यह वीडियो पवित्र बदरीनाथ धाम का बताया जा रहा है। यहां शंख बजाने की भी मनाही है लेकिन बाजार का यह शोर सिस्टम को कबूल है। धार्मिक स्थलों को पर्यटन स्थल मत बनाइए सरकार….
सुन लो अंधभक्तो तुम्हारे पप्पा का विदेश मंत्रालय क्या कह रहा है। अब करो उल्टियाँ 🤣
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MEA के प्रवक्ता:
"मुझसे CJP के विरोध-प्रदर्शन को मिलने वाली फंडिंग के बारे में कई बार पूछा गया है।
मैं कहना चाहता हूँ कि हमारी खुफिया और जांच एजेंसियों की जानकारी के अनुसार इसमें किसी भी प्रकार की विदेशी फंडिंग नहीं मिली है।"
गोडी मीडिया और भक्ति करने वालों के दावों पर एक और करारा तमाचा।
पुलिस सिपाही लाठी वाले क्या घर जाकर तू रोया कल
हे सांसद मेरी संसद वाले क्या जाकर सो पाया कल
ये कविता जाने माने एक्टर अतुल कुलकर्णी ने छात्रों के समर्थन में गाई है.
वकीलों को सड़क पर उग्र प्रदर्शन करते देख सालों से सवाल उठता था कानून के दूत जब कानून हाथ में लेकर न्याय मांगेंगे तो संदेश कैसे स्वच्छ रहेगा? क्या ऐसे प्रदर्शनों से उनकी नैतिक विश्वसनीयता कम नहीं होती?
लेकिन आज जब पत्रकारों की दयनीय हालत को नज़दीक से देखता हूं तो एहसास होता है कि जोखिम, तनाव और असुरक्षा से भरे इस पेशे में संगठित होकर लड़ना ही एकमात्र विकल्प है.
राजस्थान में पत्रकारों को बारी-बारी से मुकदमों, नोटिसों और हीन अलंकरणों के जरिए बदनाम करने का सिलसिला जारी है.
सवाल यह है कि पत्रकार ही बार-बार निशाने पर क्यों?
क्योंकि पत्रकार सूचनाओं के संरक्षक होते हैं समाज, सिस्टम और प्रभावशाली वर्गों द्वारा किए जा रहे अन्याय और अनैतिकताओं को सार्वजनिक करना उनका दायित्व है.
स्कूल में RTI के आधार पर प्रवेश ना मिलने से लेकर किसी गरीब परिवार को राशन ना मिलने तक हर स्तर की सूचनाओं को सामने लाने की जिम्मेदारी उन्हीं पर होती है.
इसी कारण अत्यधिक सूचनाओं के प्रवाह में कभी-कभी त्रुटियां भी हो जाती हैं और जितना अधिक कोई पत्रकार सक्रिय रहता है, उतना ही उसके काम में “गलतियां ढूंढना” आसान हो जाता है.
पर क्या इन छोटी त्रुटियों को बहाना बनाकर उन पर मुकदमे थोपना कानूनी रूप से सही है?
कानूनों का दुरुपयोग कर पत्रकारों को शिकंजे में कसना क्या पीड़ितों की आवाज़ को दबाने और लोकतांत्रिक सूचनाओं के प्रवाह को रोकने जैसा नहीं है?
बरसों से चेतावनी दी जाती रही है कि यदि पत्रकार संगठित नहीं हुए तो एक-एक कर सभी को निशाना बनाया जाएगा. यह संकट व्यक्तिगत नहीं, सामूहिक है.
सरकारें, सिस्टम और छिपे हुए हित सब दबे-पांव साज़िश रचते रहेंगे। “येलो जर्नलिज़्म” का ठप्पा लगाकर आपके खिलाफ महाधिवक्ता तक खड़े कर दिए जाएंगे।
संभालो यारों, समय हाथ से निकल रहा है...एकजुट हो जाओ वरना एक-एक कर हर किसी की बारी आएगी. जो आग स्टिंगरों और जमीनी पत्रकारों से शुरू हुई थी, अब संपादकों और बड़े संस्थानों को भी अपनी लपटों में ले चुकी है।
दैनिक भास्कर जैसे राष्ट्रीय अखबार के संपादक पर दर्जनों मुकदमे ठोककर उन्हें अदालतों के चक्कर कटवाना और प्रतिष्ठा को धूमिल करना यह सब एक संगठित साज़िश का हिस्सा है।
अदालतों से विनम्र अपील है:-
- पत्रकारिता जैसे जोखिमपूर्ण पेशे को कानूनी चक्रव्यूह से संरक्षण प्रदान किया जाए। ऐसे मुकदमों को क्लब कर स्पष्ट दिशानिर्देश जारी किए जाएँ ताकि पत्रकार स्वतंत्र रह सकें, भयभीत नहीं।
संपादकों व मीडिया संस्थानों से निवेदन :-
- अपने साथी स्टिंगरों-पत्रकारों के साथ वास्तविक बंधुत्व दिखाएँ। आज जो संकट खड़ा हुआ है, उसमें कहीं न कहीं उनकी चुप्पी, दूरी और कुछ स्थानों पर दमनकारी ताकतों के साथ अप्रत्यक्ष संलिप्तता भी जिम्मेदार है।
अब भी समय है मीडिया को बचाने का, और लोकतंत्र की सांसों को सुरक्षित रखने का।
जय हिंद
#ISupportLPPant #Rajasthan
@pantlp