An ever-growing number of law-abiding, India-loving, working-class citizens who were once outraged by this kind of anarchy no longer feel anger. On the contrary, there's just calm.
They’ve accepted that the only option is to work hard and leave the country or, if they can't, work hard enough to ensure their children at least have the option to leave. Videos like this only strengthen their silent resolve.
अगर मोदीजी अपने तलवों में साइनाइड लगाकर स�� जाएँ, तो अगली सुबह निशिकांत दुबे ज़हरखुरानी के साथ ICU में भर्ती मिलेंगे, और सुधांशु त्रिवेदी आज तक पर यह समझाते दिखेंगे कि, सुनिए, निशिकांत जी को साइनाइड पॉइज़निंग कैसे हुई, यह ज़रूरी नहीं है; ज़रूरी यह है कि साइनाइड की खोज महाभारत काल में सायन ऋषि ने शुर्पारक राज्य में की थी। जो आज का मुंबई है, उसे महाभारत काल में शुर्पारक कहा जाता था, जो भगवान परशुराम की नगरी थी।
अभी तो और सुनिए, महाभारत में जो ज़हर-बुझे तीर बताए गए हैं, उनमें भी सायन ऋषि का बनाया हुआ साइनाइड ही लगा होता था। अंत में ��क बात और देखिए, देखना आप चौंक जाइएगा, मुंबई में आज जो हम सायन इलाका देखते हैं, वह भी सायन ऋषि के नाम पर ही रखा गया था।
*तालियां और आंखों से बिजलियां*
मेरा मानना है कि भारतीय विवाह व्यवस्था को आज जिस तरह देखा जा रहा है, वहाँ मूल समस्य�� विवाह नहीं है, दृष्टि है। और यह मैं इसलिए कह रहा हूं क्यूंकि विवाह से आज की युवक युवतियां घबराने लगे हैं।
मेरी दृष्टि में यह व्यवस्था कभी भी केवल स्त्री–पुरुष के मिलन के लिए नहीं बनी थी। यह दो जीवन यात्राओं का संयोग थी। यह भावुक निर्णय नहीं, बल्कि सोच-समझ कर लिया गया कदम था।
हमारे पूर्वज यह जानते थे कि आकर्षण स्थायी नहीं होता और इच्छाएँ बदलती रहती हैं। मनुष्य अक्सर अपने ही निर्णयों से भ्रमित हो जाता है। इसलिए परिवार, समाज और परंपरा को बीच में रखा गया।
ताकि केवल रूप या क्षणिक चाह नहीं, ���ल्कि स्वभाव, संस्कार, सहनशीलता और कर्तव्य को देखा जा सके।
प्रेम को विवाह की शर्त नहीं बनाया गया था अपितु प्रेम को विवाह का परिणाम माना गया था। आज समस्या यह नहीं है कि विवाह तय करके हो रहा है। समस्या यह है कि हम हर रिश्ते को लाभ–हानि के चश्मे से देखने लगे हैं।
क्या मिलेगा, कितना मिलेगा, मेरी सुविधा क्या होगी, मेरी इच्छा कितनी पूरी होगी? आं��लन करने के बाद विवाह, विवाह कहां रह जाता है?
