Via @iamaryenk
We love talking about “culture,” “values,” and “respect for women.” We proudly say “yahan naari ko devi maana jaata hai.”
But the reality on the ground tells a very different story.
#UmarKhalid
🧿: इस तरह के वीडियो कभी पुराने नहीं होते है । जितनी बार देखो चेहरे पर मुस्कान फैल जाती है....😅😃
यही कहानी बचपन मे हमें भी हमारे पिताजी द्वारा बताई गयी थी काफी सालों तक कंफ्यूज रहे कौन सही है कौन गलत...?
क्या बचपन मे आपने भी राहु केतू वाली कहानी सुने या देखे थे...??
सोचिए, कितनी बेशर्म और डरी हुई होगी वो सरकार, जो एक दिव्यांग बच्चे से भी डर जाए।
हद तो तब हो जाती है, जब एक ऐसा बच्चा जो न बोल सकता है, न सुन सकता है—उसे भी हिरासत में ले लिया जाता है।
सवाल सिर्फ़ इतना है—आख़िर एक बच्चे से इतना डर क्यों?
Jantar Mantar Season 2.0 Announced होने के बाद से ही पूरे देश में खुशी की लहर है,
लोग अपना समर्थन वहां पहुंचकर शांतिपूर्ण तरीके से देने के लिए बेकाबू है,
लोग इस बार जड़ से ही उखाड़ फेंकने का काम करेंगे।
सुप्रीम कोर्ट के जज को बेरोजगार युवक नहीं दिखते, राम मंदिर में चोरी करने वाले नहीं दिखते लड़कियों के कपड़े फाड़ती पुलिस नहीं दिखती
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#बरेली बिथरी चैनपुर के वर्तमान SHO राजेश मिश्रा पर FIR के आदेश, कोर्ट ने पुलिस रिपोर्ट को माना अपर्याप्त
बरेली। बिथरी चैनपुर थाने के वर्तमान थाना प्रभारी राजेश बाबू मिश्रा से जुड़े गंभीर आरोपों के मामले में न्यायालय ने महत्वपूर्ण आदेश पारित किया है। न्यायालय ने BNSS की धारा 173(4) के तहत दाखिल आवेदन को स्वीकार करते हुए उचित धाराओं में मुकदमा दर्ज कर विधिवत जांच के निर्देश दिए हैं। थाना प्रभारी को 7 दिनों के भीतर अनुपालन रिपोर्ट न्यायालय में प्रस्तुत करने का भी आदेश दिया गया है।
मामले में आवेदक की ओर से अधिवक्ता विकास बाबू ने पैरवी की। आवेदक ने आरोप लगाया कि 11 जुलाई 2026 को उसे बिथरी चैनपुर थाने ले जाने के बाद उसके साथ जातिसूचक अपशब्दों का प्रयोग करते हुए गंभीर मारपीट की गई, जिससे उसके दाहिने हाथ में गंभीर चोट आई और उसे अस्पताल में उपचार कराना पड़ा।
आवेदक की ओर से न्यायालय में जाति प्रमाण पत्र, SSP को दिया गया प्रार्थना पत्र, उपचार संबंधी दस्तावेज और मूल रजिस्ट्री रसीद सहित अन्य अभिलेख प्रस्तुत किए गए।
पुलिस की ओर से प्रस्तुत रिपोर्ट में आरोपों से इनकार करते हुए घटना को अलग परिस्थितियों में हुई कार्रवाई बताया गया था। रिपोर्ट में आवेदक के नशे में होने का भी उल्लेख किया गया। हालांकि न्यायालय ने रिकॉर्ड का परीक्षण करते हुए कहा कि आवेदक के नशे की स्थिति को प्रमाणित करने वाला कोई चिकित्सीय दस्तावेज उपलब्ध नहीं है।
न्यायालय ने आवेदन, शपथपत्र और प्रस्तुत दस्तावेजों के आधार पर प्रथम दृष्टया संज्ञेय अपराध के संकेत मानते हुए आवेदन स्वीकार किया और FIR दर्ज कर विधिवत जांच कराने का आदेश दिया।
निष्पक्ष न्यायिक प्रक्रिया पर भरोसा
मामले में न्यायालय का आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आरोप पुलिस अधिकारी से जुड़े हैं। न्यायालय ने पुलिस रिपोर्ट को अंतिम आधार मानने के बजाय उपलब्ध मेडिकल एवं अन्य दस्तावेजों का परीक्षण किया और जांच की आवश्यकता महसूस की।
यह आदेश इस सिद्धांत को रेखांकित करता है कि कानून के सामने हर व्यक्ति समान है और गंभीर आरोपों की निष्पक्ष जांच आवश्यक है।
अब पुलिस द्वारा FIR दर्ज किए जाने, विवेचना की निष्पक्षता तथा न्यायालय में निर्धारित समय के भीतर अनुपालन रिपोर्ट प्रस्तुत किए जाने पर नजर रहेगी।
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