देख लो ट्विटर पर कितनी कमाई होती है
ये देखने के बाद भी यदि आप फर्जी स्क्रीन शॉट को देखकर इससे कमाई करने की सोच रहे हैं
तो ये सिर्फ आपकी पढ़ाई को बर्बाद करने का एक आसान तरीका है
आपमें से कुछ लोग समझते हैं कि में ट्विटर पर ट्वीट कर करोड़ों कमाता हूं, तो ये ट्वीट उनके लिए है कि मैंने 2024 ट्वीट करके कितने कमाए। वैसे मेरा किसी को भी पीड़ा देने की कोई मंशा नहीं है मगर फिर भी जाने अनजाने में मेरी ट्वीट से किसी को दुःख पहुंचा हो तो, Michhami Dukhdam.
गुड मॉर्निंग, जब आप यह पत्र पढ़ रहे होंगे, तब मैं इस दुनिया में नहीं रहूंगा। कृपया मुझसे नाराज़ न हों। मैं जानता हूं कि आप में से कई लोगों ने मेरी परवाह की, मुझसे प्यार किया और मेरा ख्याल रखा। आपके प्रति मेरी कोई शिकायत नहीं है। मुझे हमेशा से खुद से ही समस्या रही है। मैं अपनी आत्मा और शरीर के बीच बढ़ती खाई को महसूस करता रहा हूं। अब यह खाई इतनी बढ़ चुकी है कि मैं खुद को एक दानव की तरह महसूस करता हूं।
मैं हमेशा एक लेखक बनना चाहता था, विज्ञान पर लिखने वाला लेखक, कार्ल सगान की तरह। लेकिन अफसोस, मैं बस यह आखिरी पत्र लिख पा रहा हूं।
मुझे सितारों, प्रकृति और विज्ञान से बेहद प्यार था। लेकिन मैंने इंसानों से भी प्यार किया, और यह समझ नहीं पाया कि वे कब से प्रकृति से दूर हो चुके हैं।
हमारी भावनाएं आज दोयम दर्जे की हो चुकी हैं। हमारा प्रेम बनावटी है, हमारी मान्यताएं खोखली हैं। मौलिकता अब कृत्रिम कला में सिमट कर रह गई है। इस दुनिया में प्रेम करना और दुखी न होना, असंभव-सा हो गया है।
आज एक इंसान की क़ीमत उसकी पहचान और क्षणिक उपयोगिता तक सीमित हो गई है—एक वोट तक। इंसान सिर्फ़ एक आंकड़ा बन गया है, एक वस्तु। उसे कभी उसके दिमाग़ या उसकी अनंत संभावनाओं के आधार पर नहीं आंका गया।
यह मेरा पहला और आखिरी पत्र है। हो सकता है कि मैं इस दुनिया, प्रेम, दर्द, जीवन और मृत्यु को सही से समझ नहीं पाया हूं। लेकिन मुझे हमेशा जल्दी थी—बेचैनी थी जीवन शुरू करने की।
मेरे जैसे लोगों के लिए जीवन एक अभिशाप बनकर रह गया है। मेरा जन्म ही एक भयंकर हादसा था। मैं अपने बचपन के अकेलेपन और प्यार की कमी से कभी उबर नहीं पाया।
इस समय मैं न तो आहत हूं, न दुखी। बस खाली हूं। मुझे खुद की भी चिंता नहीं है। यह स्थिति दयनीय है, और शायद यही कारण है कि मैं यह कदम उठा रहा हूं।
लोग मुझे कायर कहेंगे, स्वार्थी कहेंगे। मुझे इससे कोई फ़र्क नहीं पड़ता। मैं मरने के बाद की कहानियों और भूत-प्रेत में विश्वास नहीं करता। लेकिन अगर किसी चीज़ में मेरा विश्वास है, तो यह है कि मेरी आत्मा सितारों तक यात्रा करेगी।
अगर आप मेरे लिए कुछ करना चाहते हैं, तो कृपया मेरी सात महीने की फेलोशिप (₹1,75,000) का भुगतान मेरे परिवार को दिलवा दें। रामजी को ₹40,000 देना बाकी है। उन्होंने कभी पैसे वापस नहीं मांगे, लेकिन यह रकम उन्हें लौटा दी जाए।
