खरनाल (नागौर) में परम आराध्य वीर तेजाजी महाराज के बलिदान दिवस पर आयोजित विश्व विख्यात मेला महोत्सव में पहुंचने पर ग्रामीणों व मंदिर समिति ने स्वागत किया |
बीकानेर की इस रात का दृश्य किसी उत्सव का नहीं, किसी तमाशे का नहीं; एक सामूहिक जागरण का है। ऊपर से लिया गया यह दृश्य बताता है कि धरती के लिए जब मनुष्य खड़ा होता है, तो वह अकेला नहीं रहता। खेजड़ी बचाओ आंदोलन की यह तस्वीर सिर्फ़ एक भीड़ नहीं दिखाती, यह उस नैतिक ऊर्जा का प्रमाण है, जो अक्सर रेगिस्तान की खामोशी में दबा दी जाती है, लेकिन मिटती नहीं।
हज़ारों लोगों का एक साथ इकट्ठा होना अपने आप में असाधारण नहीं है; असाधारण यह है कि वे किसी नेता के वादे के लिए नहीं, किसी तात्कालिक लाभ के लिए नहीं, एक पेड़ के लिए; एक जीवन-रेखा के लिए; एक साथ खड़े हैं। खेजड़ी, जो मरुस्थल में सिर्फ़ पेड़ नहीं है, संस्कृति है, अर्थव्यवस्था है, पशुधन की छाया है, और सबसे बढ़कर भविष्य की शर्त है। यह आंदोलन उसी शर्त को बचाने का संकल्प है।
तस्वीर में दिखती रोशनी सिर्फ़ मंच की नहीं है। यह रोशनी उन चेहरों की है, जो शायद पहली बार यह महसूस कर रहे हैं कि पर्यावरण कोई दूर की, शहरी शब्दावली नहीं, बल्कि उनके रोज़मर्रा के जीवन का सवाल है। यह भीड़ किसान की है, पशुपालक की है, छात्र की है, बुज़ुर्ग की है और उन बच्चों की भी, जिनके लिए खेजड़ी सिर्फ़ किताबों में नहीं, ज़मीन पर बची रहनी चाहिए।
बीकानेर जैसे शुष्क क्षेत्र में खेजड़ी का सवाल जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर है। यह पेड़ पानी को थामता है, मिट्टी को बाँधता है, और मनुष्य को यह याद दिलाता है कि विकास का अर्थ सिर्फ़ कंक्रीट और खनन नहीं होता। इस आंदोलन की सबसे बड़ी ताक़त यही है कि यह विकास-विरोधी नहीं है; यह अंधे, हिंसक, और संवेदनहीन, मनुष्यता विरोधी, जैव विविधता विरोधी, गोधन विरोधी, ऊँट बकरी भेड़ विरोधी विकास के ख़िलाफ़ है।
इस दृश्य में एक और बात साफ़ दिखती है—यह आंदोलन किसी एक संगठन या चेहरे तक सीमित नहीं है। यह नीचे से उठी हुई आवाज़ है। कोई एक झंडा, एक नारा, एक चेहरा केंद्र में नहीं है; केंद्र में है खेजड़ी। यही इसे नैतिक रूप से मज़बूत बनाता है। जब मुद्दा व्यक्ति से बड़ा हो जाए, तभी आंदोलन इतिहास बनते हैं।
आज जब जलवायु संकट को अक्सर आँकड़ों और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों तक सीमित कर दिया जाता है, बीकानेर का यह दृश्य बताता है कि असली जलवायु राजनीति ज़मीन पर होती है। यह आंदोलन उम्मीद देता है कि मरुस्थल भी प्रतिरोध कर सकता है—शांत, संगठित और सामूहिक तरीके से।
खेजड़ी बचाओ आंदोलन का यह क्षण हमें यह भी सिखाता है कि आशा हमेशा नारों में नहीं, दृश्यों में जन्म लेती है। जब लोग रात में भी घर लौटने के बजाय धरती के साथ खड़े रहना चुनते हैं, तब भविष्य थोड़ी देर के लिए सुरक्षित महसूस होने लगता है। यही इस तस्वीर की सबसे बड़ी उपलब्धि है—यह हमें यह भरोसा देती है कि अभी बहुत कुछ बचाया जा सकता है।
