मोदीजी ने 11 IIT बनाई हे इसमें से 7 दलितों को देकर चंद्रशेखर रावण को DIN बना दो चिराग पासवान जिम्मेदारी देना सब भर्तियों की
4 IIT में सवर्ण लोग पढ़ाई करेंगे कोई दिक्कत नहीं
आरक्षण वालों का विक्टिम कार्ड खेलना बंद होगा
दादाजी ने गजब दिल जीतने वाली बात बोली
भारत में आरक्षण पर चल रही बहस के बीच दुबई के मशहूर भारतीय इन्वेस्टर अक्षत श्रीवास्तव ने जनरल कैटेगरी के छात्रों को एक बड़ी सलाह दी है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर उन्होंने लिखा कि जनरल कैटेगरी के जो छात्र मेरिट के आधार पर मुकाबला करते हैं, उन्हें मौका मिलते ही देश छोड़कर विदेश चले जाना चाहिए।
अक्षत का तर्क है कि भारत में सत्ता में कोई भी राजनीतिक दल आए, आरक्षण खत्म नहीं होने वाला है। उन्होंने कहा कि छात्रों को सरकार या राजनीति से उम्मीद रखने के बजाय अपनी मेहनत और कमाई पर फोकस करना चाहिए। उन्होंने आर्थिक आजादी पाने के लिए यूएई, थाईलैंड, जापान और सिंगापुर जैसे देशों का रुख करने का सुझाव दिया। उनका मानना है कि कई देशों में आबादी घट रही है और वहां हुनरमंद लोगों की काफी जरूरत है।
कभी-कभी तो लगता है ये सही है।
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उन्होंने हाथ से एक बैग बनाया और उसे 70 रुपये में बेच दिया। उसे बनाने में 50 रुपये का कच्चा माल लगा था—यानी पहली कमाई सिर्फ 20 रुपये थी।
उनका नाम है रुमा देवी।
1988 में राजस्थान के बाड़मेर जिले के रावतसर गांव में जन्मी रुमा ने बहुत छोटी उम्र में अपनी मां को खो दिया। पिता ने दूसरी शादी कर ली। आठवीं कक्षा तक पहुंचते-पहुंचते परिवार ने उनका नाम स्कूल से कटवा दिया और उन्हें घर के काम में लगा दिया। उस उम्र में उनकी दिनचर्या का एक हिस्सा करीब 10 किलोमीटर पैदल चलकर पानी लाना भी था।
17 साल की उम्र में उनकी शादी हो गई।
शादी के बाद उनका पहला बेटा हुआ, लेकिन जन्म के सिर्फ 48 घंटे बाद उसकी मौत हो गई।
उन मुश्किल दिनों में रुमा को अपनी दादी की सिखाई हुई पारंपरिक कढ़ाई—कशीदाकारी—याद आई। उन्होंने फिर से सुई उठाई और काम शुरू कर दिया।
उनके पास सिलाई मशीन नहीं थी, इसलिए सब कुछ हाथ से करना पड़ता था। धीरे-धीरे उन्होंने गांव की दूसरी महिलाओं को भी अपने साथ जोड़ना शुरू किया। उनमें से ज्यादातर को कढ़ाई आती थी और यह हुनर उन्होंने भी अपनी दादी या घर की बुजुर्ग महिलाओं से सीखा था।
दस महिलाएं उनके साथ आ गईं। हर एक ने 100 रुपये लगाए। इस तरह 1,000 रुपये जमा हुए और एक सिलाई मशीन खरीदी गई।
यही छोटी-सी रकम आगे चलकर एक बड़े काम की नींव बनी।
आज रुमा देवी के बनाए नेटवर्क से थार के गांवों की दसियों हजार महिला कारीगर जुड़ी हुई हैं। वह ग्रामीण विकास एवं चेतना संस्थान की अध्यक्ष हैं और अपने नाम से एक फाउंडेशन भी चलाती हैं। इन महिलाओं में से बहुत-सी ऐसी हैं, जिनके हाथ में पहली बार उनकी अपनी कमाई आई।
लेकिन रुमा की कहानी सिर्फ महिलाओं को रोजगार देने तक सीमित नहीं रही।
एक बार कुछ डिजाइनर फैशन शो के लिए बाड़मेर आए। रुमा ने उनसे पूछा कि क्या वह भी इसमें हिस्सा ले सकती हैं।
जवाब मिला—नहीं।
उन्हें कहा गया कि आप सिलाई का काम करती हैं, फैशन डिजाइनिंग और फैशन शो आपके लिए नहीं हैं।
रुमा ने इस बात को रुकावट नहीं बनने दिया।
बाद में उन्होंने राजस्थान हेरिटेज वीक में अपने डिजाइन पेश किए और अनिता डोंगरे, बीबी रसेल और अब्राहम ठाकोर जैसे नामों के साथ काम किया। उन्होंने जर्मनी, सिंगापुर और लंदन में राजस्थान का प्रतिनिधित्व किया।
2019 में उन्हें Textiles Fair India में Designer of the Year का सम्मान मिला। 2018 में भारत के राष्ट्रपति ने उन्हें नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया। उन्हें मानद डॉक्टरेट की उपाधि मिली और हार्वर्ड ने भी उन्हें अपने यहां बोलने के लिए आमंत्रित किया।
जिस लड़की का स्कूल आठवीं कक्षा में छूट गया था, जिसने बचपन में पानी ढोया, कम उम्र में शादी की और अपने पहले बच्चे को खो दिया—उसने उसी एक हुनर को अपनी ताकत बना लिया, जो उसकी दादी ने उसे सिखाया था।
दुनिया ने जिसे सिर्फ कढ़ाई का हुनर समझा, रुमा देवी ने उसी से हजारों महिलाओं के लिए कमाई और आत्मनिर्भरता का रास्ता बना दिया।
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This one is a must read 📚.
