जातिवादियों का गिरोह गुप्त चर्चा कर रहा है आरक्षण हटाना है मगर अभी सिर्फ सुधार की बात करेंगे।
उसमें भी एक टकला बाबा कह रहा है-सिर्फ रिफॉर्म की बात करेंगे मगर ये भी मायावती को पसंद नहीं आ रहा है।
15 साल हो गए सरकार गए हुए, खौफ़ फिर भी नहीं निकल पा रहा है🔥
महाराष्ट्र में वर्गीकरण समर्थक अपना प्रतिशत काहे नही देखते
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बिहार में;
चमार जाति = 5.25%
बाल्मीकि/मेहतर = 00.24%
दुसाध = 5.32%
धोबी = 00.84%
पासी = 1%
कुल पद = 2035
चमार = 111 (5.4% अथार्त प्रतिशत 5.25% के आसपास)
दुसाध = 88 (4.34% अथार्त अपने प्रतिशत 5.31% से कम)
धोबी = 59 (2.92%अथार्त अपने प्रतिशत 0.84% से ज्यादा)
पासी = 49 (2.42% अथार्त अपने प्रतिशत 1% से ज्यादा)
लेकिन इन मोहतर्मा अपने ब्राह्मण ठाकुर व अन्य मित्रो के साथ मिलकर ऐसा माहौल बनाने की सोच रही है जैसे चमार को कई गुणा ज्यादा मिल गया।।जबकि;
"दुसाध को नुकसान हुआ। लेकिन वर्गीकरण का सबसे ज्यादा विरोध बिहार में दुसाध ही करते है क्योंकि रामविलास पासवान जी जानते थे कि जब तक एकता ह�� तब तक पूछा जा रहा है"
इसलिए मुझे धोबी व पासी के द्वारा अपने प्रतिशत से 3 गुणा ज्यादा शीट लेने पर आपत्ति नही है। अच्छी बात है कि वो पढ़कर मौका ले रहे है।।
प्रश्न : यह है कि ऐसा मौका बाल्मीकि व अन्य क्यो नही भुना रहे।
उत्तर : जैसे यह मोहतर्मा बाल्मीकि से आह्वान करने की पढ़ाई करो, और धोबी व पासी की तरह अपने प्रतिशत से कई गुणा ��े लो कि जगह "चमार हाय हाय" में व्यस्त है।
यह मोहतर्मा इसकी जगह कह सकती थी कि;
"बाल्मीकि मात्र दशमलव 2 प्रतिशत (0.2%) होने के बाद भी उनके पास अवसर है कि वो पढ़कर 16% आरक्षण पर हक जमा सकते है।।अब अगर बाल्मीकि की लिए वर्गीकरण भी कर दिया जाए तो 0.2% पर कितना मिलेगा?
"
ऐसी ही मूर्खता महाराष्ट्र में हो रही है।।
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1.मातंग मात्र 2% है।
2.चमार कि उससे सम्बंधित जातिया भी 2% के आसपास है।
3.महार 8% है।
अब मातंग व चमार महाराष्ट्र में 2%-2% में क्या कर लेंगे? जबकिं वो 14% पर बिहार में पासी व धोबी की तरह शिक्षित होकर अपना हक जमा सकते है।
वर्गीकरण के नाम पर एक तरह से बाल्मीकि का कंधा इस्तेमाल करके जो जातिया हमेशा आरक्षण ही नही बल्कि एससी/एसटी के खिलाफ रही है वो मुख्यतया सवर्ण जातिया अपना हित साधना चाहते है। उन्हें आर्टिकल 30 के अल्पसंख्यक आरक्षण जो कि एससी/एसटी से बेहतर है से आपत्ति नही है लेकिन एक नफ��त, चिढ़, जो एससी/एसटी के प्रति डीएनए में पूर्वजो से मिली है, उंसके आधार पर नए नए प्रयोग करते रहते है।
अब इस मोहतर्मा से जाटव हाय हाय करवाते रहते है। जबकि इस मोहतर्मा को समझना चाहिए कि इन लोगो को तुम्हारे व्यक्तिगत मैटर से कुछ लेना देना नही है, न ही कोई sympathy है। वो तो एससी/एसटी के ही बिल्कुल खिलाफ है।।
विकास कुमार जाटव
