बाड़मेर वाले ठग ने टिकट नहीं लेने दिया गोपाल को दिल्ली यूनिवर्सिटी में यही समाचार सुनने को आ रहे हैं !!
उसे थार के अपनायत वाले झुठे ठग को यही डर है कि कोई बड़ा नेता नहीं बन जाए !
उम्मेदाराम बेनीवाल ने पसीने छुड़ा दिए थे ।
वरना इतना आसानी से कौन सांसद की टिकट लेने देता है ।
अब उसके चमचे भी ज्ञान दे रहे हैं ।।
गोपाल जैसे कई नए युवाओं की राजनीति इन्होंने खत्म की फर्जी ठग ऑफ बाड़मेर
नरेंद्र मोदी और अमित शाह में सब ठीक नहीं चल रहा। जब से भाजपा की टीम आई है उसके बाद से अमित शाह लगातार ग़ायब हैं। उनके खास लोगों में से कुछेक को पदाधिकारी तो बना दिया गया लेकिन काम कुछ न दिया गया। अब कुछ लोग यह कहने मत आना कि शेर की छलांग के लिए चार कदम पीछे जाना आवश्यक है। फ़िलहाल यूपी चुनाव योगी के साथ मोदी की तक़दीर भी तय करेगा और मोदी से जुड़े सभी आवश्यक घटकों की।
राजस्थान कांग्रेस प्रभारी पद को लेकर दिल्ली में भारी खींचतान !
दिल्ली के कांग्रेस गलियारों से इस वक्त की बड़ी सियासी हलचल !, राजस्थान के प्रभार को लेकर कांग्रेस में शुरू हुई अंदरूनी....
#RajasthanWithFirstIndia@INCRajasthan
कांग्रेस के एक गुजरात के नेता राजस्थान के प्रभार लेने के लिए काफ़ी जद्दोजहद कर रहे हैं। उन्होंने झारखंड राज्यसभा चुनाव मे भी पार्टी के कुछ नेताओं को ख़ुश करने का काम किया था। अब संगठन महासचिव की तरफ़ से इस गुजरात के नेता जी को कुछ आश्वासन भी मिला है।
खबर ये भी आ रही है कि पीएम मोदी ने कुछ सांसदों को कल चाय पर बुलाया है और शाम को वही सांसद मंत्री बनेंगे।
कल मोदी मंत्रिमंडल में फेरबदल के कयास लग रहे हैं। देखते हैं क्या होगा?
बीते मंगलवार को केंद्रीय मंत्रियों की बैठक चल रही थी । बैठक के बीच में संसदीय कार्यमंत्री किरण रिजिजू ने पीएम को बताया कि देश के यूनिवर्सिटीज में छात्रों, युवाओं से जुड़ने के बारे में मीडिया में खबर छप गई है । जिस पर पीएम ने नाराज़गी भरे शब्दों में सारे मंत्रियों को सुनाते हुये कहा कि हमें पता है कौन ऐसा कर रहा है , हमारे मंत्री क्या-क्या करते हैं और क्या कर रहे हैं सबकी हमें ख़बर है । मंत्रिमंडल विस्तार के क्यासों को लेकर सभी तथाकथित टॉप मंत्रियों में असहजता का भाव है !
सूचना समाप्त ! अभी के लिये फ़िलहाल इतना ही ….नमस्कार …..
राहुल गांधी का अमित शाह को टारगेट करना स्ट्रेटेजिक ब्लंडर हो सकता है! हालांकि मैं जानता हूं कि मेरे इस आकलन की गलत व्याख्या की जा सकती है। फिर भी मेरा यह मानना है कि 2029 में राहुल गांधी के लिए योगी आदित्यनाथ और देवेंद्र फडणवीस की तुलना में अमित शाह ज्यादा फायदेमंद प्रतिद्वंदी साबित होंगे। बिल्कुल वैसे ही जैसे 2009 में मनमोहन सिंह के लिए आडवाणी एक फायदेमंद प्रतिद्वंदी साबित हुए थे। शाह भाजपा के जॉन राइट हो सकते हैं लेकिन दादा या धोनी नहीं हो सकते। याद कीजिए 1994-95 का दौर, जब तमाम विवादों के बावजूद नरसिंह राव को अटल बिहारी वाजपेयी ने बहुत ज्यादा टारगेट नहीं किया था क्योंकि भाजपा को पता था कि अगर कहीं कांग्रेसियों ने लोकसभा चुनाव के पहले राव की जगह अर्जुन सिंह, तिवारी या शरद पवार को फेस बना दिया तो BJP का खेल खराब हो सकता था!
