अपनी फजियत कराने के लिए सभी अहीर भाई जुड़ जाएं ☺️
सुबह से देख रहा था कि, अहीर समाज का एक बर्ग भी दूसरे इतिहास चोर वर्गों की श्रेणी में आ गया है, वो भी सुबह से बनाफर क्षत्रिय योद्धा आल्हा की जयंती पर अपनी जाति की मोहर जबर्दस्ती लगा रहा है...
फिर मेरी इच्छा हुई , की अहीर समाज अगर ऐसा दावा कर रहा है ,तो जरूर कोई ना कोई इनका कनेक्शन तो होगा आल्हा से ,,,तब मैंने इतिहास को देखना शूरु किया ,जिसमे बनाफर राजपूतो का जिक्र तो मुझे आल्हाखण्ड से लेकर भोपाल, बुंदेलखंड ,कन्नौज गजेटियर में मिला , बनाफर वंश को कई जगह यदुवंशी राजपूत भी कहा गया है ,,,पर अहीर शब्द मुझे कहीं नही मिला !
फिर अंत में जब मैं अवध का गजेटियर पड़ रहा था, तब मेरी नज़र अहीर शब्द पर पड़ी और तब पता चला कि इसी बजह से अहीर पगलाए घूम रहे हैं ,लेकिन आधी सच्चाई के साथ !!!
कियूंकि ये सच्चाई थोड़ी कड़बी है.
इतिहास के मुताबिक , आल्हा की एक सौतेली मां भी थी, मतलब आल्हा के पिता जी की दूसरी पत्नी ,जो अहीर कुल से थी , जिन्हें हम दासी भी कह सकते हैं, और उस दासी पत्नी से एक पुत्र भी था जिसका नाम चौरा था , जो आल्हा का सौतेला भाई हुआ ,,,जिसको माता की जाति की बजह से ,राजपूत उसे गंगा में बहा दिया गया था ।
फिर किसी तरह वो चौहानों के पास पहुंचा फिर बड़े होने पर पृथ्वीराज चौहान की सेना की तरफ से युद्ध किया ।।
#राजपूत_योद्धा_आल्हाऊदल
#RajputYoddhaAalhaUdal
@rajput_of_india 🏹
#पूरी पोस्ट पढ़ें...
#आल्हा-ऊदल और बनाफर राजपूत
बनाफर राजपूतों के बारे में ज्यादातर राजपूतों को भी जानकारी नहीं और वंश श्रेष्ठता के चक्कर में उनपर कुछ राजपूत भी उजूल-फिजूल टिप्पणियाँ करते रहते हैं।
रक्त शुद्धता का सबसे बड़ा पैमाना होता है कि उस क्षेत्र के सभी राजपूत वंश सदियों से जिस वंश में शादी विवाह कर रहे हों वो वंश रक्त शुद्धता की कसौटी पर खरा उतरता है। बिना ठोस जानकारी के कुछ लोग बनाफर राजपूत वंश को अहीर बताते हैं, जो बेहद शर्मनाक है।
वीर आल्हा ऊदल का बनाफर वंश---
बनाफर वंश बुन्देलखण्ड के हमीरपुर, बांदा, जालौन, उरई, ललितपुर, बनारस, चंदौली, मिर्जापुर, सोनभद्र, बिहार, मध्य भारत मे मिलता है और इनके आसपास के सभी प्रतिष्ठित राजपूत वँशो चन्देल, रघुवंशी, गौतम, दिखित, सोमवंशी, गौड़, सूरवार, गहलोत,बैस आदि से विवाह सम्बन्ध सदियों से होते आए हैं ये उनकी रक्त शुद्धता का सबसे बड़ा परिचायक है।
इस वंश के बारे में अलग अलग मान्यताएं हैं ,कहीं इन्हें यदुवंश की शाखा होना लिखा है कहीं इन्हें भीम का वंशज होना लिखा है और हिमाचल पंजाब के पठानिया वंश को भी बनाफर की शाखा होना लिखा हुआ है।
मत सत्य चाहे जो भी हो ,पर हमारे सभी 36 शुद्ध क्षत्रिय वंश जिनमे विवाह सम्बन्ध करते आए हों उनपर सुनी सुनाई अधकचरी जानकारी के आधार पर आक्षेप लगाने का अधिकार इन ज्यादा पढो लिखो को किसने दे दिया????
