@ChampaiSoren Great move! I really appreciate to our generous former chief minister Sree Champai Soren ji ❤️...aap bahot saral, shoumy aur shadi k dhani ho...!!!
@JharkhandCMO@HemantSorenJMM These policemen have done his exceptional good job in the anti naxal operation for the our state since last 7yrs, and these policemen have rights to seeking his actual legitimate demands...now the gov.of Jharkhand must have to decide to fulfill his demands.
@JharkhandCMO@HemantSorenJMM These policemen have done his exceptional good job in the anti naxal operation for the our state since last 7yrs, and these policemen have rights to seeking his actual legitimate demands...now the gov.of Jharkhand must have to decide to fulfill his demands.
@JharkhandCMO@HemantSorenJMM झारखंड सहायक पुलिस के बारे में सोचने के लिए धन्यवाद @JharkhandCMO and @HemantSorenJMM लेकिन सेवा विस्तार के साथ ही हमलोग का वेतन बढ़ोतरी होना चाहिए क्योंकि 13000 में अभी का महंगाई में जीवन चलना बहुत कठीन है।
मुख्यमंत्री श्री @HemantSorenJMM ने सहायक पुलिस कर्मियों को एक वर्ष के लिए अनुबंध के आधार पर सेवा अवधि में विस्तार दिए जाने का आदेश दिया है। गृह, कारा एवं आपदा प्रबंधन विभाग अब इससे संबंधित प्रस्ताव को मंत्रिपरिषद के समक्ष स्वीकृति के लिए भेजेगी।
राज्य में सहायक पुलिसकर्मियों के साथ शोषण हो रहा है ,नाम मात्र का वेतन मिलता है। जिससे घर परिवार चलाना इस दौर में असंभव है। सरकार से सिर्फ सांत्वना ही मिली। सहायक पुलिस 8 वर्ष सेवा दे चुके है ,लेकिन वेतन बहुत कम है। इसलिए नियमावली के अनुरूप झारखंड पुलिस संवर्ग के आरक्षी के पद पर सीधी नियुक्ति हेतु अधिसूचित नियुक्ति नियमावली-2014 मे संशोधन करते हुए 2200 सहायक पुलिस को झारखंड पुलिस में सीधी नियुक्ति देने से हमारे सहायक पुलिसकर्मियों को न्याय मिलेगा । @HemantSorenJMM@yourBabulal@JharkhandCMO@jhar_governor
कहानी — “तेरह हज़ार का सपना”
सूरज की पहली किरण गाँव के कच्चे घर की टूटी खिड़की से झांक रही थी। अभिषेक सोरेन, जो पिछले आठ साल से झारखंड में सहायक पुलिस के रूप में काम कर रहा था, अपने बिस्तर से उठ चुका था। पत्नी राधा चुपचाप चूल्हे पर पानी गरमा रही थी, और कोने में बैठा उनका बेटा किताबों में सिर झुकाए पढ़ने की कोशिश कर रहा था।
अभिषेक सोरेन की जेब में हर महीने तेरह हज़ार रुपये आते थे—उसी में घर का किराया, बच्चों की पढ़ाई, बुज़ुर्ग माता-पिता की दवा, और रोटी-कपड़ा सब कुछ चलता था। कभी-कभी तो महीने का आधा हिस्सा ही बीतता और जेब खाली हो जाती।
ड्यूटी पर निकलते वक्त अभिषेक सोरेन की वर्दी साफ़ तो थी, लेकिन उसके भीतर छुपा दर्द कोई नहीं देख पाता था। दिन में 12-14 घंटे धूप, बारिश और सर्दी में खड़ा रहना, अपराधियों से भिड़ना, और कभी-कभी जान पर खेलकर लोगों की जान बचाना—ये सब वही करता था। मगर जब वेतन की बात आती, तो अधिकारी सिर्फ एक वाक्य कहते—
“तुम अनुबंध पर हो, नियम यही है।”
रात को घर लौटते समय, अभिषेक सोरेन ने बाज़ार से बेटे के लिए किताब खरीदने का सोचा। लेकिन जेब में सिर्फ 80 रुपये थे—दवा और दूध के बीच चुनना पड़ा। अभिषेक सोरेन की आँखों में पानी भर आया, लेकिन बेटे के सामने मुस्कुरा कर बोला,
“पापा अगले महीने ले आएंगे।”
उस दिन अभिषेक सोरेन को समझ आया—यह लड़ाई सिर्फ अपराधियों से नहीं है, यह लड़ाई उस व्यवस्था से है जो उसकी मेहनत को तेरह हज़ार में तौल रही है। उसके सपने छोटे हो गए थे, लेकिन उसकी हिम्मत नहीं।
क्योंकि अभिषेक सोरेन जानता था—अगर वो हार गया, तो आने वाली पीढ़ियाँ भी तेरह हज़ार के इस पिंजरे में कैद रहेंगी।
ज़ुल्म सहना भी गुनाह है, ये मत भूलो,
अपने हक़ की लड़ाई में कभी पीछे मत झुको।
हक़ उसी का मिलता है जो मैदान में उतरता है
Learn from Dishom Guru Shibu Soren how to get your rights and entitlements.
