इंसानी तारीख में पहले ब्लैक फ़ायर पायलट, नाइज़ीरिया के अहमद अली इज़मर्ली थे। वो 1911 में एक ऑटोमन पायलट थे। उस समय यूरोप और अमेरिका में स्याह (काले) लोगों को तअलीमी इदारों में दाख़िला नहीं मिलता था उनके साथ लोग खाना नहीं खाते थे, ना पास में बैठते थे। उस दौर में इन सब मुश्किलों बंदिशों और नस्लपरस्ती के बीच एक स्याह (काले) का पायलट बनना अपने आप में एक फ़ख़्र की बात थी जो अहमद अली ने कर दिखाया था।
शाहजहांपुर में खेतों के बीच मौजूद ये गुमनाम कब्र जंग ए आज़ादी के अज़ीम रहनुमा मौलवी अहमदुल्लाह शाह फैजाबादी की है। हमारे ख्याल में इनका नाम आखिरी बार आपने तब सुना होगा जब अयोध्या में बनने वाली मस्जिद को इनके नाम पर बनाने की कवायद शुरू हुयी थी।
बीते दिनों 5 जून 1858 को 1857 के फौलादी शेर मौलवी अहमदुल्लाह शाह फैजाबादी को शाहजहांपुर जिले की पुवायां रियासत के विश्वासघाती राजा जगन्नाथ सिह के भाई बलदेव सिंह ने धोखे से गोली मार कर शहीद कर दिया था। 1857 के इंकलाब के दौरान मौलवी अहमदुल्लाह शाह शुमाली हिन्दुस्तान की एक अहम् शख्सियत थे। अग्रेंज उन्हें लाख कोशिशों के बाद भी कभी जिंदा नहीं पकड़ सके थे। अपने हर मंसूबों में नाकामयाब होने के बाद अंग्रेजों ने उनके सर की कीमत 50.000 रूपये रख दी। जिसके लालच में मुल्क के गद्दारों ने उन्हें शहीद कर दिया।
मौलवी अहमदउल्ला शाह की पहचान 1857 के इंक़लाब के दौरान एक फौलादी शेर के रूप में होती थी। 1857 का इंकलाब कामयाब तो नहीं हो सका लेकिन इस इंकलाब ने हर एक हिंदुस्तानी के दिल में आज़ादी का जो बीज बोया उसी वजह से 1947 में आज़ादी मिल सकी। लेकिन आज 1857 का वह शेर जिसने आज़ादी की दीवानगी में अपनी जान की क़ुरबानी दे दी तारीख़ के पन्नों से शायद कहीं गुम हो गया है। अहमदुल्ला का परिवार हरदोई ज़िले के गोपामऊ गावं में रहा करता था। उनके वालिद गुलाम हुसैन खान मैसूर के सुल्तान हैदर अली की फौज में एक सीनियर ऑफिसर थे।
मौलवी अहमदउल्ला शाह का मानना था कि सशस्त्र विद्रोह की कामयाबी के लिए, अवाम का सहयोग बहुत ज़रूरी है। उन्होंने दिल्ली, मेरठ, पटना, कलकत्ता और बहुत सारी जगहों का सफर तय किया और आजादी के बीज बोए। मौलवी और फजल-ए-हक खैराबादी ने भी अंग्रेजों के खिलाफ जिहाद का ऐलान कर दिया। उन्होंने 1857 में बगावत के आगाज़ से पहले भी अंग्रेजो के खिलाफ जिहाद की ज़रूरत के लिए फतेह इस्लाम नामी एक किताब लिखी थी।
जी बी मॉलसन के मुताबिक, "इस में कोई शक नहीं है कि 1857 की बगावत के साजिश के पीछे मौलवी का ज़ेहन और कोशिश अहम् थी। मुहीम के दौरान रोटी की तकसीम, चपाती तहरीक दरअसल इन्ही की ज़ेहनी सोच थी।
जी बी मॉलसन के मुताबिक जब मौलवी पटना में थे तभी ब्रिटिश अफसरों ने ख़ुफ़िया मालूमात के ज़रिये उन्हें पुलिस की मदद से उनके घर से ही गिरफ्तार कर लिया था। इसके बाद उन को ब्रिटिश हुकूमत के खिलाफ बगावत और साजिश के इलज़ाम में मौत की सजा सुना दी गयी। बाद में इस सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया गया। लेकिन बगावत फैलने के बाद बागी सिपाहियों ने जेल को तोड़ कर उन्हें आज़ाद करा लिया।
इसके बाद अंग्रेज कभी उन्हें ज़िंदा नहीं पकड़ सके थे। अंग्रेजों ने उन्हे पकड़ने की कई साजिशें रची लेकिन सभी में नाकामयाब होने के बाद उनके सर की कीमत रख दी गयी 50,000 रूपये। इसी कीमत के लालच में शाहजहांपुर जिले की पुवायां रियासत के विश्वासघाती राजा जगन्नाथ सिंह के भाई बलदेव सिंह ने 15 जून, 1858 को तब धोखे से गोली चलाकर मौलवी की जान ले ली, जब वो अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में मदद मांगने उसके किले पर गए थे।
उसने मौलवी का सिर कटवाकर रूमाल में लिपटवाया और शाहजहांपुर के कलेक्टर के हवाले कर के उससे कीमत वसूल ली। कलेक्टर ने उस सिर को शाहजहांपुर कोतवाली के गेट पर लटकाकर प्रदर्शित किया ताकि जो लोग उसे देखें, वो आगे से सिर उठाने की जुर्रत न करें।
लेकिन कुछ वतनपरस्तों ने अपनी जान पर खेलकर मौलवी का सर वंहा से उतार लिया। और पास के लोधीपुर गांव के एक छोर पर पूरे अक़ीदत और एहतराम के साथ दफ़न कर दिया। वहीं दूर खेतों के बीच आज भी मौलवी की मजार मौजूद है। जहां एक अजब सी ख़ामोशी है। एक ऐसा सिपाही जिसने मुल्क की आज़ादी के लिए अपनी जान कुर्बान कर दी शायद आज वो तारीख के पन्नों में कहीं गुम हो गया है.....
