निशु, घबराने की ज़रूरत नहीं है। मैं तुम्हारे साथ हूँ।
साफ है कि तुम्हें इसलिए निशाना बनाया गया क्योंकि तुम अपने समुदाय और छात्रों के हक़ की आवाज़ उठाती हो।
अमित शाह की दिल्ली पुलिस एक तरफ़ छात्रों के साथ अमानवीय बर्बरता करती है। दूसरी तरफ़ एक दलित लड़की के पिता का सिर फोड़ने वाला अपराधी खुलेआम घूम रहा है।
@narendramodi जी, @AmitShah जी - ऐसे अपराधी को आपका और ��पकी पार्टी के लोगों का संरक्षण क्यों है? अब भी कार्रवाई होगी या किसी को बचाते रहेंगे?
निशु, तुम्हारी लड़ाई अकेली नहीं है। हम तब तक नहीं रुकेंगे जब तक न्याय नहीं मिल जाता।
जय भीम। जय संविधान।
“Yes, my name is Khan. I have Khan in my name. I am Mohammed, I am a Muslim… and because of this, a Delhi Police officer beat me with sticks and slapped me…”
I wonder how the world will perceive this statement about the police in India's capital, Delhi!
कल जंतर-मंतर पर चल रहे आंदोलन का सुखद अंत हुआ. इस आंदोलन का एक चेहरा जो मुझे हमेशा याद रहेगा वो इरफ़ान का होगा. पहली बार 6 जून को उससे मिला था. उसी दिन जंतर-मंतर पर आंदोलन की शुरुआत हुई थी. उसके बाद मैं इरफान के घर गया. परिवार से मिला. गरीबी झेलते हुए भी इरफान हमेशा मुस्कुराता रहता है. अपनी नहीं अपने लोगों की बात करता है. अपने समाज की. समाज की कुरीतियों को तोड़ता है. इरफान का नंबर मांगने और उसकी मदद करने के लिए अब तमाम लोग संपर्क कर रहे. उन सभी का बहुत शुक्रिया. उम्मीद है इरफान को अपने सपनों का आसमान मिले.
मेरे संस्थान @TheLallantop का बहुत शुक्रिया जो हमे इन कहानियों को कहने की हिम्म�� देता है.
#irfan #lallantop
दिल्ली की झुग्गी झोपड़ी में रहने वाले इरफ़ान की आवाज़ में दर्द है सुनिए इस कला को जो दिल से निकलती है।
इतना सच्चा इतना असरदार बोलने वाला शायद हमने आज तक नहीं सुना होगा।
आप भी सुनिए और सच बताइए किसी नेता की आवाज़ में इतनी सच्चाई सुनी है आपने?
जिसको सुन���े सुनते अंदर आत्मा तक रोने लगे!
शायद नहीं, इतनी तो नहीं।
मगर इरफ़ान की आवाज़ में दर्द है पीड़ा है, साथ ही संविधान की प्रस्तावना पर क्या गज़ब मोनोलॉग है।
Thank you @RajatpandeyJF , @TheLallantop for this masterpiece ❤️
सभी पूछ रहे हैं ये कौन हैं?
ये मोहम्मद इरफ़ान हैं। साफ़गोई के साथ अपनी बात रख रहे हैं। संविधान की प्रस्तावना ऐसे सुना रहे हैं जैसे किसी गीत की तरह याद कर रखा हो। लोकतंत्र में व्यक्ति ही गरिमा की अहमियत बता रहे हैं। सोनम वांगचुक के साथ बदसलूकी पर ख़फ़ा हैं
🚨 बिहार: सोशल मीडिया पर इस्लाम की सबसे पवित्र जगह का कथित अपमान
📍 अख्तियारपुर मंझौली, पटना (बिहार)
आरोप है कि अख्तियारपुर मंझौली निवासी रोहित कुमार इंस्टाग्राम पर AI-जनरेटेड वीडियो बनाकर काबा शरीफ़ जहाँ दुनिया भर से करोड़ों मुसलमान हज और उमरा के लिए जाते हैं को लेकर कथित तौर पर बेहद आपत्तिजनक और भड़काऊ सामग्री फैला रहा है।
वीडियो में धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाले दावे किए जा रहे हैं, जिससे सांप्रदायिक माहौल बिगड़ने की आशंका है @bihar_police@PatnaPolice24x7 से मांग है कि मामले का तत्काल संज्ञान लेकर निष्पक्ष जांच की जाए। यदि आरोप सही पाए जाते हैं, तो संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कानून के तहत सख्त कार्रवाई की जाए।
अभिव्यक्ति की आज़ादी के नाम पर किसी भी धर्म की सबसे पवित्र आस्था का अपमान और नफ़रत फैलाने की कोशिश स्वीकार नहीं की जानी चाहिए।
- पिछले साल जम्मू के एक कॉलेज में MBBS की 50 सीटों में 42 सीटों पर मुस्लिम छात्रों का सिलेक्शन हुआ.
