रसूल अल्लाह ﷺ ने फ़रमाया:
जो शख़्स कोई बुराई देखे तो चाहीए की इस बुराई को अपने हाथ से रोक दे, जिसे इतनी ताक़त ना हो वो अपनी ज़बान से उसे रोक दे और जिसे इस की ताक़त भी ना हो वो अपने दिल में उसे बुरा जाने और ये ईमान का सबसे कमतर दर्जा है।
(जामे तिर्मिज़ी हदीस न . 2172 )
मैं दुखी हो चुका हूं। अपने वक्त से, अपने जिंदगी से, अपने किस्मत से, अपने आप से..!! मैं जहां खड़ा हूं वहां से मुझे खुशी का कोई भी टुकड़ा नही दिखता है। अब किसी पे भरोसा नही रहा, यहां हर इंसान अपने मतलब से ही हमसे बात करने आता है। खैर, मैं समझ गया हूं कि अब मुझे यहां कैसे जीना है ।।