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हनुमान बेनीवाल: वह किसान–नेता, जिसने अदृश्य हो जाने से इंकार कर दिया
ऐसे समय में, जब भारतीय राजनीति आज्ञाकारिता को साहस से अधिक मूल्य देती है, हनुमान बेनीवाल एक असुविधाजनक अपवाद की तरह खड़े दिखाई देते हैं।
राजस्थान की तपती हुई राजनीति में, जहाँ वफादारियाँ अक्सर जाति, सत्ता और परंपरा से तय होती हैं; बेनीवाल ने एक ऐसा रास्ता चुना जो प्रायः राजनीतिक निर्वासन की ओर जाता है। उन्होंने भारतीय जनता पार्टी से न केवल विद्रोह किया, उसके बाहर रहकर अपना वजूद भी कायम रखा।
मेरे ख़याल से हाल के वर्षों में देवी सिंह भाटी के बाद राजस्थान में वे पहले नेता हैं, जिन्होंने यह साबित किया कि केंद्रीय सत्ता से अलग होकर भी जनाधार बनाया जा सकता है और उसे बचाए रखा जा सकता है। भाटी तो फिर भी वापस भाजपा में चले गए; लेकिन उन्होंने किसान आंदोलन के समय मोदी सरकार से भी टकराव मोल लेकर अपने आपको दु:साहसी साबित किया।
2 मार्च 1972 को नागौर ज़िले में जन्मे हनुमान बेनीवाल राजनीति से अनजान परिवार से नहीं आते। उनके पिता रामदेव बेनीवाल राजस्थान विधानसभा के दो बार सदस्य रहे। लेकिन राजनीतिक विरासत ने उन्हें रास्ता दिखाया, मंज़िल नहीं। उनकी असली दीक्षा विश्वविद्यालय के गलियारों, पुलिस की लाठियों और जेल की सलाखों के बीच हुई।
नब्बे के दशक में अगर राजस्थान विश्वविद्यालय छात्र राजनीति का उबलता हुआ केंद्र था तो इसलिए कि वहाँ हनुमान ही अपनी गदा घुमा रहे थे। वहीं से बेनीवाल उभरे—पहले महाराजा कॉलेज, फिर लॉ कॉलेज और अंततः राजस्थान विश्वविद्यालय छात्रसंघ के अध्यक्ष के रूप में।
एक आंदोलन के दौरान 1996 में गिरफ्तारी और फिर तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोंसिंह शेखावत के आदेश पर आधी रात को रिहाई—यह घटना कैंपस की लोककथा बन गई।
विश्वविद्यालय के छात्रावास में 1997 में हुए सामूहिक बलात्कार के विरोध में उन्होंने जो आंदोलन किया, उसने उन्हें केवल नेता नहीं, आक्रोश की आवाज़ बना दिया। पुलिस मुकदमों के बावजूद वे निर्दलीय चुनाव जीत गए।लेकिन छात्र राजनीति का सबसे निर्णायक क्षण तब आया जब उन्होंने ग्रामीण छात्रों के लिए पाँच प्रतिशत अतिरिक्त अंक की माँग को आंदोलन में बदला। यह कोई बड़ा नारा नहीं था, एक व्यावहारिक न्याय की माँग थी।
आठ दिनों की जेल और लगातार संघर्ष के बाद यह माँग मानी गई, और लगभग आठ हज़ार ग्रामीण छात्रों को विश्वविद्यालय में प्रवेश मिला। यहीं से बेनीवाल ने यह सीख ली कि अगर आंदोलन लंबा और ईमानदार हो तो संस्थाएँ भी झुकती हैं।
