"मित्रों, क्या 120 करोड़ के देश में ओलंपिक मेडल नहीं मिल सकता? अरे सिर्फ़ सेना के जवानों को ये काम दिया जाये...तो 8-10 मेडल तो हमारे सेना के जवान लेकर के आ सकते हैं!" -मा. CM मोदी.
इस इंसान के पास PM बनने से पहले हर प्रॉब्लम को सॉल्व करने की टेक्नीक थी। पता नहीं PM बनने के बाद किसने इस पर लाल जादू कर दिया, बेचारा सारी टेक्नीक भूल गया 🙄
सत्ताधारी पक्ष आणि सत्ताधारी वर्ग यात फरक करण्याची गरज ;
अशा काळात , ज्या काळात सत्ताधारी पक्ष बदलाचे पडघम वाजू लागले आहेत !
जेन झीच्या आंदोलनाचे हे गुणवैशिष्ट्य आहे की त्यांनी देशाच्या राजकीय अर्थव्यवस्थेच्या प्राधान्यक्रमांपुढे प्रश्न उपस्थित केले आहेत. शिक्षण आणि रोजगार हे प्रश्न राज्यकर्त्यांनी अनेक वर्षे स्टेजच्या परिघावर ढकलले होते. ते जेन झीने स्टेजच्या केंद्रस्थानी आणले.
या प्रश्नांचे स्वरूपच असे आहे की नेहमीप्रमाणे एखादी चकचकीत वेष्टनात गुंडाळलेली योजना केंद्र सरकारने जाहीर करून ते सुटणारे नाहीत. कारण ते प्रचलित आर्थिक ढाच्याशी जैवपणे गुरफटवून गेले आहेत. त्या ढाच्याला हात घातल्याशिवाय त्या प्रश्नांचा गुंता सुटणे अशक्य.
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शिक्षण / बेरोजगारीचे प्रश्न विशिष्ट आर्थिक ढाच्यातून तयार झाले आहेत असे आपण म्हणत असू तर प्रश्न असा उपस्थित होतो की हा आर्थिक ढाचा / ज्याला आर्थिक धोरणांनी आकार / उकार मिळतो कोण ठरवते. अर्थात राज्यकर्ता पक्ष.
जेन झीला हे माहित होते, कोणाला जाबदायी धरायचे. साहजिकच गेली १२ वर्षे एकहाती केंद्रात सत्तेवर असणाऱ्या मोदी राजवटीला त्यांनी सिंगल आउट केले.
यांच्याकडून १२ वर्षे मिळून देखील हा प्रश्न अधिक गंभीर बनला असेल तर साहजिकच आर्थिक ढाचा बदलायचा तर राज्यकर्ता पक्ष / राजवट बदलण्याची भाषा जोर पकडू लागली आहे.
पुढचा प्रश्न असा उपस्थित होतो की जो आर्थिक ढाचा / आर्थिक धोरणे तयार होतात ती तशीच का होतात. ते काही भौतिकशास्त्राचे नियम खचितच नाहीत. तर ती विशिष्ट आर्थिक धोरणे त्या देशातील राज्यकर्त्या वर्गाच्या (इथे आपण राज्यकर्ता पक्ष आणि राज्यकर्ता वर्ग यात फरक करत आहोत) आर्थिक हितसंबंधांचे रक्षण आणि संवर्धन करण्यासाठी आखली जातात.
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सत्ताधारी राजकीय पक्ष बदलला तरी देशातील राज्यकर्ता वर्ग बदलतो असे होत नाही. असंतोष मुळे सत्ताबदल झाला तरी आर्थिक धोरणे अमुलाग्रपणे आपोआप जनकेंद्री होत नाहीत.