जब राजपूतों ने इस्लाम स्वीकार किया, तो दिल्ली के बादशाहों ने उन्हें “ख़ानज़ादा” (यानी “बादशाह/शासक का बेटा”) की उपाधि दी, जो इस्लामी दौर में “राजपूत” (राजवंश में जन्मे) का समकक्ष मानी जाती थी।
वैसे में कई ख़ानज़ादे यानी मुस्लिम राजपूत बिहार के इलाक़े में हाकिम की हैसियत से रहे हैं -
- 1576 में हुए राजमहल (झारखंड) की जंग में दाऊद ख़ान किरारानी की मौत के बाद मुग़लों के ख़िलाफ़ मोर्चाबंदी करने वाले और बिहार और बंगाल इलाक़े पर लगातार विद्रोह का झण्डा बुलंद रखने वाले ईसा ख़ान बैस के दादा अयोध्या के बैस राजपूत थे, जिन्होंने इस्लाम क़बूल कर लिया था। और बंगाल की हुसैन शाही और सूरी राजवंश में सीधी शादी से इस परिवार ने अपना क़द काफ़ी बढ़ा लिया और लंबे समय तक इलाक़े पर अपना असर रखा।
- किनवार राजपूत वंश से ताल्लुक़ रखने वाले खड़गपुर हवेली राज (मुंगेर) के राजा तोरल मल ने मुग़लों के दौर में इस्लाम क़बूल किया और रोज़ अफ़ज़ूँ के नाम से जाने गए और दो हज़ारी मनसबदार हुए। रोज़ अफ़ज़ूँ का बेटा राजा बहरोज़ शाहजहाँ का समकालीन था और शाहजहां के के लिए कई सैन्य अभियान कर विद्रोहियों को शांत किया। उस समय खड़गपुर हवेली राज बिहार का सबसे बड़ा राज्य था जिसमें झारखंड सहित आधा बिहार आता था।
- परसौनी राज (सीतामढ़ी) की स्थापना सिसोदिया राजपूत ख़ानवादे से ताल्लुक़ रखने वाले परदिल सिंह ने 1615 में की थी, जिन्होंने मुगलों के लिए इस इलाक़े के एक बाग़ी को ख़त्म जागीर पाई और इस्लाम क़बूल कर“राजा परदिल ख़ान” की ख़िताब हासिल किया। काफ़ी लंबे समय तक यहाँ हुकूमत करने के बाद उनका इंतक़ाल 1696 में हुआ और उन्हें बेलसंड के पास सरैया में दफ़नाया गया, जहाँ उनकी क़ब्र आज भी मौजूद है। उनके बाद उनके वारिसों ने गद्दी संभाली, उसी में एक हुए बसावन ख़ान, जिन्होंने अपनी ताक़त के दम पर नेपाल के तराई क्षेत्र के एक बड़े हिस्से पर क़ब्ज़ा कर लिया। और तुर्कि इलाक़े को अपनी राजधानी बनाया। उनके बेटे ग़ुलाम मुर्तज़ा ख़ान के समय नेपाल और ब्रिटिश भारत के बीच सीमा निर्धारित की गई, जिसके नतीजे में परसौनी राज को 1,400 गाँवों का नुक़सान उठाना पड़ा, क्योंकि यह तय किया गया कि वे गाँव नेपाल में आते हैं।
कहा जाता है कि ग़ुलाम मुर्तज़ा ख़ान को मुआवज़ा देने की पेशकश की गई थी, लेकिन उन्होंने इसे ठुकरा दिया और इस आश्वासन से संतुष्ट रहे कि यदि ये गाँव भविष्य में ब्रिटिश क्षेत्र में आ जाते हैं, तो उसके वंशजों को दे दिया जाएगा। ग़ुलाम मुर्तज़ा ख़ान के बाद उनके भाई बनई ख़ान ने गद्दी संभाला और तुर्की स्थित गढ़ के बाढ़ में बह जाने के बाद वह परसौनी आकर बस गए। बिहार सरकार के पूर्व मंत्री नसीरुद्दीन हैदर ख़ान इसी परिवार से ताल्लुक़ रखते हैं।
- 17वीं सदी में पंजाब के मायी राजपूत परिवार के मुखिया नुराओं ख़ान इस्लाम क़बूल करने के बाद अपने ख़ानदान के साथ पंजाब से आ कर अज़ीमाबाद, बिहार में बस गए थे। नुराओं ख़ान के दो बेटे थे। अजमेरी ख़ान और दयानत ख़ान। ये देखने में अच्छे क़द-काठी के थे। अपनी ताक़त का जौहर दिखा कर इन दोनों भाइयों ने मुग़ल बादशाह फ़र्रुख़सियर, जो उस वक़्त पटना में कैंप कर रहे थे, उनसे सीधे छह परगना के टैक्स वसूल करने का फ़रमान हासिल कर लिया।
टैक्स से इनके पास काफ़ी नगद रूपया आने लगा, जिससे इन्होंने बड़ी फ़ौज खड़ी कर ली। दयानत ख़ान के लड़के हुए - कामगार ख़ान, नामदार ख़ान, सूबेदार ख़ान, वारिस अली ख़ान। ये लोग अपनी फ़ौज के बल पर बहुत बड़े ज़मीनदार बन गए। वे कोडरमा सहित दक्षिण बिहार के लगभग सम्पूर्ण भाग पर अपना कब्ज़ा जामा लिया था। उस समय के नरहट परगना का मुख्यालय हिसुआ (नवादा) था। इनके आख़री लीडर राजा अकबर ख़ान हुए, जिन्होंने 1781 में अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ हुए युद्ध में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था।