मैं चाहता हूं कि मेरी शवयात्रा शांति से और चुपचाप हो। लोग ऐसा व्यवहार करें जैसे मैं आया था और चला गया। मेरे लिए आंसू न बहाएं। जान लें कि मैं मरकर खुश हूं, जीने से ज्यादा।
"छाया से सितारों तक।"
उमा अन्ना, आपके कमरे में यह सब करने के लिए माफ़ी चाहता हूं।
आंबेडकर स्टूडेंट्स एसोसिएशन परिवार, आप सबको निराश करने के लिए माफ़ी। आप सबने मुझे बहुत प्यार दिया। आप सभी को भविष्य के लिए शुभकामनाएं।
आख़िरी बार,
जय भीम।
रोहित वेमुला का आखिरी पत्र एक गहरी संवेदनशीलता और दर्द को व्यक्त करता है।
#JusticeForRohithVemula #RohithVemula
जिस देश में बच्चों को भीख देने का काम मुख्यमंत्री स्वयं करे, वह भी देश का सबसे बड़े राज्य का!, यह गैरकानूनी भी है और अनैतिक भी। काश मुख्यमंत्री अपने साथ चल रहे अफसरों को डांट लगाते कि पढ़ने की उम्र के बच्चे भीख कैसे मांग रहे हैं! संस्कार और दृष्टि की कमी यही कहलाती है।
कश्मीरी पंडित और डॉक्टर मनमोहन सिंह
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2004 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह जम्मू कश्मीर के दौरे पर गए तो हमने उन्हें सुझाव दिया कि वह जम्मू के एक कश्मीरी पंडित शिविर में जाएं, वह तैयार हो गए।
शिविर के दौरे से पहले की रात में तत्कालीन मुख्यमंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद जो कि पूर्व की भाजपा समर्थित सरकार में गृहमंत्री थे, रात के भोजन पर उनके साथ थे। गौरतलब है कि मुफ़्ती ही उस वक्त केंद्रीय गृहमंत्री थे जब कश्मीरी पंडित वादी से खदेड़े गए थे। मुफ्ती मोहम्मद सईद ने रात के भोजन के दौरान प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से कहा कि वह क्यों जम्मू में कश्मीरी पंडितों के शिविरों की हालत नहीं सुधारना चाहते और वह उनके लिए घाटी में सब कुछ करने को तैयार है।
मैं इस मुद्दे पर मुफ़्ती के साथ बहस नहीं करना चाहता था, मैं मौन रहा। रात के भोजन के बाद जब मैं मनमोहन सिंह के साथ अकेला था तो मैंने इस मुद्दे पर अपना मत व्यक्त किया। मुझे लगता है कि वह मेरी बात समझ गए।
अगले दिन मुफ़्ती और मैं प्रधानमंत्री के साथ ही एक शिविर में गए। वह एक परिवार के 9 सदस्यों वाले छोटे से कमरे के अंदर गए। मैं देख सकता था कि मनमोहन सिंह विचलित हो गए। उनकी आंखे नम थी। शायद इसने उन्हें उस समय की याद दिला दी जब वह स्वयं 1945 में पश्चिमी पाकिस्तान से आने वाले एक शरणार्थी थे।
इसके तुरंत बाद उन्होंने शिविर के वासियों को संबोधित किया जब मुफ़्ती और मैं उनके दोनों और बैठे थे। प्रधानमंत्री ने इस बैठक में घोषित किया कि जम्मू तथा दिल्ली के प्रत्येक कश्मीरी पंडित परिवार को दो शयनकक्ष एवं एक बैठक वाला एक आधुनिक फ्लैट दिया जाएगा। इसके लिए आवश्यक फंड भारत सरकार प्रदान करेगी।
मैं मुफ़्ती को देख सकता था, वह खुश नही थे। दिल्ली लौटने पर अपने वादे पर कायम रहते हुए मनमोहन सिंह ने मुथि, परखोव पर और नगरोटा में दो कमरे वाले 1024 फ्लैटों के लिए ₹51 करोड़ जारी कर दिए।
- लेफ्टिनेंट जनरल एस के सिन्हा
पूर्व गवर्नर, जम्मू एवं कश्मीर