What JAPAN and Japanese think about India and Indians ..
India: Not an Inspiration...
But a Warning
Japan, a nation decimated by two nuclear bombs, didn't beg for sympathy or aid. It rebuilt itself with pride and an unshakeable sense of self-respect. In the years since, it has never once stretched out a hand to America for alms.
An Indian man living in Japan for over a decade was about to leave Japan for good. He observed during his stay that no Japanese ever discussed or asked him much about India!
So, he had been a bit curious and asked his closest Japanese friend prior to departure: What Japanese think about India & Indians in general?
After a long pause, the friend replied,
"We are taught Indian history... not for inspiration, but as a warning."
Confused, the Indian man asked, "A warning?"
"Tell me," the Japanese friend continued, "how many British ruled India?"
The Indian man thought, "Perhaps... around 10,000?"
The Japanese man nodded grimly. "And how many Indians lived there? Over 300 million, right?"
"Then who oppressed your people? Who carried out the orders to whip, torture, and shoot them?" he pressed.
"When General Dyer gave the command 'Fire!' at Jallianwala Bagh, who pulled the trigger?
The soldiers weren't British; they were Indian."
"Not one turned their rifle on the tyrant. Not one," he said. "
You want to talk about slavery? That was your real slavery. Not of the body, but of the soul."
The Indian man stood frozen, silent, and ashamed.
The Japanese friend went on, "How many Mughals came from Central Asia? A few thousand maybe? And yet they ruled you for centuries. They built empires not with their numbers, but because your own people bowed their heads and offered their loyalty in exchange for survival or silver."
"Your own people converted. Your own brothers became instruments of their oppression. Your own men handed over your heroes. Chandrashekhar Azad was betrayed. Bhagat Singh faced the gallows without even a whisper of help from those who called themselves patriots," he said.
"You don't need foreign enemies. YOUR OWN PEOPLE BETRAY YOU AGAIN AND AGAIN FOR POWER, POSITION, AND PERSONAL GAIN. That is why we keep our distance."
"When the British came to Hong Kong and Singapore, not one native man joined their army. But in India, you didn’t just join the enemy. You served them. Worshipped them. Killed your own people to please them."
"*Even today, you haven’t changed. Offer some free electricity, a bottle of liquor, a blanket—and your vote, your conscience, your voice are all sold without a second thought.
YOUR LOYALTY LIES NOT WITH YOUR NATION, BUT WITH YOUR STOMACH," he said.
"You chant slogans. You march in protests. But when the country needs your character, where are you? YOUR FIRST LOYALTY IS STILL TO YOURSELF AND YOUR FAMILY. EVERYTHING ELSE —SOCIETY, DHARMA, THE COUNTRY —CAN BURN."
He ended with one final statement:
"If your nation is not strong, your home will never be safe. If your character is weak, no flag can protect you."
This is not mockery. It is a mirror.
Perhaps the time has come for us to stop looking away, because India doesn’t need more patriots in speeches.
IT NEEDS CITIZENS OF UNSHAKEABLE CHARACTER. NOT JUST FREEDOM FIGHTERS, BUT FREEDOM KEEPERS. NOT JUST FLAGS IN OUR HANDS, BUT LOYALTY IN OUR HEARTS.
It is bitter. But it is true.
HOPE IT Shakes our conscience and please spread the word🙏 one person at a time, can do wonders to this country...
साभार...