- इसके इलावा चंदेल राजपूत गिघौर राजवंश (जमुई) के संस्थापक बीर बिक्रम सिंह की 21वीं पुश्त राजा प्रताप नारायण सिंह जो गिधौर की एक शाख़ जमुई में मौजूद मिर्चा स्टेट के राजा थे, ने इस्लाम क़बूल कर अपना नाम राव अब्दुर रहमान कर लिया था। इनके वारिस आज भी जमुई में पाए जाते हैं और मिर्चा मस्जिद इसी परिवार ने बनवाई है।
- वैसे ये तो राजवाड़ों में से थे। इसके इलावा बिहार में बड़ी संख्या मुस्लिम राजपूत जागीरदार शाहाबाद इलाक़े में हुए। लेकिन ये ऊपर बताए गए परिवार जैसा रुतबा नहीं पा सके। इसके इलावा बिहार के अलग अलग इलाक़ों में मुस्लिम राजपूत ख़ानज़ादे आबाद हैं, जिसमे बिहार का चित्तौड़ कहलाने वाला पटना ज़िला का बाढ़ क़स्बा भी एक बड़ी मुस्लिम राजपूत की आबादी रखता है। उर्दू के मशहूर शायर ग़ुबार भट्टी भी मुस्लिम राजपूत हैं, इसके इलावा बिहार सरकार में मंत्री ज़माँ ख़ान भी मुस्लिम राजपूत हैं।
Umar Ashraf
यूँ तो दिल्ली शहर कई बार उजड़ा और कई बार बसा ये महज एक शहर नहीं बल्कि कल भी ये हुक्मरानो का ख्वाब था और आज भी एक ख्वाब है। जिसके पास दिल्ली उसका सारा हिन्दोस्तान यही रिवायत आज भी बरक़रार है। बहरहाल मौका ईद अल-अज़हा यानि कुर्बानी की ईद का है। तो दिल्ली में एक ईद ऐसी भी गुजरी जिसमें दिल्ली वालों के कई अपने ही कुर्बान हो गए। दरअसल बात है 1739 की जब करनाल में मुग़ल फौज को शिकस्त देने और बादशाह मुहम्मद शाह को कैदी बना लेने के बाद नादिर शाह आज के रोज ही दिल्ली में दाखिल हुआ था। अगले दिन ईद अल-अज़हा थी उसने दिल्ली की तमाम मस्जिदों में अपने नाम का खुत्बा पढ़वाया और टकसालों में उसके नाम के सिक्के ढाले जाने लगे। अभी चंद ही दिन गुज़रे थे कि शहर में अफवाह फैल गई कि एक तवायफ़ ने नादिर शाह को क़त्ल कर दिया है।
दिल्ली के लोगों ने इससे शह पाकर शहर में तैनात ईरानी सिपाहियों को क़त्ल करना शुरू कर दिया। इसके बाद जो हुआ वो तारीख के पन्नों पर कुछ यूं बयां हैं-
"22 मार्च 1739 का दिन था, सूरज की किरणें अभी अभी मशरिक़ी आसमान से फूटी ही थीं कि नादिर शाह दुर्रानी अपने घोड़े पर सवार लाल क़िले से निकल आया। उसका बदन ज़र्रा-बक़्तर से ढका हुआ था और सर पर लोहे का कवच और कमर पर तलवार बंधी हुई थी उसके कमांडर और जरनैल भी उनके साथ थे। उसका रुख आधा मील दूर चांदनी चौक में मौजूद रोशनउद्दौला मस्जिद की ओर था। मस्जिद के बुलंद सहन में खड़े हो कर उसने तलवार म्यान से निकाल ली।"
ये उसके सिपाहियों के लिए इशारा था। सुबह के नौ बजे क़त्ल-ए-आम शुरू हुआ। ईरानी सिपाहियों ने घर-घर जाकर जो मिला उसे मारना शुरू कर दिया। इस दौरान इतना खून बहा कि नालियां सुर्ख हो गयीं। लाहौरी दरवाज़ा, फ़ैज़ बाज़ार, काबुली दरवाज़ा, अजमेरी दरवाज़ा, हौज़ क़ाज़ी और जौहरी बाज़ार के घने इलाक़े लाशों से पट गए।
हजारों औरतों का बलात्कार किया गया, सैकड़ों ने कुओं में कूद कूद कर के अपनी जान दे दी। कई लोगों ने ख़ुद अपनी बेटियों और बीवीयों को क़त्ल कर दिया ताकि वो ईरानी सिपाहियों के हत्थे न चढ़ जाएं।
आनंद राम मुख्लिस अपनी किताब तज़किरा में ज़िक्र करते हैं - कुछ जगह मुखालफत की कोशिश की गयी थी। लेकिन ज्यादातर जगह पर लोगों को बिलावजह कत्ल कर दिया गया था। पारसियों ने तशद्दुद की सारी हदें पार कर दी थीं। एक तवील अरसे तक गलियां लाशों से ऐसी पटी पड़ीं थीं जैसे किसी बाग़ में बेजान पत्तियों और फूलों सी। शहर राख में तब्दील हो गया था।
मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह को रहम की भीख मांगने के लिए मजबूर किया गया था इन भयानक घटनाओं को समकालीन इतिहास में दर्ज किया गया है- जैसे रुस्तम अली की तारिख-ए-हिंदी, अब्दुल करीम के बयान-ए-वाक़ई और आनंद राम मुखलिस की तज़किरा में।
अकसर तारीख के हवालों के से ऐसा कहा जाता है की उस दिन तीस हज़ार दिल्ली वालों को मौत के घाट उतार दिया गया था। आख़िर मोहम्मद शाह ने अपने वजीरे आजम को रोशन-उद्दौला मस्जिद में नादिर शाह के पास भेजा। कहा जाता है कि वजीरे आजम नंगे पांव और नंगे सिर नादिर शाह के सामने पेश हुए और फ़ारसी में ये शेर पढ़ा-