आपल्या देशात भारतीय आणि जागतिक मोठया कंपन्या आणि वित्त भांडवल वेगाने राज्यकर्ता वर्ग बनत आहे. वित्त भांडवलाच्या मदतीने अर्थव्यवस्थेत मोठ्या कंपन्या अजून मोठ्या होत आहेत. शेतीसकट छोटे, मध्यम उद्योग, असंघटित क्षेत्र सारख्या अनेक बिगर कॉर्पोरेट क्षेत्राला चेपत नेणें, त्याचा अर्थव्यवस्थेतील वाटा कमी करत नेणे, रोजगारनिर्मिती पेक्षा भांडवलाचे हित केंद्रस्थानी ठेवणे, शिक्षण / आरोग्य आणि अनेक पब्लिक गुड उद्योगाला खाजगी नफ्यासाठी वेठीस धरणे, क्रयशक्ती वाढवण्याकडे दुर्लक्ष करून मुक्तहस्ते रिटेल लोन उपलब्ध करून देणे, वस्तुमाल सेवांच्या उत्पदनापेक्षा सट्टेबाज सदृश्य भांडवल बाजार , जमिनी यात गुंतवणूक करणे, शासनाला अर्थव्यवस्थेतून बाहेर काढणे ….ही मोठ्या कॉर्पोरेटची दीर्घकालीन आर्थिक नीती आहे. (या यादीत अर्थात भर घालता येईलच)
जेन झीने जे प्रश्न नाट्यमय रित्या पुढे आणले ते प्रश्नांची मुळे वरील आर्थिक धोरणांमध्ये आहेत. त्या धोरणांना कन्फ्रण्ट केल्याशिवाय रिझल्ट्स मिळणारे नाहीत.
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राज्यकर्ता पक्ष बदलला तर आपल्या आर्थिक हितसंबंधांना नख लागणार हे न कळण्याएवढे सत्ताधारी वर्ग गाफील नसतात. राज्यकर्ता पक्ष बदलला तरी आपले आर्थिक हितसंबंध इंटॅक्ट राहतील यासाठी त्यांनी एक स्ट्रॅटेजी आखलेली असते.
ती म्हणजे आर्थिक धोरणांच्या बारकाव्यांची सार्वजनिक चर्चाविश्वात चिरफाड होणार नाही आणि सर्व चर्चा खोके / पेट्या कोणाला मिळाल्या यावर किंवा विविध नेत्यांच्या नावांभोवती फिरतील हे पाहिले जाते. मेनस्ट्रीम मीडियावर का एवढ्या हिरीरीने कॉर्पोरेट घराण्यांनी मालकी प्रस्थपित केली याचे मग अर्थ लागतात. उदा. अदानी, NDTV
लोकशाहीत सामान्य नागरिकांचे राजकीय शिक्षण जे व्हायला पाहिजे ते होत नाही.
एक राजकीय पक्ष सत्तेवरून पायउतार झाल्यानंतर दुसरा पक्ष येतो त्यावेळेस साचलेली असंतोषाची ती वाफ कुकरची शिटी काढल्यासारखी विरून जाते.
ये काळात सत्ताधारी वर्ग, आधी सत्तेवर असलेल्या सत्ताधारी राजकीय पक्षाकडून आपली लॉयल्टी काढून घेऊन नवीन सत्ताधारी राजकीय पक्षाकडे जोडून घेतो. पोचलेले लोक असतात ते.
देशात राजकीय सत्ताबदलाच्या चर्चाना वेग येत असताना, त्याचवेळी समांतर पद्धतीने प्रचलित जनविरोधी आर्थिक धोरणांवर सार्वजनिक चर्चा सजगपणे घडवल्या पाहिजेत. जनमानसाची पकड घेणारे काऊंटर नॅरेटिव्ह तयार केले तरच सत्तेवर येणाऱ्या दुसऱ्या राजकीय पक्षावर / आघाडीवर अंकुश ठेवता येईल.
कोठूनही विश्लेषण करा आपण एकाच निष्पन्नावर येणार : घटनेत लोकशाहीत जनता सार्वभौम असते असे लिहिले आहे म्हणून ती सार्वभौम आपोआप सार्वभौम होत नाही. तिने संघटित कृती केली तरच ती सार्वभौम होऊ शकते.
