जब ठोकरें खाते-खाते तेरे दर पे आ गये
तो लगा इस सर को अब हया की आदत नहीं रही
जब भी हम यूँ तन्हा रास्तों पे गये
तो लगा अब इस दिल को तेरी ज़रूरत नहीं रही
जब भी शदीद धुप मे तेरी चाहत को आ गये
तो लगा अब छाँव की ज़रूरत नहीं रही
-काशिफ़
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@Hindi_panktiyan जुस्तजू थी जिसकी वो ख्वाब बन गये,
हमे चाहने वाले साभी राख बन गये,
वो कल जिस आईने मे तुम खुद को देखकर आये ,
आज पता चला है की वो अफताब बने गये।
@kavishala रख हौसला वो मन्ज़र भी आएगा
प्यासे के पास चलकर समंदर भी आएगा
यूँ थक कर ना बैठ ए मंज़िल के मुसाफ़िर
मंज़िल भी मिलेंगी और मज़ा भी आएगा
@satlajrahat@rahatindori @
A Tribute to All Time Favorite Rahat Indori Sahab
राहत साहब आपने शायरी का सलिक़ा सीखा दिया
बहुत से उझड़े आशिक़ों को रास्ता बतला दिया
यूँ तो पीने को बहुत थे मेह्खाने मगर
आपने गज़लो की सीरत से नशा करवा दिया
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