“और कोई नहीं बचा जिसे तू अपनी तलवार से क़त्ल करे...सिवाए इसके कि मुर्दा को ज़िंदा करे और दोबारा क़त्ल करे”
इस पर कहीं जाकर नादिर शाह ने तलवार दोबारा म्यान में डाली।
#EidAlAdha #delhi
आज के दिन ही, 26 मई 1702 ई. में 64 साल की उम्र में सलीमगढ़ किले में उम्रकैद की सजा काट रही मुगल बादशाह औरंगजेब आलमगीर की सबसे बड़ी बेटी जेब उन निसा की मौत हो गयी थी। मौत के बाद उन्हें कश्मीरी दरवाजे के बाहर तीस हजारी बगीचे में दफन किया गया था लेकिन जब दिल्ली में रेलवे लाइन बिछाई गयी तो उनकी कब्र को उनके नक्शो-निगार के साथ सिकंदरा में अकबर के मकबरे में मुंतकिल कर दिया गया था।
शहज़ादी ज़ेब-उन-निसा बेगम मुग़ल बादशाह औरंगजेब की सबसे बड़ी बेटी थीं और उनके तमाम बच्चों में सबसे पसंदीदा थीं। जैसा की उस दौर में शाही ख़्वातीन का रिवाज़ था, उनकी तालीम का खास ख्याल रखा जाता था। वह सूफियाना ज़ेहनियत रखती थीं और अक्सर फ़ारसी में काफी खूबसूरत अशआर लिखा करती थीं, अब चूंकि उनके वालिद औरंगज़ेब को मौसिकी और शायरी का शौक नहीं था, तो अक्सर उन्हें छिप-छिपाकर लिखना पड़ता था।
ज़िन्दगी के शुरूआती मरहले में तो वह अपने वालिद के लिए बेहद अज़ीज़ थीं, उनके वालिद औरंगज़ेब हर ज़रूरी मुआमलात में उनसे राय जरूर लिया करते थे, लेकिन वक्त के साथ-साथ उनके ख्यालात बदलने लगे और ज़िन्दगी के 40वें दशक में वो कुछ ऐसा कर गुजरीं जो उनके वालिद जिल्ले सुब्हानी को रास न आया वो इतने खफा हुए की अपनी हरदिलअजीज बेटी को ताउम्र कैद में रखने का फरमान जारी कर दिया था।
उनकी खता क्या थी ये तो वाजेह नहीं है लेकिन तारीखदानों का कहना है की किसी के साथ उनका अफेयर था जो की उनके वालिद को नागवार गुजरा। जबकि कुछ इस बात से इत्तेफाक रखते हैं की शहजादी ने औरंगज़ेब के बागी बेटे शहजादा अकबर से उसकी बगावत के दौरान खतो-किताबत की थी। वजह जो भी रही हो औरंगज़ेब ने उसके बाद उनकी सारी दौलत जब्त कर ली और उनकी 4 लाख की सालाना पेंशन भी मंसूख कर दिया।
शहजादी को तारीख में एक शायरा के तौर पर याद किया जाता है। उनकी तहरीरें बाद-ए-अज़मर्ग दीवान-ए-मख़फ़ी के नाम से जमा की गयीं थीं।
"वो पहली ब्रिटिश ख़ातून जिन्हें मस्जिद-अल-हरम की ज़ियारत और हज करने की सआदत हासिल हुई"
तस्वीर में दिख रही ख़ातून लेडी एवलीन कॉबोल्ड हैं। ये 1867 में स्कॉटलैंड के एक छोटे से शहर में पैदा हुईं थी। इनकी बचपन की ज़िंदगी बहुत दिलचस्प है। एवलीन एक रईस और मालदार परिवार से तअल्लुक़ रखती थीं। वो ख़ुद एक बेहद हुनरमंद और शौक़ीन ख़ातून थीं। उन्हें शिकार करना बहुत पसंद था। उनका बचपन और ज़िंदगी का एक बड़ा हिस्सा अफ़्रीक़ी मुस्लिम मुमालिक (ख़ासकर लीबिया और क़ाहिरा) में गुज़री है। वो अपनी छुट्टियां परिवार के साथ अफ़्रीक़ी मुस्लिम मुमालिक में गुज़ारती थीं। उन्हें मुस्लिम कल्चर बहुत पसंद आने लगा था। मुसलमानों के ख़ुलूस अख़्लाक़ ने उन्हें काफ़ी मुतअस्सिर किया। उन्हें अरबों से इतना लगाव हो गया था कि वो अरेबिक बोलना सीख लीं, मुक़ामी मुस्लिम बच्चों के साथ वक़्त गुज़ारती थीं और उनकी देखभाल आया/मां की तरह करती थीं।
लेडी एवलीन कॉबोल्ड ने इस्लाम क़बूल करने के बाद अपना नाम ज़ैनब कॉबोल्ड रख लिया था। वो अपनी किताब "The Pilgrimage To Mecca" में लिखती हैं।
"मैं अपनी छुट्टियां गुज़ारने जब अफ़्रीक़ी मुमालिक में जाती थी। मुझे सबसे ज़्यादह ख़ुशी तब मिलती थी जब मैं अपने हुकुमती मुहाफ़िज़ (सिक्योरिटी गॉर्ड) से बचकर वहां के दोस्तों, बच्चों से मिलती थी और उनके साथ मस्जिद जाती थी। मुझे बहुत ज़्यादह शऊर तो नहीं था लेकिन मैं दिल से एक इब्तदाई मुस्लिम थी। लेडी ज़ैनब का इस्लाम में दाख़िल होने का ऐलान करना भी दिलचस्प था। उन्होंने इस्लाम अपनाने का ऐलान पोप से मुलाक़ात पर की थी। वो अपनी किताब में लिखती हैं...
