इश्क़ - 309
बचा रहे प्रेम
तुम्हारी गैर मौजूदगी में
रख लेती हूं चाय के दो कप,
इस बात से बेखबर कि तुम नहीं हो यहां।
तुम्हारी अनुपस्थिति में
अक्सर करती हूं तुमसे जी भर के बातें।
रूठती हूं, मनाती हूं।
जिरह करके करती हूं तुमसे तुम्हारी ही शिकायतें।
मैं जानती हूं प्रेम मापने की ,
कोई इकाई नहीं होती,
फिर भी जोबन के अल्हड़पन में,
सखियों संग हथेलियों पर खूब तोड़े,
कांच की चूड़ियों के टुकड़े।
ये जानने की खातिर…
कितना प्रेम करेगा मुझसे मेरा प्रिय !
पतझड़ के इस मौसम में,
जब झरती हैं एक साथ म्लानता की
कुम्हलाई पीत पत्तियां!
मैं मन ही मन तुम्हें पुकारती हूं,
इस चाह में कि मेरे मन की टेर
टकराए तुम्हारे हृदय की भीत से,
उसकी अनुगूंज पड़े तुम्हारे कानों में।
और मेरी स्मृति…रक्त बन दौड़े
तुम्हारी रक्त धमनियों में इस भांति,
कि प्रेम रच जाए तुम्हारी रग रग में।
सुनो ! मेरे साथी
तुम बिन मेरे दिन बैरागी हैं
और रातें स्याह।
तुम्हारी प्रतीक्षा में जब सुनती हूं,
तुमसे तुम्हारे आने की ख़बर,
जाफरानी पारिजात सा,
खिल उठता है मेरा रोम रोम,
बजने लगता है धड़कनों का मांदल !
तुम्हारा लौटना जैसे कोई उत्सव हो।
नहीं जानती मेरे हमनवा!
कि कितना बचा है जीवन,
और उसमें कितना शेष है प्रेम.!
मैं चाहती हूं …तब भी,
चाय के कप में बची चाय जितना,
हथेली पर बिखरे चूड़ियों के टुकड़ों जितना,
पत्तों पर ठहरी बारिश की बूंदों जितना,
जीवन में बचा रहे प्रेम !!!
अर्पण जमवाल
#संजीवपालीवाल #येइश्क़नहींआसां #इश्क़ @JamwalArpan@sahitya_tak
#X पर मेरी प्रिय कवयित्री अर्पण जी जिनकी कविताएं बहुत हीं सारगर्भित होती हैं...😊
"सुधियों का मचान"
स्टापू से जीवन में चित्ती सा मन था
जहां एक पैर पर उछलता था बचपन।
खेतों की मेढ़ों पर दौड़ता भागता
अपनी चहक से उड़ा देता
मक्के के खेतों से पखेरूओं की पाँत।
कभी दुपट्टे का सोंटा लेकर घूमता
सबकी पीठ पीछे, गाते गाते…
“कोकड़ा छुपाके जुम्मे रात आई है,
जेड़ा अगे पिछे देखे,ओहदी शामत आई है।”
जहां भूख सरीखा नन्हा दुःख था
और खेल सरीखा सुख!
पोखरों के उजले पानियों में
अपनी मोहक छवियों पर रीझता जोबन था
अमराइयों में झूले थे और उन झूलों पर…
अपनी रौ में झूलता बेफिक्र लड़कपन,
जो कोयल के स्वर में,
दोहराता था अक्सर अपना स्वर।
जहां सरगम के सुरों से सुरीले दिन थे
और गज़ल सी रूहानी रातें !
सुधियों के इस मचान पर
आच्छादित रहता है…
विगत परिदृश्य का वितान !
जिसके एकांतिक निर्वात में गाहे बगाहे
मन फ़्लांग जाता वक्त की उत्तुंग भीत
और झांक आता इस पार से
उस पार की आयु का खिलंदड़पन
समृतियां लौटती हैं
अपनी आवृत्तियों के क्रम में
छुपम छुपाई खेलते हुए
धप्पा मारती हैं ,
मन थक कर देह में लौटता है हर बार ।
सभी यात्राएं …
देह की नहीं होती,
कुछ यात्राएं मन की भी होती हैं !
स्मृतियां !
मन से तय की गई,
वो यात्राएं हैं !!! 🦋
~ अर्पण
@JamwalArpan
#हिन्दीनामा
फ़िर सांझ ढलेगी,
फ़िर सूरज डूबेगा,
गोधूलि में गईयां
लौटेंगी अपनी घरालों में
परिंदे लोटेंगे अपने आलनों में,
खेलते, शोर मचाते बच्चे,
फ़िर लौट आयेंगे घरों में !
दिन भर की थकान के बाद,
नीदों में गुम हो कर,
फ़िर एक स्त्री..
ढूंढेगी अपने हिस्से का आसमान !
~अर्पण जमवाल
@JamwalArpan
सुनो ना !
जब मैं कहती हूं
सुनो ना !
और तुम,
सारी व्यस्तताओं को,
ख़ारिज कर,कहते हो।
हां कहो ना!
ये हमारे मध्य होने वाले,
संवादों में से,
सबसे प्रेमिल संवाद है !!!
~ अर्पण जमवाल
@JamwalArpan
सुनो ना !
जब मैं कहती हूं
सुनो ना !
और तुम,
सारी व्यस्तताओं को,
ख़ारिज कर,कहते हो।
हां कहो ना!
ये हमारे मध्य होने वाले,
संवादों में से,
सबसे प्रेमिल संवाद है !!!
~ अर्पण जमवाल
@JamwalArpan
कविताएं भी होती हैं,
भेदभाव का शिकार,
अच्छी कविताओं को नहीं मिलते
पोस्टर !
और पोस्टर को नहीं मिलती
अच्छी कविता!
फ़िर भी अच्छी कविताएं,
पाठकों के दिलों में अपनी जगह बना लेती हैं,
अच्छाई पा लेती है अपना स्थान !!!
~अर्पण
@JamwalArpan#विश्व_कविता_दिवस
फ़िर सांझ ढलेगी,
फ़िर सूरज डूबेगा,
गोधूलि में गईयां
लौटेंगी अपनी घरालों में
परिंदे लोटेंगे अपने आलनों में,
खेलते, शोर मचाते बच्चे,
फ़िर लौट आयेंगे घरों में !
दिन भर की थकान के बाद,
नीदों में गुम हो कर,
फ़िर एक स्त्री..
ढूंढेगी अपने हिस्से का आसमान !
~अर्पण जमवाल
@JamwalArpan
बुद्ध ने कहा...
तुम मत लिखो मुझ पर कविताएं,
मैंने कहा ... फिर क्या लिखूं भंते !
बुद्ध ने कहा... तुम लिखो दुःख और करुणा,
उसी में मिलेंगे...
मोक्ष,आत्मज्ञान और
मुझ पर प्रश्न उठाने वालों को
उनके आक्षेपों के प्रतिउत्तर !
इतना कहकर...
बुद्ध ने अपनी आँखें मूंद लीं।
~अर्पण