मनुस्मृति। जब मुद्दाविहीन हो जाओ तो मनुस्मृति को गाली दे दो। जब स्वयं को आधुनिक व बुद्धिजीवी दिखाना हो तो मनुस्मृति को गाली दे दो। जब वोक दिखना हो तो मनुस्मृति को गाली दे दो।
मनुस्मृति कहती है कि कन्या का अविवाहित रह जाना बेहतर है, लेकिन उसका विवाह किसी गुणहीन पुरुष से नहीं किया जाना चाहिए। नारी-सशक्तिकरण के लिए इससे बेहतर समझ रखते हैं आप? मनुस्मृति कहती है कि शारीरिक परिपक्वता के बाद निर्धारित अवधि तक प्रतीक्षा करने के बाद ही लड़की का विवाह हो, उस समय के हिसाब से 17 वर्ष तक। बाल-विवाह के विरुद्ध इससे बेहतर कोई प्रमाण है आपके पास?
मनुस्मृति कहती है - विन्देत सदृशं पतिम्। कन्या अपने योग्य पति का स्वयं वरण करे। यदि अभिभावक विवाह नहीं कराते और कन्या स्वयं पति चुन ले, तो न कन्या किसी पाप या अपराध की भागी होती है, और न वह पुरुष जिसे वह चुनती है। स्वेच्छा और कंसेंट को इससे बेहतर परिभाषित कर सकते हैं आप?
पुत्रेण दुहिता समा। पुत्री पुत्र के समान है। स्त्री-पुरुष समानता के लिए मनुस्मृति से बेहतर कुछ ला सकते हैं आप? क़ुरान या बाइबिल लेकर आइए, देख लीजिए। स्वयं डॉ आंबेडकर ने बुढ़ापे में मनुस्मृति का लोहा माना है, उत्तराधिकार वाले विषय को लेकर। मनुस्मृति माता की निजी संपत्ति को अलग से मान्यता देती है और उसे अविवाहित पुत्री का भाग बताती है। परिवार में महिलाओं को सशक्त रखने के लिए इससे बेहतर कोई व्यवस्था अबतक लेकर आए आप?
बल, दबाव या जबरन नियंत्रण से स्त्रियों को सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। विश्वसनीय पुरुष भी उन्हें क़ैद नहीं रख सकते। आत्मानमात्मना यास्तु रक्षेयुस्ताः सुरक्षिताः। मतलब, जो स्त्री अपने विवेक से अपनी रक्षा करती हैं, वही सुरक्षित है। बाहरी निगरानी से ऊपर विवेक को रखा गया है। स्त्रियों को विवेकी माना गया है। इससे अधिक सम्मान देते हैं आप? आपने तो अपनी बहन तक को चुनावी राजनीति में खुद के 2 दशक बाद उतारा।
धन के देखभाल एवं प्रबंधन के लिए मनुस्मृति ने स्त्रियों पर विश्वास जताया है। राजा को मनुस्मृति आदेश देती है कि ऐसी स्त्रियों की रक्षा करे जिनके पति बाहर हैं, जिनका परिवार प्रभावशाली नहीं है, जो बीमार हैं या जिनके पति या पुत्र नहीं हैं। अगर कोई संबंधी भी किसी स्त्री की संपत्ति हड़पता है तो उसे चोर मानकर दंड देने को कहा है। इससे अधिक परवाह है आपको स्त्रियों की?
पति को आदेश है कि बाहर जाने से पहले पत्नी की आजीविका की व्यवस्था करके जाए। अब ये मत कहिएगा कि पत्नी ख़ुद नहीं कर सकती क्या। जीवेच्छिल्पैरगर्हितैः। आगे ये भी लिखा है कि पति न करे तो स्त्री ख़ुद सम्मानजनक कार्यों के जरिए कमाए। आत्मनिर्भरता के लिए इससे बेहतर नियम बना लेंगे आप?