मूर्खता की पराकाष्ठा देखिए,
एक ने लिखा कि बनाफर मतलब बने हुए फर्जी राजपूत!!!
अरे मूर्ख वो बनोत होता है जो थोड़े से ईस्ट यूपी और बिहार में अलग जाति के रूप में मिलते हैं, बनोत और बनाफर दोनो अलग हैं इनमे कोई सम्बन्ध नही!!!
एक महान हस्ती ने लिखा कि "जनश्रुति और कुछ अंग्रेज इतिहासकार बनाफ़रो को राजपूत पिता और अहीर माता की सन्तान मानते थे तो बनाफर भी अहीर थे,।
मतलब अधकचरी जानकारी के आधार पर बनाफर अहीर हो गए????
सत्य ये हैं कि चन्द्रवँशी बनाफर वंश क्षत्रप वनस्पर के वंशज हैं जो शक/कुषाणों के अधीन मध्य भारत मे उनके गवर्नर के रूप में शासन करते थे।
सभी बनाफर आल्हा ऊदल के वंशज नही हैं ,और आल्हा ऊदल की माता का अहीर होना भी झूठी किवदंती है,
और ये देखिए असली बात ये है पर किवंदती कुछ और फैल गयी।
महोबा के चन्देल शासक परमाल के दो बनाफर राजपूत सेवक थे -- दसराज और बच्छराज,
परमाल ने दसराज के साथ अपनी रानी मल्हना की बहन दिवला का और बच्छराज के साथ तिलका का विवाह करा दिया था।
दसराज (दस्सराज, जसहर) के आल्हा (नुन आल्हा) और उदयसिंह (उदल, रुदल) एवं बच्छराज के मलखान (मलखै) और सुलखान नामक पुत्र हुए।
दसराज के यहाँ किसी दूसरी अहीर स्री से चौड़ा (अवैध पुत्र) भी पैदा हुआ था, जिसे नदी में बहा दिया गया था। सौभाग्य से उसे पृथ्वीराज चौहान के पास पहुँचा दिया गया था।
चौहान ने पुत्रवत् इसकी देखरेख की थी।
यहीं चौड़ा, कालान्तर में, चौहान सेना का अधिपति बना। आल्ह खंड की अंतिम लड़ाई में इसे आल्हा, ऊदल यानी सौतेले भाइयों के विरुद्ध महोबा में लड़ते हुए उल्लेख हुआ है।
इसका अर्थ है कि आल्हा ऊदल की माता तो चन्देल शासक परमाल की पत्नी की सगी बहन दिवला थी ,
और आल्हा की सौतेली माता कोई अहीर भी थी जिससे जो सन्तान हुई वो महोबा के युद्ध मे पृथ्वीराज चौहान की ओर से लड़ने आई थी,
उस अहीर स्त्री के वंशज आज भी अहिरो में dauwa अहीर के रूप में पाए जाते हैं।
जगनिक ने जब आल्हाखण्ड लिखा था तो उसमें सही तथ्य दिए, किन्तु बाद में इसमे काल्पनिक बाते जुड़ती चली गयी और आल्हा ऊदल की माता अहीर होना प्रचलित कर दिया गया जिसका उल्लेख ब्रिटिश इतिहासकारों ने भी किया।
आल्हा ऊदल की सौतेली माता अहीर होने से कुछ मूर्खो ने पूरे बनाफर वंश को ही अहीर और अशुद्ध होना प्रचारित कर दिया!!!!
