‘करने को तो हम क्रांति भी कर सकते हैं
अगर सरकार कमज़ोर हो
और जनता समझदार
लेकिन हम समझते हैं
कि हम कुछ नहीं कर सकते हैं
हम क्यों कुछ नहीं कर सकते हैं
यह भी हम समझते हैं।’
✦ गोरख पाण्डेय
जीना अपने ही में
एक महान कर्म है
जीने का हो सदुपयोग
यह मनुज धर्म है
अपने ही में रहना
एक प्रबुद्ध कला है
जग के हित रहने में
सबका सहज भला है
जग का प्यार मिले
जन्मों के पुण्य चाहिए
जग जीवन को
प्रेम सिन्धु में डूब थाहिए
ज्ञानी बनकर
मत नीरस उपदेश दीजिए
लोक कर्म भव सत्य
प्रथम सत्कर्म कीजिए
@DDNewslive@AshokShrivasta6 Aap national channel h, apka ye kartavya banta h ki chahe paksh ho ya vipaksh, aise bhadkao headlines mat chalaiye, kisi pe h lzaam lagana apka kaam nahi, sawal puchna h, ilzaam lagane ke liye nyaypalika h, kripya apne dharm ka samman kariye
सुख का दिन डूबे डूब जाए।
तुमसे न सहज मन ऊब जाए।
खुल जाए न मिली गाँठ मन की,
लुट जाए न उठी राशि धन की,
धुल जाए न आन शुभानन की,
सारा जग रूठे रूठ जाए।
उलटी गति सीधी हो न भले,
प्रति जन की दाल गले न गले,
टाले न बान यह कभी टले,
यह जान जाए तो ख़ूब जाए।
~ सूर्यकांत त्रिपाठी निराला : जयंती पर सादर नमन 💐
हिंदी साहित्य में एक कहानी बहुत मशहूर है — प्रेमचंद के फटे जूते।
लेकिन यह सिर्फ जूतों की कहानी नहीं है, यह एक लेखक की गरीबी, ईमानदारी और आत्मसम्मान की कहानी है।
Munshi Premchand जब किसी कार्यक्रम या सभा में जाते थे, तो अक्सर उनके पैरों में फटे हुए जूते होते थे। जूते इतने पुराने कि तलों में छेद थे, किनारे उधड़े हुए थे। लोग उन्हें देखते, कुछ दया करते, कुछ मज़ाक उड़ाते, और कुछ सोचते — इतना बड़ा लेखक और ऐसे जूते?
लेकिन प्रेमचंद उन जूतों को बदल नहीं पाए…
क्योंकि उनके पास पैसे नहीं थे।
प्रेमचंद ने अपनी ज़िंदगी में कभी लेखन को व्यापार नहीं बनाया। उन्होंने सच लिखा, समाज लिखा, शोषितों की आवाज़ लिखी। और इसी ईमानदारी की कीमत उन्होंने गरीबी से चुकाई। कई बार घर में खाने को नहीं होता था, इलाज के पैसे नहीं होते थे — लेकिन लेखन कभी झूठा नहीं हुआ।
इसी घटना पर व्यंग्यकार Harishankar Parsai ने बहुत तीखी और मार्मिक बात कही थी।
परसाई ने लिखा (भावार्थ में):
“लोग प्रेमचंद के फटे जूतों पर हँसते हैं,
लेकिन किसी ने यह नहीं पूछा कि
जूते क्यों फटे थे?
जूते इसलिए फटे थे क्योंकि
प्रेमचंद ने उन्हें बदलने से ज़्यादा
अपने ज़मीर को बचाना ज़रूरी समझा।”
परसाई आगे कहते हैं कि समाज को लेखक की सच्चाई से कोई मतलब नहीं, उसे बस दिखावा चाहिए। अगर प्रेमचंद चमचमाते जूते पहन लेते, समझौता कर लेते, सत्ता की तारीफ़ लिख देते — तो शायद उनके जूते नहीं फटते।
लेकिन फिर प्रेमचंद भी नहीं रहते।
फटे जूते इस बात का सबूत थे कि यह आदमी बिकता नहीं है।
ये जूते गवाही थे उस ईमानदारी की, जो भूखी रह सकती है — लेकिन झुक नहीं सकती।
आज प्रेमचंद अमर हैं।
उनके जूते नहीं बचे,
लेकिन उनकी सोच, उनकी कलम और उनका सच —
आज भी जिंदा है।
और शायद इसीलिए,
फटे जूते पहनने वाला वह आदमी
चमचमाते जूतों वालों से कहीं बड़ा था।
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