मन ने भ्रमित कर रखा है हम सबको, दिमाग को लक्ष्य और कर्मठता से हटाकर उलझनो से तोड़ देना चाहता है। मत सुनो इसकी, दुर्बलता के गर्त में ढकेलते इन संवेगो को कुचलकर, लक्ष्य की ओर बढ़ते चलो । एक दिन मन की इन सारी उलझनो पर जीत होगी ।
•प्रह्लाद पाठक
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वह एक पुराना दुःख... हर बार नये जूतों की तरह पहना मैंने.... वह भीतर ही भीतर चोटिल करता रहा... और मैं किसी को बिना कुछ कहे सुने मुस्कुराती चलती रही.....
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(काव्यांश)
पायल
२९-३-२०२४