"एक बार पोप से मेरी मुलाक़ात हुई तब पोप ने मुझसे एक सवाल किया और पूछा क्या आप कैथोलिक हैं? मैं पोप के इस सवाल से हैरान और बेचैन हो गई लेकिन मेरे दिल ने मुझे संभाला और मैंने जवाब में कहा - "मैं एक मुसलमान हूं"
वो लिखती हैं - "उस वक़्त मुझ पे क्या गुज़री मैं जानती हूं, मैने सोचा नहीं था मेरे साथ ऐसा होगा लेकिन मेरे दिल में माचिस की जली तीली की तरह एक रौशनी हुई और फिर मैंने इस्लाम के बारे में और जानने का अज़्म किया"
लेडी ज़ैनब 26 मार्च 1933 को 66 साल की उम्र में काबा शरीफ़ की ज़ियारत/हज की और अल्लाह ने उन्हें हज के लिए मक्का जाने वाली पहली ब्रिटिश खातून होने के ऐज़ाज़ से नवाज़ा। वो सऊदी अरब के शाही परिवार का मेहमान बनीं। तस्वीर में आप देख सकते हैं सऊदी अरब के प्रिंस सऊद बिन अब्दुल अज़ीज़ और दीगर अफ़सरान के साथ लेडी ज़ैनब देखी जा सकती हैं। लेडी ज़ैनब का हज करने के तीस साल बाद 1963 में इंतक़ाल हो गया था और उन्हें स्कॉटलैंड के शहर वेस्टर रास के क़ब्रिस्तान में दफ़नाया गया था।
~ Shahnawaz Ansari
हिन्दोस्तान में सूरी सल्तनत की बुनियाद रखने वाले बादशाह शेर शाह सूरी का आज के दिन ही, 22 मई सन् 1545 ई. में बुदेलखंड में कालिंजर के किले के मुहासरे के दौरान बारूद में विस्फोट होने की वजह से इंतकाल हो गया था। दरअसल कालिंजर का हुक्मरान कीरत सिंह ने शेर शाह के हुक्म के बरखिलाफ जा कर महाराजा वीरभान सिंह बघेला को पनाह दे रखी थी। इसी कारण नवम्बर 1544 ई. में शेर शाह सूरी ने कालिंजर किले का मुहासरा कर लिया था। लगभग 6 महीने तक किले को घेरे रखने के बाद भी जब कामयाबी के आसार नहीं दिखे तो शेर शाह सूरी ने किले पर गोला, बारुद के प्रयोग का हुक्म दिया। किले की दीवार से टकरा कर लौटते हुए एक गोले के विस्फोट से शेर शाह सूरी का इंतकाल हो गया।
शेर शाह सूरी को उनकी वफ़ात के बाद उनके पैदाइशी शहर सासाराम में दफनाया गया। उसके बाद उनके बेटे इस्लाम शाह सूरी ने कालिंजर का किला फतह किया और फ़तह के लगभग 3 महीने बाद उनके मकबरे की तामीर का काम शुरू हो गया। चारों तरफ से खूबसूरत तालाब के बीचो-बीच मौजूद शेरशाह का मकबरा हिन्दोस्तान के ख़ूबसूरत मक़बरों में शुमार किया जाता है।
"शेर शाह सूरी के दौर-ए-हुकूमत में मुसाफ़िरों को पहरेदारी की ज़रूरत नहीं होती थी और न ही उन्हें सफ़र के दौरान बीहड़ और बियाबाँ में रुकने में डर लगता था।"
"रेगिस्तान हो या सुनसान इलाक़ा, जहाँ रात हो जाती थी, ये मुसाफ़िर वहीँ ठहर जाते थे। अपना सामान ज़मीन पर रख कर, अपनी सवारी को चरने के लिए छोड़ देते थे और ऐसे सुकून से सोते थे जैसे अपने ही घर में हों। उनके जान और माल की हिफ़ाज़त इलाक़े के ज़मींदार की ज़िम्मेदारी हुआ करती थी। मुसाफिरों के साथ किसी तरह की अनहोनी होने पर उस इलाक़े के ज़मींदार की गिरफ़्तारी और सज़ा होती थी जिसके डर से ज़मींदार मुसाफ़िरों की हिफ़ाज़त का इंतेज़ाम किया करते थे।"
"एक बूढी औरत भी सोने के ज़ेवर की पोटली सर पर लिए अकेले सफ़र पर जा सकती थी। शेर शाह की सज़ा का ऐसा ख़ौफ़ था की किसी चोर या डाकू की हिम्मत नहीं होती थी की बूढी औरत के नज़दीक भी आ सके।"
.
.
.
#shershah #shershahsuri
ये जो इमारत आप देख रहे हैं ये 104 साल पहले तक एक मस्जिद हुआ करती थी, इसका नाम था Hasan pasha Mosque, आज ये एक आर्ट गैलरी के तौर पर इस्तेमाल हो रही है ,ये Greece के Crete island के Chania ( तुर्किश नाम "हानिया )शहर में मौजूद है जो 1922 ई० तक उस्मानी तुर्कों के अंडर में था, 1922 ई० में तुर्की और ग्रीस के बीच एक समझौते के तहत यहां की पूरी मुस्लिम आबादी को तुर्की में शिफ़्ट किया गया और ये इलाका पूरी तरह से ग्रीस के अंडर में आ गया था ...