साथियों मुझे बताते हुए अतयंत हर्ष हो रहा है की मेरी किताब का दक्षिण एशिया संस्करण प्रकाशित हो गया है। यह भारत, नेपाल, बंदलादेश, श्रीलंका एवं भूटान में सस्ते दाम पर मिलेगी। अभी अमेज़ॉन पर लन्दन/अमरीकी संस्करण रूपए 22000/-का बिक रही है. अब यह 1100/- में भारत में बिकेगी।
दिल्ली में हो रहे “आरक्षण विरोधी” प्रदर्शन तथाकथित उच्च जातियों की अपनी वर्चस्व बचाने की एक नग्न कोशिश को बेनकाब करता है।
SCs, STs तथा OBCs के सा��ाजिक न्याय के खिलाफ अपने वर्चस्व को बचाए रखने और सामाजिक जाति प्रथा की रक्षा करने के लिए उन्होंने बेशर्मी से “ऊंची जाति” की अपनी पहचान को सबसे आगे रखा।
कल का यह तमाशा ठीक उसी “राष्ट्र-विरोधी” खतरे को सामने लाता है, जिसके बारे में डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने 25 नवंबर 1949 को संविधान सभा में अपने समापन भाषण में चेतावनी दी थी।
बाबासाहेब ने कहा था कि जातियां स्वाभाविक रूप से राष्ट्र-विरोधी होती हैं क्यो��कि वे सामाजिक जीवन को खंडित करती हैं, अलगाव को संस्थागत रूप देती हैं, और समुदायों के बीच ईर्ष्या तथा द्वेष के एक निरंतर चक्र को जन्म देती हैं।
कल, जब लोग खुले तौर पर गर्व के साथ “सवर्ण” पहचान और राजनीतिक नारों के तहत मार्च कर रहे थे, तब वे सक्रिय रूप से उसी राष्ट्र-विरोधी विभाजन को व्यवहार में ला रहे थे!
उन्होंने उस जाति व्यवस्था की रक्षा के लिए अपने सवर्ण अभिमान और वर्चस्व का हथियार की तरह इस्तेमाल किया जो सच्ची बंधुत्व की भावना को असंभव बना देती है।
“...यदि हम वास्तव में एक राष्ट्र बनना चाहते हैं। क्योंकि बंधुत्व तभी एक तथ्य हो सकता है जब एक राष्ट्र हो। बंधुत्व के बिना समानता और स्वतंत्रता केवल रंग की पुताई से अधिक कुछ नहीं होगी।”
बाबासाहेब के लिए राष्ट्र का निर्माण केवल राजनीतिक या संवैधानिक स्��र पर नहीं, बल्कि सामाजिक और मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी होना आवश्यक था। और इसके लिए बंधुत्व अनिवार्य था। यहीं उनकी बंधुत्व को लेकर कही गई बात बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। बंधुत्व के बिना समानता टिक नहीं सकती।
कोई भी समाज बंधुत्व प्राप्त करने का दावा तब तक नहीं कर सकता जब अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य पिछड़ा वर्गों के लिए सामाजिक न्याय की नीति के खिलाफ तथाकथित उच्च जातियां अपने जातिगत विशेषाधिकार का इस्तेमाल विरोध के रूप में करती हैं।
सच्चा लोकत��त्र तब ढह जाता है, जब वंचित और शोषित समुदायों की उन्नति को तथाकथित उच्च जातियों के वर्चस्व पर सीधे हमले के रूप में देखा जाने लगता है।
बंधुत्व जब तक एक जीवंत सामाजिक वास्तविकता नहीं बनता, तब तक समानता और स्वतंत्रता केवल एक सतही “रंग की पुताई” हैं, जो सामाजिक न्याय की पहली चुनौती के सामने ही उखड़ने लगती हैं।
मुझे इसमें कोई संदेह नहीं है कि यह प्रदर्शन आरएसएस-भाजपा द्वारा राजनीतिक रूप से संग��ित किया था। लेकिन कांग्रेस नेतृत्व की चुप्पी उतनी ही निंदनीय है। जब सामाजिक न्याय के खिलाफ सवर्ण गर्व को इतनी खुलेआम इस्तेमाल किया जाता है, तो चुप्पी का अर्थ मिलीभगत होता है!
