हल्द्वानी में उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में फिफ्थ शेड्यूल और कुमाऊनी गढ़वाली समुदाय को ट्राइबल स्टेटस के महत्वपूर्ण विषय पर उत्तराखंड एकता मंच के द्वारा जनसभा आयोजित की गयी। वर्तमान परिस्थितियों में इस विषय पर गंभीर विचार विमर्श की आवश्यकता है।
टिहरी नागरिक मंच द्वारा उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों के लिए पाँचवीं अनुसूची (5th Schedule) के विषय पर अपने विचार रखने का अवसर प्रदान करने पर आभार एवं हार्दिक धन्यवाद व्यक्त करता हूँ। टिहरी नागरिक मंच के सभी पदाधिकारियों एवं उपस्थित सभी साथियों का पुनः हार्दिक धन्यवाद।
उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले में “उत्तराखण्ड सहायता समिति” द्वारा "5th Schedule & Tribe Status पर बैठक की गई।
अब उत्तराखण्ड का समुदाय अपने पहाड़ों में ही रोजगार प्राप्त करने के लिए अपने जल जंगल जमीन पर अपने अधिकार वापस प्राप्त करने के लिए जागृत हो रहा है.
उत्तराखंड की परंपराएँ, आस्था और बदलता समाज
देश में मांस-मछली खाने वाले और देवताओं को बलि अर्पित करने वाले हिंदुओं की संख्या शाकाहारी और लहसुन-प्याज से परहेज करने वाले हिंदुओं से अधिक है। शैव और शाक्त संप्रदायों में बलि प्रथा का विशेष महत्व है। ऐसे में, क्या बलि प्रथा के खिलाफ बोलना हिंदू धर्म का अपमान माना जाना चाहिए?
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में सदियों से पशु-बलि की परंपरा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं रही, बल्कि यह ग्राम समुदाय की साझी व्यवस्था का हिस्सा थी।
बलि के बाद मांस पूरे गाँव में समान रूप से बाँटा जाता था, जिससे यह सामूहिक भोजन और एकता का प्रतीक बनता था न कि व्यक्तिगत उपभोग या व्यवसाय का।
आज स्थिति बदल चुकी है। जहाँ पहले स्थानीय संस्कृति और समुदाय-नियंत्रित व्यवस्था थी, वहाँ अब बाहरी व्यवसायी समूहों और राजनीतिक स्वार्थों ने जगह ले ली है।
बड़ी कंपनियाँ रोज़ाना हजारों पशुओं का मांस व्यावसायिक रूप से करती हैं, परंतु जब एक ग्रामीण अपनी पारंपरिक आस्था निभाता है, तो उसे अपराध की तरह देखा जाता है। यह हमारे क़ानूनों और सामाजिक दृष्टिकोण की दोहरी नीति को उजागर करता है।
राजस्थान और अन्य राज्यों से हर वर्ष हजारों पशुपालक अपने झुंडों के साथ उत्तराखंड के चारागाहों में पहुँचते हैं। लेकिन इस पर किसी प्रकार की नियामक नीति या पर्यावरणीय नियंत्रण नहीं है।
इससे स्थानीय संसाधनों और पारंपरिक पशुपालन पर विपरीत असर पड़ता है।
गढ़वाली और कुमाऊँनी समाज, जिनकी आजीविका कभी वन, पशुपालन और कृषि पर आधारित थी, वे अब रोजगार और पहचान दोनों से वंचित हो रहे हैं। आस्था के प्रतीक “बली पर्व” जैसी परंपराएँ, जो कभी ग्राम एकता और सांस्कृतिक पहचान की प्रतीक थीं, अब विलुप्त हो रही हैं।
यह आवश्यक है कि सरकार और समाज मिलकर उत्तराखंड की पारंपरिक सांस्कृतिक और आर्थिक व्यवस्थाओं को समझें और उनका संरक्षण करें ताकि “आस्था और रोजगार” दोनों सुरक्षित रह सकें।
भारत के संविधान में नागरिकों को मौलिक अधिकार प्रदान किए गए हैं। अनुच्छेद 13(3)(क) के अंतर्गत “कानून” की परिभाषा दी गई है, जिसके अनुसार यदि कोई भी कानून मौलिक अधिकारों का हनन करता है तो वह शून्य (void) घोषित किया जा सकता है। यह अनुच्छेद नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करता है।
अनुच्छेद 13(1) और पाँचवीं अनुसूची मिलकर यह सिद्ध करते हैं कि अनुसूचित या जनजातीय क्षेत्रों में कोई भी औपनिवेशिक या आधुनिक राज्य कानून, यदि ग्रामसभा की स्वायत्तता, पारंपरिक अधिकारों या नागरिकों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो वह असंवैधानिक (Unconstitutional) और शून्य (Void) है।
इन दोनों प्रावधानों के तहत यह सिद्धांत स्थापित होता है कि:
मौलिक अधिकार सर्वोच्च हैं, और जनजातीय क्षेत्रों में शासन ग्रामसभा की सहमति व परंपरा के अनुरूप होना चाहिए।
इसलिए, पाँचवीं अनुसूची के अधीन आने वाले क्षेत्रों में ग्रामसभा और जनजातीय स्वशासन केवल प्रशासनिक संस्था नहीं, बल्कि संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों का संवैधानिक रूप (Constitutional Extension of Fundamental Rights) है।”