देश की प्रति व्यक्ति आय 2,813 डॉलर प्रति वर्ष है जिसके साथ भारत की दुनियां में रैंक 144 है।
> लेकिन अगर अंबानी– अदानी की संपत्ति को हटा दें तो देश की प्रति व्यक्ति आय सिर्फ $2,700 रह जाएगी।
> अगर देश के शीर्ष 10 अमीर लोगों को हटा दिया जाय तो देश की प्रति व्यक्ति आय सिर्फ $2,500 रह जाएगी।
> अगर देश के शीर्ष 200 अमीर लोगों को हटा दिया जाय तक देश की प्रति व्यक्ति आय सिर्फ $2,150 रह जाएगी।
> अगर देश के शीर्ष 1% अमीर लोगों को हटा दिया जाय तो देश की प्रति व्यक्ति आय सिर्फ $1,730 ही रह जाएगी।
> अगर देश के शीर्ष 5% अमीर लोगों को हटा दिया जाए तो देश की प्रति व्यक्ति आय सिर्फ $1,130 ही रह जाएगी— यह आंकड़ा अफ्रीका के गरीब देशों के बारबार है जो शर्म की बात है।
यह अंतर देश में धन और इनकम की असमानता को दर्शाता है जहां देश की कुल संपत्ति का आधा हिस्सा सिर्फ 5% लोगों के पास है और बाकी आधे में देश की 95% जनता गुजारा कर रही है
मोदी जी ने खुद कहा है कि वे ज़्यादा पढ़े-लिखे नहीं हैं. खुद कहते हैं कि फाइल नहीं पढ़ सकते, यानि कामकाज भी नहीं जानते होंगे! बेहद फूहड़ और लफ्फाज़ी भरे भाषणों में भी कोई योग्यता नहीं झलकती.
इससे साफ़ पता चलता है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कोई प्रभावशाली छवि नहीं बनी है और इसलिए भारत को भी एक देश के तौर पर इसका कभी कोई वास्तविक लाभ नहीं मिला.
जहां आरक्षण नहीं होता वहां क्या होता है?
सुनिए@RTIExpress श्यामलाल यादव जी से
कि जहां लैटरल एंट्री हुई है वहां किन्हें जगह मिली है।
SC, ST OBC की क्या दुर्गति है।
अगर जानबूझकर रोक रहे हो तो नियत पता चलती है।
लोग नहीं मिल रहे तो साबित हुआ आरक्षण सही है।
"अलग नजरिए से बात रखने या सवाल पूछने पर छात्रों को दंडात्मक कार्रवाई की धमकी नहीं दी जा सकती"
◆ सुप्रीम कोर्ट के जज उज्ज्वल भुइयां ने कहा
#SupremeCourt | Ujjwal Bhuiyan | Supreme Court Judge
कई बार जाति आपकी योग्यता से पहले आपका बायोडाटा पढ़ लेती है।
जो लोग कहते हैं कि “प्राइवेट सेक्टर में सिर्फ़ मेरिट चलती है, वहाँ जाति कौन पूछता है?” उन्हें यह रिसर्च ज़रूर पढ़नी चाहिए।
Indian Institute of Dalit Studies के सुखदेव थोराट, Paul Attewell और Firdaus Fatima Rizvi ने भारतीय निजी क्षेत्र में नौकरी पाने की प्रक्रिया पर एक बेहद महत्वपूर्ण field experiment किया - “Urban Labour Market Discrimination”।
प्रयोग बहुत सीधा था।
एक ही नौकरी के लिए लगभग एक जैसी शैक्षणिक योग्यता, अनुभव और क्षमता वाले बायोडाटा तैयार किए गए। फर्क मुख्यतः नाम का था - एक नाम से High-Caste Hindu, दूसरे से Dalit और तीसरे से Muslim सामाजिक पहचान का संकेत मिलता था। आवेदन में जाति या धर्म अलग से लिखा नहीं गया था।
66 हफ्तों में 548 नौकरियों के लिए कुल 4,808 आवेदन भेजे गए। ये नौकरियाँ आधुनिक private sector की थीं - IT, pharmaceuticals, manufacturing, banking, automobile, media, sales, finance जैसे क्षेत्रों तक।
और नतीजा हमारे समाज के सामने एक असहज सवाल खड़ा करता है।
एक जैसी डिग्री, एक जैसा अनुभव और एक जैसी योग्यता होने के बाद भी दलित पहचान वाला नाम नौकरी के अगले चरण तक पहुँचने में नुकसान से जुड़ा पाया गया। यह अंतर statistically significant था।