तस्मात्साधारणो धर्मः श्रुतौ पत्न्या सहोदितः। धार्मिक कार्य पति-पत्नी साथ मिलकर करें। पत्नी के बिना कोई अनुष्ठान पूरा नहीं होता है। हमारे यहाँ पत्नी को बेगम नहीं, अर्धांगिनी कहा गया है। यहीं से निकला है 'आधी आबादी'। पूरे पचास प्रतिशत - उतना ही, जितना पुरुष का हिस्सा। पचास-पचास। इससे अधिक सटीक तरीके से बराबरी का सन्देश दे सकते हैं आप? अन्योन्यस्य। एक-दूसरे के प्रति। वैवाहिक जीवन में भी दोनों की ज़िम्मेदारियाँ हैं। मनुस्मृति कहती है कि न स्त्री और न ही पुरुष वैवाहिक मर्यादा का उल्लंघन करे। इसमें क्या जोड़ देंगे आप क्रांतिकारी कहलाने के लिए? कुछ बाक़ी है क्या? मनुस्मृति कहती है कि नियम दोनों पर हैं।
मनुस्मृति ने स्त्री को महाभागाः (सौभाग्यशालिनी और सौभाग्य लाने वाली) कहा। मनुस्मृति ने स्त्री को पूजार्हाः (सम्मान की अधिकारी) कहा। मनुस्मृति ने स्त्री को गृहदीप्तयः (घर को प्रकाशित और प्रसन्न रखने वाली) कहा। परिवार के सुख का आधार कहा। गृहस्थ-जीवन का प्रत्यक्ष आधार कहा।
अब जिसने परिवार नामक संस्था को ख़त्म करने का लक्ष्य ले रखा हो, उसे ये सब बुरा लगेगा ही। वो पूछेगा कि स्त्री परिवार के सुख के लिए तिनका भी क्यों हिलाए। वो ये नहीं पूछेगा कि मनुस्मृति ने पुरुष को भी स्त्री के भरण-पोषण की ज़िम्मेदारी उठाने को क्यों कहा है।
यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते… रटा-रटाया है, इसीलिए इसे नहीं गिनाया। सबको पता है। इसी प्रसङ्ग में ये भी लिखा है कि जिस घर में स्त्री दुःखी रहती है वह परिवार शीघ्र नष्ट होता है। यानी, परिवार की स्थिति का पैमाना यह तय कर दिया गया है कि उसमें महिलाओं को प्रसन्न रखा जा रहा है या नहीं।
लेकिन नहीं, गाली तो केवल मनुस्मृति को ही पड़ेगी। क़ुरान और बाइबिल का नाम नहीं लिया जाएगा। राहुल गाँधी आज 'स्त्रीवादी' बने हैं, काश मनुस्मृति पढ़ लिया होता कम से कम। पढ़ा तो हमने भी नहीं है, इसीलिए जो कहा जाता है मान लेते हैं। सफाई देने लगते हैं कि ये उस समय की व्यवस्था थी।
मनुस्मृति से अधिक फेमिनिज्म और कहीं नहीं है। फ़िलहाल इस इकोसिस्टम के लिए तो फेमिनिज्म सिर्फ़ अश्लीलता और अंग-प्रदर्शन ही है।
Jai Shri Ram .
Looks like BRS pink slaves have targetted and mass reporting my account due to which my account’s reach is dead since yesterday.
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आनंद रंगनाथन लिखते हैं:
मैं यह लिखने के लिए विवश हूँ और आपसे इसे पढ़ने का अनुरोध करता हूँ।
गुरु नानक से पहले कोई सिख नहीं था!
मुहम्मद से पहले कोई मुसलमान नहीं था!
ऋषभदेव से पहले कोई जैन नहीं था!
बुद्ध से पहले कोई बौद्ध नहीं था!
कार्ल मार्क्स से पहले कोई वामपंथी नहीं था!
कृष्ण से पहले राम थे...
राम से पहले जमदग्नि थे...
जमदग्नि से पहले अत्रि थे...
अत्रि से पहले अगस्त्य थे...
अगस्त्य से पहले पतंजलि थे...
पतंजलि से पहले कणाद थे...
कणाद से पहले याज्ञवल्क्य थे...
याज्ञवल्क्य से पहले भी... सभी "सनातन वैदिक" अनुयायी थे!