- हिंदूवादी संगठनों ने इसका विरोध किया, अन्तत: उस कॉलेज की मान्यता रद्द हो गई. हिंदूवादी संगठनों ने जश्न मनाया.
- नीट का पेपर लीक होने से लगभग 20 लाख हिंदू ���ात्र प्रभावित हुए है.
- क्या किसी हिंदूवादी संगठन ने उन छात्रों के लिए आवाज़ उठाई?
युवा आईपीएस अधिकारी प्रणव जैन ने जो लिखा उसे सभी को पढ़ना समझना और सोचना चाहिए! अंग्रेजी में लिखा है उन्होंने! इसे हिंदी में भी पढ़�� जाना चाहिए! उनके लेख का हिंदी अनुवाद है! उनकी अनुमति के बिना और माफ़ी के साथ कुछ बाते जोड़ी है! पढ़ें और और फिर अतीत से वर्तमान का एक मुकम्मल सफर करें,ढेर सारे ख्यालात के साथ! यकियें दिलाता हूँ! कुछ मिनट आपका जरूर इसे पढ़ने में जाएगा! लेकिन क्या दे जाएगा इसे आप खुद महसूस करेंगे! और आज के कटु सोशल मीडिया काल में इसे पढ़ना और भी जरुरी है!
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कुछ हफ्ते पहले, एक दोस्त ने मुझे रात 01:40 बजे फोन किया। मैसेज ��हीं किया। फोन किया।
एक पल के लिए मैं बुरी खबर के लिए तैयार हो गया। इस वक़्त कॉल? भूल चूका था कि एक वक़्त कैसे जब रात के दो बजे भी दरवाजे से जोर से आवाज आती थी और खोलने पर सवाल होता था-सुट्टा मारना है क्या! और पुरे नींद में साम��े वाले मैदान में चला जाता था! और फिर वहां उन सुट्टों में जीवन सफर के तरंगों को भी महसूस करता था!
लेकिन वह कल था!
आज जीवन ने हम फॉर्मेट कर दिया है कि देर रात के फोन सिर्फ़ तब आते हैं जब कोई मुसीबत हो। कोई अस्पताल में। कोई फँसा हुआ। कोई मर गया।
खैर बात कल की!
सामान्य कॉल थी! लंदन से एक दोस्त का फ़ोन था! वह वहां काम ख़त्म करके लंदन की लगभग खाली सड़कों पर घर जा रही थी, उसे एक गाना सुनाई दिया जिस पर हम ��ोनों कभी झूमते थे, और अचानक उसे मेरी याद आ गई। तो उसने फोन लगा दिया दिया। हमने फिर आधे घंटे तक ऐसी बातें कीं जो आज के सन्दर्भ में बेसिर वाली कह सकते हैं! कुछ भी तो नहीं था उस बात में! काम की! क्या बातें थी?
काम की थकान। बॉलीवुड की गॉसिप। वो अपनी शादीशुदा ज़िंद���ी को कितना एंजॉय कर रही है। एक प्रोफेसर जिसे हम कभी नफ़रत करते थे उनका याद आना!
बताओ यह भी कोई बात थी? यही माइंडफॉर्मेट कि बात थी!
कॉल ख़त्म होने के बाद मैं देर तक बैठा रहा! अजीब सी कसक के साथ कि मैंने कुछ देर के लिए अपने कल से अरसे बाद मिला! यह "मी कालिंग मी" वाली से कुछ हालात थे! पल भर के जगजीत सिंह के उस गाने के साथ बहने लगा-वो कागज की बस्ती वह बारिश का पानी"!
रात के सन्नाटे में सब कुछ फ़्लैश बैक स�� चलने लगा-
कल की तो बात थी!
जब दोस्ती के लिए बड़ी प्लानिंग नहीं चाहिए होती थी। हम घंटों बात करते थे बिना कैलेंडर देखे। होस्टल की छतों, चाय की टपरियों और बिना वजह की लंबी सैरों पर पूरी शामें निकल जाती थीं। तब ( जिसे हम जवानी के दिन कहते है) में दोस्ती के पास फालतू वक्त होता था – खुला, उद्देश्य यह की कोई उद्देशय नहीं का, और शानदार तरीके से बर्बाद करने वाला समय!
