*आचार्य जी,क्या कहूँ कुछ समझ नहीं आ रहा है।।*
*आप इतना प्यार करते हैं हमसे।।*
*आपसे जुड़ने के बाद हमें अंदाजा भी नहीं लगता कि हमारे भीतर क्या क्या बदल गया।*
*आज पीछे मुड़कर देखते हैं तो लगता है पूरी दुनिया ही बदल गई ।।*
*कसम से,कीचड़ में लोटे रहते हैं हम ।।और आप हमारा पकड़कर कब चुपचाप उठाकर आसमान तक लेकर चले जाते हैं पता ही नहीं चलता है।।*
*समझ में नहीं आ रहा है कि क्या बताऊं कि क्या मिला।*
*मुझसे गिनती नहीं होगी ।।*
क्योंकि मुझे लग रहा है कि मेरा दूसरा जन्म हुआ है।
आज 3 साल पुराना फोटो देख ली । तब समझ आया कि क्या से क्या हो गए हम ,पता ही नहीं चला ।
आप चुपचाप हमारे भीतर आकर हमें बदल कर रख दिए और हमें ख़बर ही नहीं । और अहंकार आपसे ही भागने के चक्कर में रहता है ।। आज अगर मैं यहाँ न होत�� तो न जाने कहाँ गर्त में होती ।।
मैं बता नहीं सकती आज वो बात भी याद आ रही है कि इंसान के जीवन में जब सच्चाई आती है न तो वो पूरा बदल जाता है।।उसकी आँखें,उसका चेहरा ,उसका शरीर,उसका मन सब कुछ बदल जाता है ।।
आज जब 3 साल पहले की तस्वीर देखी और उसी समय से आचार्य जी से जुड़ी फिर आज की तस्वीर देखी तो जमीन आसमान का ��ंतर है ,ये पता चला ।।
*अगर आपको जानना ही है न कि आपको क्या मिला आचार्य जी के साथ तो बस याद कर लिया करिए कि जब जुड़े थे तब क्या क्या लेकर चले थे और अब वो सब छूट रहा है कि नहीं ।।*
*आपके पैरों तले ज़मीन खिसक जाएगी ये जानकर कि जब आप अंदर से भी खुद को रोक ही रहें हैं उच्चतम की तरफ बढ़ने से ,*
_वहाँ आप लगातार सत्र भी देख रहें है न_
_और परीक्षा दे रहे हैं और अवलोकन जारी है_
_तब भी इतना इतना बदलाव हो सकता है तो सो���ो अगर नीयत ही हो जाए बदलने की तो आप क्या बन जाओगे ।।_
मैं (अहंकार)क्या ही धन्यवाद दे पाए आचार्य जी का ।।
ये तो बस इतना कर ले कि वो जो दे रहें हैं उसको चुपचाप वैसे का वैसे ले ले ।इतना भी कर दे तो आचार्य जी का मान होगा ।।बाकी मुँह से कुछ भी कहने की कोशिश करेगा तो बेकार ही है क्योंकि फिर से अहंकार बढ़ चढ़कर बोलेगा ।।
आ��ार्य जी,नहीं कहा जा रहा कुछ सिवाय इसके कि ये पूरी बात लिखते हुए सिर्फ आँखों से आंसू आ रहें हैं लगातार,और वो ये चल रहा है भीतर की मैं क्या थी और क्या हो गई ।।
और प्यार क्या होता है ये आप ही सीखा सकते हैं जो कि इतने सारे लोगों को इतना प्यार करते हैं कि उनको पता भी नहीं है कि आपके प्यार ने उनको पूरा बदल दिया ।।
अब ये लड़ाई नहीं रुकेगी ।। आप मुझे मुझसे बचाए हैं तो अब पीछे जाने की तो कोई गुंजाइश नहीं।।और आगे बढ़ने के लिए लगातार सच के साथ रहने के चुनाव जारी रहेगा ।।
सतत आत्मावलोकन न होता तो पता भी न लगता कि अहंकार कितनी चाल चल रहा है।।
❤️❤️आचार्य जी 🫂❤️
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Acharya Prashant's weekly column on The Pioneer, 10 October, '26
Non-Duality as the Core of Religiosity
"Dharma does not begin with belief in God, scripture or ritual. It begins with suffering. Pain and suffering must be distinguished here. Pain belongs to the organism; the body is injured, falls ill, ages, grows hungry and tired. Suffering in the religious sense belongs to the ego. It is the unease of a centre that experiences itself as incomplete and so keeps reaching outward. "
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बाणगंगा में सैकड़ों मरी हुई मछलियाँ पाई गईं।
भारत में नदियों के, विशेषकर प्रदूषण का एक बहुत बड़ा जो कारण है, वह धार्मिक है।
पूजने से पहले पूछना पड़ता है कि बात क्या है?
हम भीतर से बिल्कुल मैले हो चुके हैं, इसीलिए बाहर कुछ भी मैला करने में हमें कोई संकोच नहीं होता। मैला देखकर हमें कोई दुख नहीं होता।