जय भीम। जय संविधान। जय भारत।
"पानी नही मूत्र पिलायेंगे" इस प्रकार के नारे आरक्षण हटाने के नाम पर लग रहे। मुद्दा "आरक्षण हटाना नही" बल्कि देश की 27% जनसँख्या अथार्त "एससी/एसटी" के प्रति पूर्वजो से डीएनए से मिली नफरत है।
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आज Pay back to Society कार्यक्रम में सब्सक्रिप्शन से तीन की मदद करी। जो वाकई काफी परेशान थे, काफी समय से आग्रह कर रहे थे। । जिन मित्रो ने मुझे सब्स्क्राइब किया है उनका Pay back to Society में योगदान देने के लिए बहुत बहुत शुक्रिया। काफी जरूरतमंद बार बार आग्रह करते रह्ते है, उनमे मेरे आग्रह पर मित्र मदद कर देते है लेकिन काफी ज्यादा छूट जाते है। उनसे माफी चाहते है क्योंकि 90% से ऊपर समाज उदासीन है।
अब आरक्षण पर आ जाते है।
तीन दिनों से आरक्षण हटाओ के नाम पर जो ड्रामेबाजी चल रही है, उसमे;
1.किसी से बहस न करे। क्योंकि यह अब स्थाई है। इसके अलावा आरक्षण हटाने की मांग करने उनका लोकतांत्रिक अधिकार है। उन्हें अपने इस लोकतांत्रिक अधिकार का यूज करने दे। बल्कि उन्हें जंतर मंतर से हटा देना गलत है। उन्हें करने देना चाहिए था।
2.हालाँकि जो इस बहाने एससी/एसटी को अपशब्द कहे उंसके खिलाफ एफआईआर दर्ज जरूर करवाए।
3.यह जो ��रक्षण हटाने के नाम पर आंदोलन चल रहे है उंसकी स्वयं ज्यादा चर्चा न करे। क्योंकि जो विषय हट नही सकता है, उसपर काहे अपनी एनर्जी गलत लोगो से विवाद में बेकार करे।
4.लेकिन यह ध्यान रखे कि कट्टर हिन्दू , सनातन के नाम पर जो प्रदर्शन कर रहे है जो हिन्दू धर्म का ठेकेदार मानते है, वो ही बार बार एससी को "5000 साल से पानी नही मिला" के नाम पर चिढ़ा रहे है।
आरक्षण हटाने का मुद्दा केवल एससी एसटी से नह जुड़ा है। ओबीस��� को भी मिलता है और सबसे बड़ी बात अल्पसंख्यक वर्गों (मुस्लिम, जैन, सिख) को आर्टिकल 30 का सबसे बेहतरीन दुनिया का आरक्षण मिलता है। यह फ्रिंज एलिमेंट्स कभी आर्टिकल 30 में मिल रहे आरक्षण का विरोध नही करते है। कभी जैन या मुस्लिम को इस आधार पर टारगेट नही करते है। उनका टारगेट केवल और केवळ एससी/ एसटी है क्योंकि;
"इन वर्गों के प्रति उनके पूर्वजो से नफरत डीएनए से ट्रांसफर हुई है"
इसलिए केवल मुद्द्या "आरक्���ण" का नही बल्कि एक नफरत का है। नफरत जिसमे अल्पसंख्यक मुस्लिम, जैन, सिख को भाई मानते है लेकिन एससी/एसटी को खत्म कर��े की मंशा रखते है।
5.प्रश्न यह है कि;
"दगड़ू समाज के प्रतिशत के आधार पर मिले प्रतिनिधित्व अथार्त नौकरी के बाद उन्ही के चरणों मे पहली सैलरी, चढ़ावा उल्टा लेटरकर चढ़ाकर आता है जो उसे "5000 सालों से प्यासा" कहकर चिढ़ाते है, व इस चढ़ावे के एक हिस्से को आरक्षण खत्म करो अभियान में चन्दा देकर आते है"