झटके में मैं ओटीटी सीरीज की तरग फ़्लैशबैक से आज वर्तमान में आ गया!
आज जब आपस में बिना किसी अजेंडे की मिलने की बात हो तो एक फॉर्मेट है उसे टालने का- "जल्दी मिलते हैं" और "सॉरी यार, ज़िंदगी बहुत बिज़ी है"!
इन दो बहानों के बिच आज की एडल्ट दोस्ती हमारे आधुनिक जीवन में सबसे भावनात्मक और सबसे कम चर्चा वाली जिंदगी की कमी और नुकसान बन गई�� हमने कल की दोस्ती की कही किसी जेहन के कोने वाले कब्र में दफ़न कर दिया! और वह कमी चिढ में बदल गयी!
यही कारण है की अब जब रॉकफोर्ड का गान " यारो दोस्ती बड़ी ही हसीं हैं" कहीं दूर भी सुनाई देता हो तो हम जल्दी दूर से भागने की कोश्शि करते हैं! एक गिल्ट उभरता हाउ और हम उसे तुरंत दबा देते हैं! या दोस्ती का एक ब्रेक अप ही है!
देखिये न रोमांटिक रिश्तों के ब्रेकअप का एक सिस्टम है! वह आपके साथ चलता है! अलग अलग रूप में! उसके लिए फिल्में हैं। गाने हैं। कविता, शरई है! रिवाज़, हमदर्दी, सलाह के कॉलम गए! यह आपको इस ब्रेक अप को बनाए रखने में मदद करता है! अगर आप नहीं भी चाह रहे हैं तब भी!
लेकिन दोस्ती के छूटने का ग़म अदृश्य रहता है। न यह कहीं अस्तितत्वा में है! कोई नहीं यह बताता है उस इंसान से धीरे-धीरे दूर हो जाना कितना तकलीफ़देह होता है जो कभी आपकी ज़िंदगी एक अटूट हिस्सा था जो आपको बारीकी से जानता था। वह आपकी ख़ामोशी की भाषा पर लॉन्ग एस्से लिख सकता तह! जो तुम्हारे "ठीक है" कहने के अंदाज़ से तुम्हारा मूड पहचान लेता था। जो तुम्हारे क्रश और छोटी-छोटी असुरक्षाओं के बारे में सब कुछ जानता था। आप गाली देकर भी उससे काम करवा सकते थे! कोई अपेक्षा नहीं! बस फ्रीक्वेंसी मैच है! इतना काफी था!
यहाँ यह और भी त्रासदी है की हर रिश्ते के टूटने या पीछे छूटने के पीछे वजह होती है!
यहाँ ऐसा कुछ तो नहीं था! बस छूट गया! छूट गया! बिना अलविदा कहे! टच में रहेंगे कहकर हम उस दोस्ती के स्पर्श को भूल गए! बस भूल गए !
रोमांटिस्म की तरह दोस्ती ड्रामाटिक इफ़ेक्ट के साथ ख़त्म नहीं होतीं। कोई आखिरी बातचीत नहीं। अलग दूर जाने की कोई साफ़ वजह नहीं। कोई सिनेमाई दी एन्ड नहीं। ज़्यादातर द���स्तियाँ अनदेखे जमा होते बोझ में घुल जाती हैं, अलमारी की उस किताब की तरह रख दी जाती है जिसके बारे में हम सोचते हैं की खाली वक़्त में पढ़ेंगे और बाद में पढ़ना तो दूर उस किताब तक को भूल जाते हैं!
टाली दी गली कॉल बैक, थका देने वाली नौकरियाँ, ओढ़ा हुआ बिजिपन, जगह की दूरी, इमोशनल फटीग, जीवन की अलग प्राथमिकताएँ, और अलग रफ्तार से अलग अलग पटरी पर चलती ज़िंदगियाँ।
और फिर ��क दिन अचानक अहसास होता है कि आज वह जो इंसान कभी हमारे हल कहे-अनकहे अल्फाज्ज को मुझसे बेहतर डिकोड कर सकता था आज वह हामरे में सिर्फ़ उतना ही जानता है हमारे इंस्टाग्राम स्टोरी पर बाकी जीवन में कभी न मिले ये "दोस्त" भी जानते हैं!
