बिहार में आदेशपाल से लेकर सचिव तक राज्य सरकार के कर्मचारियों को 7वें वेतनमान के अनुरूप वेतन, ग्रेड-पे और लेवल का लाभ मिल रहा है, तो फिर शिक्षकों को इससे वंचित क्यों रखा जाए?
जब शिक्षकों को राज्यकर्मी का दर्जा दिया गया है, तो केवल नाम के लिए राज्यकर्मी का दर्जा देने से क्या फायदा, यदि उन्हें राज्य कर्मियों के समान वेतनमान और वित्तीय अधिकार ही नहीं मिलेंगे?
शिक्षकों को आश्वासन नहीं, समान वेतनमान और उनका वास्तविक हक चाहिए।
#BiharTeachersNeed7thPay
फरक्का जल संधि क्या है, और बिहार के हित में इसे खत्म करना क्यों जरूरी है?
1996 में भारत और बांग्लादेश के बीच गंगा के पानी के बंटवारे को लेकर 30 साल की एक संधि हुई थी।
इस संधि के तहत फरक्का पर गंगा के पानी के बंटवारे की व्यवस्था तय की गई।
लेकिन फरक्का तक पहुंचने से पहले गंगा बिहार से होकर गुजरती है। इसलिए फरक्का पर पानी के प्रवाह से जुड़ा कोई भी फैसला बिहार पर सीधा असर डालता है।
गर्मी में गंगा का प्रवाह घटता है। ऐसे समय में बिहार के लिए सिंचाई और पानी की उपलब्धता की चुनौती बढ़ जाती है।
दूसरी तरफ, बरसात में गंगा में गाद का जमाव, नदी के तल का ऊंचा होना और जलनिकासी की समस्या बिहार के बाढ़ संकट को और गंभीर बनाती है।
भागलपुर, मुंगेर और गंगा के किनारे के इलाकों में रहने वाले लोग हर साल इसका खामियाजा भुगतते हैं।
तीन दशक पहले जब यह संधि हुई थी, तब बिहार की आबादी, पानी की जरूरत और पर्यावरणीय परिस्थितियां आज जैसी नहीं थीं।
आज बिहार को अपने बढ़ते कृषि और पेयजल संकट के बीच अपने जल संसाधनों पर ज्यादा अधिकार और बेहतर प्रबंधन की जरूरत है।
और अब एक अहम मौका सामने है।
1996 की यह संधि दिसंबर 2026 में समाप्त हो रही है।
इसलिए केंद्र सरकार को आगे की व्यवस्था तय करने से पहले बिहार के हितों पर गंभीरता से विचार करना चाहिए।
नई व्यवस्था हो, तो उसमें बिहार की जरूरतों को प्राथमिकता मिले।
क्योंकि बिहार के पानी से जुड़ा फैसला बिहार की कीमत पर नहीं हो सकता।
मौसम के बारिश में अलग ही कांड हो रहा है
सुबह गैस पर रोटी सब्जी बनाई थी,शाम को चाय बनाते समय गैस खत्म हो गई
मैने नाना को बोला BOOK कर दो
नाना ने कहा बेटा 45 दिन बाद ही गैस सिलेंडर आएगा,
मैने पूछा कितना समय हो गया है,
नाना बोले अभी 25 दिन ही हुए है,
तो अब कितने दिन तक इंतजार करोगे..?
नानी ने फिर चूल्हा शुरू कर दिया जिस पर कड़ी बनाई..!
मुझे तो ये नियम जरा भी सही नहीं लग रहा
शहर में गैस सिलेंडर आप 25 दिन के बाद बुक कर सकते ले सकते
लेकिन गांव में पूरे 45 दिन बाद गैस सिलेंडर मिलता..??
अब 20 दिन नानी को चूल्हे पर खाना बनाना होगा..!