@sunny_sharad@ZeeBiharNews@JharkhandCMO@DainikBhaskar@JagranNews
कहानी: “माटी का वादा”
झारखंड के एक छोटे से गाँव में आदिवासी परिवार का बेटा मनोज था। उसका सपना था—खाकी पहनकर अपने गाँव की रक्षा करना। पिता खेतों में मजदूरी करते, माँ जंगल से लकड़ी लाती, ताकि मनोज पढ़ सके और अपने लोगों का सहारा बन सके।
किस्मत ने साथ दिया, और मनोज सहायक पुलिस में भर्ती हो गया। तनख्वाह कम थी, लेकिन उसे लगा—
"सेवा में गर्व है, पैसों में नहीं।"
लेकिन हकीकत उससे अलग थी। महीनों तक मनोज और उसके साथी नक्सल इलाकों में ड्यूटी देते, शहरों में धूप हो या बारिश हो तभी भी डियुटी करते,पसीना ही नहीं कभी-कभी खून भी बहता। फिर भी उन्हें सिर्फ "तेरह हज़ार रुपये मिलते।"
उधर राजधानी तथा अन्य क्षेत्रों में मुख्यमंत्री जी मंच से बार-बार कहते—
मैं अपनी माटी, अपने आदिवासियों का बेटा हूँ।
लेकिन जब उसी माटी के बेटे का हक मार लिया जाता, अधिकारियों के अन्याय से उसका मनोबल टूटता, तब मुख्यमंत्री जी खामोश रहते।
गाँव के लोग पूछते—
जब मुख्यमंत्री जी खुद को माटी का बेटा कहते हैं, तो क्या माटी के बेटों का दर्द सुनना उनका फर्ज़ नहीं?
मनोज ने उस दिन ड्यूटी पर खड़े-खड़े सोचा—
शायद हम इस माटी के बेटे हैं, लेकिन सरकार के लिए हम बस एक सस्ती ताकत हैं, जो चुपचाप जान दे भी दे, तो भी वे समझते हैं कि हमको ज्यादा दे रहे हैं।
और उस दिन मनोज की आँखों में सिर्फ़ गुस्सा नहीं, बल्कि अपने ही माटी के नेताओं से टूटा हुआ भरोसा भी था।
यही हकीकत है माननीय। कि आपलोग को लगता है कि हम सहायक पुलिस को 13000 ज्यादा दे दे रहे हैं। आज हमारे गांव में एक मजदूर को भी हमसे (433रू) से कहीं ज्यादा मिलता है। झारखंड के आम जनमानस से भी पुछ लिजीए की क्या एक सहायक पुलिस का पारिश्रमिक 13000 देना सही है या नहीं।
@HemantSorenJMM@JMMKalpanaSoren@Supriyo__JMM@JharkhandCMO@JharkhandPolice@JmmJharkhand@RajeshThakurINC@KRajuINC@RahulGandhi@yadavtejashwi@DipikaPS@kumarsudivya@chamralindaJMM@hafizulhasan001@IrfanAnsariMLA@ShilpiNehaTirki@bandhutirkeymla@deepakbiruajmm
#jharkhand_sahayak_police
माननीय मुख्यमंत्री श्री @HemantSorenJMM जी मुझे याद है सहायक पुलिस को लेकर विधानसभा में हमलोग ने कितनी लंबी लड़ाई लड़ी थी, उस वक्त आपने कहा था की इनका समायोजन पुलिस में कर लिया जाएगा परंतु एक साल से ऊपर हो गया सहायक पुलिस का ना समायोजन हुआ ना ही मानदेय में आपकी सरकार ने सम्मानजनक बढ़ोतरी किया उल्टा उनका अनुबंध समाप्त करने की धमकी दी जा रही है ..
मैं आग्रह करूँगा की यह सहायक पुलिस के बदौलत जो आज थोड़ा बहुत क़ानून व्यवस्था बचा है उस पर सहानुभूति पूर्वक विचार करें ..
@BJP4Jharkhand@yourBabulal