Actually,
मैं इस्तीफे की पूरी इनसाइड स्टोरी बताता हूँ। हिंगलाज जी के सोर्स से पहले तो ये कन्फर्म हो गया था कि युवाओं के प्रोटेस्ट में अमरीका एजेंसी CIA इन्वॉल्व है। इसी को बेस्ड बनाकर पहले सरकार ने विदेश मंत्रालय से एक स्टेटमेंट दिलाया कि प्रोटेस्ट में विदेशी फंडिंग नहीं हो रही है। लोगों को लगा ये सही बात है लेकिन गोरमिंट ने अमरीका को यहां चूतिया बना दिया और उसे भुलावे में रखकर ऐसा स्टेटमेंट दिलवाया। ये इस आंदोलन को खत्म करने के लिए सरकार का ही एक मास्टरस्ट्रोक था।
इधर अमरीका विदेश मंत्रालय के स्टेटमेंट के बाद चूतिया बनता रहा और इधर गोरमिंट ने नेक्स्ट स्टेप लिया। अमरीका से CIA के चीफ ने अभिजीत दीपके को कॉल करके कहा कि भाई तुम्हारे देश की गोरमिंट को तो अपने वाले कनेक्शन का कुछ मालूम ही नहीं है। इसके बाद अभिजीत ने कहा कि जब सरकार को मालूम ही नहीं है तो फिर कनेक्शन को थोड़ा ज्यादा साउंड करते हैं और फिक्स हुआ कि आज रात को 8 बजे डोनाल्ड ट्रंप, CIA चीफ और अभिजीत दीपके ZOOM मीटिंग पर प्रोटेस्ट की नेक्स्ट स्ट्रेटजी बनायेंगे। लेकिन असल में ये लोग सब चूतिया बन रहे थे क्योंकि सरकार को उनकी एक एक गतिविधि मालूम थी।
सरकार को ये भी मालूम चल गया था कि आज वाली ZOOM मीटिंग में ये लोग मोदी के इस्तीफे वाली स्ट्रेटजी बनायेंगे। ये लोग आज कुछ स्ट्रेटजी बना पाते उससे पहले ही गोरमिंट ने धर्मेन्द्र प्रधान से इस्तीफा दिलवाकर भयंकर मास्टरस्ट्रोक चल दिया। प्रधान इस्तीफा होते ही व्हाइट हाउस एडमिनिस्ट्रेशन ने एक मेल भेजकर अभिजीत को भयंकर फटकार भी लगाई है और वो मेल भी सरकार के पास है। अभी डोनाल्ड ट्रंप ने अभिजीत को ये भी बुलवाया है कि तुम्हारा प्रोटेस्ट एकदम फ्लॉप है और अगली बार से किसी प्रोटेस्ट के लिए हमसे डील मत करना।
अब कल सुबह दस बजे ट्रंप प्रशासन व्हाइट हाउस में CIA के सब ऑफिसर को तलब करके बुला रहा है। इस समीक्षा के लिए कि प्लान एक्सपोज कैसे हुआ ?
लेकिन हमको अमरीका की इंटेलिजेंस को एक्सपोज करने वाले जर्नलिस्ट पर प्राउड है कि देश को इतने बड़े खतरे से बचा लिया।
Story of अमित शाह: चैप्टर 5- ये चैप्टर अमित शाह और योगी पर है। क्या अमित शाह और योगी के बीच पॉलिटिकल दुश्मनी है? क्या अमित शाह और योगी एक दूसरे को हटाना चाहते हैं? क्या अमित शाह और योगी के बीच नहीं बनती है? इन सवालों के ठोस और सटीक जवाब देता हूं। कुछ दिन पहले अमित शाह से योगी आदित्यनाथ दिल्ली में मिले। दो तस्वीरें खिंचवाई गई। सोशल मीडिया पर खासकर इन तस्वीरों को लगाकर हजारों कहानियां बना दी गई। ? लगाकर सैंकड़ों लाइन यूट्यूब पर लिख दिए गए। सारी बातें टोटल बकवास और काल्पनिक थी। आपको बताता हूं क्या हुआ? आज ही उस मुलाकात पर कुछ लोगों से बात हुई तो पूरी जानकारी मिली। अमित शाह और योगी ने उस शाम सिर्फ और सिर्फ राम मंदिर पर ही बात की थी। आगे राम मंदिर कैसे चलना चाहिए? क्या व्यवस्था होनी चाहिए? किसे क्या जिम्मेदारी देनी चाहिए? चंपत राय और अनिल मिश्रा का क्या होना चाहिए, ये बात हुई।
1. राम मंदिर में चोरी केस में सुप्रीम कोर्ट को जवाब देना है।
2. 22 जुलाई को ट्रस्ट की बैठक होनी है। उससे पहले SIT की फाइनल रिपोर्ट आनी है।
3. राम मंदिर का नया सीईओ कौन होगा? वो तय होना है। 1000 नाम आ चुके हैं। इसमें से पहले तीन लोगों को शॉर्ट लिस्ट करना है।
4. चंपत राय और अनिल मिश्रा को छोड़ना है या लापरवाही का केस होना है।
5. राम मंदिर चलाने के लिए पांच अलग-अलग कमिटी बननी है, अयोध्या में ही रहने वाले एक फुल टाइम कोषाध्यक्ष पर भी बात हुई
6. राम मंदिर ट्रस्ट में तीन नए ट्रस्टी का नाम सोचना है
दरअसल योगी और अमित शाह के बीच कैसी कैमिस्ट्री है, ये बात इस वक्त पॉलिटिक्स की सबसे बड़ी मिस्ट्री है। सबसे बड़ी सच्चाई ये है कि देश के नंबर वन लीडर को पॉलिटिकल लीडर्स के बीच सबसे ज्यादा भरोसा योगी और अमित शाह पर ही है। मोदी दोनों को ही बेहद पसंद करते हैं। मोदी का भरोसा इन दोनों पर लगातार बना हुआ है। राम मंदिर जैसे मुश्किल मसले को भी दोनों को मिलकर सुलझाने के लिए कहा गया है। और अब ये पूरा मामला सॉल्व हो गया है। संसद सत्र शुरू होने से पहले राम मंदिर के इश्यू को ठीक कर लिया गया।
चन्नी से बैर नहीं...रंधावा की खैर नहीं!