सारी सुविधा सिर्फ शहरों तक निर्मित है
चाहे शिक्षा हो
चाहे नेटवर्क हो
चाहे लाइट हो
शायद इसलिए लोग गांव छिड़कर शहर चले जाते
हमें बिहार के लिए आवाज़ उठाना चाहिए लेकिन कुछ लोगों को छोड़कर तभी संभव है।
बिहार के कोचिंग संस्थान को दूर रखिए। अभय तिवारी जैसे लोग बिहार के बड़े बड़े कोचिंग संस्थान में बैठें हैं। हमें जरूरत उन लोगों की जो वाकई में विधार्थी हैं।
हमें बेतूका बातों को अपने सत्याग्रह में नहीं लाना है जैसे शिक्षा मंत्री का इस्तीफा, हिंसा या किसी भी तरह के अपशब्दों से दूर रहना है।
हमें कोचिंग संस्थान की सहायता नहीं चाहिए अगर चाहिए भी तो मंच पर नहीं। अगर मंच पर आएं तो बकैती न करें।
डोमिसाइल नीति को हर हालात में लागू होनी चाहिए।
#awareness
#bihar
#bpsc
भारत की स्त्रियों को यह सुनना चाहिए, इसलिए नहीं कि उन्हें कोई महान वादा किया जा रहा है, यह जानने के लिए कि एक पॉलिटिशियन को महिलाओं के बारे में क्या और कैसे बात करनी चाहिए. भारत की स्त्री माताओं-बहनों के आगे भी बहुत कुछ हैं, एक मुकम्मल इंसान हैं, नागरिक है- उन्हें यह एहसास दिलाना और इसकी चिंता करना इस देश की तरक़्क़ी के लिए बेहद ज़रूरी है.
Guys, do you know what the biggest downgrade in world history is? Imagine a man who studies Economics at the University of Cambridge. He then goes on to earn a PhD from the University of Oxford. After that, he becomes a professor at Delhi University. He serves as the Governor of the Reserve Bank of India and also as the Chief Economic Advisor. He later becomes the Finance Minister of India for five years and then serves as the Prime Minister of the country for ten years.And then he's replaced by a an uneducated person. I don't know which country this is about, but if you ask me, that's the biggest downgrade in world history. The biggest downgrade.
An Open Letter to the Jantar Mantar protestors:
My dear young friends,
I address you today not as a politician or an MP, but as someone deeply troubled by what is happening to your generation of young Indians.
This is personal for me. I was born to a middle-class family: my father was a salaried newspaper employee, my mother a homemaker, with three children to educate on one income. For a family like ours, merit was not a slogan. Scholarships, fair examinations, honest results — these were the only way one salary could carry three children's dreams.
I went to school in Mumbai and Kolkata, to college here in Delhi, topped the University and earned admission into IIM — and chose instead to follow my passion for international affairs, in America, on a scholarship. Nothing was inherited; everything was earned by hard work and yes, Exams.
So I know that a fair, merit-based system is the only ladder for young people from lower and middle-income families to climb up. When that ladder is broken — papers leaked, examinations cancelled, trust destroyed — the children of the rich and powerful do not suffer. They have other ladders. It is your dreams, and your families' sacrifices (and tragically, in some homes, young lives themselves) that are betrayed.
To the young people gathered at Jantar Mantar, and those raising your voices peacefully across India: this country hears you. Your anger is not indiscipline — it is the anguish of a generation that did everything right and was still betrayed . You are not alone.
And to the millions of young Indians watching quietly: your generation is not a problem to be managed. You are the answer to India's future. Do not lose hope. This ladder will be rebuilt — by you, and by every Indian who stands with you.
To Shri Sonam Wangchuk-ji, my heartfelt appeal: please end your fast. You have awakened the conscience of the nation; that is what a fast is meant to do. India needs your voice for the long road ahead.
With Parliament in session again from Monday, we will have an opportunity to raise the students’ issues in the highest forum of our democracy. That’s where the problem should be addressed, not by fasting unto death. Please heed my plea.
And finally, to the Government: I respectfully urge you to reach out and engage in the dialogue our democracy owes its young citizens. That is not weakness; that is statesmanship.
This is India's ‘FREE PRESS’ !
He's an anchor on Doordarshan, a central government TV channel. He's always spewing venom. When a child questioned the flaws in the CBSE exam testing, this national channel anchor @AshokShrivasta6 labeled him a P@kistani child. Imagine the mental trauma the child and his entire family must have suffered!
This is a serious crime. It's online bullying. If it were any other country, he would be in jail for violating child rights. But the @narendramodi government won't take action against this anchor. If they do, we'll let you know.
This is PRESS FREEDOM here… you can FREELY commit any crime while sitting in the government's lap.
Thank you
This is a sleeper coach Indian toilet in a train in South India.
- Jet Spray
- Scrubbed toilet
- Clean mug
- Clean, functional washbasin
- A blue mat post cleaning (ensures dry footwear)
Trains in North India lack all of the above especially in a sleeper coach. Why?