यानी CV में योग्यता बराबर थी, लेकिन नाम बदलते ही अवसर की संभावना बदल गई।
और शायद यही हमारे समाज की सबसे बड़ी विडंबना है।
जिस दलित बच्चे से बार-बार कहा जाता है - “आरक्षण छोड़ो, मेरिट पर मुकाबला करो।”
वही बच्चा जब पढ़-लिखकर, डिग्री लेकर, समान योग्यता के साथ उस प्राइवेट सेक्टर में पहुँचता है जहाँ आरक्षण नहीं है, तब यह अध्ययन बताता है कि सिर्फ़ उसका नाम भी नियोक्ता की प्रतिक्रिया को प्रभावित कर सकता है। शोधकर्ताओं ने निष्कर्ष में भी लिखा कि भेदभाव केवल अशिक्षित या पुराने भारत की बची हुई चीज़ नहीं दिखता; आधुनिक private enterprises में भी caste favouritism और Dalit-Muslim exclusion के प्रमाण दिखाई देते हैं।
इसलिए अगली बार कोई कहे कि -
“जाति खत्म हो चुकी है, अब सिर्फ़ मेरिट की बात होनी चाहिए।”
तो उससे एक सवाल पूछिए -
जब डिग्री समान है, अनुभव समान है, योग्यता समान है और CV भी समान है - तो सिर्फ़ नाम बदलने से नौकरी के दरवाज़े खुलने की संभावना क्यों बदल जाती है?
आरक्षण पर सवाल बाद में करिए, पहले उस व्यवस्था से सवाल करिए जिसमें कई बार ‘मेरिट’ देखने से पहले ‘नाम’ देख लिया जाता है।
भगवान गौतम बुद्ध के बाद धरती पर जन्मे दूसरे सबसे महान आत्मा भगवान ओशो कहते हैं,
मनुस्मृति के माध्यम से तुमने शूद्रों पर पांच हज़ार साल तक अत्याचार किया,
उनके पैरों में बेड़ियाँ डाली,
उन्हें शिक्षा से वंचित किया,
हक़, अधिकार, सम्मान नहीं दिया,
और अब उनके आरक्षण पर बुरी नज़र रखते हो,
पांच हज़ार साल के अत्याचार के बदले
शूद्रों का आरक्षण दो सौ साल तक भी रहे तो कम है,
आरक्षण के समर्थन में वरिष्ठ पत्रकार श्यामलाल यादव सर ने जो कहा वह एकदम परफेक्ट है।
"जहां आरक्षण नहीं है, पहले वहां तो बराबरी की व्यवस्था लाइए, अगर ऐसा नहीं करते तो स्वाभाविक है कि मन में खोट है।"
भारत में इनका संगठन 24 घंटे मुसलमानों के खिलाफ अभियान चलाता है। मुसलमान पाकिस्तान जाएं, भारत हिंदू राष्ट्र है, वगैरह।
अमेरिका में जाकर प्रवचन दे रहे हैं कि "अगर कोई हिंदू यह मानता है कि भारत में मुसलमान नहीं होने चाहिए, तो वह हिंदू नहीं है।'"
यही है इनका दोहरा चाल-चरित्र-चेहरा। सौ साल से यही कर रहे हैं। मुंह में राम बगल में छुरी।
सुभाष चंद्रा मामले में स्कैम सिर्फ यही नहीं है कि ₹22,006 करोड़ क़र्ज़ की गारंटी ₹6.5 करोड़ में सेटल कर दिया।
सवाल यह भी है कि सुभाष चंद्र की नेट वर्थ 2017 में ₹45,888 करोड़ से अब मात्र ₹31.79 करोड़ कैसे रह गई : गुरुदीप सिंह सप्पल, कांग्रेस
रिज़र्वेशन नहीं तो फिर क्या? क्या मेरिट से नियुक्त होते हैं वाइस चांसलर्स और जज?
सुनें हमारे नए शो 'साम दाम दंड भेद' के दूसरे एपिसोड में आरक्षण के मामले पर @RTIExpress को.
"डरेंगे क्यों? जब गलत हुआ है, तो सवाल पूछने का हक़ सबका है!"
6 साल के इस बच्चे की बेबाक बातें सुनकर किसी की भी आँखें खुल जाएंगी। सवाल पूछने पर थाने ले जाना, धमकाना,क्या यही लोकतंत्र और कानून का राज है?
पूरा वीडियो सुनें और सोचें कि हम किस व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं।
#Sahaa