मध्य प्रदेश के मुरैना में ट्रेन में आग लगने की अफवाह से यात्री ट्रेन से उतरकर रेलवे ट्रैक पर कूद गए,
जबकि ठीक उसी समय दूसरे ट्रैक पर ट्रेन आ गई और उसकी चपेट में आने से कई यात्रियों की मौत हो गई।
अमेरिका ने भारत से किसी भी प्रकार की माफ़ी माँगने से इंकार कर दिया है
स्ट्रेट ऑफ़ हॉर्मुज़ में बिना अमेरिकी परमिशन के कोई भी जहाज नहीं निकलेगा।
नमस्ते ट्रंप 🙏🏻
भोपाल पहुंचे केंद्रीय मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के सामने विरोध दर्ज करवाने जा रहे NSUI के प्रदेश अध्यक्ष आशुतोष चौकसे को कांग्रेस कार्यालय के सामने से पुलिस ने कुछ यूं पकड़ा...!
VIDEO | Rajya Sabha polls: All three BJP candidates in MP elected unopposed, collect 'certificates of victory' in Bhopal.
(Full video available on PTI Videos - https://t.co/n147TvrpG7)
कांग्रेस की राज्यसभा प्रत्याशी सुश्री मीनाक्षी नटराजन के निर्वाचन पत्र पर भारतीय जनता पार्टी की आपत्ति। सुश्री नटराजन ने तेलंगाना के 1 और मध्यप्रदेश के 2 आपराधिक मामले छुपाए। कांग्रेस का कहना है FIR नहीं हुई थी,सिर्फ नोटिस मिला था।विधानसभा में दिग्विजय सिंह , मीनाक्षी नटराजन और उमंग सिंगार भी पहुंचे।बीजेपी से पहुंचे राकेश सिंह, उम्मीदवार महेश केवट, भगवान दास सबनानी।बहस जारी। @VistaarNews
मध्यप्रदेश राज्यसभा का चुनाव दो महत्वपूर्ण बिंदुओं पर आधारित है
- पहला वर्तमान प्रदेश नेतृत्व की यह एक तरीके से यह चुनावी परीक्षा है
- दूसरा यह कॉंग्रेस की एकजुटता को मापने की पहली कसौटी है
राज्यसभा चुनाव में तीसरा उम्मीदवार उतारने का निर्णय मुख्यमंत्री मोहन यादव की राजनीतिक आतुरता और उनके सलाहकारों की रणनीति को दर्शाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इसके पीछे मुख्य उद्देश्य यह संदेश देना है कि मोहन यादव प्रदेश की राजनीति में एक बड़े और निर्णायक नेता के रूप में स्थापित हो रहे हैं।
यदि वास्तव में तीसरा उम्मीदवार उतारना ही था, तो पार्टी में कई अन्य विकल्प भी मौजूद थे। लेकिन उम्मीदवार के रूप में महेश केवट का चयन कई राजनीतिक सवाल खड़े करता है। वे न केवल अपेक्षाकृत कम चर्चित चेहरा हैं, बल्कि मुख्यमंत्री आवास और केवट समाज से जुड़े होने के कारण उन्हें एक ऐसे उम्मीदवार के रूप में देखा जा रहा है, जो पूरी तरह नेतृत्व की रणनीति का हिस्सा हैं।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि यदि तीसरी सीट के समीकरण अपेक्षा के अनुरूप नहीं बैठे और किसी को राजनीतिक रूप से इसकी कीमत चुकानी पड़े, तो उसके लिए नेतृत्व को एक ऐसा चेहरा चाहिए था जो पूरी तरह उनका अपना माना जाए। इसी संदर्भ में कुछ लोग यह भी मानते हैं कि संभावित "बलि का बकरा" तय करने की पूरी प्रक्रिया में मुख्यमंत्री आवास से जुड़े केवट समुदाय के प्रभावशाली लोगों की भूमिका रही हो सकती है।
हालांकि इन दावों की पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन इस तरह की चर्चाएं राजनीतिक बहस का हिस्सा बनी हुई हैं।