संजीव चांदोरकर (१७ ऑगस्ट २०२६)
हथियारी नक्सल तो गए, लेकिन दिमागी नक्सल समाज को गलत राह पर घसीटने के लिए भांति-भांति के दांव आजमा रहे हैं। इन्हें पहचानकर आइसोलेट करने के साथ ही देश की युवा पीढ़ी को विकसित राष्ट्र बनाने की मुख्यधारा से जोड़ना होगा।
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के शासनकाल में मोबाइल रिचार्ज👇
> 13 कंपनियाँ
> लाइफटाइम फ्री इनकमिंग
> आजीवन वैधता
पीएम मोदी के शासनकाल में मोबाइल रिचार्ज👇
> सिर्फ 2 कंपनियां
> 84 दिन की वैधता के साथ ₹899 की फीस
> कोई फुलटाइम की इनकमिंग फ्री नहीं
भगवान का शुक्र है......... मोदीजी ने हमें बचा लिया वरना कांग्रेस हमें लूट लेती।
2047 के बाद सड़कों गड्ढे नहीं होंगे
2047 के बाद सुप्रीम कोर्ट इंसाफ़ करने लगेगा
2047 के बाद लिंचिंग नहीं होगी
2047 के बाद बेरोजगारी नहीं होगी
2047 के बाद निष्पक्ष चुनाव आयोग होगा.
स्वर्ग ही उतर आयेगा 2047 में
मोदी की सपने दिखाने की रोज़ नई डेडलाइन से लोग उकता गये हैं.
जिस दिन धर्म सत्ता का अधिकार बन जाएगा, उस दिन जनता अपने अधिकार भूल जाएगी और धर्म बचाने निकल जाएगी, जबकि सत्ता, देश बेचकर भी खुद को ‘देशभक्त’ बतलाएगी.
इस दौर के परिप्रेक्ष्य में डॉ अंबेडकर की ये बात कालजयी प्रमाणित हुई.
#IndependenceDay
जरूरी नहीं है की भगवा वस्त्र धारण किए व्यक्ति में ज्ञान का भंडार हो।
कुछ लोग भगवा वस्त्र धारण करके सिर्फ अपनी राजनीतिक रोटियाँ सेकते हैं।
हाँ मैं बात कर रहा हूँ योगी आदित्यनाथ की इनको मुसलमानों से बहुत दिक्कत है चाहे वो आम इंसान हो या कोई क्रांतिकारी।
इन्होंने हाल ही में वोट बैंक के लिए मौलाना मोहम्मद अली जौहर पर जो अपमान जनक टिप्पणियां थी वो असहनीय है।
शायद इन्हें नहीं पता है की मौलाना मोहम्मद अली जौहर कौन थे? चलो मैं बता दे रहा हूँ।
मोहम्मद अली जौहर ने ऑक्सफोर्ड से पढ़ाई करके कॉमरेड' और 'हमदर्द जैसे अख़बारों से पत्रकारिता करके अंग्रेज़ों की नींद हराम कर दी थी।
इन्होंने अपने भाई के साथ मिलकर सबसे पहले ख़िलाफ़त आंदोलन शुरू की थी।
जिसके बाद इस आंदोलन के कई क्रांतिकारी हिस्सा बने।
इस आंदोलन ने देश में ब्रिटिश विरोधी भावना को तीव्र करने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई।
मौनपा जौहर ने गांधी जी के साथ मिलकर असहयोग आंदोलन 1920-22 शक्रिए रूप से भाग लिया।
इन्होंने देश में हिंदू मुस्लिम एकता बनाये रखने के लिए पूरे देश का दौरा किया।
आज इनके योगदान को महज़ इसलिए नकारा जा रहा है क्यूँकि कुछ मीडिया वाले बिना पढ़े कुछ भी बोल देते है।
समस्त देशवासियों से निवेदन है कि अगर ऐसे लोगों के हाथ में तिरंगा पकड़े देखो जिनको लगता है आजादी भीख में मिली थी।
या जिनको आजादी 2014 में मिली हो उनसे तिरंगा सम्मानपूर्वक ले लें।
क्यूंकि ऐसे लोगों के हाथ में किसी पार्टी का झंडा ही अच्छा लगता है तिरंगा नहीं।
#IndependenceDay
हमें हिसाब दिजिए पार्ट -3 आ गया है मेरे दोस्तों
सुनिए इस सच्चाई से भरे हुए सवाल पुछते हुए गाने को जो आपके रोंगटे खड़ा कर देगा.