इन "राजनीतिक शतरंज" की "12 चालों" को ध्यान से पढ़ें और समझें...?
1. क्या मुगल "भारतीय" बन गए और "भारतीय" "काफ़िर"...?
2. क्या गियासुद्दीन खान मोतीलाल बन गए, जवाहरलाल नेहरू?
उनकी बेटी से...
इंदिरा, राजीव-मैनो,
ये सभी... "गांधी" बन गए!!
और..."भारतीय"... "मूर्ख" बन गए!!
3. क्या मोमिन "कश्मीरी" बन गए...?
और, "कश्मीरी पंडित" "शरणार्थी" बन गए...?
4. क्या बांग्लादेशी "बंगाली" बन गए...?
और, "बंगाली" "बाहरी हिंदू" बन गए...?
5. क्या "सैनिकों" और "पत्थरबाजों" के "हत्यारे" "आंदोलनकारी" बन गए? और, "भारतीय सेना" "मानवाधिकार उल्लंघनकर्ता" बन गई...?
06. "टुकड़े-टुकड़े गैंग" "देशभक्त" बन गए...? और, "देशभक्त" "कट्टरपंथी" कहलाने लगे...?
07. "चिता की लकड़ी" "पर्यावरण संबंधी चिंता" बन गई...? और, "कब्रिस्तान में बर्बाद हुई ज़मीन" उनका "जन्मसिद्ध अधिकार" बन गई...?
08. "राखी" में इस्तेमाल होने वाली "ऊन" "भेड़ों" को "तकलीफ" देती है...?
तो फिर बकरी ईद का क्या?
9. तुष्टीकरण "धर्मनिरपेक्ष" कैसे बन गया...?
जबकि, "समानता"
"सांप्रदायिक" कैसे बन गई...?
10. "आरएसएस" "आतंकवादी" कैसे बन गया...?
और, "ओसामाजी"...,
"हाफ़िज़ साहब"..., और
"हुर्रियत" कैसे बन गए...?
शांति की चोटियाँ...
11. “भारत माता की जय”
“सांप्रदायिक” बन गया...?
और, “भारत तेरे टुकड़े होंगे”
“अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता” बन गया...?
12. “बांटो और राज करो” “शासन” बन गया...? और… “सबका साथ सबका विकास” “जुमला” बन गया?
ज़रा सोचो...? और समझो... कि
आखिरकार एक “हिंदू बहुसंख्यक देश” में
ये सब कैसे हुआ...?
हे हिंदुओं, अगर तुम सोते रहोगे...
तो तुम्हें पता भी नहीं चलेगा...
कब... तुम एक “आतंकवादी देश” के “नागरिक” बन गए...!!
एक “हिंदू” होने के नाते, मैं आपसे अनुरोध करता हूँ कि इसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाएँ और साझा करें।
धुरंधर को बस फिल्म की तरह क्यों ले...
इसने जिस जिस विषय को उठाया है,उसमे टेरर फंडिंग,जाली नोट,वो सोच जिसमें भारतीयों के सिर को काट कर मुदरिके के मिनारों से टांगने की बात है...
पर सबसे दुखद और खुन खौलाने वाला लब्ज है मेजर इक़बाल द्वारा कहा गया ‘माल-ए-ग़नीमत’ ...वो जिसे कौड़ियो दो कौड़ियों में बेचने की बात कहता है,जो सपना है इस फिरके का...
माल ए गनीमत इतिहास का एक बेहद पीड़ादायक और संवेदनशील अध्याय है...ये भारत को लुटने आए अरबी,तुर्क,म़ंगोल हर किसी ने करनेकी कोशिश की है...यूं तो इसका अर्थ है युद्ध में जीती गई वस्तु...पर युद्ध में सामान से ज्यादा किमती इज्जत है,जिसको लुटना इसका सही अर्थ समझते हैं येए....