पंजाब कांग्रेस में मची उठापटक का निष्कर्ष ये है कि हाईकमान चन्नी को मना लेगा। रंधावा का क्या होगा ये कोई नहीं जानता। सूत्र बता रहे हैं कि कांग्रेस हाईकमान चन्नी से कम, रंधावा से ज्यादा खफा है।
राहुल गांधी ने बैठक में साफ कहा कि अनुशासनहीनता बर्दाश्त नहीं की जाएगी। मतलब जो सोचता है कि वो ताकत दिखाकर हाईकमान को झुका लेगा वो अब मुमकिन नहीं है।
दरअसल दिल्ली तक भी ये रिपोर्ट पहुंच रही है कि गुटबाजी करने वाले नेताओं को रंधावा ही पर्दे के पीछे से लीड कर रहे थे। चन्नी दलित हैं इसलिए उनके नाम और चेहरे का इस्तेमाल हुआ। इस खेल को खुद चन्नी भी नहीं समझ पाए।
इस पूरे सियासी घटनाक्रम में बाजवा बड़े चालाक निकले। वो चुपके से राणा गुरजीत के घर पर चन्नी गुट की बैठक में पहले ही जाकर बैठ गए। अंदर की एक-एक बात सुनी। अब दिल्ली आकर हाईकमान को सब बता दिया। हाईकमान से मिलने के बाद बाजवा तुरंत चंडीगढ़ पहुंचे। चन्नी को घर पर बुलाया। उन्हें राहुल का संदेश दिया।
सूत्र बता रहे हैं कि चन्नी तक ये बात पहुंचाई गई है कि वो मुख्यमंत्री बनने की उम्मीद ना छोड़ें। राहुल गांधी का अगला मिशन किसी दलित चेहरे को ही मुख्यमंत्री बनाने का है। अगर पंजाब में कांग्रेस जीतेगी तो चन्नी राहुल की पहली पसंद रहेंगे।
दिल्ली में आज रात एक और मीटिंग शुरू हो चुकी है। ये मीटिंग सबसे महत्वपूर्ण है। सारी बातें एक-एक कर इसी मीटिंग में फाइनल होगी। इस मीटिंग में नंबर वन लीडर, नंबर 2, नंबर 3 और नंबर 4 मौजूद हैं। सिर्फ 4 टॉप लीडर्स के बीच ये बैठक चल रही है। ये चार लोग ही तय करेंगे बीजेपी में किसे क्या मिलेगा...एनडीए में कौन-कौन कैसे-कैसे आएगा? किसको कहां एडजस्ट किया जाएगा और किसे कुछ नहीं मिलेगा। अगले कुछ घंटे..कुछ दिन..बीजेपी के नेताओं की भी धड़कनें बढ़ी रहेंगी।
बिग ब्रेकिंग..पंजाब कांग्रेस... एक्सक्लूसिव इन्फो...👇
** कांग्रेस आलाकमान पंजाब कांग्रेस के बागी गुट से नाराज..खासतौर पर कांग्रेस अध्यक्ष ने एक नेता जो गुट का लीडर है उसको लेकर अपनी कड़ी नाराजगी जताई है..किसी नाराज नेता से नहीं मिलेंगे कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी..
* संगठन महासचिव के सी वेणुगोपाल अगले एक दो दिनों ( संसद सत्र से पहले) में पंजाब कांग्रेस के सांसदों के साथ करेंगे मुलाकात..बैठक में कांग्रेस आलाकमान के नजरिये से उनको अवगत कराया जाएगा..