किन्तु यही सोच तथाकथित प्रेम विवाह में होती है,
तो उसे आधुनिक कहा जाता है। और जब वही सोच तय विवाह में दिखती है, तो उसे दकियानूसी कह दिया जाता है।
मेरा मानना है कि असल समस्या परंपरा नहीं है। असल समस्या यह है कि परंपरा से धर्म निकाल दिया गया है।
यह सत्य है, चाहे कड़वा लगे किन्तु अधिकांश रिश्ते देह और धन के इर्द-गिर्द ही घूमने लगे हैं और यही दो कारण सबस��� अधिक टकराव पैदा करते हैं।
इसलिए तय विवाह तब तक स्थिर रहे, जब तक इन दोनों से ऊपर कर्तव्य, मर्यादा और दीर्घ दृष्टि रखी गई। आज वही विवाह कठिन लग रहा है, क्योंकि हम उसी ढाँचे में स्वार्थ और सुविधा भर रहे हैं।
विवाह एक सुख पाने की योजना नहीं बल्कि
मैं उसे धर्म की सहयात्रा समझता हूं। और इसलिए जब तक यह दृष्टि जीवित रहती है, विवाह जीवित रहता है।
डियर @fssaiindia के अधिकारियों ,
आपने पूरे द��श में मिलावटी खाद्य पदार्थ, नकली पनीर और नकली घी के खिलाफ नेशन-वाइड जांच की बड़ी घोषणा की थी। मीडिया में ढोल पीटा गया, हेडलाइन बनीं, और जनता को ��रोसा दिलाया गया कि सख्त कार्रवाई होगी।
आज आपकी घोषणा को 15 दिन हो चुके हैं।
अब सीधे सवाल 👇
यह नेशन-वाइड जांच कहां तक पहुंची?
कितने राज्यों में छापे मारे गए?
कितनी फैक्ट्रियां, गोदाम और सप्लाई चेन की जांच हुई?
कितने सैंपल फेल पाए गए और किन-किन शहरों में?
कितने लाइसेंस सस्पेंड/रद्द किए गए?
कितने FIR और प्रॉसिक्यूशन शुरू हुए?
जनता के सामने जांच की सार्वजनिक रिपोर्ट कब जारी होगी?
अगर कार्रव��ई हुई है तो डेटा सार्वजनिक कीजिए राज्यवार, जिला-वार, केस-वार।
और अगर नहीं हुई, तो साफ बताइए >>
क्या यह पूरा मामला सिर्फ प्रेस रिलीज़ और फर्जी नैरेटिव बिल्डिंग तक सीमित था?
क्या मिलावटखोर माफिया के सामने FSSAI सिर्फ बयानबाज़ी कर रही है?
खाने की सुरक्षा पब्लिक हेल्थ का मुद्दा है।
यहां शोर नहीं, जवाबदेही और ठोस कार्रवाई चाहिए।
🚨🚨 बीमा को सुरक्षा कहा गया था, लेकिन असल में ये धैर्य परीक्षा बन चुका है।
>> प्रीमियम समय पर कटता है — ऑटो-डेबिट, SMS, ईमेल, रिमाइंडर… सब तेज़।
लेकिन जब क्लेम का वक्त आता है 👇
• फाइल “अंडर रिव्यू” में चली जाती है,
• फोन “कस्टमर केयर” में अटक जाता है,
• और मरीज “मेंटल ट्रॉमा” में।
>> यही वो सिस्टम है जि��� पर @ajeetbharti सवाल उठा रहे हैं — और ये सवाल किसी एक केस का नहीं, पूरे बीमा इकोसिस्टम का है।
>> आज भारत में बीमा ऐसा प्रोडक्ट बन गया है, जिसमें रिस्क ग्राहक का है, फायदा कंपनी का है, और जवाबदेही किसी की नहीं।
@HDFCERGOGIC जैसी बड़ी कंपनियाँ भी क्लेम के समय भरोसे की जगह क्लॉज़, सब-क्लॉज़ और जांच का जाल बिछा देती हैं।
>> बीमा लेने वाला सोचता है — “मुसी��त में सहारा मिलेगा”
और सिस्टम कहता है — पहले साबित करो कि तुम सच में बीमार हो।
👉🏻 जब सुरक्षा शर्तों में उलझ जाए, तो उसे बीमा नहीं
संस्थागत असंवेदनशीलता कहा जाता है।
मुझे लगता है कि मेडिकल इंश्योरेंस , बड़े इंश्योरेंस कंपनियों के अधिकारियों और बड़े निजी अस्पतालों के बीच सांठ गांठ का जबरदस्त धंधा है जिसमें आम आदमी फंस चुका है .. एक बार लोग ये तय कर लें कि जेब में जितना पैसा है उतने का ही इलाज कराएंगे तो बड़े अस्पताल भरभरा कर ढह जाएंगे .. लूट मची है लूट .. और सुनवाई कहीं नहीं