कई सालों से डॉक्टरों ने भारत में #वैक्सीन को लेकर एक अजीब बात देखी।
जो वैक्सीन यूरोप और अमेरिका में बच्चों पर अच्छी तरह काम करती थीं,वही वैक्सीन भारतीय बच्चों में उतनी असरदार नहीं दिखती थीं।वैक्सीन वही,डोज वही—लेकिन सुरक्षा थोड़ी कम।ज्यादातर लोगों ने इसे सामान्य मान लिया। लेकिन वेल्लोर की एक वैज्ञानिक ने करीब 30 साल तक यही सवाल पूछा—आखिर ऐसा क्यों होता है?
उनका नाम है डॉ. #गगनदीप_कांग।
उन्होंने तमिलनाडु के क्रिश्चियन मेडिकल कॉलेज,वेल्लोर से डॉक्टर की पढ़ाई की।लेकिन एक डॉक्टर के लिए थोड़ा अलग रास्ता चुना।वह लैब में चली गईं और वहीं रिसर्च में जुट गईं। उनका विषय था—#बच्चों_की_आंत यानी Gut। खास तौर पर गरीब परिवारों के बच्चों की आंत।उन्होंने यह समझने की कोशिश की कि शुरुआती वर्षों में बार-बार होने वाला दस्त और संक्रमण बच्चे की आंत पर क्या असर डालता है।
उनकी रिसर्च से पता चला कि बार-बार होने वाले संक्रमण सिर्फ बच्चे को बीमार ही नहीं करते।इससे आंत की अंदरूनी परत को नुकसान पहुंचता है,बच्चे की ग्रोथ प्रभावित होती है और शरीर की ओरल वैक्सीन के प्रति प्रतिक्रिया भी कमजोर हो सकती है।
यानी विदेशों में साफ-सुथरे माहौल में विकसित की गई कोई वैक्सीन अगर ऐसे बच्चे पर उतनी असरदार नहीं है,जिसे दो साल की उम्र से पहले ही 10 बार संक्रमण हो चुका है,तो समस्या हमेशा वैक्सीन में नहीं होती।समस्या उस बच्चे की आंत की उस स्थिति में भी हो सकती है,जिससे वह पहले ही गुजर चुका है।लेकिन डॉ. कांग यहीं नहीं रुकीं।
#रोटावायरस छोटे बच्चों में गंभीर दस्त का एक बड़ा कारण है और इसकी वजह से बड़ी संख्या में बच्चों की जान जाती है।भारत में बाहर से आने वाली रोटावायरस वैक्सीन उपलब्ध थीं,लेकिन वे महंगी थीं और जिन गरीब परिवारों के बच्चों को उनकी सबसे ज्यादा जरूरत थी,वहां तक उनकी पहुंच आसान नहीं थी।
डॉ. कांग ने #Rotavac की क्लिनिकल ट्रायल प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।यह भारत में विकसित पहली स्वदेशी रोटावायरस वैक्सीन थी, जिसे एक भारतीय कंपनी ने बनाया था। वह दूसरी वैक्सीन #Rotasiil से जुड़े काम में भी महत्वपूर्ण भूमिका में रहीं।
दोनों वैक्सीन को विश्व स्वास्थ्य संगठन की मंजूरी मिली। Rotavac को भारत के राष्ट्रीय टीकाकरण कार्यक्रम में भी शामिल किया गया,यानी अब यह उन बच्चों तक भी पहुंचती है जिनके माता-पिता को इसके लिए पैसे नहीं देने पड़ते।
2019 में डॉ. गगनदीप कांग भारत में काम करने वाली पहली भारतीय महिला वैज्ञानिक बनीं जिन्हें #Royal_Society का #Fellow चुना गया। यह संस्था 1660 में लंदन में स्थापित हुई थी।इस उपलब्धि तक पहुंचने में 359 साल लगे।वह विश्व स्वास्थ्य संगठन की वैक्सीन सुरक्षा से जुड़ी वैश्विक सलाहकार समिति में भी काम कर चुकी हैं और अब दुनिया की बड़ी स्वास्थ्य संस्थाओं में से एक में ग्लोबल हेल्थ से जुड़े काम का नेतृत्व करती हैं।
उन्होंने अपना पूरा करियर ऐसे सवाल के पीछे लगा दिया,जिसे शायद बहुत कम लोग पूछते थे।सवाल यह नहीं था कि गरीब बच्चों तक वैक्सीन कैसे पहुंचाई जाए।
सवाल था—
"जब वैक्सीन उन बच्चों तक पहुंचती है,तो वह उतनी अच्छी तरह काम क्यों नहीं करती?"
और इसी सवाल ने भारत की वैक्सीन रिसर्च को एक नई दिशा देने में मदद की।
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