क्या इस पीड़ा को किसी ने महसूस किया है?
हम इस तरह जीने के लिए तो नहीं बने थे! स्कूल-कॉलेज वाली कल की दोस्तियाँ इसलिए चलती थीं क्योंकि संस्थान एक साथ हमें डोरी मेइब बाँध दे��ा था! बार-बार मिलना दोस्ती को दिन दर दिन रिन्यूअल करते रहते था!
समाजशास्त्री कहते आए हैं कि मानवीय रिश्ते रिश्तों की तीव्रता या अतरंगता से बलिक नियमितता से टिकते हैं। एक ही लोगों से बार-बार मिलना धीरे-धीरे नज़दीकी बना देता है। जवानी की दोस्ती यह स्वाभाविक रूप से देती थी! एडल्ट जीवन इस चेन को पूरी तरह तोड़ देता है। खासकर शहरी जीवन में।
आज के युवा प्रोफेशनल ऐसे सिस्टम में जी रहे हैं ��ो कनेक्शन का जश्न मनाने का दिखावा करते हुए दोस्ती को चुपचाप जेहन के कब्र में दगन कर रहा है! एडल्ट जीवन में वीकेंड जश्न भी एक "ड्यूटी" की तरह हो जाता है जो सोशल वेलिडेशन के लिए करना ही होता है!
अगर वीकंड में अच्छी तस्वीर वाली कोई "इवेंट" न किया तो अलग फोमो!
इनके बीच शहर दूरियाँ बेरहमी से बढ़ा देते हैं। वीकेंड सामाजिक जगहों की बजाय रिकवरी का समय बन गए हैं। महत्वाकांक्षा हर किसी को अपनी ज़िंदगी क�� प्रोजेक्ट मैनेजर बना देती है।
।त्रासदी यह है कि ये अकेलापन अक्सर लगातार डिजिटल संपर्क के साथ रहता है। हम शायद पहली पीढ़ी हैं जिसके पास एक-दूसरे तक बिना रुके पहुँच है, और साथ ही हम भावनात्मक रूप से सबसे ज़्यादा दुर्गम भी हो गए हैं। हम एक-दूसरे के अस्तित्व की एंबिएंट जानकारी रखते हैं, पर एक-दूसरे की ज़िंदगी में सार्थक रूप से हिस्सा नहीं लेते। मैं जानता हूँ मेरे दोस्त क्या खाते हैं। कौन से कैफ��� जाते हैं। क���स बात की शिकायत करते हैं। मुझे पता चल जाता है कि उन्हें प्रमोशन मिला क्योंकि लिंक्डइन मुझे उनके पहले बता देता है। और फिर भी कभी-कभी फोन करने से पहले हिचकता हूँ क्योंकि मुझे उनकी ज़िंदगी का भावनात्मक मौसम अब पता नहीं रहता। बस उतना पता है जिनकी उनकी सोशल प्रोफइल हमारे सर्च में आई! यहाँ एक एल्गो का अलग इशू है!
खुद का सैनिटाइज़्ड वर्ज़न एडल्ट जीवन आत्म-नियंत्रण को इनाम देता है। हर कोई थका हुआ ह��। हर कोई खुद पर काम कर रहा है। हर कोई "बहुत कुछ झेल रहा है"।कुछ समय पहले, मैं अपने एक सबसे करीबी दोस्त से लगभग दो साल बाद मिला। हम दोनों ऐसे बदल गए थे दो अनजाने की तरह!
