सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है, और जो व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के श्रद्धालुओं की सुविधा का ध्यान रखता है, वह निश्चित रूप से सम्मान का पात्र है। देवेंद्र सिंह राठौड़ जी के इस प्रयास की जितनी सराहना की जाए, उतनी कम है।
#बुटाटी_धाम@Butati_Dham_@DevendraButati@PoliceRajasthan@RajCMO
देवेंद्र सिंह बुटाटी के लिए यहीं से कुंठा बहुत अधिक गहराई थी। दुकानदारों ने यहां से खुली गुंडागर्दी शुरू कर दी। उनकी दुकानें बंद होने के कगार पर थी। देवेंद्र सिंह जी ने मिलावटी मिठाई प्रसाद बंद करवा दिए थे।
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यह विरोध देवेन्द्र सिंह या केसरी सिंह का इसलिए है क्योंकि इन दोनों ने अपनी कुर्सी का सही इस्तेमाल किया, पूरी ईमानदारी से काम किया और सिस्टम में होने वाली चोरी को हमेशा के लिए बंद कर दिया।
लेकिन इस विरोध के पीछे की एक और कड़वी सच्चाई यह भी है कि ये दोनों राजपूत हैं। जरा गोविंद डोटासरा को ही देख लीजिए, जो आदमी अपने राज में खुलेआम फटकारे देने की बातें करता था,
जिसके कार्यकाल में शिक्षा विभाग का भ्रष्टाचार और पेपर लीक जैसे काले कारनामे हुए, उसने कभी अपनी पार्टी के किसी छोटे से ब्लॉक सदस्य के खिलाफ भी एक शब्द नहीं लिखा।
लेकिन बुटाटी वाले मामले में आते ही उन्हें अचानक 'हे राम' याद आ गए और उन्होंने केसरी सिंह की नियुक्ति को भी एक बड़ी गलती बता दिया। यह सब सिर्फ इसलिए क्योंकि वे राजपूत हैं। समाज को अब यह गहरी साजिश समझनी होगी कि यह किसी एक व्यक्ति का विरोध नहीं है, बल्कि यह इस बात का विरोध है कि कोई राजपूत जाति में पैदा होकर इतने मजबूत फैसले कैसे ले रहा है।
लेकिन सबसे बड़ा और दर्दनाक सवाल तो हमारे अपने समाज पर खड़ा होता है। हमारा यह नीरस समाज और इसके बड़े-बड़े संगठन, युवक संघ से लेकर तमाम सेनाओं तक, आज इस मुद्दे पर पूरी तरह मौन क्यों हैं?
कोई भी खुलकर बोलने को तैयार क्यों नहीं है? क्यों भाई, क्या ये लोग समाज के हिस्से नहीं हैं या फिर यह नाराजगी इसलिए है क्योंकि ये ईमानदार लोग आपकी चंदा लॉबी को कोई फायदा नहीं पहुंचने देते? सोचिए, समझिए और गहराई से विचार कीजिए।
ऐसे संगठनों के लोग जहाँ भी मिलें, उनसे यह सवाल जरूर कीजिए क्योंकि समाज का हर आदमी हर बार केसरी सिंह या देवेंद्र सिंह जितना मजबूत नहीं होगा कि अकेला सीना तानकर लड़ सके। और अगर समाज के हर व्यक्ति को अपनी लड़ाई अकेले ही लड़नी है, तो फिर इन बड़े-बड़े संगठनों की जरूरत ही क्यों है?
आज बुटाटी धाम मंदिर परिसर में जो सुविधाएं की है वो देवेंद्र सिंह बुटाटी से पहले किसी अध्यक्ष ने नहीं की थी।
जब भी किसी व्यवस्था को सुधारने और आम लोगों की सुविधा के लिए कड़े कदम उठाए जाते हैं, तो कुछ लोगों का विरोध होना स्वाभाविक है।
मंदिर परिसर का सुंदरीकरण करना और उसके सामने से अतिक्रमण हटाना एक ऐसा काम है जिससे आम श्रद्धालुओं को बड़ी राहत मिलती है, भले ही कुछ लोगों के निजी हितों को इससे ठेस पहुंची हो।
एक सच्चे प्रबंधन या नेतृत्व की पहचान यही होती है कि वह तात्कालिक विरोध या नाराजगी की परवाह किए बिना, परिसर की पवित्रता, सुरक्षा और दीर्घकालिक भलाई के लिए सही फैसले ले। इतिहास गवाह है कि जब-जब बदलाव और सुधार के काम हुए हैं, उन्हें शुरुआती दौर में रेजिस्टेंस (विरोध) का सामना करना ही पड़ा है।
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सेवा ही सबसे बड़ी पूजा है, और जो व्यक्ति बिना किसी स्वार्थ के श्रद्धालुओं की सुविधा का ध्यान रखता है, वह निश्चित रूप से सम्मान का पात्र है। देवेंद्र सिंह राठौड़ जी के इस प्रयास की जितनी सराहना की जाए, उतनी कम है।
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अभी तों धोरे धीरे समाज जाग रहा हैं की कैसे एक ईमानदार देवेंद्र सिंह जी बुटाटी को ख़तम करने की साजिश हो रही हैं पहले ठाकुर ब्रजभूषण शरण सिंह फिर मेघराज सिंह रोयल फिर प्रेम सिंह बाजोर फिर कर्नल केशरी सिंह फिर राजवीर सिंह चलकोइ फिर प्रयोग राजपूतों के खिलाफ ???
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Butati