@nishikant_dubey पूरे देश से बीजेपी के कार्यकर्ताओं और नेताओं की पश्चिम बंगाल में ड्यूटी लगाई गई है तो यह वही पैदल यात्रा में शामिल आपके अपने ही कार्यकर्ता गण हैं
जनता समझी थी मंत्री समाधान बताएँगे,
मगर निकला ये कि गर्मी में नीति नहीं, प्याज़ काम आएगी।
देश में कहीं बिजली नहीं, कहीं बिल भारी, कहीं एसी सपना है…
और सत्ता का संदेश आया है —
“ठंडक चाहिए तो प्याज़ साथ रखिए।”
वाह री हुकूमत,
जनता रोजगार माँगे तो जुमला,
महंगाई पूछे तो भाषण,
गर्मी बढ़े तो प्याज़।
अब बस इंतज़ार है उस दिन का,
जब कह दिया जाए —
बारिश में छाता नहीं, टमाटर लेकर निकलिए।
जनता समझी थी मंत्री समाधान बताएँगे,
मगर निकला ये कि गर्मी में नीति नहीं, प्याज़ काम आएगी।
देश में कहीं बिजली नहीं, कहीं बिल भारी, कहीं एसी सपना है…
और सत्ता का संदेश आया है —
“ठंडक चाहिए तो प्याज़ साथ रखिए।”
वाह री हुकूमत,
जनता रोजगार माँगे तो जुमला,
महंगाई पूछे तो भाषण,
गर्मी बढ़े तो प्याज़।
अब बस इंतज़ार है उस दिन का,
जब कह दिया जाए —
बारिश में छाता नहीं, टमाटर लेकर निकलिए।
जनता समझी थी मंत्री समाधान बताएँगे,
मगर निकला ये कि गर्मी में नीति नहीं, प्याज़ काम आएगी।
देश में कहीं बिजली नहीं, कहीं बिल भारी, कहीं एसी सपना है…
और सत्ता का संदेश आया है —
“ठंडक चाहिए तो प्याज़ साथ रखिए।”
वाह री हुकूमत,
जनता रोजगार माँगे तो जुमला,
महंगाई पूछे तो भाषण,
गर्मी बढ़े तो प्याज़।
अब बस इंतज़ार है उस दिन का,
जब कह दिया जाए —
बारिश में छाता नहीं, टमाटर लेकर निकलिए।
जनता समझी थी मंत्री समाधान बताएँगे,
मगर निकला ये कि गर्मी में नीति नहीं, प्याज़ काम आएगी।
देश में कहीं बिजली नहीं, कहीं बिल भारी, कहीं एसी सपना है…
और सत्ता का संदेश आया है —
“ठंडक चाहिए तो प्याज़ साथ रखिए।”
वाह री हुकूमत,
जनता रोजगार माँगे तो जुमला,
महंगाई पूछे तो भाषण,
गर्मी बढ़े तो प्याज़।
अब बस इंतज़ार है उस दिन का,
जब कह दिया जाए —
बारिश में छाता नहीं, टमाटर लेकर निकलिए।
जनता समझी थी मंत्री समाधान बताएँगे,
मगर निकला ये कि गर्मी में नीति नहीं, प्याज़ काम आएगी।
देश में कहीं बिजली नहीं, कहीं बिल भारी, कहीं एसी सपना है…
और सत्ता का संदेश आया है
“ठंडक चाहिए तो प्याज़ साथ रखिए।”
वाह री हुकूमत,
जनता रोजगार माँगे तो जुमला,
महंगाई पूछे तो भाषण,
गर्मी बढ़े तो प्याज़।
अब बस इंतज़ार है उस दिन का,
जब कह दिया जाए
बारिश में छाता नहीं, टमाटर लेकर निकलिए
जनता समझी थी मंत्री समाधान बताएँगे,
मगर निकला ये कि गर्मी में नीति नहीं, प्याज़ काम आएगी।
देश में कहीं बिजली नहीं, कहीं बिल भारी, कहीं एसी सपना है…
और सत्ता का संदेश आया है —
“ठंडक चाहिए तो प्याज़ साथ रखिए।”
वाह री हुकूमत,
जनता रोजगार माँगे तो जुमला,
महंगाई पूछे तो भाषण,
गर्मी बढ़े तो प्याज़।
अब बस इंतज़ार है उस दिन का,
जब कह दिया जाए —
बारिश में छाता नहीं, टमाटर लेकर निकलिए।
मंत्री जी, जनता महंगाई से जल रही है और सरकार इलाज में प्याज़ पकड़ा रही है।
एसी आम आदमी खरीद नहीं पा रहा, प्याज़ आम आदमी खा नहीं पा रहा…
और हुकूमत कह रही है—लो, इसे जेब में रख लो।
अब अगला बयान शायद ये हो—
रोज़गार नहीं है तो सपने रख लो,
पेट्रोल महंगा है तो साइकिल की फोटो रख लो,
और गर्मी लगे तो प्याज़ सूंघ लो।
देश चल रहा है या स्टैंड-अप कॉमेडी शो?