इसमे असली गुनहगार "दगड़ू टाइप" के एससी/एसटी सरकारी कर्मचारी है।
विकास कुमार जाटव
वैसे भी सरकार इतने सारे अधिकारियों कर्मचारियों को नौकरी पर ना रख कर अरबों रुपए बचा रही है जिससे सरकार को अपना प्रचार प्रसार करने के लिए पैसे की कमी महसूस नहीं होती जिसका फायदा चुनाव में मिल जाता है,बाकी इस ��ार्य के लिए ठेके पर आसानी से मजदूर मिल जाते हैं।
बीते एक दशक में केंद्र सरकार के खाली पद करीब दोगुने हो गए। 2015 में 4.21 लाख पद खाली थे, जो 2024 में बढ़कर 8.24 लाख हो गए। कुल मंजूर पदों में रिक्तियों की हिस्सेदारी 11.5% से बढ़कर 21% हो गई। इस अवधि में केंद्र के विभिन्न विभागों में पदों की कुल मंजूर संख्या में 2.74 लाख का इजाफा हुआ। फिर भी भरे हुए पद 1.29 लाख घट गए।
सरकारी कंपनियों में करीब आधे कर्मचारी ठेके पर हैं। 2015 में ये आंकड़ा 18.6% था, जो 2025 में 49.1% हो गया। 2015 में रेलवे में कोई पद खाली नहीं था। 2024 में 2.40 लाख पद (16.2%) खाली हैं। हेल्थ में भी वेकेंसी की शून्य से 6% पहुंच गई।
बीते एक दशक में केंद्र सरकार के खाली पद करीब दोगुने हो गए। 2015 में 4.21 लाख पद खाली थे, जो 2024 में बढ़कर 8.24 लाख हो गए। कुल मंजूर पदों में रिक्तियों की हिस्सेदारी 11.5% से बढ़कर 21% हो गई। इस अवधि में केंद्र के विभिन्न विभागों में पदों की कुल मंजूर संख्या में 2.74 लाख का इजाफा हुआ। फिर भी भरे हुए पद 1.29 लाख घट गए।
सरकारी कंपनियों में करीब आधे कर्मचारी ठेके पर हैं। 2015 में ये आंकड़ा 18.6% था, जो 2025 में 49.1% हो गया। 2015 में रेलवे में कोई पद खाली नहीं था। 2024 में 2.40 लाख पद (16.2%) खाली हैं। हेल्थ में भी वेकेंसी की शून्य से 6% पहुंच गई।
@Kamlesh41855513 कालेजियम का कमाल
यहां कोई आरक्षण नहीं है
क्योंकि
यहां मेरिट नहीं,जाति देखकर सेलेक्सन होता है
यहां कोई परीक्षा नहीं होती,बस जाति ही काफी है।
यह एक ऐसी संस्था है जिसके एक आदेश से देश की पूरी व्यवस्था हिल जाती है।
ये देश का दुर्भाग्य है कि इतनी बड़ी संस्था में एक जाति का वर्चस्व है
भाजपा व कांग्रेस की केन्द्र और राज्यों में रही सरकारों ने हमेशा से उन्हीं जातियों के लोगों को बढ़ावा दिया है जो पहले से ही काफी सम्पन्न व अमीर रहे हैं सबका साथ सबका विकास का ढींढोरा पीटने वाली पार्टी का यही चाल चरित्र है।
दलितों के प्रति छूआछूत की मानसिकता आज भी इनके दिमाग में है
भाजपा स्वर्णों की पार्टी हैं दलितों-पिछड़ों कि नहीं। भाजपा और उसके समर्थित दलों की 22 राज्यों में सरकार हैं।
लेकिन इन 22 राज्यों में एक भी CM दलित नहीं है जबकि देश में दलितों की आबादी 22% हैं। भाजपा के पास 22 राज्यों में 22% दलितों के लिए एक मुख्यमंत्री का पद नहीं हैं।