* संगठन महासचिव के जरिए नाराज नेताओं को (सांसदों के माध्यम से) स्पष्ट बता दिया जाएगा कि कांग्रेस आलाकमान अपना फैसला नहीं बदलने वाला है। साथ ही नेतृत्व का ये संदेश भी सुना दिया जाएगा कि कोई भी नेता लॉबिंग या दबाव की राजनीति करके नेतृत्व का फैसला नहीं बदल सकता।
* साथ ही नाराज नेताओं को GSO के माध्यम से ये भी बता दिया जाएगा कि कोई भी नेता पार्टी से बड़ा नहीं है। इसलिए अनुशासन की सीमा रेखा ( जैसा कि पिछले दिनों देखा गया ) को दुबारा पार करता है तो पार्टी अनुशासनात्मक कार्रवाई करने से पीछे नहीं हटेगी..
काला कोट, टीके का हल्का रंग, तीन की जगह एक मोबाइल फ़ोन, चेहरे पर मुर्दानगी, आँखों में उदासी। उफ़्फ़ यह वही नरोत्तम है जो खुलेआम चौहारों सड़कों पर मुस्लिमों के ख़िलाफ़ जनता का आवाहन करते थे। जिन्होंने मध्य प्रदेश को नफ़रती प्रदेश बनाने की भरपूर कोशिश की और कुछ हद तक सफल भी रहे।
अब सवाल खड़ा होता है कि यह अब करेंगे क्या? भाजपा ने बहुत दिग्गजों का कैरियर खत्म किया उनके सामने तो नरोत्तम की कोई हैसियत भी नहीं है।
अच्छा होगा नरोत्तम जन सेवा के लिए रियल इस्टेट का काम शुरू करें। रियल इस्टेट के काम से जनता को भी फायदा होगा ख़ुद को भी। ट्रेनिंग देने के लिए पार्टी में ही लोग मौजूद हैं। क्योंकि सिर्फ़ विधायक का टिकट नहीं कटा है कैरियर पर फुल स्टॉप लग गया है।
हरीश चौधरी का यह बयान ही यह बताने के लिए पर्याप्त है कि राजस्थान कांग्रेस में नेताओं के बीच की अंदरूनी खींचतान किस स्तर तक पहुंच चुकी है।
"पहले जो हमारे मुख्यमंत्री जी थे... उनके बारे में नहीं बोलूं तो इस पवित्र स्थान पर ठीक है। भजनलाल जी के और के.के. बिश्नोई जी के भी सीधे तार जुड़े हुए हैं।
मेरे तो आजकल वो रामा-श्यामी इस एमपी चुनाव के बाद में... बंद हो गए हैं। अब उमेदराम जी जाकर समाचार ले आते हैं, मैं सुन लेता हूँ।"
मित्रो, आप सहमत हों या असहमत, अपने विचार अवश्य व्यक्त करें कि राजस्थान की राजनीति में यह जो घटित हो रहा है, उस पर आपके मुखर विचार क्या हैं? ख़ासकर इस लेख पर जो आज रशीद किदवई ने दिल्ली से एनडीटीवी पर लिखा है :
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बीते कुछ घंटों में राजस्थान की राजनीति और कांग्रेस के भीतर शुरू हुए नए उद्वेलन को लेकर काफी घटनाएं हुई हैं। सबसे पहले पूर्व सीएम अशोक गहलोत ने अपने जीवन का सबसे ख़तरनाक़ हमला बोला। उम्मीद थी कि अब पायलट पलटवार करेंगे; लेकिन वे चुप रहे। अब मीडिया में सब लोग अपनी-अपनी उपस्थिति और नेताओं के साथ अपने-अपने कोण के अनुसार तो टिप्पणियाँ कर ही रहे हैं, लेकिन कुछ ऐसी अनहोनियां हैं, जो हुए ही जा रही हैं। सोमवार रात को उमांशकरसिंह ने एक लंबा पोडकास्ट किया। इस बीच और बहुत कुछ आया। आज प्रमुख पत्रकार और लेखक रशीद किदवई ने राजस्थान के घटनाक्रम पर एक लंबा लेख लिखा है।
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रशीद किदवई वरिष्ठ पत्रकार, लेखक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं। सेंट स्टीफेंस कॉलेज, दिल्ली से स्नातक और यूनिवर्सिटी ऑफ लेस्टर से मास कम्युनिकेशन में पीजी हैं। ब्रिटिश एवं कॉमनवेल्थ ऑफिस फेलोशिप पर हैं। SONIA : A Biography, 24 Akbar Road, Neta Abhineta और Ballot जैसी चर्चित पुस्तकों के रचयिता हैं। द टेलीग्राफ, कोलकाता के पूर्व एसोसिएट एडिटर रहे हैं। दैनिक जागरण, अमर उजाला, The Tribune, ThePrint, ABP News सहित दर्जनों हिंदी, अंगरेज़ी व उर्दू प्रकाशनों में नियमित स्तंभकार तथा टीवी-रेडियो पर सक्रिय राजनीतिक टीकाकार हैं। उनका लेख ज़ोरदार है :
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राहुल द्वारा उपेक्षित, पायलट से परेशान: अशोक गहलोत के महापतन की अंदरूनी कहानी
कांग्रेस के कई नेता यह सोच रहे हैं कि गहलोत, जो इंदिरा, संजय, राजीव, नरसिम्हा राव, सीताराम केसरी, सोनिया और राहुल के दौर में पार्टी के साथ टिके रहे, अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम पड़ाव पर क्यों भटक गए। वे पूछते हैं ; "अशोक गहलोत को गुस्सा क्यों आता है?"