राजनीति में हर कदम के पीछे कई परतें होती हैं और इस निर्णय की वास्तविक मंशा क्या है, यह तो समय ही बताएगा। फिलहाल कांग्रेस अपेक्षाकृत एकजुट दिखाई दे रही है। ऐसे में सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्यसभा की तीसरी सीट आखिर किस करवट बैठती है।
बाक़ी कांग्रेस ने इस लड़ाई को महिला सम्मान से जोड़ दिया है
@drbrajeshrajput@rupeshmishramp@PrabhuPateria@MPTakOfficial@Anurag_Dwary@mpbreakingnews@sanjaygupta1304
राज्यसभा चुनाव में तीसरा उम्मीदवार उतारने का निर्णय मुख्यमंत्री मोहन यादव की राजनीतिक आतुरता और उनके सलाहकारों की रणनीति को दर्शाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इसके पीछे मुख्य उद्देश्य यह संदेश देना है कि मोहन यादव प्रदेश की राजनीति में एक बड़े और निर्णायक नेता के रूप में स्थापित हो रहे हैं।
यदि वास्तव में तीसरा उम्मीदवार उतारना ही था, तो पार्टी में कई अन्य विकल्प भी मौजूद थे। लेकिन उम्मीदवार के रूप में महेश केवट का चयन कई राजनीतिक सवाल खड़े करता है। वे न केवल अपेक्षाकृत कम चर्चित चेहरा हैं, बल्कि मुख्यमंत्री आवास और केवट समाज से जुड़े होने के कारण उन्हें एक ऐसे उम्मीदवार के रूप में देखा जा रहा है, जो पूरी तरह नेतृत्व की रणनीति का हिस्सा हैं।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि यदि तीसरी सीट के समीकरण अपेक्षा के अनुरूप नहीं बैठे और किसी को राजनीतिक रूप से इसकी कीमत चुकानी पड़े, तो उसके लिए नेतृत्व को एक ऐसा चेहरा चाहिए था जो पूरी तरह उनका अपना माना जाए। इसी संदर्भ में कुछ लोग यह भी मानते हैं कि संभावित "बलि का बकरा" तय करने की पूरी प्रक्रिया में मुख्यमंत्री आवास से जुड़े केवट समुदाय के प्रभावशाली लोगों की भूमिका रही हो सकती है।
हालांकि इन दावों की पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन इस तरह की चर्चाएं राजनीतिक बहस का हिस्सा बनी हुई हैं।
राजनीति में हर कदम के पीछे कई परतें होती हैं और इस निर्णय की वास्तविक मंशा क्या है, यह तो समय ही बताएगा। फिलहाल कांग्रेस अपेक्षाकृत एकजुट दिखाई दे रही है। ऐसे में सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्यसभा की तीसरी सीट आखिर किस करवट बैठती है।
बाक़ी कांग्रेस ने इस लड़ाई को महिला सम्मान से जोड़ दिया है
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राज्यसभा चुनाव में तीसरा उम्मीदवार उतारने का निर्णय मुख्यमंत्री मोहन यादव की राजनीतिक आतुरता और उनके सलाहकारों की रणनीति को दर्शाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इसके पीछे मुख्य उद्देश्य यह संदेश देना है कि मोहन यादव प्रदेश की राजनीति में एक बड़े और निर्णायक नेता के रूप में स्थापित हो रहे हैं।