सम्राट चौधरी,नयाब सिंह सैनी,मोहन यादव, भूपेंद्र पट��ल OBC मुख्यमंत्री हैं जबकि ओबीसी की आबादी देश में सबसे ज्यादा है 52% लेकिन हिस्सेदारी केवल 18%
3 आदिवासी मुख्यमंत्री हैं।
जबकि स्वर्णों को भाजपा ने भर भर के मुख्यमंत्री बनाया हैं। भाजपा और समर्थित दलों ने 15 स्वर्णों को मुख्यमंत्री बनाया जिनकी आबादी 15% नहीं हैं। लेकिन उनको 68% हिस्सेदारी दी हैं।
भाजपा दलितों पिछड़ों की रोटी छीन कर स्वर्णों को खिला रही है
भाजपा स्वर्णों की पार्टी हैं दलितों-पिछड़ों कि नहीं। भाजपा और उसके समर्थित दलों की 22 राज्यों में सरकार हैं।
लेकिन इन 22 राज्यों में एक भी CM दलित नहीं है जबकि देश में दलितों की आबादी 22% हैं। भा���पा के पास 22 राज्यों में 22% दलितों के लिए एक मुख्यमंत्री का पद नहीं हैं।
सम्राट चौधरी,नयाब सिंह सैनी,मोहन यादव, भूपेंद्र पटेल OBC मुख्यमंत्री हैं जबकि ओबीसी की आबादी देश में सबसे ज्यादा है 52% लेकिन हिस्सेदारी केवल 18%
3 आदिवासी मुख्यमंत्री हैं।
जबकि स्वर्णों को भाजपा ने भर भर के मुख्यमंत्री बनाया हैं। भाजपा और समर्थित दलों ने 15 स्वर्णों को मुख्यमंत्री बनाया जिनकी आबादी 15% नहीं हैं। लेकिन उनको 68% हिस्सेदारी दी हैं।
भाजपा दलितों पिछड़ों की रोटी छीन कर स्वर्णों को खिला रही है
1. दिल्ली के जंतर मंतर पर संविधान में एस.सी., एस.टी. व ओ.बी.सी. समाज को दिये गये आरक्षण के विरुद्ध अभी हाल ही में जमा हुये कुछ लोगों द्वारा आर्थिक आधार पर आरक्षण को लागू करने की उठाई गई यह नई माँग कतई भी उचित व देशहित में नहीं है��� उन्हें आरक्षण के सम्बंध में ऐसा कोई कार्य नहीं करना चाहिये जिससे समतामूलक समाज, विकसित व सम्मानित देश बनाने के संवैधानिक कार्यों को आघात पहुँचे।
2. वैसे भी देश में सदियों से जातिवाद की अमानवीयता का शिकार रहे एस.सी., एस.टी. व ओबीसी समाज के लोगों हेतु संविधान में की गई आरक्षण की व्यवस्था के बारे में परमपूज्य बाबा साहेब डा. भीमराव अम्बेडकर का यह कहना था कि ’जातिवाद का परित्याग ही सबसे बड़ी देशभ��्ति है’। अतः लोग सही देशभक्ति का परिचय ज्यादा दें तो यही उचित होगा।
3. जहाँ तक आर्थिक आधार पर आरक्षण देने की बात है, तो केन्द्र व राज्य सरकारों द्वारा भी ग़रीबी उन्मूलन के एक नहीं बल्कि अनेकों कार्यक्रमों पर काफी सरकारी धन हर वर्ष ख़र्च किया जाता है, किन्तु उसमें व्याप्त भ्रष्टाचार आदि के कारण इसका सही लाभ अगर देश के लोगों को नहीं मिलता है तो यह तो सरकारी व्यवस्था क��� सीधा-सीधा दोष है।
4. इसके अलावा, आर्थिक आधार पर आरक्षण की नई व्यवस्था भी देश में लागू है, जिसका भी सही लाभ अपरकास्ट समाज के ग़रीब परिवारों को नहीं मिल पा रहा है बल्कि इसमें छलावा अधिक है।