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रशीद किदवई . सबसे आगे हैं अशोक गहलोत, 75 वर्षीय, बेताब और पूरी तरह आक्रामक। क्या यह दिल्ली-जयपुर-जोधपुर की गर्मी है, राज्यसभा सीट से वंचित होना है, या पिछले तीन वर्षों से नेहरू-गांधी परिवार का उनसे लंबी, सीधी बातचीत करने से इनकार है, या फिर AICC के प्रमुख पदों जैसे कोषाध्यक्ष, संगठन प्रभारी महासचिव से बाहर रहने की आशंका है, जिसने गहलोत को पिछले कुछ दिनों में बेलगाम कर दिया है?
जयपुर में गहलोत ने खुद ही उस शर्मनाक अध्याय को नया रंग देने की कोशिश की, जब उनके भीतर के आजीवन कांग्रेसी ने सोनिया और पूरी पार्टी को चौंका दिया था राजस्थान कांग्रेस विधायक दल की बैठक बुलाने से इनकार करके। उस समय सोनिया ने गहलोत को दिल्ली आकर AICC के 88वें अध्यक्ष का पद संभालने को कहा था। गहलोत ने, यह भांपते हुए कि उनके कट्टर प्रतिद्वंद्वी सचिन पायलट उनके उत्तराधिकारी होंगे, 92 विधायकों को पार्टी हाईकमान के फैसले की अवहेलना करने के लिए तैयार कर लिया। 7 जून 2026 को गहलोत ने इस दावे को खारिज किया कि उन्होंने कांग्रेस हाईकमान के खिलाफ विद्रोह किया था। उन्होंने कहा कि विधायक पार्टी की आंतरिक गतिशीलता के तहत काम कर रहे थे, न कि केंद्रीय नेतृत्व का विरोध कर रहे थे। उनका कहना था कि मीडिया के रवैये ने जनधारणा को प्रभावित किया, जिससे स्थिति की गलत समझ बनी।
'यह एक षड्यंत्र है'
अशोक गहलोत ने कहा कि उनका मानना है कि स्थिति की गलत व्याख्या की गई और यह एक सुनियोजित षड्यंत्र जैसी लगी। उन्होंने कहा, "जो हालात सामने आए... मुझे लगता है यह एक षड्यंत्र था। AICC के पर्यवेक्षक अचानक आए, एक तमाशा हुआ और मेरी बदनामी हो गई।"
गहलोत के इस विस्फोट से यह स्पष्ट नहीं होता कि वे किस पर 'षड्यंत्र' का आरोप लगा रहे हैं राहुल गांधी पर, पार्टी अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे पर, AICC पर्यवेक्षक अजय माकन पर या AICC के संगठन प्रभारी महासचिव केसी वेणुगोपाल पर?
जानकार सूत्रों का कहना है कि राहुल और प्रियंका गांधी से मुलाकात न मिलने से ज्यादा गहलोत को इस बात का डर है कि सचिन पायलट राजस्थान प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में वापस आ सकते हैं। अगर पायलट, गोविंद सिंह डोटासरा की जगह लेते हैं; जो लगभग छह वर्षों से RPCC अध्यक्ष हैं तो 49 वर्षीय पायलट नवंबर-दिसंबर 2028 में मुख्यमंत्री पद के प्रबल दावेदार बन जाएंगे।
पीछे छूटा हुआ नेता?
