल देते हैं। और एक ख्वाहिश बस्ते में डाल देते हैं।
@varungrover लेखक के पास समदृष्टि होता है पर आजकल वे दृष्टिबाधित या काने हो गए हैं। स्त्री दैहिक स्वतंत्रता की बात करने वाली दिपिका जी हिजाब पहनकर आबु धाबी टूरीस्म का प्रचार करती हैं तो आप चुप रहते हैं। क्या आप बायीं आंख के काने हैं। आप ही पावरजीवी हैं, आत्मपरीक्षण किजीए।
@kamleshksingh
@varungrover इस पॉडकास्ट को हमलोग प्यार से threpautic bullshit बुलाते हैं, वरुण भाई, 10 मिनट के क्लिप से किसी कनक्लूजन पर पहुंचना नासमझी है, आपकी 250 एपिसोड्स के पत्रों को सुनिएगा तो पता चलेगा कि इसके वजह से न जाने कितने लोग डिप्रेशन जैसी समस्या से बाहर निकले हैं, उम्मीद है आप समझेंगे
धन्यवाद! @TheNewspinch ये डॉक्यूमेंट्री तमाम सरकारों के मुंह पर तमाचा है, जो अपने आप को गरीबों का मसीहा कहते हैं या फिर विश्वगुरु कहते हैं या जन नायक, 75 वर्ष बीत चुके हैं, फिर भी ये हाल है। ऐसे ही समाज के ठेकेदारों को आईना दिखाते रहिए, शुभकामनाएं @Abhinav_Pan और टीम
प्याला उसके हाथ से नहीं लेने से कुछ नहीं होगा, अगर तुम मैक़दे में थे तो वाइज़ नहीं रहे। तुमको हम रिंदों में गिनेंगे। इस करतूत के कमज़र्फ कारिंदों में गिनेंगे। हाथ न मिलाने, बेतबाज़ी जीत जाने से दामन का दाग नहीं मिटता, शेख़ जी। तुम्हारी लानती लत लहू सूखने के पहले तुम्हें महफ़िल में ले गई। ये कैसे भूल पाओगे। सिंदूर के सिपाही नहीं हो तुम। तुम्हारा नाम उसके गुनाहगारों में गिनेंगे। बिन प्याले का जश्न मुबारक बिन पेंदे के लोटों को। गिनते रहिए रुपए डॉलर दिरहम वाले नोटों को।
Happy Birthday Comrade❣️
डियर कॉमरेड,
तुम्हारा जन्म दिन आ गया है और हर साल की तरह इस बार भी तुम बहुत याद आए। रम के पेग अकेले लगाने की तमन्ना नहीं है लेकिन तुम्हारी ग़ैर मौजूदगी में कोई और चारा भी नहीं है। उम्मीद है बिस्मिल,अशफ़ाक, राजगुरु, सुखदेव, बटुकेश्वर और आज़ाद के साथ कल रात अच्छी पार्टी हुई होगी। तुम से तो यह भी नहीं पूछ सकता कि जन्नत कैसी होती है, तुम तो नास्तिक हो। क्या पता तुम इंद्र की सभा में भी किसी दिन बम फेंक आओ। पिछले साल तुम्हारी जेल डायरी मिली थी, यार गज़ब की किताबें पढ़ते हो, और ये बताओ बिना इंटरनेट के इतनी किताबें मिल कैसे जाती थीं तुम्हें? लाइब्रेरियन को कैसे मना लेते थे? यहाँ तो अब न लाइब्रेरियन है न लाइब्रेरी है। ख़ैर छोड़ो! आज तो कॉमरेड, तुम्हारा जन्म दिन है, कुछ तुम्हारी बात करता हूँ। मुझे लाहौर का हाल चाल मिला, कुछ दोस्त सरहद उस पार बनाए हैं मैंने, तुम्हारा घर लायलपुर बिलकुल महफूज़ है वहाँ और लाहौर यूनिवर्सिटी भी, कभी आना तो साथ में पंजाब घूमेंगे। खेतों में बंदूक़ वाली फ़सल अभी भी बाक़ी है लेकिन गुज़रे दिनों खेतों में कुछ काले कानून उग आए थें, उनको साफ़ किया है। बिस्मिल से कहना की गोरखपुर उनको रोज़ याद करता है, आज़ाद कंपनी गार्डन में अगर कभी टहलने आएँ तो बता देना मैं भी सुबह जल्दी उठ कर सैर पर निकल पडूँगा। ख़ैर! तुम को एक नई बात बताता हूँ, तुम हिंदुस्तान से प्यार करते हो लेकिन अब लोग हिंदुस्तान बोलने में शर्म महसूस कर रहे हैं, कुछ बुरा हो गया है तुम्हारे हिंदुस्तान के साथ लेकिन घबराने की ज़रूरत नहीं है कॉमरेड, हम हैं ना, लड़ रहे हैं, तुम्हारे जज़्बे के साथ। तुम्हारा ड्रीम लैंड हमारा होम लैंड है ।
पिछली बार तुमने पूछा था गांधी के हत्यारों का क्या हुआ?
