सांसें लेना भी दूभर कर दिया है इन नफरती भेड़ियों ने। आए दिन कभी हमारे नबी की शान में गुस्ताखी, कभी कुरान और अल्लाह पर कीचड़, तो कभी हमारी मां-बहनों के बुर्के पर फब्तियां कसी जाती हैं। टोपी और दाढ़ी देखकर नफरत की नजरें गड़ाई जाती हैं, हमारी पहचान पर चोट की जाती है और 'लैंड जिहाद' का झूठा और बेबुनियाद शोर मचाकर हमें हर तरफ से घेरा जाता है। अजान की आवाज़ से इनके कान सुन्न पड़ते हैं और मस्जिदों को तोड़ने के लिए बुलडोजर तैयार खड़े रहते हैं।
क्या इस मुल्क में मुसलमान होना गुनाह हो गया है?
हर तरफ आर्थिक और सामाजिक रूप से घोटने की साजिश है कभी हमारी रोजी-रोटी छीनने के लिए 'थूक जिहाद' जैसे गंदे और झूठे इल्जाम लगाकर हमारे छोटे दुकानदारों और ठेल वाले भाइयों का बायकॉट कराया जाता है, कभी हमारी शादियों को 'लव जिहाद' बताकर बजरंग दल और सेना के नाम पर गुंडे तंग करते हैं, तो कभी हमारी तालीम और मदरसों को शक की नजर से देखकर उन्हें निशाना बनाया जाता है।
कभी अपमानजनक शब्दों जैसे 'कठमुल्ला' कहकर संबोधित किया जाता है, कभी 'मुगल के डर से धर्म बदल लिया' और 'हलाल की पैदाइश' कहकर गंदी गालियां दी जाती हैं, कभी सड़क पर रोककर 'बाबर की औलाद' कहकर ताने मारे जाते हैं और प्रताड़ित किया जाता है, कभी जबरन 'जय श्री राम' के नारे लगवाए जाते हैं, कभी गाय के नाम पर बेकसूरों को पीट-पीटकर मार डाला जाता है, तो कभी गानों और मुहर्रम-जुलूसों पर रोड़ेबाजी कराके उलटे हमारे ही लोगों पर झूठी एफआईआर लादकर जेलों में सड़ा दिया जाता है।
पाकिस्तान का नाम लेकर हर मुसलमान को गद्दार साबित करने की साजिशें खुलेआम चल रही हैं यहाँ तक कि हमें 'घुसपैठिए' और 'बंगाली' बताकर नेता लोग अपनी राजनीतिक रोटियां सेकते हैं और वोट बटोरने का गंदा खेल खेलते हैं यह सीधा हम पर हमला होता है।
आज हालात यह हो चुके हैं कि मोहल्ले में अगर किसी पड़ोसी से मामूली सा झगड़ा भी हो जाए, तो दिल में यह खौफ बैठ जाता है कि कहीं ये भीड़ जुटाकर हमारे पूरे परिवार को ही जान से ना मार दें। घर से बाहर जाने वाला शख्स शाम को सलामत लौटेगा या नहीं, इसकी कोई गारंटी नहीं बची है। आए दिन हमारी बस्तियों को उजाड़ा जाता है, हमारे रोजगार छीने जाते हैं, हमारे बच्चों के भविष्य को कुचला जाता है, और जब हम थाने या अदालत में इंसाफ की गुहार लगाने जाते हैं, तो वहां से भी दुत्कार कर भगा दिया जाता है।
सबसे बड़ा जहर यह है कि सरकार, तंत्र और प्रशासन इन कातिलों और नफरत फैलाने वालों की पीठ ठोक रहे हैं, उन्हें खुली छूट दे रखी है ताकि वे खुलकर हमारा मानसिक और शारीरिक शोषण कर सकें।
और उन राजनीतिक ठेकेदारों और नेताओं को भी हम अच्छी तरह समझ चुके हैं जो इन मुद्दों पर सिर्फ इसलिए थोड़ा-बहुत बोल देते हैं ताकि हम मुसलमानों का भरोसा जीतकर सिर्फ अपने वोट बैंक की रोटियां सेक सकें वक्त आने पर वे भी हमारे साथ खड़े नजर नहीं आते।
उन लोगों से भी आज सीने पर हाथ रखकर पूछना चाहता हूँ जो सिर्फ 'भाईचारे' की झूठी चादर ओढ़े घूमते हैं क्या उन्हें देश में यह सब नंगा नाच होता हुआ अच्छा लग रहा है, या फिर कहीं न कहीं वे अंदर ही अंदर यह सब देखकर खुश होते हैं? क्यों नहीं कोई समाज सुधारक आगे आकर इन दरिंदों से सवाल पूछता? क्या हमारी जिंदगी और हमारे बच्चों का वजूद कोई मायने नहीं रखता?
मैं अच्छी तरह जानता हूं कि इस पोस्ट को लिखने के बाद मुझ पर भी हमले होंगे, धमकियों का दौर शुरू होगा, डिजिटल लिंचिंग होगी और पुलिस-प्रशासन भी शायद मुझ पर ही फौरन शिकंजा कसने आ जाएगा।
लेकिन यह दर्द सिर्फ मेरा नहीं, इस देश के करोड़ों मुसलमानों का रिसता हुआ नासूर है। अगर आज अपनों पर हो रहे इस अंधेर और जुल्म के खिलाफ मेरी जुबान नहीं खुली, तो मेरा जिंदा रहना ही बेकार है। अब डर की हर हद पार हो चुकी है, चुप रहने का वक्त हमेशा के लिए खत्म हो चुका है अब बोलना भी होगा और इस जुल्म के खिलाफ सीना तानकर खड़ा भी होना होगा!
आज बिश्राम की खाहिश है न खाहिश है ज़ुबाँ की,
साँस की डोर से बंधी है अब तो हर साँस इफ़्तिख़ार की।
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-कातिल में है। 💔
जमीनी विवाद को लेकर एक पक्ष के लोगों पर घर में घुसकर मारपीट आरोप है कि विवाद के दौरान ट्रैक्टर लोगों पर चढ़ा दिया गया, जिसमें एक व्यक्ति की दर्दनाक मौत हो गई। और गर्भवती महिला के पेट के ऊपर चढ़ने से हालत गंभीर
घटना के बाद इलाके में तनाव का माहौल है!
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