मुख्यधारा की राजनीति में उनका प्रवेश उतना सहज नहीं था। 2003 में पहला विधानसभा चुनाव हारने के बाद 2008 में वे भाजपा के टिकट पर खींवसर से जीते। लेकिन यह रिश्ता अस्थायी साबित हुआ। 2010 के दशक की शुरुआत में उन्होंने भाजपा के शीर्ष नेतृत्व पर भ्रष्टाचार और सत्ता-साठगाँठ के आरोप लगाए। पार्टी ने इसे अनुशासनहीनता कहा; बेनीवाल ने इसे नैतिक ज़िम्मेदारी। नतीजा—निलंबन और निष्कासन।यहीं से उनका असली राजनीतिक परीक्षण शुरू हुआ।
2013 में निर्दलीय जीतकर उन्होंने यह साबित किया कि भाजपा से बाहर रहना राजनीतिक आत्महत्या नहीं है। वे विधानसभा में ऐसे विधायक बने जो सत्ता के भीतर रहकर भी विरोध की भाषा बोलते थे। चाहे आरपीएससी के पेपर लीक हों, अवैध बजरी खनन हो या किसानों की उपेक्षा—बेनीवाल ने हर मुद्दे को सड़क तक पहुँचाया।
2015 में उन पर हुआ हमला और उसके बाद छात्रों का उग्र विरोध, उनकी जनस्वीकृति का प्रमाण था।2018 में राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी (RLP) की स्थापना एक जोखिम भी थी और एक घोषणा भी। किसान कर्ज़माफी, मुफ़्त सिंचाई बिजली और न्यूनतम समर्थन मूल्य जैसे मुद्दों को लेकर उनके ‘किसान हुंकार’ महा-रैलियों ने राजस्थान की राजनीति को झकझोर दिया। आरएलपी राज्य की तीसरी राजनीतिक शक्ति बनकर उभरी—एक दुर्लभ उपलब्धि।
2019 में नागौर से लोकसभा जीतकर वे राष्ट्रीय राजनीति में पहुँचे, भाजपा-नेतृत्व वाले एनडीए के सहयोगी के रूप में। लेकिन यह गठबंधन भी स्थायी नहीं रहा। 2020 के कृषि क़ानूनों पर उन्होंने खुला विद्रोह किया—संसदीय समितियों से इस्तीफ़ा दिया, किसानों को दिल्ली कूच के लिए संगठित किया और अंततः एनडीए से नाता तोड़ लिया। ऐसी संसद में, जहाँ असहमति दुर्लभ होती जा रही है, यह कदम असाधारण था।
दिसंबर 2023 में संसद की सुरक्षा भंग होने की घटना के दौरान, जब घुसपैठिए लोकसभा कक्ष में कूदे, बेनीवाल उन सांसदों में थे जिन्होंने उन्हें काबू किया। बाद में उनका बयान कि “हीरोगीरी उतार दी”; उनकी राजनीतिक शैली का सटीक प्रतिबिंब था: सीधी, देहाती और दिखावे से मुक्त। हालाँकि उनकी राजनीति अजेय नहीं रही। फिर भी भाजपा और कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों के बलशाली नेताओं के सामने महाबली हनुमान ही साबित हुए। भले चुनाव उनके हाथ से निकल गया हो।
2024 के खींवसर उपचुनाव में उनकी पत्नी कनिका बेनीवाल की हार ने यह दिखाया कि करिश्मा भी सीमित होता है और जातीय समीकरण अब भी निर्णायक हैं। हालांकि कनिका चुुनाव हार गईं, लेकिन यह तय है कि गंगानगर की यह बेटी भी इस संघर्ष की राह से एक दिन विधानसभा या लोकसभा ज़रूर पहुंचेगी।
