I had a traumatic train ride today. It is very sad to see how people do not respect public spaces enough. When we are in the public, we should not shout or even talk loudly and disrespect every individual’s personal space in Public. As artists, we have a 100 thoughts running. And we thrive in silence. Everyone can understand the initial excitement when travelling in a big group in a train. But imagine a group of 40 middle aged adults occupying a 56 seater coach and talking so loudly to everyone for 5 hours. Non stop. Problem in India is nobody can question them. It is an unsaid rule that the other 16 of us which aren’t part of the group should simply endure them. So I requested the TTE if I could get another seat in a different coach. He tried but unfortunately since the train was full, I had to simply stay in the same coach but a different seat. Suddenly a group of 8, that was already yapping and laughing non stop, started playing UNO. And then I requested the TTE if anything could be done. He requested them to stop and they immediately stopped. But after a couple of minutes TTE came back and mockingly asked them ‘yaake sir galaatte maadtaideera?’ (Why are you creating nuisance?) and they had a good laugh with him and said, ‘sir Neevu banni, adona’(Sir you also join, let’s play). So the concern here is not about who won. Myself, along with them, as Indians, lost the Civic sense game. When will we as a nation improve our public behaviour?
राजनीतिक दलों ने IIT बॉम्बे पर होने वाली बहस के लिए अपना प्रवक्ता भेजने से इनकार कर दिया।
कोई भी SC/ST एक्ट पर चर्चा करना या इस विषय को छूना नहीं चाहता।
अर्नब की बात सुनिए।
अविश्वास अलग है, विश्वास का टूटना अलग है। हर स्कीम, हर भाषण, हर रैली के केंद्र में SC, ST, OBC, शोषित, वंचित, पीड़ित।
इतना अधिक बोला गया है कि लगता है भारत में और लोग नहीं रहते।
और विडंबना देखिए, SC, ST के उत्थान के लिए दी जाने वाली राशि से एजुकेशन बजट कम है। आर्थिक उत्थान की जड़ में एजुकेशन है, लेकिन आप फ्रीबीज़ का बजट बढ़ाते जा रहे हैं। एजुकेशन के जरिए आगे बढ़ना चाहने वाले गरीब सवर्ण का क्या?
(यह जनवरी में प्रकाशित मूल वीडियो का एक अंश है।)
As per data presented in Rajyasabha (by GOI):
Suicide rate (2019-2023)-
SC=13.3% (Population 16.6%)
ST=4% (Population 8%)
OBC=34.7% (Population 44-45%)
GC=48% (population 31%)
Please make "GC protection act" to save them from "caste-discrimination" in academic institutions 🙏
@ramgopal_rao Respected Sir🙏
Theoretically it is good solution.But is there any guarantee that again they will not cry partiality?May be again one group will blame as more General Category students will clear 4 years or less than this
बिलकुल सच कुछ पंक्तियां पढ़ने के बाद मैं भी BITS को ही quote करने का सोच रही थी।वहाँ तो किसी Employee के बच्चे तक को भी Direct Engineering में Admission नहीं मिलता भले ही वो Director या Vice-Chancellor का ही बच्चा क्यों न हो।
यही वह दृश्य है जहाँ योग्यता, @narendramodi के भीड़तंत्र के समक्ष झुक कर बिछ जाने के सामने, कलम निकाल कर अपनी अंतिम यात्रा का आरंभ कर रही है।
डायरेक्टर केदारे साहब शांत हैं, 18 माँगें हों या 180, वो स्वीकार कर लेंगे क्योंकि @PMOIndia से कारण बताओ नोटिस आ जाएगा कि आपसे एक छोटा सा प्रोटेस्ट नहीं सँभलता, जबकि हमने तिलचट्टों के प्रोटेस्ट में पूरे देश को बताया है कि करना क्या है।
भीड़ ही ‘लोकतंत्र’ का ‘लोक’ है, अतः वह जो भी कहे, वह जाँच से पहले ही कर दीजिए। मुझे थूकने की इच्छा हो रही है किसी के मुँह पर!