5. वास्तव में ख़ासकर यही वह भ्रष्ट व जातिवादी सरकारी व्यवस्था है जिसने आरक्षण के संवैधानिक रचनात्मक प्रावधान को कभी सही से ज़मीन पर लागू ही नहीं होने दिया है, जिस कारण एससी, एसटी व ओबीसी समाज के लोग, आज़ादी के इतने लम्बे अरसे के बाद आज तक भी, ग़रीबी, जातिवादी द्वेष, शोषण, अत्याचार व जातिवाद के ज़हर का दंश हर दिन हर स्तर पर लगातार झेलते रहते हैं।
6. अतः सभी सरकारें भी आरक्षण विरोधी तत्वों को शरण व संरक्षण बिल्कुल भी ना दें तो यह व्यापक देश व जनहित में होगा। लोगों से भी अपील है कि वे आरक्षण जैसे अहम् एवं संवेदनशील मुद्दे पर सस्ती राजनीति ना करें और ना ही होने दें।
7. हालाँकि उसी ही दिन पार्लियामेन्ट थाना क��� बाहर एक पीड़ित व्यक्ति के मामले में एफआईआर दर्ज कराने के लिए कांग्रेस के वरिष्ठ नेता श्री राहुल गाँधी कई घन्टों तक धरने पर बैठे रहे, जिसका पार्टी को कोई ऐतराज़ नहीं है।
ऽ लेकिन उसके बग़ल में जंतर-मंतर पर दलित व शोषितों के जातीय आधार पर दिये जाने वाले आरक्षण को ख़त्म करवाने के लिए धरना-प्रदर्शन भी चल रहा था, वहाँ पर वे व उनका कोई भी कांग्रेसी साथी उन्हें समझाने तक के लिये भी नहीं गये, जिससे इन वर्गों के प्रति इ��की आरक्षण विरोधी मानसिकता अभी भी साफ झलकती है।
देश के युवाओं की यह हालत सरकार ने की ना शिक्षा दे पायी ना ही रोजगार.सरकार ने सिर्फ अमीरों पर ही नजरें इनायत रखीं.उनके लिये देश के खजाने के साथ-2 सारे संसाधनों को बाँट दिया.2200 करोड़ रूपये चंद घरानो को R&D और chip इनोवाशन के नाम पर बांट दिये और अब ISRO भी खत्म प्लान पक्का है.
"आरक्षण" ऐसा विषय है जो कभी खत्म होना सम्भव नही है। सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सासंद रहते हुए कहा भी था कि;
"हम आरक्षण को खत्म नही कर सकते है। हाँ, इसे उस ��्तर पर ले जा सकते ही जँहा इसका होना या न होना बराबर है"
इसलिए;
1.आरक्षण खत्म नही होगा। यह ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य भी जानते है क्योंकि उनकी तीनो की कुल आबादी 8% से 10% के बीच है। उनके बस का नही है आरक्षण खत्म करवा सके। मात्र एक अफवाह की मो��ी सरकार सँविधान परिवर्तित कर रही है उससे 65 शीट घट गई। आरक्षण विरोध पर भाजपा 20 शीट से 30 शीट पर आ जायेगी, या अपने पुराने दिन अथार्त 2 शीट पर। इसलिए भाजपा के बस का नही है।
2.लेकिन राज्यो ने वाकई एससी आरक्षण को निष्प्रभावी कर दिया है । उदाहरण के लिए उत्तर प्रदेश का मेडिकल का कितना बड़ा विबाद चल रहा है। राज्य सरकार कोई ठोस जवाब नही दे रही है। इसके अलावा स्कॉलरशिप सही समय पर नही आ रही है। काफी बता रहे है कि सामान्य की स्कॉलरशिप 5 माह पहले ही आ गयी।।एससी एमबीबीएस छात्रो की अभी तक नही आई।
