अनन्त अंबानी और राधिका अंबानी ने आज यह साबित कर दिया कि👇
> वजन घटाने की दावा करने वाली सभी दवाईयां फर्जी हैं।
> बाल झड़ने से रोकने का दावा करने वाली सभी दवाईयां, शैंपू और तेल फर्जी हैं कोई काम नहीं करेगा।
> मुंहासे, पिंपल, झाईयां आदि ठीक करने का दावा करने वाली क्रीम और सीरम फर्जी हैं।
ये सारी समस्याएं नेचुरल हैं आप दवाओं से इन समस्याओं पर कुछ हद रोकथाम लगा सकते हैं लेकिन खत्म नहीं कर सकते— वरना अंबानी फैमिली के पास पैसों की कमी थोड़ी है वो न कर लेते?🤔🤔
गाजियाबाद लोनी के BJP विधायक ने एक वीडियो बनाकर कहा की कोई भी वकील हाजी सलमान का केस ना लड़े!
फिर क्या उसके बाद इंस्टाग्राम में सैकड़ों वकीलों के वीडियो आ गए सब यही कह रहे हैं मै लड़ूंगा हाजी सलमान का केस उसमें कुछ हिंदू वकीलों के वीडियो भी है!
100 में से 80% हिंदुओं के वीडियो सलमान के समर्थन में भी आए बाकी के 20% विडियो विरोध में आए जो हिंदू संगठन से जुड़े हुए हैं या तो वो BJP के कार्यकर्ता हैं!
मतलब गाजियाबाद की जनता सलमान के साथ है और विधायक जी से खफा है इसलिए विधायक जी माहौल बनाने के लिए हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेल रहे हैं!
आज इलाहाबाद हाई कोर्ट में जौहर यूनिवर्सिटी के फाउंडर मोहम्मद आज़म ख़ान और उनके बेटे पूर्व विधायक अब्दुल्लाह आज़म की जमानत की मांग की जाने वाली याचिका पर सुनवाई होनी थी लेकिन जस्टिस विक्रम डी चौहान ने सुनवाई के वक़्त ख़ुद को सुनवाई से अलग कर मामले को मुख्य न्यायधीश को ट्रांसफर कर दिया।
जज साहब ने 15 जुलाई को सुनवाई की थी और अगली तारीख़ 6 अगस्त दे दी, आज़म ख़ान के वकीलों और परिजनों ने 20 दिन इंतिज़ार किया और आज अदालत पहुंचे तो जज साहब ने बिल्कुल मौके पर ख़ुद को सुनवाई से अलग कर लिया, जज साहब चाहते तो मामले को पिछली तारीख़ यानी 15 जुलाई को ही इस मामले से अलग कर सकते थे ताकि अब तक मामला की सुनवाई हो जाती, लेकिन साहब ने ऐसा नहीं किया क्योंकि मामले को खींचना भी था।
ख़ैर जज साहब की मामले से दूरी बनाने की मजबूरी जो भी रही हो लेकिन साफ़ जाहिर है कि अदालतों में सरकारों का खौफ़ है, इसलिए जज अब मामलों से दूरी बनाना ही बेहतर विकल्प समझते हैं, और यह दूरी उन्हीं केसों में बनाई जाती हैं जिनमें पहली ही सुनवाई में जमानत देने का आधार बनता हैं लेकिन दबाव के कारण जज फ़ैसले देने का भी फैसला नहीं ले पा रहे हैं, और फैसला लिया जाता है तो मामलों से दूरी बनाने का।
यह पहला मामला नहीं जब किसी जज ने आज़म ख़ान और उनके बेटे के मामले की सुनवाई से दूरी बनाई हो, इससे पहले 21 नवंबर 2025 को यतीमखाना केस में भी जो कि आज़म ख़ान से ही जुड़ा हुआ था, उसकी सुनवाई से भी जज समीर जैन ने ख़ुद को अलग कर मामले को मुख्य न्यायधीश के पास भेज दिया था।
साबित हैं जज साहब आज़म ख़ान के मामले को भांप चुके हैं जिसमें आज़म ख़ान और उनके बेटे को बरी या जल्द जमानत देने के अलावा कोई रास्ता नहीं था, लेकिन जज साहब ने जमानत न देकर ख़ुद को मामले की सुनवाई से अलग कर मुख्य न्यायधीश के पास भेजना मुनासिब समझा। अगर जज साहब को इस मामले से ख़ुद को अलग ही करना था तो अलग होने वाला फैसला कई महीनों में क्यों लिया गया? क्यों न ख़ुद को मामले की शुरुआत या जब मुख्य न्यायधीश ने अदालत में भेजा था उसी दौरान क्यों नहीं लौटाया गया? अब नागरिक अदालतों का नहीं बल्कि अदालत ही नागरिकों का समय बर्बाद करती हैं, अदालत का नागरिक समय बर्बाद करता है तो अदालत द्वारा नागरिकों पर जुर्माना और FIR तक दर्ज कर देती हैं लेकिन नागरिकों अगर अदालत ही नागरिकों का समय बर्बाद करें तो किस पर जुर्माना और किस पर FIR होनी चाहिए यह भी अदालतों को बताना चाहिए।
जब देश के बाकी नेता सो रहे थे, तब एक सांसद बच्चों के लिए रात भर धरने पर बैठा रहा!
सांसद चंद्रशेखर आजाद संसद परिसर में रात भर भीमराव अंबेडकर की प्रतिमा के नीचे धरने पर बैठे रहे!
सांसद चंद्रशेखर आजाद चलो संसद मार्च में प्रदर्शनकारी छात्रों पर लाठी चलाए जाने से नाराज़ है!