WARNING ‼️ इस वीडियो को मत देखना अगर तुम कमज़ोर दिल के हो तो… इंदिरा ने पाकिस्तान के 93 हज़ार क़ैदी वापस दे दिए… लेकिन अपने 54 युद्धबंदी वापस नहीं ले पाई… कलेजा फट जाएगा अगर ये सुन लोगे तो…
लगभग एक वर्ष पूर्व #अमेज़ॉन_इंडिया ने अपने ग्राहकों से प्रति क्रय पांच रुपए लेना शुरू किया। बहाना बनाया कि यह मार्केटप्लेस फी है। जैसे #अमेज़ॉन अपने ग्राहकों तथा विक्रेताओं से कुछ नहीं कमाती है, इसलिए वेबसाइट तथा अन्य खर्चों के लिए उसे ग्राहकों से प्रति क्रय पांच रुपए लेना न्यायसंगत है।
जब कि वस्तुस्थिति उल्टी है - अमेज़ॉन विक्रेताओं से मोटा कमिशन वसूलती है। कई बार इतना कि व्यापारमें लाभ न के बराबर बचें। अपने डिलिवरी करनेवालों से जी-तोड़ मेहनत करवा कर अत्यंत कम पारिश्रमिक देती है। इतना ही नहीं, अपने वेबसाइट तथा अन्य कार्योंमें प्रयुक्त सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स पर काम का इतना दबाव डालती है कि जीवन दूभर हो जाए। मेरा भांजा वहां काम करता था, उसने नोकरी छोड़ कर एमबीए किया और दूसरी नौकरी पकड़ी, अमेज़ॉन छोड़नेमें उसे तनिक भी दुख नहीं हुआ।
तात्पर्य यह, कि जब कोई निजी संस्था अपने भरपूर लाभ कमाने पर भी ग्राहकों से पांच रुपए की वसूली प्रति क्रय कर सकती है, जहां खरीद का माल ५० रुपए ही क्यों न हो, तो इसके विरोधमें तो कहीं से कोई आवाज़ नहीं उठती। अमेज़ॉन का व्यापार कम नहीं होता, कोई आंदोलन खड़ा नहीं होता, जिससे अमेज़ॉन को इस वसूली को रोकना पड़े।
वहीं, जब ₹२०००/- की UPI करने पर केवल ₹५/- शुल्क लेने की बात हो रही है, तो चिल्लमपों ऐसे मची हुई है कि सरकार हर किसी की भैंस खोल कर लें जा रही है। कोई तो तार-तम्य होना चाहिए प्रतिक्रिया में! लेकिन नहीं, सरकार ने सुननी चाहिए, निःशुल्क सेवा उपलब्ध करानी चाहिए। ये ठीक नहीं है।
वैसे #UPI तंत्र चलाने वाली संस्था #NCPI जिसमें सरकार के साथ सरकारी एवं निजी बैंक भी शामिल हैं, इसे चलानेमें लगने वाले संसाधन एवं संचालन पर वार्षिक कई हज़ार करोड़ रुपए खर्च करती है। अभी तक यह खर्च इन बैंकों से तथा सरकारी खजाने से आता है। लेकिन बैंकों का कहना है कि इस खर्च की वसूली होनी चाहिए, और वह भी उनसे होना #तर्कसंगत है जो इस सुविधा का प्रयोग करते है। आखिरकार बैंक भी व्यापार के संस्थान हैं, न कि धर्मादा संस्थाएं! यह तर्क भी सही है।
दूसरा तर्क यह है कि UPI करने से काम किस का बनता है? बैंकों का! यदि यह सुविधा न होती तो लोगों को बैंक जाना पड़ता, और घंटों खड़े होकर अपना काम होने की प्रतीक्षा करनी पड़ती। बैंकों को भी आजकी तुलनामें भारी संख्यामें कर्मचारी रख कर इस काम को और पेचीदा तरीके से करवाना पड़ता। तो बैंक NCPI के रास्ते UPI जीवित रखनेमें खुद का फायदा ही करती हैं, न कि नुक़सान। तो फिर क्यों अधिभार वाली लालच कर रहीं हैं?
