शाबाश ! केसरी सिंह !
#RPSC ने पेपर सेटरों को सिलेबस ही नहीं दिया #SI_भर्ती_2021 का !
गजब हो गया बच्चे सिलेबस पढ़ते रहे पेपर बनाने वालों के पास सिलेबस ही नहीं जो वो नोटिस के जवाब में खुद बता रहे हैं।
#SI_भर्ती_21_reexam_फिर_से_हो
प्रेमी की नज़र में मैं वफ़ा-दार नहीं हूँ
माँ से दग़ा करने को मैं तैयार नहीं हूँ
पगड़ी पिता की रौंद के मैं इश्क़ निभाऊँ
कैसे करूँ ये जुर्म, मैं गद्दार नहीं हूँ
~ त्रिशिका धरा
हारे हुए लोग कहाँ जायेंगे ? ?
हारे हुए लोगों के लिए कौन दुनिया बसाएगा ?
उन पराजित योद्धाओं के लिए ,
तमाम शिकस्त खाए लोगों के लिए।
प्रेम में टूटे हुए लोग,
सारी जिंदगी को कहीं दांव लगाकर हारे हुए लोग
थके-हारे लोग, गुमनाम लोग
वो बूढ़े पिता जो अब अकेले रह गए हैं
वो कल्पनाओं में खोया रहने वाला बच्चा
जो परीक्षा में फेल हो गया है
वो लड़की जो तेज कदमों से घर की तरफ लौट रही है
वो बूढ़ा गुब्बारे वाला जो कांपते हाथों से पैसे गिनता है
एक असफल लेखक
मैच हार गया खिलाड़ी
इंटरव्यू से वापस लौटा युवा
और ऐसे तमाम लोग
जिन्हें पता था कि वे सफल हो सकते हैं
मगर उन्होंने असफलताओं से भरा रास्ता चुना,
वो लोग जिन्होंने
हमेशा गलत राह पर चलने का जोखिम उठाया
वो लोग जिन्होंने
गलत लोगों पर भरोसा किया
वो जिन्होंने
चोट खाई, धोखा खाया, ठोकर खाई
गिरे और धूल झाड़कर खड़े हुए
वे कहां जाएंगे ?
क्या कोई ऐसी दुनिया होगी
जहां दो हारे हुए इंसान
एक-दूसरे की हथेलियां थामे
कई पलों तक खामोश रह सकते हों
अपनी चुप्पी में तकलीफ बांटते हुए।
जिन्होंने इकारस की तरह
सूरज की तरफ उड़ान भरी
और उनके पंख पिघल गए
हारे हुए लोगों के लिए कोई जगह नहीं है
न किसी घर में, न समाज में, न किसी देश में।
क्या जो विजेता थे
वो इनसे बेहतर हैं? बेहतर थे?
नहीं, वही हारा जिसने जिंदगी की अनिश्चितता पर यकीन किया
वही जिसने अनजान रास्तों पर चलने का जोखिम उठाया
जिसने गलती करनी चाही , जो मक्कार चुप्पियों के पीछे छिपा नहीं।
जो बोल सकता था मगर बोला नहीं
उसने वो चुना जिसे चुनने का कोई तर्क नहीं था
सिवाय उसकी आत्मा के
जो हारा आखिर वो भी एक नायक था।
एक पराजित नायक के दर्द को
कौन समझना चाहेगा?
जाएंगे कहाँ सूझता नहीं
चल पड़े मगर रास्ता नहीं
क्या तलाश है कुछ पता नहीं
बुन रहे हैं दिल ख़्वाब दम-ब-दम।
कवि : दिनेश श्रीनेत
मंज़िलें लाख कठिन आएँ गुज़र जाऊँगा
हौसला हार के बैठूँगा तो मर जाऊँगा
चल रहे थे जो मेरे साथ कहाँ हैं वो लोग
जो ये कहते थे कि रस्ते में बिखर जाऊँगा .....
रास आई न मोहब्बत मुझे वर्ना साक़ी
मैं ने सोचा था कि हर दिल में उतर जाऊँगा ..!!
आज मैंने मोर के बदसूरत पैर देखे
और ख़ुश हुआ
इन्हीं पैरों पर सवार हो आएगी बरसात
आज मैंने मज़दूर के खुरदुरे हाथ देखे
और ख़ुश हुआ
इन्हीं हाथों से बनेगी इमारत
आज मैंने माँ की फटी बिवाइयाँ देखीं
और ख़ुश हुआ
इन्हीं दरारों में सुरक्षित रहेंगे हम
आज मैंने बच्चे को कंचों के लिए रोते देखा
और ख़ुश हुआ
दुनिया ठीक-ठाक चल रही है
आज मैंने सौंदर्य को
उलट-पलट कर देखा
और ख़ुश हुआ!
-निरंजन श्रोत्रिय
मना कर दिया...😊
बचपन में जब पहली बार हवाई जहाज देखा था
तो मैंने मानने से मना कर दिया था
कि कोई इंसान बना सकता है इसे
थोड़ा बडे होने पर...😊
गुलज़ार को पढ़ा और
उन कविताओं को भी
इंसानी मानने से मना कर दिया
ऐसा तीसरी बार...
अब हुआ
जब तुम दिखे।😊
दिल करता है तुम्हें खत लिखू,
तुझे लिखु, या तेरी उन यादों को लिखु,
तेरे साथ रात रात भर किये बातों को लिखु, या तेरे ना होने का एहसास लिखु,
तेरे बारे में लिखु, या तेरे संग बिताये पल को लिखु,
नई नई आँखें हों तो हर मंज़र अच्छा लगता है
कुछ दिन शहर में घूमे लेकिन अब घर अच्छा लगता है
हम ने भी सो कर देखा है नए पुराने शहरों में
जैसा भी है अपने घर का बिस्तर अच्छा लगता है
-ˋˏ निदा फ़ाज़ली ˎˊ-
मरुस्थल से यकायक जैसे जंगल हो गए हैं
तेरा सानिध्य पाकर हम मुकम्मल हो गए हैं
बदन के नक़्शे पे हर तिल को सौ सौ बार देखा
उसे इतना पढ़ा हमने कि पागल हो गए हैं
- अज़हर इक़बाल🌷
ये मंजिल भी उसी की है ये रस्ता भी उसी का है
नजर अगर उसने दी है तो नजरिया भी उसी का है
वो मेरे हक में जो भी फैसला लेगा सही लेगा
ये कश्ती भी उसी की है ये दरिया भी उसी का है
ये कैसा शोर है दिल टूटने का बेवफाई से
ये पत्थर भी उसी का है ये शीशा भी उसी का है
~ डॉ चन्द्रशेख पाण्डेय