वो भाषा में ज़्यादा एफिशिएंट हो गया था, जैसे कॉरपोरेट जीवन ने उसके ख़्यालों को बुलेट पॉइंट में ढाल दिया हो। मैं एक अजीब तरह से हमेशा थका हुआ हो गया था, जहाँ थकान इतनी स्थायी लगती है कि शिकायत करने का मन भी नहीं करता। पहले बीस मिनट बातचीत अजीब तरह से एडल्ट अपडेट्�� पर अटकी रही। नौकरी। माँ-बाप। सेहत। आपसी जान-पहचान वालों की डरावनी रफ्तार से सगाई। और फिर अचानक वो हँसा – पूरी तरह, ज़ोर से, सिर पीछे फेंककर बिलकुल वैसे ही जैसे पहले हँसता था – और एक पल के लिए समय सिमट गया। वो फिर सामने था।
वो भाई जो मेरे साथ कभी ऑटो का किराया नहीं बाँटता था। वो भाई जो लेक्चर में मेरे बगल बैठकर नोटबुक के किनारे बकवास स्केच बनाता था। वो भाई जो जानता था कि मैं कौन हूँ, इससे पहले कि एडल्ट जीवन हम सबको थोड़ा पॉलिश किया हुआ रिज्यूमे बना दे।आधुनिक जीवन की भावनात्मक अर्थव्यवस्था आधुनिक वयस्क जीवन लगभग हर क्षेत्र में ऑप्टिमाइज़ेशन को बढ़ावा देता है। प्रोडक्टिव बनो। एफिशिएंट बनो। खुद को हील करो। अपने शौक को मोनेटाइज़ करो। अपनी पहचान क्यूरेट करो।
कहीं न कहीं दोस्तियाँ भी मैनेजमेंट की भाषा में ढलने लगीं। अब हम भावनात्मक बैंडविड्थ की बात ऐसे करते हैं जैसे डेटा प्लान हो। कभ���-कभी स्नेह भी अदृश्य कॉस्ट-बेनिफिट एनालिस से तौला जाता है: कौन पहले मैसेज करता है? कौन ज़्यादा मेहनत करता है? कौन भावनात्मक रूप से उपलब्ध है? कौन ऊर्जा चूसता है?लेकिन दोस्ती हमेशा एक तरह की गैर-तार्किक उदारता पर निर्भर रही है। साथ मिलकर समय को शानदार तरीके से बर्बाद करने की इच्छा। वही चिंता पाँचवीं बार सुनने की हिम्मत। चुप्पी में बैठना। बिना किसी एजेंडे के उपलब्ध रहना।और शायद इसीलिए अब यह दोस्ती अब ज़्यादा कट्टर लगत�� है। ये उस लेन-देन वाली सोच का विरोध करती है जिसे आधुनिक जीवन हर जगह इनाम देता है। क्योंकि एक सच्चा दोस्त कुछ बेहद दुर्लभ देता है: बिना ऑप्टिमाइज़ की गई उपस्थिति। परिवार खून से बंधा होता है। शादी संस्था से। काम के रिश्ते उपयोगिता से। दोस्ती सिर्फ़ आपसी चुनाव से ज़िंदा रहती है। किसी को रुकना नहीं होता। फिर भी कुछ लोग रुकते हैं।नामुमकिन शेड्यूल और भावनात्मक थकान के बावजूद, कुछ दोस्त लौटते रहते हैं। वो मीटिंग के बीच मीम भेजते हैं। तुम्हारी अहम तारीखे��� याद रखते हैं। बिना वजह फोन करते हैं। सुविधा के लिए नहीं। बल्कि इसलिए कि थकान के नीचे कहीं न कहीं, वो आज भी तुम्हारी अंदरूनी ज़िंदगी को अहम मानते हैं। कभी-कभी ये बस एक ज़िद होती है – दुनिया के हर चीज़ को प्राथमिकता देने के दबाव के बावजूद, लोगों के पास बार-बार लौटने की ज़िद।
यू ट्यूब पर इस गाने को 100M से ज्यादा लोगों ने सुना था, उसके बाद सरकार ने इस गाने पर बैन लगा दिया और यू ट्यूब से डिलीट करवा दिया। अब पुनः इस गाने को अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचाने का प्रयास है।
I’ve always been a huge fan of Iranian cinema but this is something else !
Never imagined that in the middle of a war, Iran would be producing high-quality, pro-level short films, directly taking on Donald Trump and Israel.
पवन खेड़ा को सुनिए! उनकी आवाज़ एक सच्चे भारतीय की आवाज़ है, उनकी आवाज़ एक सच्चे हिंदू की आवाज़ है। उनकी आवाज़ एक सभ्य इंसान और हिंदुस्तानी नागरिक की आवाज़ है। हाल मे घटित घटनाओ पर जितना गुस्सा @Pawankhera को है उतना ही गुस्सा हर सच्चे भारतीय को होना चाहिए।
ये शर्मनाक वीडियो आया है राजस्थान से
जो टोंक-सवाईमाधोपुर से बीजेपी के पूर्व सांसद सुखबीर सिंह जौनपुरिया ग़रीबों में कंबल बांट रहे थे। लेकिन जैसे ही कुछ मुस्लिम महिलाओं को देखा उनको वहाँ से हट जाने को कहा। यहाँ तक कि दिए गए कंबल वापस ले लिए गए।
उनके चलते चलते कुछ लोगों ने सवाल जवाब भी करने की कोशिश की लेकिन वे ताव दिखाते हुए निकल गए।