हेल्थ इंश्योरेंस पर GST हटाते ही इसका सीधा लाभ आम जनता को मिलना चाहिए था न कि बीमा कंपनियों को, मगर GST हटते ही बीमा कंपनियों ने बेस प्रीमियम को 8 से 12 फीसदी तक बढ़ा दिया जो साफ तौर पर जनता के साथ धोखा और सरकार के नीतिगत फैसले का दुरुपयोग है | चूंकि हेल्थ इंश्योरेंस कोई लग्ज़री व्यवस्था नहीं बल्कि ज़रूरत है क्योंकि बीमारी पहले ही इंसान को तोड़ देती है और उस पर बीमा कंपनियों की लालच भरी नीतियाँ आम आदमी की कमर तोड़ रही हैं ऐसे में GST हटने का फायदा उपभोक्ता को मिलना चाहिए था मगर उसका तोड़ बीमा कंपनियों ने निकाल लिया जो जनता के हित में नहीं है |
मेरा प्रधानमंत्री श्री @narendramodi व वित्त मंत्री श्रीमती @nsitharaman से प्रश्न है कि
1- क्या हर सुधार का लाभ सिर्फ कॉरपोरेट मुनाफे तक सीमित रहेगा ?
2- ��्या IRDAI और सरकार,बीमा कम्पनियों की इस मनमर्जी पर सख़्त निगरानी रखेंगी या चुप रहेंगी ?
@PMOIndia @FinMinIndia
@JaipurDialogues Not just MP it’s going to cost big time in UP. 2027 is a gone case already if issues like this not handled correctly. Always pushing away core voters won’t be helpful. @AmitShah@myogiadityanath.
1. सिर्फ इंदौर के मेयर नहीं, मध्य प्रदेश का शासन एवं प्रशासन, इस महापाप के सभी जिम्मेवार लोग जनता के प्रति अपराध के कटघरे में खड़े हैं।
2. मेरी 'X' पर प्रतिक्रिया के बाद मीडिया के पत्रकार भाई बहनों से नहीं मिल पाने के लिए क्षमा मांगती हूं, अभी 3 दिन पहले मेरी दाईं आंख की सर्जरी (ऑपरेशन) हुई है, मोबाइल, फोन पर बात करना, धूप, ध��ल सब पर रोक लगी है, अभी 7 दिन बाहर नहीं निकलना, ना मुलाकात कर पाना है, क्षमा मांगती हूं।
@ajeetbharti UP में गाड़ी चलाने वाला हर इंसान मानेगा,सरकारी नौकरी की ऑफ़िशियल गाड़ी वाला सड़क को अपनी जागीर समझता है। और गाड़ी अगर प्रशासन या पुलिस की हो, तो पूछना ही क्या।
नोट- बड़े अधिकारियों की बात नहीं कर रहा, उनका कॉन्वॉय तो सामने वाली हर गाड़ी को हटाते हुए चलता है।
The uncomfortable truth is: everyone has to go through a phase of intense hard work at least once in their life.
For some, it's during school.
For others, it hits in college.
And for many, it comes later during their first job, first switch, second switch, or even beyond.
The catch?
The later you push that phase, the tougher it gets.
Early in life, the competition is smaller, the responsibilities are fewer, and the stakes are low. That’s when excellence is cheapest, in terms of effort, stress, and sacrifice.
But once reality hits, when bills show up, when you see your peers pulling ahead, when survival and growth clash, the grind becomes ten times harder. Because now you're competing with thousands who are hungry, experienced, and desperate for the same opportunity.
So yes, cracking something early (be it JEE, exams, a skill, or a career break) doesn’t “guarantee” life, but it gives you leverage. And leverage compounds.
Early excellence isn’t about privilege, it’s about momentum.
The sooner you build it, the longer you benefit from it.