और इसमें सबसे संवेदनशील है , बांग्लादेश मुक्ति संग्राम 1971 के दौरान महिलाओं को जिस तरह पाकिस्तानी फौज ने रौंदा,वो जुल्म अत्याचार मानवता को झकझोर देने वाले थे।
माल ए गनीमत का ज़िक्र करना बेहद जरूरी है। यह कोई साधारण शब्द नहीं, बल्कि एक ऐसी सोच को दर्शाता है,जिसमें औरतें उसकी जिती ग्ई मिल्कियत हैं।
जिसका भयावह 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के दौरान, पाकिस्तानी सेना द्वारा महिलाओं पर बड़े पैमाने पर अत्याचार किए गए।
हजारों स्वतंत्र स्रोतों और शोधों चिख चिख कर बताते हैं कि औरतों पर यह हिंसा केवल युद्ध का हिस्सा नहीं थी, बल्कि बंगाली समाज को तोड़ने और डर फैलाने की एक सुनियोजित रणनीति थी।
महिलाओं को जबरन उठाया गया, उनके साथ अमानवीय व्यवहार किया गया और उन्हें नंगा करक कैदी शिविरों में रखा गया,उनपर बलात्कार हुएं। इन घटनाओं ने असंख्य परिवारों और पीढ़ियों को गहरे घाव दिए। कई पीड़िताओं को बाद में समाज में भी स्वीकार्यता नहीं मिल सकी और उनकी पीड़ा इतिहास के पन्नों के अंदर दब कर रह गई।
‘माल-ए-ग़नीमत’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल, किसी भी इंसान खासकर महिलाओं को वस्तु के रूप में देखने की मानसिकता को दर्शाता है, जो किसी भी सभ्य समाज के लिए अस्वीकार्य है।
पर ये होता है, हमास ने इजराइली महिलाओं के साथ किए, आइएसआइ ने कुर्द महिलाओ के साथ किया,भारत में जब जब विदेशी अक्रांता भारत आएं तो यहां कि महिलाओं के साथ हुआ,भारत की वीर राजपूतानियों ने इससे बचने के लिए जौहर किए ।
और सबसे ताजा तो आपरेशन सिंदूर के वक्त कुछ पाकिस्तानी पत्रकार आन रिकार्ड भारत की अभिनेत्रियों को अपनी लौंडिया या माल ए गनीमत बनाने के इच्छुक दिखे।
युद्ध के दौरान ऐसी सोच बस एक खास आइडियोलॉजी में हैं,जो क्रूरता को और बढ़ावा देते है।
इतिहास के ये किस्से हमें केवल दर्द ही नहीं, बल्कि एक सीख भी देते हैंकि किसी भी परिस्थिति में स्त्री की गरिमा, सम्मान और अधिकारों का हनन नहीं होना चाहिए।
पर पाकिस्तान का बच्चा बच्चा दिल्ली लालकिले पर गौ के कबाब खाने की बात करता है और व्यस्क पाकिस्तानी भारत की इज्जत को माल ए गनीमत बनाने को आतुर...
यही उनकी सोच है,वही उनको सिखाया गया है और यही उनके लिए आखिरी सच है,जिसके लिए वो जान लेने और देने की हद पार कर देते है।
धुरंधर प्रोपेगंडा नही है,हम शुतुरमुर्ग हैं...
मेरा शंकराचार्य- नरेंद्र मोदी है !
मेरा मठाधीश- नरेंद्र मोदी है !
मेरा आचार्य- नरेंद्र मोदी है !
मेरा गुरु भी- नरेंद्र मोदी है !
क्योंकि....
नरेंद्र मोदी ने मुझे स्मरण कराया कि मैं हिन्दू हूँ !
नरेंद्र मोदी ने मुझे बताया कि भारतवर्ष मेरा राष्ट्र है !
नरेंद्र मोदी ने स्मरण कराया कि भारतवर्ष ही मेरा ठिकाना है !
नरेंद्र मोदी ने मुझे भान कराया कि भारत में हिन्दू भी रहते हैं !
As OpIndia turns 11, we launch a new vertical. Last year, it was Hinduphobia Tracker - our squirrel’s contribution towards instilling Shatrubodh
Today, it’s @dharmadhyaanam - a project by @Shh_Shaili - small start to instil Swayambodh
Follow and bless us, like you always do 🙏
Watching the #Parliament proceedings today, one thing is clear - this government is being run by adults.