कॉमरेड, ये सवाल तुम न ही पूछते तो अच्छा था। तुम्हारा तहरीर किया ग़ालिब का शे'र याद आया -
बाज़ीचा-ए-अतफ़ाल है दुनिया मिरे आगे
होता है शब-ओ-रोज़ तमाशा मिरे आगे
अच्छा एक बात तो बतानी ही रह गई है, मैंने पिछले साल फिलोसॉफी पढ़नी शुरू की है, तुम्हारी तरह किताबों का शौक़ पाल लिया है । कुछ कुछ लिखता भी रहता हूँ, अगर कभी ग़ालिब और मीर से फुरसत मिले तो काफ़ को मौक़ा देना, तुमको अपनी ग़ज़लें सुनाने का बहुत मन है। इस सिलसिले में पिछले हफ़्ते मैंने एक ख़ाब भी देखा है, लाहौर यूनिवर्सिटी में किसी शाम तुम एक जो़रदार भाषण देकर सीढ़ियों से उतर रहे हो और दोस्तों ने तुमको घेर रखा है, तुम मेरे साथ कैम्पस से बाहर आते हो और हम किसी खुफ़िया जगह पे ओल्ड मॉन्क के पेग लेकर बैठे हैं तुम ग़ालिब की ग़ज़ल सुना रहे हो और आज़ाद दाद दे रहे हैं। पंडित शराब की बात पर बिस्मिल हो गए हैं। और फिर तुम मुझसे कहते हो काफ़ कोई ग़ज़ल सुनाओ जानी।
कॉमरेड तुम याद आते हो, बेशुमार याद आते हो ।
तुम्हारा जानी
काफ़
https://t.co/SQ8CMb5jg6
मेरे मित्र @Nirarthak25 के द्वारा रेणु के पुस्तक ऋणजल - धनजल की समीक्षा की गई है, पुस्तक प्रांत की भाषाओं और संस्कृति की एक विशेष झलक प्रस्तुत करती है, बाढ़ और सुखाड़ से जुझते राज्य के लोगों के विडम्बना को जानने के लिए ये पुस्तक अवश्य पढ़ें।
#हिंदी
Acute shortage of blood at BJMC Ahmedabad…#Urgent Appeal for blood 🩸 donation 🙏
Blood Donation Centers: 🚨
1. U. N. Mehta Institute of Cardiology and Research Centre
Room no 110, 1st floor, A block
Contact no -9316732524
2. IHBT Department, Civil Hospital
2nd floor, 1200 bed Civil Hospital,
Contact no- 9428265409
3. IKDRC Blood Centre
1st floor, IKDRC Hospital,
Manjushree mill road, Baliya limdi
Contact no- 07922687500
Ext no-4226
4. GCRI Blood Centre
1st floor, Gujarat cancer & Research institute
Contact no-07922688026
#bjmc #AhmedabadPlaneCrash
सड़क पर चल रही विजय यात्रा फुटपाथ को मुंह चिढ़ा रही थी. सड़क पर IIT पहुंचने वाले बच्चों के गले में गेंदा की माला थी और फुटपाथ के बच्चे के मुंह में पॉलीथीन. सफेद टीशर्ट पहना लड़का आसमान निहार रहा था और फुटपाथ पर आवारा घूमने वाला बच्चा उस लड़के को. सड़क और फुटपाथ के बीच की खाई बहुत गहरी है.
इस खाई पर जाति का पुल नहीं टिक सकता जिसमें सिर्फ आरक्षण के पार्ट पुर्जे लगे हों. आरक्षण का नट बोल्ट इतना टाइट होता तो न जाने इस खाई को कितनी बड़ी आबादी पार कर गई होती. फुटपाथ पर अभी भी गुरबत की जात एक सी ही है.
मुद्दा इस खाई को भरने का होना चाहिए.
📍पटना , बिहार
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