इसके अलावा अधिकतर नौकरी संविदा व ठेके , आउटसोर्सिंग पर चल रही है। जँहा आरक्षण नही है।। काफी सेक्टर में आरक्षण इतना निष्प्रभावित कर दिया है जिसका आम एससी को पता नही चलता है। हम डेटा संग्रह, पुराने डेटा से तुलना, अवलोकन, रिसर्च करके इन सभी पर नजर रखते है। आवाज उठाते है। लेकिन इस चक्कर मे बैंक बैलें��� व जेब हल्की हो जाती हैं। पिछले 3 महीनों में कम से कम 20 ऐसे विषयो पर नजर पड़ी जिसमे एससी को भारी नुकसान हुआ है। लेकिन अकेले हर विषय पर अभियान चलाना अकेले के बस का नही है।
3.ऐसे विषयो को Pay back to Society के माध्यम से अभियान चलाने में लोगो से सहयोग करने के लिए बार बार कहने पर अजीब सा व्यक्तिगत बुरा लगने लगा है,क्योंकि 20 में से 2 का रिस्पॉन्स आता है। कभी कभी विचार आता है, छोड़ो, जब मेरी आर्थिक स्तिथि अच्छी है तब काहे इसमे समय दे, औरों की तरह इंजॉय करे क्योंकि बाकी अन्य जिसे विषय बताया जाए कि फलाना छीन रहा है। अभियान चलाते हैं सम्मलित नही होना चाहते तो आर्थिक रूप।से पुश करे। लेकिन दूसरा ऐसा सोचता है कि यह बताने वाले अथार्त हमारा काम है। इसलिये एक समय बाद हम भी थक जाएंगे। इसी प्रकार सैकड़ो थककर घर आराम कर रहे है।। इसलिए आरक्षण हटाओ अभियान की जरूरत नही है। एससी एसटी एक दिन स्वयं इसे बिलकुल निष्प्रभावी करवा ही देगा।
4.आरएसएस की इच्छा आरक्षण खत्म करने की है। लेकिन उसे भी पता है कि 8% से 10% वाले समाज के बस का नही है।
5.सबसे मुख्य बात की;
आरक्षण की वजह से हिन्दू धर्म बचा हुआ है।।
क्योंकि एससी/एसटी/ओबीसी में धीरे धीरे हिस्सा ईसाई बनने के लिए तैयार बैठा है। आरक्षण उन्हें करने से रोक देता है। एससी को हिन्दू कहने की शुरुआत ही 1910 के बाद शुरू हुई। क्योंकि उस समय लग गया था कि देश से अंग्रेज भागने वाले है, इसलिए अपनी अपनी जनसँख्या ज्यादा दिखाने के लिए हिन्दू व मुस्लिम में हौड मची थी। इसलिए ब्राह्मण धर्म ने जँहा शिकागो सम्मलेन 1891 में हिन्दू धर्म की जगह "ब्राह्मण धर्म" के नाम से हिस्सा लिया, वंही एससी/एसटी को मुस्लिम आकर्षित न कर ले, अपना "ब्राह्मण धर्म" नाम छोड़कर "हिन्दू धर्म" कहलवाना पड़ा।
6.महत्वपूर्ण बात यह है कि;
"बाबा साहब ने आरक्षण कभी माँगा ही नही। उन्होंने मु��्लिम, सिख, ईसाई को मिल रहे अलग निर्वाचन मण्��ल व्यवस्था में एससी को शामिल करने की माँग करी थी क्योंकि एससी अवर्ण जातिया थी। ब्राह्मण धर्म से सम्बंधित नही रही।।उनका स्टेटस मुस्लिम, सिख, ईसाई की तरह स्वतंत्र था। जो स्वीकार कर ली गयी। लेकिन इसके खिलाफ गांधी धरने पर मरने की हालत तक बैठ गए। हमसे वो छीन गया। जो अगर नही छिनता तो आज हमारी स्तिथी बेहतर होती"
7.लेकिन प्रयास जारी रहें। बाबा साहब जब सँघर्ष कर रहे थे और जब उन्हें उनके अनुयायिओं ने बताया कि पास के गांव के एससी इस्लाम अपना रहे है तब बाबा साहब ने सार्वजनिक घोषणा करी की में "बौद्ध विचारधारा" अपनाऊंगा। जिसे 20 साल बाद उन्होंने अपनाया भी। इस वजह से इस्लाम का प्रभाव एससी बस्तियो के बाहर ही रुक गया। एक तरह से ;