- Syed Asman Mustafa Kazmi
जहांगीर: न्याय की ज़ंजीर और कला का पारखी सम्राट "न्याय वह नींव है जिस पर साम्राज्य टिके होते हैं।" मुगल इतिहास में शहंशाह जहांगीर (सलीम) का व्यक्तित्व बड़ा ही अनूठा रहा है। जहाँ वे अपने पिता अकबर महान की विरासत को आगे बढ़ाने वाले एक शक्तिशाली शासक थे, वहीं वे अपनी न्यायप्रियता और प्रकृति के प्रति अगाध प्रेम के लिए भी जाने जाते हैं।
जहांगीर के शासनकाल की खास बातें:
न्याय की ज़ंजीर (Zanjir-e-Adl): जहांगीर ने आगरा के किले में सोने की एक विशाल ज़ंजीर लगवाई थी। कोई भी फरियादी, चाहे वह कितना ही साधारण क्यों न हो, उस ज़ंजीर को खींचकर सीधे बादशाह से न्याय की गुहार लगा सकता था।
कला और चित्रकला का स्वर्ण युग: जहांगीर को कला का इतना गहरा ज्ञान था कि वे किसी चित्र को देखकर बता सकते थे कि उसे किस चित्रकार ने बनाया है। उनके काल को 'मुगल चित्रकला का स्वर्ण युग' कहा जाता है।
प्रकृति प्रेमी: उन्हें बाग-बगीचों और पशु-पक्षियों से बहुत लगाव था। श्रीनगर का प्रसिद्ध 'शालीमार बाग' आज भी उनके प्रकृति प्रेम की गवाही देता है।
नूरजहाँ के साथ शासन: उनके जीवन में मलिका नूरजहाँ का गहरा प्रभाव था। वे इतिहास की सबसे शक्तिशाली महिलाओं में से एक बनीं, जिन्होंने शासन व्यवस्था में सक्रिय भूमिका निभाई।
जहांगीर का काल वैभव, संस्कृति और न्याय के संतुलन का दौर था, जिसने भारतीय इतिहास और कला को नए आयाम दिए।
भोपाल की महिला शासक नवाब सुल्तान जहां बेगम, विश्व इतिहास की पहली महिला हैं जो किसी यूनिवर्सिटी की इलेक्टेड चांसलर बनी। साल उन्नीस सौ बीस में अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की स्थापना के बाद उन्हें उसका पहला चांसलर बनाया गया।
ये जहांगीर के ससुर और जोधपुर की राजकुमारी जगत गोसाईं के पिता राजा उदयसिंह की है। जगत गोसाईं, मुग़ल बादशाह शाहजहां की मां थीं। उदयसिंह ने जब अपनी बेटी की शादी अक़बर के बेटे जहांगीर के साथ तय की तो कल्याणदास राठौर ने इस शादी का विरोध किया था। लेकिन उदयसिंह को इस रिश्ते से कोई परहेज नही था क्योंकि जहांगीर खुद राजपूत राजकुमारी जोधाबाई के बेटे थे और राजपूताना तो मुग़लों का ननिहाल था।
लेकिन दूसरे राठौर राजा इसके ख़िलाफ़ थे इस वजह से कल्याणदास ने उदय सिंह को क़त्ल करने की धमकी दी जिसकी वजह से राठौड़ वंश के दोनों राजाओ उदय सिंह और कल्याणदास के बीच जंग हुई जिसमें कल्याणदास, सिवाना के किले में मारे गए। 1586 में जहांगीर और राजकुमारी जगत गोसाईं की शादी फतेहपुर सीकरी में हुई।
ये तस्वीर बैरम खान की है। वो शख़्स जिसने हुमायूँ की मौत के बाद हिन्दोस्तान में मुग़ल सल्तनत की बुनियाद को दोबारा यकीनी बनाया था। आज बैरम खां का ज़िक्र करने की एक खास वजह है, दरअस्ल आज के दिन ही 31 जनवरी 1561 में एक अफ़ग़ान सरदार ने गुजरात में बैरम खां का कत्ल कर दिया था। इस अफ़ग़ान सरदार के पिता को बैरम खान ने एक जंग में क़त्ल किया था। दरअस्ल बैरम खान शहंशाह अकबर के हुक्म से हज के सफर के लिए मक्का जा रहे थे।
बैरम खान को मुग़ल बादशाह बाबर ने अपने बेटे हुमायूँ के साथ बेटे की तरह पाला था। बाद में बैरम खान ने अक़बर की अपने बेटे की तरह हिफ़ाज़त की और ज़िन्दगी भर साए की तरह हुमायूँ के दोस्त बन कर रहे। बैरम खान ही थे जिसकी वजह से मुगलों ने हेमू जैसे ताक़तवर राजा को हराकर वापस दिल्ली पर क़ब्ज़ा किया। बैरम खान हुमायूँ के साढ़ू, अकबर के मंत्री और अब्दुल रहीम खानेखाना के वालिद भी थे।
बैरम खान ने मुगलों के लिए कई जंग फतह की। जब हुमायूँ ने चांपानेर (गुजरात) के क़िले पर घेरा डाला। किसी तरह से दाल ग़लती न देखकर चालीस मुग़ल जंगजू सीढ़ियों के सहारे क़िले में कूद गए, जिनमें बैरम ख़ाँ भी थे क़िला फ़तह कर लिया गया। शेरशाह से चौसा की जंग में लड़ते वक़्त बैरम ख़ाँ भी साथ ही थे। पानीपत के जंग में बैरम खान ही थे। कन्नौज की जंग में भी वही लड़े। इन सभी घटनाओं ने हुमायूँ और बैरम ख़ाँ को एक खास दोस्ती के बंधन में बाँध दिया था।
आसान शब्दों मे कहे तो वो मुग़लो के कटप्पा थे जिसने अपनी सारी ज़िन्दगी एक वफादार बनकर उनकी हिफाज़त में गुज़ार दी।
*रामपुर रियासत की स्थापना*
चलो आज जिन नवाबों को बदनाम करके लोगों ने अपनी सियासी रोटियां सेंकी उन नवाबों के कार्य और इतिहास भी पढ़ लें जिन की बदोलत रामपूर का नाम इतिहास के पन्नों में अमर हो गया है