Common people are not the ones wasting fuel. They are struggling just to survive.
It’s politicians who waste fuel with hundreds of cars in election rallies & long VIP convoys.
Time to end this entire VIP culture !
बिहार: बिना 'किट' के जनगणना के मैदान में उतरे कर्मी, संसाधनों की कमी से बढ़ रही परेशानी
पटना/मुजफ्फरपुर: देश के सबसे महत्वपूर्ण प्रशासनिक अभ्यासों में से एक, 'भारत की जनगणना 2027' का कार्य बिहार में शुरू हो चुका है, लेकिन जमीनी स्तर पर काम कर रहे प्रगणकों (Enumerators) के बीच भारी असंतोष देखने को मिल रहा है। शिकायत है कि जहां अन्य राज्यों में कर्मियों को आधिकारिक बैग, डायरी और स्टेशनरी युक्त पूरी 'सेंसस किट' दी जा रही है, वहीं बिहार के कई जिलों में कर्मियों को केवल एक मार्कर थमाकर फील्ड में भेज दिया गया है।
सुविधाओं के नाम पर सिर्फ एक मार्कर?
सोशल मीडिया पर वायरल हो रही तस्वीरों और ग्राउंड रिपोर्ट के अनुसार, प्रगणकों को पहचान पत्र और आधिकारिक बैग जैसे बुनियादी संसाधनों के बिना ही घरों की मार्किंग और डेटा संग्रहण का काम करना पड़ रहा है। एक प्रगणक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "धूप और धूल के बीच हमें घंटों फील्ड में रहना पड़ता है। बिना बैग के फॉर्म्स और जरूरी कागजात संभालना मुश्किल हो रहा है। हमें सिर्फ एक मार्कर दिया गया है, जबकि नियमतः पूरी किट मिलनी चाहिए।"
सुरक्षा और पहचान का संकट
बिना आधिकारिक बैग और प्रॉपर किट के फील्ड में जाने से कर्मियों को एक और बड़ी समस्या का सामना करना पड़ रहा है—पहचान का संकट। * जनता का अविश्वास: आधिकारिक किट या पहचान पत्र न होने के कारण लोग अक्सर प्रगणकों को संदेह की दृष्टि से देखते हैं और जानकारी साझा करने में हिचकिचाते हैं।
प्रशासनिक लापरवाही: अन्य राज्यों की तुलना में बिहार में संसाधनों की इस कमी को लेकर विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं।
क्या है प्रशासनिक पक्ष?
सूत्रों की मानें तो किट के वितरण में हो रही देरी का मुख्य कारण आपूर्ति श्रृंखला (Supply Chain) में आई बाधा हो सकती है। हालांकि, कर्मियों का तर्क है कि जब जनगणना की तारीखें पहले से तय थीं, तो संसाधनों की व्यवस्था समय पर क्यों नहीं की गई?
कर्मियों की मांग
बिहार के प्रगणकों और पर्यवेक्षकों ने सरकार से मांग की है कि:
तत्काल प्रभाव से सभी कर्मियों को 'भारत की जनगणना' के लोगो वाले बैग और स्टेशनरी किट उपलब्ध कराई जाए।
सुरक्षा के लिहाज से उचित पहचान पत्र दिए जाएं ताकि फील्ड में किसी अप्रिय स्थिति से बचा जा सके।
निष्कर्ष: जनगणना जैसे राष्ट्रीय महत्व के कार्य में संसाधनों की ऐसी कमी न केवल कर्मियों का मनोबल गिराती है, बल्कि डेटा की सटीकता और सुरक्षा पर भी सवालिया निशान लगाती है। अब देखना यह है कि विभाग इस दिशा में कितनी जल्दी सक्रिय होता है।
यह सिर्फ़ एक पैकेट काजू का मामला नहीं है बल्कि यह पैकेज्ड फूड सिस्टम की सड़ी हुई सच्चाई है।
DMart जैसे बड़े रिटेलर और Pro V जैसे ब्रांडेड प्रोडक्ट में कीड़े मिलना कोई दुर्घटना नहीं, यह क्वालिटी कंट्रोल की खुली नाकामी है।
जब महंगे दाम लेकर बेचे जा रहे ड्राय फ्रूट्स में कीड़े निकलें तो यह साफ है कि स्टोरेज , सप्लाई चेन , पैकिंग और इन-हाउस चेक सब फेल हैं। ब्रांड नाम सिर्फ़ भरोसा बेचने के लिए है , जमीन पर निगरानी शून्य है।
सबसे बड़ा सवाल @fssaiindia कर क्या रहा है?