एक सवाल है दोस्तों, जबाब जरूर दिजिएगा
हम तो तिरंगा आसमान में लहराएगा… मगर क्या ज़मीन पर भी आज़ादी उतरी है?
आज 15 अगस्त है।
हवाओं में जश्न की तैयारी है,
हर तरफ़ तिरंगे की शान है…
लेकिन दिल में एक सवाल आज भी ज़िंदा है—
क्या हमें वही भारत मिला, जिसका सपना भगत सिंह, चंद्रशेखर आज़ाद और रामप्रसाद बिस्मिल ने देखा था?
हम आसमान में तिरंगा पूरी शान से लहराएँगे।
राष्ट्रगान गाएँगे।
देशभक्ति के नारे लगाएंगे।
लेकिन ज़मीन की इस कड़वी हकीकत को कैसे झुठलाएँगे?
गोरे अंग्रेज़ चले गए…
लेकिन क्या हर भारतीय सचमुच आज़ाद हो गया?
आज भी आम आदमी महंगाई, बेरोज़गारी और असुरक्षा के बीच अपने सपनों को बचाने की जद्दोजहद कर रहा है।
मिडिल क्लास टैक्स देता है,
ईमानदारी से मेहनत करता है,
बच्चों की पढ़ाई और घर के भविष्य के लिए बचत करता है फिर भी हर साल उसके सपनों की कीमत बढ़ती जाती है और उसकी क्रय शक्ति घटती जाती है।
किसान सवाल लेकर खड़ा है।
युवा नौकरी के इंतज़ार में है।
मजदूर अपनी मेहनत की सही कीमत चाहता है।
मिडिल क्लास अपने हिस्से की राहत तलाश रहा है।
और लोकतंत्र में सबसे बड़ा सवाल यही है
जिस आज़ादी के लिए हमारे क्रांतिकारियों ने अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया, क्या उस आज़ादी का मतलब सिर्फ़ सत्ता बदलना था?
भगत सिंह का सपना सिर्फ़ अंग्रेज़ों को भगाना नहीं था।
आज़ाद का सपना सिर्फ़ विदेशी हुकूमत हटाना नहीं था।
बिस्मिल की कुर्बानी सिर्फ़ सत्ता हस्तांतरण के लिए नहीं थी।
उनका सपना था..
एक ऐसा भारत जहाँ इंसान की कीमत उसकी जाति, धर्म, हैसियत या जेब से नहीं, बल्कि उसकी इंसानियत और अधिकारों से तय हो।
इसलिए आज तिरंगे को सलाम करते हुए हमें सिर्फ़ जश्न नहीं मनाना चाहिए
खुद से सवाल भी करना चाहिए।
क्योंकि देश से सवाल करना देशद्रोह नहीं,
लोकतंत्र के प्रति जिम्मेदारी है।
हमें अपने शहीदों से सिर्फ़ उनकी तस्वीरों पर फूल चढ़ाकर नहीं,
बल्कि उनके सपनों को ज़िंदा रखकर श्रद्धांजलि देनी होगी।
गोरे अंग्रेज़ चले गए
अब उस व्यवस्था के काले सच का हिसाब कौन देगा?
अधूरे वादों का हिसाब कौन देगा?
युवा के टूटते सपनों का हिसाब कौन देगा?
मिडिल क्लास की घटती क्रय शक्ति का हिसाब कौन देगा?
किसान और मजदूर की बेचैनी का हिसाब कौन देगा?
और सबसे बड़ा सवाल....
क्या 15 अगस्त सिर्फ़ कैलेंडर की तारीख़ है, या हर भारतीय के जीवन में बराबरी, सम्मान, न्याय और अवसर की आज़ादी का नाम भी है?
तिरंगा आसमान में लहरता रहे....