@Saurabh_Unmute@ECISVEEP गज़ब हाल बना दिया है,एक प्रत्याशी के परिवार को खुली धमकीं दी जा रही है यह अधिकारी चुनाव कराने गए हैं यह पार्टी विशेष के लिए प्रचार प्रसार करने गए हैं, फिलहाल आप सो रहे थे , हैं और 3 तक सोते ही रहेंगे
रिप्रेजेंटेशन ऑफ द पीपुल एक्ट, 1951 (लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम) की धारा 123(3) के तहत किसी उम्मीदवार या उसके समर्थक द्वारा “धर्म, मातृभाषा, जाति या समुदाय” के नाम पर वोट मांगना “भ्रष्ट आचरण” माना गया है।
क्या केंचुआ इस कानून को मानता है या मनु स्मृति के अनुसार संचालित होता है।
@ECISVEEP
गर्मी आते ही शहरों की सच्चाई धुएँ बनकर आसमान पर लिखी जाने लगती है। कहीं झुग्गियाँ जलती हैं, कहीं पूरी बस्तियाँ राख हो जाती हैं। मगर सबसे बड़ी विडम्बना यह नहीं कि आग लगी—सबसे बड़ी विडम्बना यह है कि सत्ता हर साल वही तमाशा दोहराती है और जनता हर बार वही दर्द सहती है।
सत्ता के दफ्तरों में योजनाओं के ढेर हैं, भाषणों में विकास की आँधी है, विज्ञापनों में चमकता भारत है—लेकिन जमीन पर गरीब की झोपड़ी अब भी एक चिंगारी से हार जाती है। जिन शहरों को विश्वस्तरीय बनाने के दावे किए जाते हैं, वहाँ गरीब के घर तक सुरक्षित बिजली, पक्की छत, चौड़ी गलियाँ और आग से बचाव की व्यवस्था तक नहीं पहुँचती।
जब बस्तियाँ जलती हैं, तब अचानक अफसर जागते हैं। फाइलें खुलती हैं, जांच बैठती है, राहत की घोषणाएँ होती हैं। कुछ दिन बाद सब शांत। फिर अगली गर्मी का इंतज़ार। मानो व्यवस्था ने गरीब की तबाही को मौसमी कार्यक्रम बना दिया हो।
सत्ता flyover गिनती है, metro के फीते काटती है, skyscraper दिखाती है, लेकिन उन लाखों लोगों को भूल जाती है जो उसी शहर की रसोई चलाते हैं, निर्माण करते हैं, सफाई करते हैं, मजदूरी करते हैं। शहर उनकी मेहनत पर खड़ा है, पर उनकी जिंदगी की कीमत शून्य है।
सबसे शर्मनाक बात यह है कि हर हादसे के बाद जिम्मेदारी धुएँ की तरह उड़ जाती है। न कोई जवाबदेही तय होती है, न स्थायी समाधान निकलता है। बस मुआवज़े के कुछ टुकड़े फेंक दिए जाते हैं, जैसे इंसानी जिंदगी की कीमत तय कर दी गई हो।
विडम्बना यही है कि सत्ता को गरीब की झोपड़ी सिर्फ तब दिखती है जब वह जल रही होती है। बाकी दिनों में वह नक्शों, योजनाओं और भाषणों से गायब रहती है। अगर यही शासन है, तो फिर राख पर खड़ी चमक सिर्फ दिखावा है, विकास नहीं।