सत्य यही है कि वीर आल्हा ऊदल का बनाफर राजपूत वंश सभी शुद्ध क्षत्रियो के साथ वैवाहिक सम्बन्धो द्वारा जुड़ा हुआ है जिसका बेहद गौरवशाली इतिहास है।
पर्याप्त जानकारी न हो तो उलजुलूल पोस्ट या कोई भी आक्षेप लगाना बन्द किया जाए।
#राजन्य_क्रॉनिकल्स_टीम
#RajputyoddhaAalhaUdal
@1stIndiaNews@RahulGandhi@ashokgehlot51@SachinPilot@siddaramaiah सचिन पायलट जो कुछ भी है वह केवल और केवल कांग्रेस पार्टी की वजह से है उनकी खुद की इतनी औकात नहीं है कि नये सिंधिया बन सकें। कांग्रेस की क्या वो तो हनुमान जी बेनीवाल और किरोड़ी लाल जी मीणा जितना वजूद नहीं रखते हैं।
#वामपंथियों और संघ #आरएसएस एक ही समय में एक क्षत्रिय राजा को अच्छा ,तो दूसरे क्षत्रिय राजा को बुरा बताकर क्षत्रियों के विरुद्ध कूटनीतिक #षड्यंत्र किया है। महाराणा प्रताप और मानसिंह उसके उदाहरण हैं।
#महाराणा प्रताप और #मानसिंह उस समय के 2 #बहुमूल्य रत्न थे। जिनकी वजह से भारत में सनातन संस्कृति जीवित बची रही।
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16 वीं शताब्दी में जिस समय #तोपों से लैस #मुगलो का देश पर कब्जा हो रहा था। उस समय दक्षिणी ,पूर्वी एवं मध्य भारत के अधिकांश हिस्सों पर तोपों से लैस #पठानों का कब्जा था।
उस समय महाराणा प्रताप और मानसिंह जैसे #कुछ ही क्षत्रिय राजा बचे थे। और उन क्षत्रिय राजाओं के पास हथियार के नाम पर तलवार और भाले थे।
तोपों के साए में क्षत्रिय राजाओं ने कूटनीतिक एवं रणनीतिक रूप से, हथियार के रूप में,केवल तलवार और भालों के साथ,इस देश में विदेशी आक्रमणकारियों का पूर्ण रूप से #कब्जा नहीं होने दिया।
यह #निष्पक्ष अध्ययन का विषय होना चाहिए था। लेकिन क्षत्रियों के प्रति पूर्वाग्रह एवं ईर्ष्या के कारण 16 वीं शताब्दी की तत्कालीन संकटकालीन परिस्थितियों का कोई निष्पक्ष अध्ययन करना ही नहीं चाहता।
अगर 16 वीं शताब्दी में मुगल और पठान एक दूसरे के #शत्रु ना होते । तो आज भारत में सनातन ,सिख ,पारसी, जैन ,बौद्ध धर्म का #अस्तित्व नहीं होता।
#पारसियों को अपने देश पर्सिया से जान बचाकर भारत में ही शरण लेनी पड़ी। पारसी लोग अपनी जान बचाने के लिए यूरोप की ओर नहीं भागे। क्योंकि पारसी भारत में अपने को सुरक्षित समझते थे।
ऐसी ही संकटकालीन एवं विपरीत परिस्थितियों में तत्कालीन राजाओं को ही निर्णय लेना था।
16 वीं शताब्दी में तत्कालीन राजाओं द्वारा जो निर्णय लिए गए , वह सही थे या गलत। यह तो निष्पक्ष अध्ययन का विषय है।
लेकिन तत्कालीन राजाओं द्वारा लिए गए सही या ग़लत निर्णयों की वजह से ही आज भारत में सभी धर्मों का अस्तित्व बना हुआ है।
अगर निष्पक्ष रुप से विचार करें ।तो अधिकांश मध्य एशिया क्षेत्र,#बौद्ध धर्म के प्रभाव में था। लेकिन अब अधिकांश मध्य एशिया में बौद्ध धर्म का अस्तित्व नजर नहीं आता।
#आलोचना का अधिकार उसे होता है। जिनके पूर्वजों ने अपने कर्तव्यों का पालन किया होता है।
वामपंथी एवं संघ सहित अन्य वर्गों के लोग राजा मानसिंह पर टिप्पणी करते हैं ।तो टिप्पणी करते समय कम से कम ,उन्हें अपने पूर्वजों के योगदान अथवा #कायरता के बारे में भी बताना चाहिए।
मूर्खो को ये समझना चाहिए कि , अगर #मान सिंह अकबर के अधीन थे ।तो फिर कैसे मान सिंह ने उस समय पूरे देश मे इतने #हिन्दू मन्दिर बनवाये ?