यदि वास्तव में तीसरा उम्मीदवार उतारना ही था, तो पार्टी में कई अन्य विकल्प भी मौजूद थे। लेकिन उम्मीदवार के रूप में महेश केवट का चयन कई राजनीतिक सवाल खड़े करता है। वे न केवल अपेक्षाकृत कम चर्चित चेहरा हैं, बल्कि मुख्यमंत्री आवास और केवट समाज से जुड़े होने के कारण उन्हें एक ऐसे उम्मीदवार के रूप में देखा जा रहा है, जो पूरी तरह नेतृत्व की रणनीति का हिस्सा हैं।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि यदि तीसरी सीट के समीकरण अपेक्षा के अनुरूप नहीं बैठे और किसी को राजनीतिक रूप से इसकी कीमत चुकानी पड़े, तो उसके लिए नेतृत्व को एक ऐसा चेहरा चाहिए था जो पूरी तरह उनका अपना माना जाए। इसी संदर्भ में कुछ लोग यह भी मानते हैं कि संभावित "बलि का बकरा" तय करने की पूरी प्रक्रिया में मुख्यमंत्री आवास से जुड़े केवट समुदाय के प्रभावशाली लोगों की भूमिका रही हो सकती है।
हालांकि इन दावों की पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन इस तरह की चर्चाएं राजनीतिक बहस का हिस्सा बनी हुई हैं।
राजनीति में हर कदम के पीछे कई परतें होती हैं और इस निर्णय की वास्तविक मंशा क्या है, यह तो समय ही बताएगा। फिलहाल कांग्रेस अपेक्षाकृत एकजुट दिखाई दे रही है। ऐसे में सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्यसभा की तीसरी सीट आखिर किस करवट बैठती है।
बाक़ी कांग्रेस ने इस लड़ाई को महिला सम्मान से जोड़ दिया है
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राज्यसभा चुनाव में तीसरा उम्मीदवार उतारने का निर्णय मुख्यमंत्री मोहन यादव की राजनीतिक आतुरता और उनके सलाहकारों की रणनीति को दर्शाता है। ऐसा प्रतीत होता है कि इसके पीछे मुख्य उद्देश्य यह संदेश देना है कि मोहन यादव प्रदेश की राजनीति में एक बड़े और निर्णायक नेता के रूप में स्थापित हो रहे हैं।
यदि वास्तव में तीसरा उम्मीदवार उतारना ही था, तो पार्टी में कई अन्य विकल्प भी मौजूद थे। लेकिन उम्मीदवार के रूप में महेश केवट का चयन कई राजनीतिक सवाल खड़े करता है। वे न केवल अपेक्षाकृत कम चर्चित चेहरा हैं, बल्कि मुख्यमंत्री आवास और केवट समाज से जुड़े होने के कारण उन्हें एक ऐसे उम्मीदवार के रूप में देखा जा रहा है, जो पूरी तरह नेतृत्व की रणनीति का हिस्सा हैं।
राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि यदि तीसरी सीट के समीकरण अपेक्षा के अनुरूप नहीं बैठे और किसी को राजनीतिक रूप से इसकी कीमत चुकानी पड़े, तो उसके लिए नेतृत्व को एक ऐसा चेहरा चाहिए था जो पूरी तरह उनका अपना माना जाए। इसी संदर्भ में कुछ लोग यह भी मानते हैं कि संभावित "बलि का बकरा" तय करने की पूरी प्रक्रिया में मुख्यमंत्री आवास से जुड़े केवट समुदाय के प्रभावशाली लोगों की भूमिका रही हो सकती है।
हालांकि इन दावों की पुष्टि होना अभी बाकी है, लेकिन इस तरह की चर्चाएं राजनीतिक बहस का हिस्सा बनी हुई हैं।
राजनीति में हर कदम के पीछे कई परतें होती हैं और इस निर्णय की वास्तविक मंशा क्या है, यह तो समय ही बताएगा। फिलहाल कांग्रेस अपेक्षाकृत एकजुट दिखाई दे रही है। ऐसे में सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि राज्यसभा की तीसरी सीट आखिर किस करवट बैठती है।
बाक़ी कांग्रेस ने इस लड़ाई को महिला सम्मान से जोड़ दिया है
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