आज हनुमान बेनीवाल राष्ट्रीय राजनीति में एक असहज लेकिन साहस के स्थान पर खड़े हैं। 2024 में ‘इंडिया’ गठबंधन से जीतने के बाद भी उन्हें हाशिये पर रखे जाने की शिकायत रही। यह उस संरचनात्मक सच्चाई को उजागर करता है कि छोटे दलों के नेता, चाहे जितने लोकप्रिय हों, राष्ट्रीय गठबंधनों में अक्सर अस्थायी माने जाते हैं।फिर भी, राजस्थान की राजनीति में हनुमान बेनीवाल एक ज़रूरी याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र अब भी सड़कों से जन्म ले सकता है, सिर्फ़ पार्टी मुख्यालयों से नहीं। यह भविष्य की राजनीति में टिक पाएगा या नहीं, कहना मुश्किल है। लेकिन इतना तय है कि बेनीवाल ने एक दुर्लभ काम किया है: उन्होंने विरोध को टिकाऊ बना दिया है। अगर हनुमान बेनीवाल की तरह का साहस भाजपा या कांग्रेस के कुछ नेताओं ने दिखाया होता तो राजस्थान आज एक अलग ही राह पर चल रहा होता!
हनुमान बेनीवाल को जन्मदिन की असीम शुभकामनाएँ!
@hanumanbeniwal@RLPINDIAorg@kanikabeniwal51
टिब्बी मुद्दे पर हनुमान बेनीवाल ने लोकसभा में कांग्रेस को पूरी तरह बेनकाब कर दिया है।
हनुमानगढ़ के टिब्बी में कल एथेनॉल फैक्ट्री को लेकर हुए भारी बवाल का मुद्दा हनुमान बेनीवाल ने लोकसभा में उठाते हुए कहा कि राजस्थान से कांग्रेस के 11 सांसद हैं। किसानों ने ही उन्हें वोट देकर संसद भेजा है, फिर भी किसानों की लड़ाई में कांग्रेस का मौन हैरान करने वाला है। इस घटनाक्रम में कांग्रेस के एक विधायक अभिमन्यु पूनिया घायल भी हुए हैं।
बेनीवाल ने कहा कि विपक्ष की भूमिका कांग्रेस को निभानी चाहिए थी, लेकिन किसानों की आवाज़ उठाने का काम मुझे ही करना पड़ रहा है।
धन्यवाद है हनुमान जी को
जनता से जुड़े मुद्दों की अनदेखी पर जब कभी पत्रकार लोग मुख्य विपक्षी पार्टी कांग्रेस को आड़े हाथों लेते हैं तो भाजपाई ठहरा दिए जाते हैं। चलो भाइयों, अब हनुमान जी को भी भाजपाई बता दो लेकिन कांग्रेस अपना मुख्य विपक्षी दल होने का धर्म तो कम से कम निभाए।
अरावली केवल पहाड़ों की एक शृंखला नहीं, उत्तर भारत की श्वसन प्रक्रिया है।
ऐसे में लोकसभा में हनुमान बेनीवाल का नियम 377 के तहत इसका मुद्दा उठाना महज एक राजनीतिक हस्तक्षेप नहीं, एक पर्यावरण–संकट पर समय रहते बजाई गई चेतावनी की घंटी है।
दुःखद यह है कि जिस प्रश्न पर सभी दलों को एक स्वर में मुखर होना चाहिए, वहाँ मुख्य विपक्ष ख़ास तौर पर कांग्रेस लगभग निस्तब्ध पड़ी है।
अरावली भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रेणियों में से है; यह दिल्ली–एनसीआर से लेकर राजस्थान के एक दर्जन से अधिक ज़िलों तक भूजल, जलवायु और जैव–विविधता की अदृश्य ढाल की तरह काम करती है। यही शृंखला रेगिस्तान की रेत को आगे बढ़ने से रोकती है, हवा को कुछ हद तक शुद्ध करती है और अनगिनत गाँवों के कुओं–तालाबों की प्यास बुझाती है।
ऐसे में हनुमान बेनीवाल के दिए गए आँकड़े – पाँच साल में 27,000 से अधिक अवैध खनन, परिवहन और भंडारण के मामले और मात्र 13% में एफआईआर आदि सब हमारे पर्यावरणीय शासन की असल विफलता को उघाड़ते हैं।
244 करोड़ रुपए का जुर्माना सुनने में बहुत लगता है, लेकिन एक पहाड़ की रीढ़ टूट जाने के बाद पैसा किस काम आता है?