गहलोत की दूसरी चिंता पार्टी में उनकी बढ़ती अप्रासंगिकता है। इस अनुभवी चुनावी योद्धा को न तो परामर्श के लिए बुलाया जाता है, न ही किसी महत्वपूर्ण भूमिका के लिए विचार किया जा रहा है। कमलनाथ की तरह, उनके समर्थकों ने यह कथा फैलाने की कोशिश की कि अगर पूर्व राजस्थान मुख्यमंत्री को राज्यसभा की सीट दी जाए तो वे 24 अकबर रोड लुटियंस दिल्ली का एक टाइप-VIII बंगला अगले छह साल के लिए पार्टी को दे देंगे। कांग्रेस, जो इंदिरा भवन, रौज एवेन्यू में अपने नए मुख्यालय में स्थानांतरित हो चुकी है, पर 24 अकबर रोड खाली करने का दबाव है, जो जनवरी 1978 से फरवरी 2025 तक दशकों तक पार्टी का कार्यालय रहा। लेकिन राहुल गांधी इस घर को 'पार्टी को दान' करने के इशारे के प्रति उदासीन बताए जाते हैं।
'दिग्गी राजा' की कहानी
एक और वरिष्ठ कांग्रेस नेता की कहानी याद आती है दिग्विजय सिंह। संजय गांधी के जमाने से 50 से अधिक वर्षों के अपने अच्छे मित्र की तरह, 79 वर्षीय दिग्विजय सिंह नेताओं के बीच नेता; राज्यसभा का कार्यकाल हाल ही में समाप्त होने के बाद एक अनिश्चित राजनीतिक भविष्य का सामना कर रहे हैं। सेवानिवृत्ति, बागबानी, संस्मरण लिखना या संगीत सुनना; यह 'दिग्गी राजा' की खुशी का विचार नहीं है। लेकिन पार्टी के खिलाफ शिकायत पालने या षड्यंत्र का आरोप लगाने की बजाय, दिग्विजय ने राहुल, सोनिया और पार्टी नेतृत्व को लोकसभा के दो कार्यकाल और राज्यसभा के दो कार्यकाल देने के लिए धन्यवाद दिया। उन्होंने यह भी कहा कि राज्यसभा चुनाव में पार्टी प्रत्याशी मीनाक्षी नटराजन की जीत सुनिश्चित करने के लिए वे 'सब कुछ' करेंगे।
राजनीतिक स्तर पर, दिग्विजय, गहलोत की ही तरह, राज्य और राष्ट्रीय राजनीति में विकल्पों की कमी महसूस कर रहे हैं। उनके पुत्र जयवर्धन सिंह मध्यप्रदेश की राजनीति में अच्छी स्थिति में हैं, जिससे पिता की गृहराज्य में भूमिका सीमित हो गई है। इसी तरह AICC सचिवालय में भी रघोगढ़ के पूर्व राजा, जो प्रसिद्ध सिंधिया वंश से टकराने के इतिहास के लिए जाने जाते हैं, के लिए कोई पद या भूमिका प्रतीक्षारत नहीं है। रोचक बात यह है कि सितंबर-अक्टूबर 2022 की एक त्वरित समीक्षा बताती है कि जब अशोक गहलोत ने कांग्रेस हाईकमान के खिलाफ विद्रोह किया, तब दिग्विजय AICC के 88वें अध्यक्ष बनने के बेहद करीब थे और अंततः खरगे का नाम इस प्रतिष्ठित पद के लिए सामने आया।
उनके पास योग्यता की कमी नहीं थी
कांग्रेस में ऐसे नेताओं की कोई कमी नहीं जो दिग्विजय को बड़े सम्मान से देखते हैं। उनके अनुसार राहुल गांधी को दिग्विजय को राजनीति से विराम न लेने के लिए मनाने की कोशिश करनी चाहिए। अनौपचारिक स्तर पर राहुल गांधी को सुझाया गया है कि वे दिग्विजय की सेवाओं का उपयोग संतों, गुरुओं और हिंदू धार्मिक संस्थाओं के प्रमुखों से संपर्क के माध्यम के रूप में करें, ताकि बहुसंख्यक समाज को साधा जा सके। दिग्विजय 'सनातन धर्म' के मुखर समर्थक रहे हैं, 'हिंदुत्व' का विरोध करते रहे हैं और अक्सर BJP, VHP, RSS तथा अन्य को 'सच्चे हिंदुत्व की भावना' को परिभाषित करने के विषय पर शास्त्रार्थ या बहस की चुनौती देते रहे हैं।