रामपुर सन् 1742 से पूर्व रामपुर नाम से प्रसिद्ध नहीं था लेकिन इसके अन्तर्गत आने वाले सभी इलाकों पर नवाब अली मोहम्मद खाँ ने अपना अधिकार स्थापित किया तथा यह क्षेत्र रूहेलखंड रियासत का अंग बना। नवाब अली मोहम्मद की मृत्यु के पश्चात रूहेलखंड रियासत एकीकृत रूप में स्थापित नहीं रही। सन् 1752 में इस रियासत का अन्तिम रूप से बंटवारा हो गया। नवाब अली मोहम्मद खाँ के दो बेटों तथा अन्य रूहेला सरदारों में यह रियासत छोटे-छोटे भाग में विभाजित हो गई जिसके वह शासक बन गए। इसमें रामपुर, शाहबाद तथा छांछट का क्षेत्र नवाब फैज़ुल्लाह खाँ को प्राप्त हुआ। जो कि कई वर्षों तक बरेली में रहकर अपनी रियासत का प्रबंध करते रहे लेकिन बाद में उन्होंने शाहबाद को अपनी रियासत की राजधानी बनाया। सन् 1752 से सन् 1774 तक नवाब फैज़ुल्लाह खाँ रामपुर रियासत स्थापित होने से पूर्व भी यहाँ के नवाब थे।
वर्ष 1774 ईं० में रूहेलों पर एक बड़ी विपत्ति आई। अवध के नवाब शुजाउद्दौला ने अंग्रेज़ो से मिलकर रूहेलखंड पर आक्रमण कर दिया। इस समय हाफ़िज़ रहमत खाँ रूहेलों के सरदार थे, अन्य सभी सरदार मर चुके थे। उनकी सन्तानें रह गई थीं उनमें भी आपस में एकता नहीं थी तथा वह पहले की भांति शक्तिशाली भी नहीं थे। हाफ़िज़ रहमत खाँ तथा अन्य रूहेला शासकों ने शुजाउद्दौला का मुकाबला किया लेकिन जीत न सके और हार गए। पराजित होकर रूहेला पहाड़ की तरफ लाल डांग के स्थान पर कूच कर गए। शुजाउद्दौला ने उनका पीछा किया तथा अंग्रेजों के साथ लाल डांग पहुँच गया। दोनों ओर की सेनाएँ कुछ समय तक आमने-सामने डटी रहीं लेकिन फिर समझौता हो गया जो कि लाल डांग की संधि के नाम से जाना जाता है। 7 अक्तूबर 1774 को हस्ताक्षरित इस संधि के अनुसार नवाब फैज़ुल्लाह खाँ अपनी पहली जागीर के मालिक रहे। नवाब फैज़ुल्लाह खाँ युद्ध में बहादुरी से लड़े थे तथा उनमें रूहेलों को संगठित करने की योग्यता भी थी। इसलिए शुजाउद्दौला व अंग्रेज़ो ने शीघ्र ही यह संधि कर ली। संधि के पश्चात अब से नवाब फैज़ुल्लाह खाँ की रियासत रामपुर रियासत कहलायी। अब नवाब फैज़ुल्लाह खाँ की मौजूदा जागीर में शाहबाद, सरसावा (शीशगढ़) एवं चौमहला (बहेड़ी) के साथ कुछ और परगने आजोन (मीरगंज), राजपुर (बिलासपुर), ठाकुरद्वारा (मुरादाबाद), सरखड़ा (थाना मूण्डा पाण्डे इलाका मुरादाबाद, कावर (शेरगढ़ जिला बरेली), रेहड़ (काशीपुर) रिठौडा सम्मिलित कर दिये तथा नवाब अली मोहम्मद खाँ के शेष परिवार की परवरिश की ज़िम्मेदारी भी उन्हीं को सौंप दी गई।
सन् 1752 ई० में रियासत विभाजन में हाफिज रहमत खां ने नवाब फैज़ुल्लाह खां को जो क्षेत्र दिया था वह 4-5 लाख की सालाना आमदनी का था। इतनी ही आमदनी का इलाका नवाब अब्दुल्ला खां को दिया था। इसके अतिरिक्त आठ लाख की राशि नवाब सादुल्ला खां को तथा उनके मरने के बाद उनकी बेगम को ढाई लाख रुपया दिए जाते थे। यह रकम बीस लाख रुपयों से ज्यादा होती थी। अब इन सबकी परवरिश के भार के साथ जो क्षेत्र नवाब फैज़ुल्लाह खां को दिया गया था वह पौने पंद्रह लाख रुपया की आमदनी का था जिसमें पांच हज़ार फौज रखने के खर्चे भी सम्मिलित थे। नवाब फैज़ुल्लाह खां ने न सिर्फ अपने रिश्तेदारों का भार उठाया बल्कि दूंदे खां की औलाद व अहमद खां बख्शी की औलाद तथा अहमद खां ख़ानसामा के वज़ीफे भी मुक़र्रर किये। दूंदे खां की औलाद में अज़ीमुल्ला खां तथा उनकी बहिन बेगम सादउल्ला खां रामपुर में आ गईं थीं। अहमद खाँ खानसामा तथा अहमद खाँ बख्शी भी रामपुर आ गए थे। हाफ़िज़ रहमत खाँ के छोटे बेटे अकबर खाँ तथा इनायत खाँ की बेगम भी रामपुर में आकर बस गई। इनके वज़ीफे भी नवाब फैज़ुल्लाह खाँ ने मुकर्रर कर दिए। क्योंकि अब रामपुर को छोड़कर पूरे रूहेलखंड पर नवाब अवध का अधिकार था अतः अन्य रूहेले भी अधिकतर रामपुर आकर बस गए।
प्रारम्भ में नवाब फैज़ुल्लाह खाँ शाहबाद में रहे और उन्होंने नई राजधानी के लिए अपने भतीजे मुस्तफा खाँ की अध्यक्षता में एक कमीशन नियुक्त किया। तब कुछ माह बाद रामपुर को अपनी रियासत की राजधानी बनाया था इसका नाम मुस्तफाबाद रखा। जिस जगह नवाब साहब ने अपनी रियासत की राजधानी स्थापित की वहाँ उस समय घाटमपुर, डोंगरपुर, ठोटर, रम्पुरा प्रमुख रूप से आबाद थे तथा रम्पुरा अथवा रामपुर नाम प्रचलित था। नया नाम मुस्तफाबाद जनता की जुबान पर न चढ़ सका और रामपुर नाम ही प्रसिद्ध हुआ तथा रियासत भी रामपुर रियासत (स्टेट) प्रख्यात हुई।
हमीदा बानो बेगम कौन थी
हमीदा बानो बेगम (1527-1604) मुग़ल बादशाह हुमायूँ की पत्नी और महान मुग़ल सम्राट अकबर की माँ थीं। उन्हें 'मरियम मकानी' के नाम से भी जाना जाता है। फारसी मूल की हमीदा ने निर्वासन के कठिन समय में हुमायूँ का साथ दिया और अकबर के शासनकाल में भी एक प्रभावशाली महिला के रूप में अपनी भूमिका निभाई।
मूल परिवार वह फारसी विद्वान शेख अली अकबर जामी की बेटी थीं।