• क्या पैकिंग से पहले कोई वास्तविक इंस्पेक्शन होता है?
• क्या गोदामों की नियमित जांच होती है या सिर्फ़ कागज़ों में?
• क्या कंज़्यूमर शिकायतों पर सैंपल टेस्ट होते हैं या मामला दबा दिया जाता है?
• एक्सपायरी से पहले ही खराब हो चुके प्रोडक्ट्स बाज़ार में कैसे पहुँच रहे हैं?
• बड़े ब्रांड होने पर क्या कार्रवाई से छूट मिल जाती है?
Impressive presentation this from Mahua Moitra schooling BJP on Vande Mataram👇
• Sujalam- Over 70% of surface water is undrinkable today
• Malayaja shitalam- AQI in national capital itself is above 800
• Shasyashyamalam- 10,000 d!e every year due to debt,crop failure & weak support system
• Suhasinim sumadhurabhasinim- U as ruling party urself call for v!olence against minorities
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एक राजनीतिक व्यक्तित्व के तौर पर राजीव-सोनिया की मैं घनघोर आलोचक रही हूँ। इसके उलट मेरे पिता दोनों के घनघोर प्रशंसक...। इस बात के बावजूद कि उन्हें ये लगता रहा कि राजीव जैसे सुदर्शन व्यक्ति सोनिया की तुलना में ज्यादा सुदर्शन पार्टनर डिजर्व करते हैं, वे सोनिया के व्यक्तित्व के कायल रहे।
राजीव की मृत्यु के बाद पापा सहानुभूति से भरकर कहा करते थे, ‘यहाँ क्या रखा है सोनिया के लिए अब! उसे अपने बच्चों को लेकर अपने मायके चले जाना चाहिए। बच्चे वहाँ सुरक्षित रहेंगे। यहाँ अब परिवार में कोई बचा भी तो नहीं है।’
जब सोनिया गाँधी कांग्रेस की अध्यक्ष बनी और कांग्रेस सत्ता में आई तो जाहिर तौर पर प्रधानमंत्री पद के लिए सोनियाजी की दावेदारी सबसे प्रबल थी। उस चुनाव के दौरान मेरी भी सोनिया गाँधी के प्रधानमंत्री बनने को लेकर आपत्ति थी औऱ पापा से इस मामले में लंबी-लंबी बहसें हुआ करती थीं।
सुषमा स्वराज की उस धमकी के बाद, जिसमें वो बोली थीं, ‘यदि सोनिया गाँधी प्रधानमंत्री बनेंगी तो मैं सिर मुँडवाकर जमीन पर सोना शुरू कर दूँगी।’, पापा बहुत व्यथित हुए थे। मुझे आज भी उनके शब्द औऱ उनके फेशियल एक्प्रेशन हूबहू याद है।
पापा ने बहुत हिकारत से कहा था, ‘क्या औरत है ये?’ फिर गर्व से बोले, ‘जब देश की जनता ने सोनिया गाँधी के प्रधानमंत्री की दावेदारी को समर्थन दिया है, जब देश का संविधान उन्हें प्रधानमंत्री होने से नहीं रोकता तो ये कौन है❓
मैं तब भी विरोध में थी औऱ मेरा तर्क ये था कि सौ करोड़ लोगों के देश में क्या एक भी ऐसा काबिल व्यक्ति नहीं है कि एक विदेशी मूल की महिला इस देश की प्रधानमंत्री बनें! पापा बहुत तार्किक नहीं थे, उनके पास इस बात का जवाब नहीं था।
बाद में राजेश ने ये कहकर मुझे सन्न कर दिया था कि, ‘तुम्हारे जो तर्क है वे कोई नए तर्क नहीं हैं, ये इसी समाज से पाए तर्क हैं। एक स्त्री जो अपना परिवार-घर सब छोड़कर आपके यहाँ आती हैं, आपके परिवार को, परंपराओं और समाज को अपनाती है, आपके बच्चों को जन्म देती हैं। आप उसकी कोख से पैदा हुए बेटे को अपना कुलदीपक कहते हैं, उसे अपना वारिस बनाते हैं, मगर उसकी माँ दूसरे घर की ही रहती है। यही हमारा समाज है, इसी को तुम सही मानती हो! तुम्हारे साथ भी ऐसा हो तब?’