पार्टी नेताओं का कहना है कि यदि राहुल गांधी दिग्विजय की उपलब्धियों पर ध्यान दें तो उन्हें कई 'मील के पत्थर' मिलेंगे। फरवरी 2002 में उन्होंने 'दिघौरी सम्मेलन' आयोजित किया था, जिसका उद्देश्य राम जन्मभूमि आंदोलन पर VHP के वर्चस्व को तोड़ना था। जब अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे और डॉ. मुरली मनोहर जोशी मानव संसाधन विकास मंत्रालय संभाल रहे थे, तब कांग्रेस के मुख्यमंत्री के रूप में दिग्विजय ने विश्वविद्यालय शिक्षा में ज्योतिष को एक विषय के रूप में शुरू करने का समर्थन किया था; जिसने कांग्रेस में कई लोगों को चौंका दिया। अक्टूबर 2017 से अप्रैल 2018 के बीच दिग्विजय ने नर्मदा के आसपास एक कठिन पदयात्रा की; 192 दिन चलते हुए मध्यप्रदेश की 230 में से 166 विधानसभा क्षेत्रों को कवर करते हुए 3,325 किलोमीटर की दूरी तय की। दिसंबर 2018 के चुनावों में कांग्रेस ने राज्य विधानसभा में BJP को सफलतापूर्वक हराया।
दिग्विजय सिंह उन चंद राजनेताओं में से भी हैं जो तीनों स्तरों नगर पालिका, राज्य विधानसभा और संसद में निर्वाचित प्रतिनिधि रहे हैं। वे नगर निगम के प्रमुख, विधायक, राज्य मंत्री, लोकसभा और राज्यसभा सांसद तथा मुख्यमंत्री रहे हैं, इसके अलावा अनेक पार्टी पदों पर भी रहे हैं। 2012 के उत्तरप्रदेश चुनावों के दौरान वे राज्य के AICC महासचिव प्रभारी थे और राहुल के साथ इतनी निकटता से काम किया कि कई लोग उन्हें राहुल का 'मेंटर' कहने लगे। पुराने लोग याद करते हैं कि जब दिग्विजय 1980 में पहली बार मंत्री बने, तो एक पूर्व राज्य मुख्य सचिव ने उन्हें सलाह दी थी; "राजनीति में पैसा जुटाने के तीन तरीके हैं हरजाना (कराधान), जबरना (जबरदस्ती) और नजराना (उपहार)। अगर कभी जरूरत पड़े तो तीसरा रास्ता चुनना।"
गहलोत, हालांकि, दिग्विजय नहीं हैं। उनके बस की बात नहीं कि पार्टी हाईकमान को अपना भाग्य तय करने दें। कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि गहलोत का हालिया विस्फोट पार्टी में अच्छा नहीं लगा। एक पार्टी पदाधिकारी ने तो यहां तक संकेत दिया कि इससे 2028 में उनकी सरदारपुरा सीट भी जा सकती है। कांग्रेस में कई लोग यह सोचकर हैरान हैं कि गहलोत, जो इंदिरा, संजय, राजीव, नरसिम्हा राव, सीताराम केसरी सोनिया और राहुल के पूरे दौर में पार्टी के साथ खड़े रहे, 75 वर्ष की परिपक्व आयु में, अपने राजनीतिक जीवन के अंतिम पड़ाव पर क्यों भटक गए। वे पूछते हैं :
"अशोक गहलोत को गुस्सा क्यों आता है?"
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यह अंगरेज़ी से हिन्दी का बहुत ही ख़राब अनुवाद है और मेरी समझ के अनुसार किया गया है। यह लेख एक तरह से साभार यूज किया जा रहा है। यह लेख राजस्थान की राजनीति पर है और प्रमुख प्रतिपक्षी दल पर है तो आपके विचार जानना बहुत ही ज़रूरी हैं। मैंने गहलोत साहब के बयान का भी हिस्सा पूरा का पूरा यहाँ दिया था।
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मूल आलेख के लिए एनडीटीवी की वैबसाइट पर जाएं। लिंक ये है :
https://t.co/RZQ2FiPtVD
@ndtvindia@ndtv@rasheedkidwai
पूर्व ओएसडी @_lokeshsharma का बड़ा खुलासा : “गहलोत ने गांधी परिवार को लेकर भी अपशब्द बोले, राहुल गांधी के लिए कहा ‘ये राजनीति का पप्पू है’… मुझे मौक़ा मिले तो मैं @RahulGandhi , @priyankagandhi और सोनिया जी को रिकॉर्डिंग/सबूत दिखा सकता हूँ”
https://t.co/EfPLjr80Mg
क्या भाजपा बाड़मेर में संगठन चला रही है या अलग-अलग शक्ति केंद्र अपनी निजी राजनीति मजबूत कर रहे हैं?