The Opposition, meanwhile, is a playpen of dynasts.
Mulayam’s kid, Pawar’s kid, Sonia’s brood, Karunanidhi’s kid, Gogoi’s kid and Hooda’s…
Not one willing to engage with facts, figures, data, or even the Defence Minister’s statement on the recently concluded Operation Sindhoor, a hard-won military success.
But who has the patience for that, right? Too boring, yaar.
They came for drama, slogans, and arrogance and could not even get themselves to applaud our soldiers.
Shameful.
Not one ounce of merit or ability only privilege and entitlement and that ridiculous *blank* red book they brandish like scripture.
May you be doomed to carry it forever, it’s the perfect reflection of your empty heads.
The Trump Shock Doctrine⚡️ is back, and the world’s elite are reacting like Victorian ladies scandalized by a glimpse of bare ankle.
Just when the global establishment thought it could slip back into its cozy, rules-based order— where wars are fought with polite statements and America foots the bill —Donald J. Trump stormed in like a CEO discovering his employees have been throwing champagne parties on his credit card. !_
The headline? Zelensky gets the boot. The press lunch is left for the interns. The foreign policy elite gets indigestion. And somewhere in Brussels, NATO officials are whispering, "He wasn’t supposed to come back… does this means we actually have to defend ourselves ?"
For the American middle class, this isn’t just a foreign policy shake-up it’s a long-overdue reality check. For years, they’ve been told that democracy and "global stability" require trillions of their tax dollars. Meanwhile, their roads look like the moon’s surface, their wages stagnate, and their grocery bills rival defense budgets.
Now, at last, someone has said what they’ve been muttering at family dinners:
"Why are we still paying for this ?"
Trump’s message is simple: Ukraine, NATO, the EU—either clean up your own mess or cut a deal. 👊It’s not isolationism; it’s basic financial responsibility. After all, imagine if you were forced to buy your neighbor a top-of-the-line security system every year—while he kept leaving the front door open and provoking the guy across the street.
And so, the establishment meltdown begins. Trump is reckless! Trump is abandoning allies ! 🚩Trump is endangering democracy!
Meanwhile, European leaders, who have long enjoyed the luxury of outsourcing their defense to American taxpayers, are suddenly looking like students who just realized the test isn’t multiple choice.
Ah, Europe. The birthplace of cathedrals, bureaucratic nightmares, and wars that America has to finish.
For decades, EU elites reassured themselves that they were global players, capable of taking on Russia and shaping the world.
Except… they never actually had to prove it.
Why? Because America was always there—ready to step in with troops, tanks, and blank cheques.
But now? Now, Trump is staring at them like a parent who just discovered their 35-year-old child is still on their Netflix account.
This is existentially terrifying for the EU. After all, they couldn’t take on Russia even with U.S. backing. The idea of doing it alone? Sacré bleu!
Zelensky’s Nightmare: The Free Ride Is Over !
And then there’s Zelensky—the man who played his role perfectly up until now. The wartime hero. The defiant Churchill of Kyiv. The media🤓 darling.
But Trump, who has never been one for sentimental theatrics, just called his bluff:
"You are not winning this."
This wasn’t just a diplomatic message—it was a cold, hard reality check.
For all of Zelensky’s speeches, for all of his emotional appeals to Western audiences, he knows Trump just did something no other leader has dared to do: point out the obvious.!
Of course, the media will scream that Trump is "abandoning Ukraine." But after years, billions of dollars, and thousands of lives, the war is still at a stalemate.
The choices are simple:
1. A bottomless pit of U.S. funding.
2. A negotiated settlement.
At the heart of this global meltdown over Trump’s return is one uncomfortable truth:
The world has forgotten how to deal with blunt reality.
Good pamphlet on #LoveJihaad
Share this to all your Telugu friends asking them to share with the girls in schools and colleges.
Such pamphlets should be made available in all local languages and share in all the states.
Bringing awareness is the key.