" हिन्दुओ को बाबा साहब का एहसानमन्द होना चाहिए। नही तो अभी तक मुस्लिम 14% से 40% या ज्यादा दिखते"
8.वर्तमान में ईसाई एससी बस्तियो में घुसने की कोशिस कर रहा है। लेकिन "आरक्षण" क�� वजह से पिछले 20 सालों से नाकाम हो रहा है। क्योंकि ईसाई बनते ही आरक्षण खत्म। इसलिए लोगो का आकर्षण उस तरह नही है। बल्कि जो बन गए है, उनके घर अगर लोकल प्रशासन जाति प्रमाणपत्र "रद्द" क्यो न किया जाए का नोटिस भेज देंगे तो वो भी भागकर वापस आएंगे।
इसलिए आरएसएस को तो ज्यादा जोर शोर से आरक्षण की वकालत करनी चाहिए। बाकी;
विकास कुमार जाटव
UP असेंबली स्पीकर सतीश महाना शनिवार को उन्नाव में एक कार्यक्रम में पहुंचे थे। गार्ड ऑफ़ ऑनर के बाद जब राष्ट्रगान चल रहा था, तभी अचान�� महाना वहां से उतरकर चले गए। #Unnao @NBTLucknow
BSP के तत्वावधान में पंजाब में निकाली जा रही “सतगुरु श्री रविदास जी महाराज सम्मान यात्रा” को लगातार व्यापक जनसमर्थन मिला है।यात्रा में बड़ी संख्या में लोग शामिल होकर सतगुरु श्री रविदास जी महाराज के बेगमपुरा का संकल्प लिया.अब पंजाब को 2027 में BSP की ���रकार बनाकर बेगमपुरा बनाएंगे.
आरक्षण कोई भीख नहीं बल्कि देश की मजबूरी है जिससे स��स्टम में सबकी भागीदारी सुनिश्चित होती है, दूसरी उम्मीद जब बहुजनों का भारत के शासन व्यवस्था से मोहभंग हो रहा था तब मान्यवर साहब कांशीराम जी दे गये देश की राजनीति से जोड़कर।
किन्तु बहुजन समाज आज भी अपने आप को ठगा महसूस करता है।
भारत आबादी के अनुसार संसाधनों को बंटवारा होना चाहिए. आज भी सबसे ज्यादा संपत्ति और भूमि सवर्ण समुदाय के पास है.
1. उच्च जाति के पास 41% संपत्ति है.
2. ओबीसी के पास 31% संपत्ति है.
3. मुस्लिम के पास 8% संपत्ति है.
4. दलित समाज के पास 7.3% संपत्ति है.
5. आदिवासी समाज के पास 3.7% संपत्ति है.
सबसे ज्यादा संपत्ति सवर्ण समाज के पास है. इनकी आबादी 10% के आसपास है और 41% संपत्ति पर कब्जा है.
ओबीसी पिछड़ा 52%, दलित 24% और आदिवासी 10% हैं. आबादी के अनुपात में उनके पास संपत्ति और जमीन नही है.
भारत में सबसे बड़ा मुद्दा यही है. लेकिन कोई बहुजन नेता इस पर बोलता नही है कारण उनका पेट भरा हुआ है. ��ोलना लिखना आपको है, अपनी लड़ाई और संवैधानिक अधिकारों पर किसी नेता पर निर्भर मत रहिए. ये लोग CM या मंत्री बनकर अपने बच्चों के लिए सब सैट कर एक दिन मर जाएंगे.
भुगतना केवल आपको हमको और हमारी आने वाली पीढ़ी को पड़ेगा. वो आरक्षण के खिलाफ बोल रहे हैं तो आप इन मुद्दों को उठाओ.
नोटिस : अध्ययन 2013 NSSO AIDIS डेटा पर आधारित. 14 फरवरी 2019 इंडियन एक्सप्रेस.
IMAGE : Elite Women & Labour Women