मुझे लगा ये विचार मुझे कैसे नहीं आया! जबकि ये विचार पहले मुझे आना चाहिए था।
जब सोनिया गाँधी ने प्रधानमंत्री न बनने का अपना निर्णय सुनाया तो पहली बार मैंने सोनिया गाँधी को और उनकी पूरी यात्रा को देखा औऱ ऑब्जर्व किया। इंदिराजी की केयरिंग बहू, राजीव की प्रेयसी-पत्नी-दोस्त-पार्टनर और प्रियंका-राहुल की लविंग माँ।
फिर एक पूरी तरह से पारिवारिक सोनिया का राजनीतिक सोनिया में ट्रांसफॉर्मेशन... राजीव के साथ परछाई की तरह रहती सोनिया का बिना राजीव के राजनीति की गंदगी को झेलती सोनिया गाँधी। कांग्रेस की उद्धारक सोनिया।
प्रधानमंत्री जैसे बड़े पद को ठुकराती, इतिहास में दर्ज होने की महत्वाकांक्षा की उपेक्षा करती सोनिया गाँधी। पहली बार लगा कि ये कितना बड़ा प्रलोभन था औऱ इस प्रलोभन को कितनी सहजता से दरकिनार कर दिया।
मुझे इस सोनिया गाँधी से प्यार है। मुझे उस सोनिया से प्यार है, जिसने तमाम कड़वाहटें पाईं फिर भी अपने बच्चों को उन कड़वाहटों से दूर रखा। मुझे उस सोनिया से प्यार है, जिसने इस देश की लगातार गिरती जा रही राजनीतिक संस्कृति में अपनी गरिमा और सौम्यता के साथ कभी समझौता नहीं किया।
मुझे उस सोनिया से प्यार है, जिसने अपने जीवन की सबसे बड़ी पूँजी गँवाकर भी अपने बच्चों को माफ करना सिखाया। जिसने उस हत्यारों को माफ कर दिया जिन्होंने उसके जीवन से सब कुछ छीन लिया... प्रेमी, पति, दोस्त, खुशी, सुरक्षा सब कुछ। फिर भी नफरत न की, न अपने बच्चों को नफरत की विरासत दी।
मुझे उस सोनिया से प्यार है, जिसने इस देश की संस्कृति को उस स्त्री से ज्यादा आत्मसात किया है, जो इसी मिट्टी में जन्मी औऱ रह रही हैं।
मैं बार-बार इस बात को रेखांकित करती हूँ कि मैं कांग्रेसी नहीं हूँ। शायद ही मैं कभी इतनी राजनीतिक हो पाऊँगी कि सही-गलत की सलाहियत भूलकर किसी दल, किसी विचार, किसी व्यक्ति की ऐसी समर्थक, प्रशंसक हो जाऊँ कि उसमें कोई गलती, कमी नहीं देख पाऊँ।
इतने लंबे अर्से के सार्वजनिक जीवन में सिर्फ एक बार उनकी भाषा विचलित हुई थीं औऱ उन्होंने "मौत का सौदागर" फ्रेज का इस्तेमाल किया था। ये फ्रेज गलत नहीं था, इसका इस्तेमाल भी गलत नहीं था, बस ये सोनिया गाँधी का स्टाइल नहीं था।
इसके अलावा वे कभी भी अपनी भाषा, भाव-भंगिमा और विचार व्यवहार से हल्की नहीं हुईं। हमेशा गरिमा, शालीनता और सौम्यता के साथ नजर आईं।
और इसी गरिमामयी, शालीन, सौम्य, मजबूत और संवेदनशील स्त्री से प्यार है।
ये कहना इसलिए जरूरी है कि इस देश की राजनीति और राजनीतिज्ञों ने उन्हें बहुत रूसवा किया है, उनके साथ बहुत अभद्रता का बर्ताव किया तो ये बताना-जताना हमारा कर्तव्य है कि हम उन्हें प्यार करते हैं।
एक बेहद पितृसत्तात्मक राजनीतिक समाज के घृणित व्यवहार के लिए खुद को शर्मिंदा भी महसूस करती हूँ, इसलिए भी ये पोस्ट लिखना जरूरी लगा।
#happy_birthday_soniya
नोट - ये राजनीतिक पोस्ट नहीं है। यदि किसी को इसमें राजनीति नजर आ रही हो तो अपने दिमाग का इलाज करवा ले।
- अमिता नीरव जी की पोस्ट