हुमायूँ से विवाह 1541 में 14 वर्ष की आयु में उनका विवाह हुमायूँ से हुआ।
उन्होंने ही 1542 में अमरकोट में अकबर को जन्म दिया था, जब हुमायूँ निर्वासन में था।
उन्होंने मुगल साम्राज्य में एक ताकतवर महिला (मरियम मकानी) के रूप में अहम योगदान दिया और अकबर के शासनकाल में भी सक्रिय रहीं।
उन्होंने नई दिल्ली में हुमायूँ के प्रसिद्ध मकबरे के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
3 अप्रैल 1325 ई. (18) रबी अल थानी 725 हिजरी) की सुबह 86 से 87 साल की उम्र में दिल्ली के मशहूर सूफी हजरत निजामुद्दीन औलिया की वफात हुई थी। 14वीं सदी के इतिहासकार जियाउद्दीन बरनी का दावा है की दिल्ली के लोगों पर इनका असर इस कदर था की दुनियावी मुआमलात की तरफ से लोगों के नुक्तए नजर में एक मिसाली तब्दीली वाक्या हुयी लोग तसौउफ और नमाज की तरफ माएल होने लगे और दुनिया से दूर रहने लगे थे।
हजरत निज़ामुद्दीन औलिया की पैदाइश उत्तर प्रदेश के बदायूं जिले में हुयी थी। महज पांच साल की उम्र में, अपने वालिद सैयद अब्दुल्ला बिन अहमद अल हुसैनी बदायुनी की वफ़ात के बाद, वह अपनी मां बीबी जुलेखा के साथ दिल्ली आ गए थे। उनकी बायोग्राफी का जिक्र आइन-ए-अकबरी में मिलता है, जो मुगल शहंशाह अकबर के वज़ीर, अबुल-फ़ज़ल इब्न मुबारक द्वारा लिखी गयी 16वीं सदी की एक किताब है।
बीस साल की उम्र में, निजामुद्दीन औलिया अजोधन (मौजूदा पाकिस्तान में पाकपट्टन शरीफ) गए और सूफी संत फरीदुद्दीन गंजशकर के शागिर्द बन गए, जिन्हें आमतौर पर बाबा फरीद के नाम से जाना जाता है। निजामुद्दीन औलिया ने अजोधन में रिहाईश इख़्तियार नहीं की, लेकिन दिल्ली में अपनी तालीम को जारी रखा और साथ ही साथ सूफी अकीदत का आगाज किया। वह हर साल रमजान-उल मुबारक का महीना बाबा फरीद की बारगाह में गुजारने अजोधन जाते थे। अजोधन का उनका तीसरा दौरा था, जब बाबा फरीद ने उन्हें अपना जानशीन बनाया था। इसके कुछ अरसे बाद जब निजामुद्दीन औलिया दिल्ली आये तो उन्हें खबर मिली की बाबा फरीद का इंतकाल हो गया है।
निज़ामुद्दीन औलिया दिल्ली के मुख्तलिफ मुक़ामात पर रहते हुए आखिरकार गियासपुर में आबाद हो गए। शहर के हंगामों से दूर उन्होंने यहां अपना खानकाह बनवाया, एक ऐसी जगह जहां हर तबके के लोगों को खाना खिलाया जाता था। यहां वो लोगों को रूहानी तालीम भी देते थे। बहुत जल्द ये खानकाह एक ऐसी जगह बन गयी जहां अमीर-गरीब हर तरह के लोगों का हुजूम रहने लगा।
उनके कई शागिर्दों ने रूहानी उरूज हासिल किया जिनमे शेख नसीरुद्दीन चिरागे देहलवी और अमीर खुसरो (एक नामवर आलिम, गायक और दिल्ली सलतनत के शाही शायर) शामिल हैं।
आज की तारिख में इनकी मजार, निजामुद्दीन दरगाह, दिल्ली में मौजूद है। असल में इस इलाके को पहले गयासपुर के नाम से जाना जाता था लेकिन हजरत के आबाद होने के बाद से इलाका उनके ही नाम पर आबाद हो गया। दरगाह के सफेद गुंबद व मरकजी ढांचे की तामीर उनकी वफ़ात के बाद मुहम्मद बिन तुग़लक़ ने करवाई थी। फ़िरोज़ शाह तुगलक ने बाद में इस ढांचे की मरम्मत की और गुंबद के चारों तरफ से चार सुनहरी प्यालियों को हटा दिया। हैदराबाद के खुर्शीद जाह ने कब्र के चारों ओर संगमरमर का कटघरा तोहफे में दिया था। मौजूदा गुम्बद फरीदुन खान ने 1562 में तामीर करवाया था।
सुल्तान शमशुद्दीन इल्तुतमिश की रेहल इसी रेहल पर रख कर वो क़ुरआन की तिलावत किया करते थे। आज की तारीख में ये सालार जंग म्यूज़ियम हैदराबाद में मौजूद है।
तारीखी दस्तावेजों से मालूम होता है की शमशुद्दीन इल्तुतमिश एक मुत्तक़ी मुसलमान थे जिन्होंने रात को अपना ज्यादातर वक्त इबादत में गुजारा था।
उनकी वफात के बाद उन्हें मेहरौली में कुतुबमीनार के करीब दफन किया गया था। जहां कुरानी आयतों से सजा हुआ उनका खूबसूरत मकबरा बना हुआ है। उनके दरबारी शायर अमीर रूहानी ने उन्हें मुकद्दस जंगजू और ग़ाज़ी के तौर पर बयां किया है।
हैदराबाद हाईकोर्ट , हैदराबाद के निज़ाम मीर उस्मान अली खान ने अपनी रियासत की अदालत के लिए इसकी तामीर करवाई थी।
यहां पर कभी मुहम्मद कुली कुतुब शाह का हिना महल हुआ करता था, जिसे बाद में दोबारा तामीर करके निज़ाम मीर उस्मान अली ने कोर्ट में तब्दील कर दिया। आज यह तेलंगाना हाई कोर्ट के नाम से जाना जाता है।
चीन की ज़ियान मस्जिद- ये चीन की मशहूर ज़ियान मस्जिद है जो 742 ईसवी में चीनी पगोडा की शक्ल की बनाई गई। दुनिया में ये अकेली ऐसी मस्जिद है जिसमें चीनी भाषा में अजा़न दी जाती है। ये अरबी व्यापारियों के यहां की चीनी लडकियों से शादी करने के बाद वजूद में आयी थी। चीन में इस वक्त लगभग 128 मिलियन मुसलमान रहते हैं।
#China #Muslim #MuslimInChina