'तुम्हारे महल चौबारे
यहीं रह जाएँगे सारे
अकड़ किस बात की प्यारे?
ये सर फिर भी झुकाना है।...
सजन रे, झूठ मत बोलो
ख़ुदा के पास जाना है
न हाथी है, न घोड़ा है
हमें पैदल ही जाना है।'
~ शैलेन्द्र
पर होता है इसका ठीक उलटा
कोई-न-कोई, कहीं-न-कहीं, कभी-न-कभी
ऐसा मिल जाता
जिससे प्यार किए बिना रह ही नहीं पाता
दिनोंदिन मेरा यह प्रेम-रोग बढ़ता ही जा रहा
और इस वहम ने पक्की जड़ पकड़ ली है
कि वह किसी दिन मुझे
स्वर्ग दिखाकर ही रहेगा। ❤️
कितना दुष्कर है अपनों को समझाना और उससे भी अधिक दुष्कर है ख़ुद को समझाना। जीवन में विकल्पों के लिए अवकाश कम है। बेहद अजीज़ और प्रिय कवि कुंवर नारायण की कश्मकश याद आ रही।
हर समय
पागलों की तरह भटकता रहता
कि कहीं कोई ऐसा मिल जाए
जिससे भरपूर नफ़रत करके
अपना जी हल्का कर लूँ