बहुत कम लोगो को जानकारी है ,कि
मथुरा,#अयोध्या, काशी, दिल्ली,बिहार,राजस्थान, द्वारिका,जगन्नाथ पुरी इन सभी जगहों पर आज भी राजा मान सिंह द्वारा बनाये गए मन्दिर,घाट मौजूद हैं...
#सिकंदर लोदी द्वारा तोड़े गए काशी विश्वनाथ मन्दिर का निर्माण भी राजा मान सिंह ने 1585 में करवाया था!
मथुरा का मानसी घाट , काशी का मान सिंह घाट की #हरिद्वार हर की पौड़ी सब कुछ राजा मान सिंह की देन है !
#हल्दीघाटी के युद्ध में जब महाराणा प्रताप का घोड़ा चेतक घायल हो गया ।तो आसिफ खान ने मानसिंह से महाराणा प्रताप का पीछा करने को कहा ।लेकिन मानसिंह ने इंकार कर दिया। मानसिंह की इस बात से नाराज होकर, अकबर ने 6 महीने तक मानसिंह को नजरबंद कर दिया।
मानसिंह भी चाहते थे कि महाराणा प्रताप सुरक्षित रहें। क्योंकि उस समय की तत्कालीन दुरुह परिस्थितियों के कारण,मानसिंह अपने बाबा द्वारा अकबर को दिए गए वचन से वचनबद्ध थे।
भगवान #बुद्ध कहते हैं कि जब राज्य पर संकट हो। तो प्रत्येक नागरिक का कर्तव्य है कि राज्य की रक्षा के लिए अपने कर्तव्यों का पालन करे।
आज जो वर्ग यह कहकर अपने पूर्वजों की कायरता पर पर्दा डालते हैं कि हमारे पूर्वजों को लड़ने ही नहीं दिया गया।
तो उन्हें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि #कोल, भील, राजभर आदि जातियां भी राज्य पर संकट आने की स्थिति में स्वेच्छा से राज्य के लोगों की रक्षा के लिए लड़ती थीं।
लेकिन बड़ी विडंबना है कि जिन लोगों के पूर्वजों ने राज्य की और राज्य के लोगों की रक्षा के अपने कर्तव्यों का निर्वहन नहीं किया ।आज उन्हीं के वंशज अपने कायर पूर्वजों की आलोचना करने के बजाए ,अपना रक्त बहाने वाले क्षत्रियों की #आलोचना का कोई मौका नहीं छोड़ते।
#अरब, तुर्क, मुगल और पठान सैन्य रूप से इतने मजबूत थे कि उन्हें किसी भी राज्य को जीतने में 10 वर्ष से अधिक का समय नहीं लगता था।
चलाता शब्दभेदी बाण था,
अखंड शक्ति का वो प्रमाण था,
जिसे कोई रोक ना पाए वो ऐसा अग्निबाण था,
इस धरा का वो वीर पुत्र पृथ्वीराज चौहान था..
राजपूताने की धरा को गौरवान्वित करने वाले चौहान कुलभूषण की जयंती पर कोटिश: नमन🙏💐
#राजपूत_सम्राट_पृथ्वीराज_चौहान#RajputSamratPrithvirajChauhan
Samrat Prithviraj Chauhan famous as "Rai Pithora" was the last Hindu emperor of Throne of Delhi.
He was a generous #Rajput king Chāhamanā Dynasty and a indomitable warrior as well.
857 वी जयंती पर कोटि-कोटि वंदन।
#RajputSamratPrithvirajChauhan#राजपूत_सम्राट_पृथ्वीराज_चौहान
Rajput Samrat Prithviraj Chauhan famous as "Rai Pithora" was the last Hindu emperor of Throne of Delhi. He was a generous #Rajput king Chāhamanā Dynasty and a indomitable warrior as well. 857 वी जयंती पर कोटि-कोटि वंदन।
@SatveerShekhwat #RajputSamratPrithvirajChauhan #राजपूत_सम्राट_पृथ्वीराज_चौहान
चंद : है अंतिम अवसर यही, सुन देकर तू ध्यान।
एक बाण से लक्ष्य कर, मत चूके #चौहान
चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण।
ता ऊपर घड़ियाल (सुल्तान) है, मत चूके चौहान।।
And that bastard Ghori died within few seconds!
A great roar and howl went up!
#RajputSamratPrithvirajChauhan