नष्ट हो चुके जल–स्रोत, उजड़ी हुई जैव–विविधता और कटे हुए जंगल किसी चेक से वापस नहीं आते। एनजीटी ने अरावली में खुदाई को जघन्य अपराध की श्रेणी में रखा है, फिर भी सरकारों की चुप्पी और आधी–अधूरी कार्रवाई बताती है कि नीतियाँ काग़ज़ पर हैं, ज़मीन पर नहीं।
एक पर्यावरणविद और पर्वत–संरक्षक की नज़र से देखें तो हनुमान बेनीवाल ने केवल अरावली नहीं, हमारी आने वाली पीढ़ियों के भविष्य का मुद्दा उठाया है।
अब ज़िम्मेदारी केंद्र, राजस्थान और हरियाणा सरकारों पर है कि वे विशेष नीति, सख़्त प्रवर्तन और जन–भागीदारी के साथ अरावली को “खनन–ज़ोन” नहीं, “जीवन–ज़ोन” घोषित करें। अगर हम आज इन पहाड़ों को नहीं बचाते, तो कल कोई क़ानून, कोई जुर्माना, हमारे सूखते हुए आसमान और फिसलती धरती को बचा नहीं सकेगा।@hanumanbeniwal
ठेकेदार ने शिकायत वापिस लेने के लिए मुझे 2 केंद्रीय मंत्रियों ,15 सांसदों और 20 विधायकों सहित बहुत से अधिकारियों से कॉल करवाए लेकिन मैं विकास कार्य के साथ भ्रष्टाचार बर्दास्त नहीं कर सकता ! देश के इतिहास में ये पहला मामला होगा जब पूरी सड़क टूटकर वापिस बनेगी - @hanumanbeniwal जी
गोविंद सिंह डोटासरा जी कल भाषण दे रहे थे हनुमान बेनीवाल जी MLA है क्या ?
जो व्यक्ति सांसद है वो विधायक क्यों रहना चाहेगा !
दूसरी बात जब हाईकमान कांग्रेस के बड़े नेताओं को सांसद का चुनाव लड़वाना चाहती थी तब सभी नेताओं ने हारने के डर से लड़ने से मना कर दिया था
लेकिन हनुमान बेनीवाल लड़ा भी और जीता भी ।
राजस्थान के लोकदेवता #पाबूजी के मुख्य अनुयायी "पाबूजी का पावड़ा" मीठी #राग में गाकर इनका संदेश घर-घर पहुंचाते हैं..इन्ही लोगो के कारण आज अपनी लोक कला और संस्कृति जीवित है जहां भी ये लोग मिले इनकी #मदद कीजिए...🙏
पाबूजी महाराज को ऊंटों 🐫 का #देवता भी कहा जाता हैं। #Rajasthan
यह बंदा अपने समर्थकों को दिल से फटकार लगाता है।
यह बंदा अपने समर्थकों को उनकी खामियां बताता है।
इस बंदे ने अपना एक ऐसा समर्थक वर्ग तैयार किया है जो डांट खाकर भी खुश होता है और झापड़ खाकर भी।
इस बंदे के हाव-भाव देखकर आपको भले ही हंसी आए लेकिन इसके संदेश गहरे होते हैं।