UPI से पूर्व बैंक और व्यापारी प्रतिष्ठान क्रेडिट कार्ड से मोटी रकम का आदान-प्रदान करते थे। इसमें कार्ड जारीकर्ता संस्था जैसे मास्टर कार्ड, वीज़ा, अमेरिकन एक्सप्रेस, डाइनर्स कार्ड इ. न केवल ३-५% का अधिभार व्यापारी प्रतिष्ठान से लेते थे, बल्कि बकाया राशि का पूरा भुगतान न करने पर ३६-४०% की ब्याज दर से बकाया राशि को ऋण के तौर पर वसूलते थे, और वसूलते हैं। अमरीका में इस साहुकारी से जनता में त्राहि-त्राहि मची हुई रहती है।
भारतमें इतनी सरलता से ऋण लेने का चलन नहीं रहा, और न हि पनप पाएगा। चीन के कुछ बदमाशोंने सुलभ ऋण के चलते कैसे कई परिवार उजाड़ दिए खबरें सब पढ़ते हैं। कार्ड कंपनियों के मर्चेंट्स डिस्काउंट रेट से व्यापारी प्रतिष्ठानों को नुक़सान पहुंचता है, सारे जानते हैं।
इस पृष्ठभूमि में UPI एक सुखद समीर की लहर है। इसे यथावत बनाए रखना सभी के हित में है, और मैं प्रार्थना करता हूं कि यह ऐसे ही बने रहे।
और यदि न रह पाए तो किसी न किसी लाभप्रद रूप में इसे बनाए रखने हेतु में इस छोटे से अधिभार को सहने में भलाई मानता हूं। MDR, जो ३-५% तक होता है, उसके विपरीत यह प्रस्तावित अधिभार अधिकतम ०.२५% (₹२०००/- पर ₹५/-) रहेगा, और उससे अधिक रकम पर उससे भी कम। इसमें कोई तुलना ही नहीं हो सकती है।
अतः, झल्लाने, झुंझलाने, उकताने, गुस्साने से बेहतर है कि चीजों को वास्तविकता में जानें, और उस परिप्रेक्ष्य में अपनी संतुलित राय दें।
शुभं भवतु! जय जय श्रीराम! 🙏🚩
एक ज़माना था, जब कांग्रेस बहुमत से सत्ता में रही और भारत में मनी ऑर्डर भेजने पर 5 प्रतिशत तक शुल्क लगता था। जी हाँ, आपने सही पढ़ा। किसी को ₹1,000 का मनी ऑर्डर भेजने पर ₹50 सरकारी शुल्क के रूप में देना पड़ता था।
इसके अलावा, मनी ऑर्डर की पावती के नाम पर कई जगह पोस्टमैन द्वारा ₹2 से ₹5 प्रति सैकड़ा तक सुविधा शुल्क लिए जाने की शिकायतें आम थीं। कुछ स्थानों पर यह राशि ₹10 प्रति सैकड़ा तक भी बताई जाती थी। कई बार सुविधा शुल्क न होने पर भी राशि काटकर बाकी पैसा दिया जाता था, और लोग इसे व्यवस्था का हिस्सा मानकर सह लेते थे।
कुछ समय पहले तक परीक्षा के लिए ₹100 की डीडी बनवाने में ₹20 तक अतिरिक्त शुल्क देना पड़ता था। बैंक में पूरा दिन आवेदकों की भीड़ लगी रहती थी। दोपहर 3 बजे के बाद डीडी मिलती, फिर अगले दिन पोस्ट ऑफिस जाकर लंबी लाइन में लगकर उसे रजिस्ट्री करना पड़ता था। रजिस्ट्री के लिए भी ₹20–₹25 तक खर्च हो जाता था।
और आज?
आज UPI ने इसी भागदौड़ को कुछ सेकंड के काम में बदल दिया है। न बैंक की लंबी लाइन, न डीडी के लिए पूरा दिन, न पोस्ट ऑफिस की दौड़। मोबाइल उठाइए, भुगतान कीजिए और काम समाप्त।
डिजिटल युग में UPI अब केवल सुविधा नहीं, रोज़मर्रा की आवश्यकता बन चुका है। इससे दूरी बनाना आसान नहीं है।
बाकी कांग्रेस का काम है किकियाना।
उन्हें और उनके समर्थकों को किकियाने दीजिए, आप मस्त रहिए। 😄🇮🇳