#दुर्गसिंह_राजपुरोहित
बाड़मेर भाजपा की मौजूदा स्थिति अब केवल राजनीतिक चर्चा का विषय नहीं, बल्कि संगठनात्मक चिंता का कारण बनती जा रही है। भाजपा ने युवा चेहरा जिलाध्यक्ष बनाकर यह संदेश देने की कोशिश की थी कि अब संगठन नई ऊर्जा, नए नेतृत्व और युवाओं की ताकत के साथ आगे बढ़ेगा। लेकिन ज़मीनी तस्वीर इससे बिल्कुल अलग दिखाई दे रही है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब जिलाध्यक्ष युवा हैं, तब भी जिले में युवाओं का जुड़ाव भाजपा के प्रति क्यों नहीं बढ़ रहा? भारतीय जनता युवा मोर्चा राजस्थान की नई प्रदेश कार्यकारिणी में बाड़मेर से एक भी युवा चेहरा जगह नहीं बना पाया। राजनीतिक विश्लेषक इसे साधारण संगठनात्मक चूक नहीं, बल्कि जिले में कमजोर होती पकड़ का संकेत मान रहे हैं।
राजनीतिक गलियारों में लगातार यह चर्चा है कि नए जिलाध्यक्ष अब भी पूरे जिले की बजाय सेड़वा क्षेत्र की राजनीति तक सीमित नजर आते हैं। क्या उन्हें यह एहसास नहीं कि वे केवल एक क्षेत्र विशेष नहीं, बल्कि पूरे बाड़मेर जिले के अध्यक्ष हैं? जिले के शिव, चौहटन, बायतु और ग्रामीण क्षेत्रों में संगठनात्मक सक्रियता लगभग ठहरी हुई महसूस होती है। कार्यकर्ताओं के बीच यह धारणा बनती जा रही है कि संगठन अब सीमित दायरे में सिमट चुका है।
भाजपा की सबसे बड़ी समस्या अब विपक्ष नहीं, बल्कि अंदरखाने चल रही समानांतर राजनीति मानी जा रही है। पार्टी के भीतर “पॉवर सेंटर”, “न्यूक्लियर सेंटर” और “परमाणु सेंटर” जैसे शब्द अब व्यंग्य नहीं, बल्कि संगठन की वास्तविक स्थिति का प्रतीक बन चुके हैं। कई पुराने कार्यकर्ता मानते हैं कि संगठन के आधिकारिक ढांचे से ज्यादा असर उन लोगों का दिखाई देता है जो पर्दे के पीछे अपनी अलग राजनीतिक लाइन चला रहे हैं।
मदन दिलावर ने अग्रवाल पंचायत में पुराने अध्यक्ष को हास्य-विनोद में घर बैठने की सलाह तो दे दी, लेकिन उन अघोषित अध्यक्षों पर कोई टिप्पणी नहीं हुई जो संगठन से ऊपर अपनी समानांतर सत्ता स्थापित करने में लगे हुए हैं। यही वजह है कि भाजपा कार्यकर्ताओं में असंतोष लगातार बढ़ रहा है, हालांकि संगठनात्मक भय और अनुशासन के कारण अधिकांश लोग खुलकर बोलने से बचते हैं।
बीते कुछ वर्षों में भाजपा को बाड़मेर में लगातार राजनीतिक झटके लगे हैं। विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रत्याशी की जमानत जब्त होना केवल हार नहीं थी, बल्कि जनाधार खिसकने का संकेत था। लोकसभा चुनाव में भी जनता ने कई बड़े चेहरों को अपेक्षित समर्थन नहीं दिया। इसके बावजूद संगठन आत्ममंथन करने की बजाय अंदरूनी शक्ति संघर्ष में उलझा दिखाई देता है।
सीमावर्ती जिला होने के कारण बाड़मेर राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील माना जाता है। यहां संगठन कमजोर होना केवल चुनावी नुकसान नहीं, बल्कि लंबे समय की रणनीतिक कमजोरी भी बन सकता है। पार्टी के कई पुराने जानकार मानते हैं कि यदि समय रहते भाजपा ने संगठन को एकधारा में नहीं लाया, युवाओं को वास्तविक भागीदारी नहीं दी और जिलाध्यक्ष पूरे जिले में समान सक्रियता नहीं दिखा पाए, तो भविष्य में बाड़मेर भाजपा के लिए सबसे बड़ी चुनौती उसके अपने भीतर से ही खड़ी होगी।
कांग्रेस के सबसे बड़े जानकार बताए जाने वाले आदेश रावल के हिसाब से तो वीडी सतीशन मुख्यमंत्री की दौड़ से बहुत पहले ही बाहर हो चुके थे। फिर वे मुख्यमंत्री बन कैसे सकते हैं?
यह तो ग़लत हुआ है पूरी तरह
जिस दिन राहुल गांधी चाहेंगे वेणुगोपाल नहीं रहेंगे...तो वो नहीं रहेंगे. शुरू में राहुल गांधी बहुत अटैचेड पॉलिटिशियन थे..बहुत नेता उन्हें छोड़ कर चले गए...
अगर वेणुगोपाल ये सोच रहे हैं कि राहुल गांधी उन्हें मुख्यमंत्री बनाएंगे तो वो बहुत बड़ी ग़लतफहमी में है।
आज की तारीख में राहुल गांधी बहुत डिटैचड पॉलिटिशियन है उन्हें किसी से कोई लगाव नहीं है न उनका कोई फेवरेट है..