और उसके साथ भारत के हर नागरिक का सिर भी ऊँचा रहे। 🇮🇳
यही उन शहीदों के सपनों वाले भारत की असली आज़ादी होगी।
जय हिंद। 🇮🇳
इंकलाब ज़िंदाबाद।
पोस्ट को ज्यादा से ज्यादा रिपोस्ट करें और उन नेताओं तथा नौकरशाह से सवाल जरूर पुछे।
#स्वतंत्रता_दिवस
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पंतप्रधान नरेंद्र मोदी यांनी स्वातंत्र्यदिनाच्या निमित्त लाल किल्ल्यावरून केलेल्या भाषणात बुद्धिजीवींना ‘दीमागी नक्षल’ असं म्हटल्याचा निषेध व्यक्त करताना.
कल नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी जी ने प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी एवं भारत की विदेश नीति पर जो टिप्पणी की है, वो अत्यन्त निम्नस्तरीय और निन्दाजनक तो है ही, साथ ही मुझे व्यक्तिगत रूप से बहुत पीड़ा देने वाली भी है।
अपने लम्बे राजनैतिक जीवन में, मैंने किसी भी नेता प्रतिपक्ष को, चाहे वो सुषमा जी या अरूण जेटलीजी रहे हो, अथवा अटल जी और आडवाणी जी रहे हो, या फिर अटलजी की सरकार में डॉ. मनमोहन सिंह हों या सोनिया गांधी जी रही हो, ऐसा अशोभनीय आचरण कल्पना से परे था।
ऐसा आचरण भारत में स्वस्थ्य लोकतंत्र के लिए, एक गंभीर खतरे का संकेत है। राहुल गांधी जी के मन में, प्रधानमंत्री जी के प्रति चाहे जितनी भी कुण्ठा भरी हो, ऐसी अभद्र टिप्पणी सर्वथा अस्वीकार्य है। विशेषकर तब जबकि मोदीजी के रूप में एक ऐसे प्रधानमंत्री, जिन्होंने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का मान बढ़ाया और विकसित भारत का मार्ग प्रशस्त किया, ऐसे नेता के प्रति ऐसी अभद्र टिप्पणी, हर भारतीय के मन को, अन्दर से कष्ट देने वाली है।
मैं कांग्रेस पार्टी से यह भी कहना चाहूंगा, कि ऐसी भाषा और आचरण के बाद, क्या वे लोग अब, लाल, बाल, पाल से लेकर गांधीजी नेहरूजी, सरदार पटेल, सुभाष बाबू, राजेन्द्र बाबू से लेकर शास्त्री जी, नरसिम्हा राव जी से लेकर प्रणव मुखर्जी जी तक जैसे विराट व्यक्तित्वों की विरासत का दावा कर सकते हैं?
मैं कह सकता हूं कि, आज इस आचरण से राहुल गांधी ने न सिर्फ प्रधानमंत्री मोदीजी का अपमान किया है बल्कि भारत की अंतर्राष्ट्रीय प्रतिष्ठा का अपमान किया है, लोकतंत्र और नेता प्रतिपक्ष के पद की गरिमा को तार-तार कर दिया है। मैं तो यह कल्पना भी नही कर सकता कि जिसके नाम के आगे गांधी शब्द लगा हो, वह ऐसा शर्मनाक बयान दे सकता है!
मोदी के लिए
जंतर मंतर के युवा/प्रदर्शनकारी /आंदोलनकारी 'दिमागी नक्सल' हैं .
सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाला विपक्ष 'दिमागी नक्सल' है .
सवाल पूछने वाले पत्रकार और बुद्धिजीवी 'दिमागी नक्सल' हैं .
NALSAR यूनिवर्सिटी के छात्र 'दिमागी नक्सल' हैं .
सरकार के दावों और वादों पर घेराबंदी करने वाले किसान 'दिमागी नक्सल' हैं.
सरकार की शिक्षा और परीक्षा नीति के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले लाखों बेरोजगार युवा 'दिमागी नक्सल' हैं .
सरकार के मुनादी ब्रिगेड में जो भी शामिल नहीं हैं, सब 'दिमागी नक्सल' हैं.
आज़ादी की 80वीं सालगिरह के मौके पर मोदी ने अपने आलोचकों और विरोधियों के लिए नया शब्द गढ़ा है
'दिमागी नक्सल'
कई सालों तक अर्बन नक्सल के तमगे के बाद नया तमगा है 'दिमागी नक्सल '