बच्चे भी अपने Rights और हक़ के लिए आवाज़ उठाना सीख रहे हैं।
विदिशा में Students का बढ़े हुए Bus किराये के खिलाफ़ सड़क पर उतरना बताता है कि आज के बच्चे गलत होता देखकर चुप बैठने वाले नहीं हैं।
अपने Rights के लिए सवाल करना, अपनी मांग रखना और गलत के खिलाफ़ आवाज़ उठाना ही तो मजबूत लोकतंत्र और संविधान की ताकत है।
ये बच्चे सिर्फ़ अपना आज नहीं, देश का कल भी तय करेंगे।
लेकिन कहीं न कहीं दुख इस बात का भी है कि क्या हर गलत चीज़ के लिए बच्चों और आम लोगों को ही सड़क पर उतरकर आवाज़ उठानी पड़ेगी? जिम्मेदार लोग खुद संज्ञान लेकर ऐसे मुद्दों का तुरंत समाधान क्यों नहीं निकाल सकते?
जनता के आवाज़ उठाने का इंतज़ार करने के बजाय, जिम्मेदारों को अपनी जिम्मेदारी खुद समझनी चाहिए।
प्रधानमंत्री जी को इस पर भी ध्यान देना चाहिए,
आपके समर्थक कितना गलत बोल रहे हैं,
ये श्रद्धा सिंह है,
इनकी ग़लती सिर्फ इतनी है कि सरकार के खिलाफ छात्रों के समर्थन में जंतर मंतर पर पहुंची थी।
माननीय प्रधानमंत्री @narendramodi जी, माननीय गृहमंत्री @AmitShah एवं संबंधित विभाग @DoPTGoI से विनम्र निवेदन है कि हम अग्निवीर भाइयों के सम्मान और उनके भविष्य के पूरी तरह पक्षधर हैं। देश की सेवा करने वाले प्रत्येक अग्निवीर का सम्मान होना चाहिए। लेकिन विभिन्न न्यूज sources से मिली जानकारी के अनुसार ये ज्ञात हुआ है कि SSC GD भर्ती में 50% आरक्षण लागू होने वाला है यदि ऐसा होता है तो इससे लाखों सामान्य अभ्यर्थियों के अवसर प्रभावित होने की आशंका है।
इसलिए हमारा अनुरोध है कि अग्निवीरों के पुनर्वास के लिए अलग और प्रभावी व्यवस्था बनाई जाए, उन्हें वहीं 75% परमानेन्ट कर देने जैसी कोई व्यवस्था बनाई जाए और उन्हें 50% की जगह 15 या 20% तक का ही Reservation दिया जाए ताकि उनका भविष्य भी सुरक्षित रहे और SSC GD के अन्य अभ्यर्थियों के साथ भी समान अवसर और निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा बनी रहे। कृपया इस निर्णय पर पुनर्विचार करें और ऐसा समाधान निकालें जिससे किसी भी वर्ग के युवाओं का नुकसान न हो।
हमारी मांग किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि सभी युवाओं के लिए संतुलित और न्यायसंगत अवसर की है।
#Stop_SSCGD_50%_Reservation
@SSC_GoI
अभिजीत दीपके: BJP की तरफ़ से उन्हें पार्टी में शामिल होने का ऑफर धमकियों के साथ मिला,
उनके मुताबिक कहा गया कि BJP जॉइन कर लो तो उनके और उनके परिवार की ज़िंदगी बेहतर हो जाएगी।
इस पर अभिजीत ने कहा, मैं मोदी और अमित शाह के पोते-पोतियों की उम्र का हूँ अगर बच्चों को धमकाना पड़े तो ऐसी ताकत का क्या मतलब।
एक ट्रेंड चल रहा है— 'Reservation Hatao'
हो सकता है आपके चार दोस्त हों, जिन्हें लगता हो कि आरक्षण की वजह से उनका चयन नहीं हुआ। उनकी पीड़ा भी वास्तविक है, उसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
लेकिन क्या सिर्फ़ उन्हीं चार लोगों की कहानी पूरे भारत की कहानी है?
मैं गाँव से आता हूँ। मैंने अपनी आँखों से ऐसे परिवार देखे हैं जो इंसानी मल साफ़ करते थे। ऐसे बच्चे देखे हैं जिन्हें स्कूल में अलग बैठाया जाता था। जिनके छू लेने पर लोग नहाने चले जाते थे। यह कोई सैकड़ों साल पुरानी कहानी नहीं, आज भी बहुत से गाँव ऐसे हैं जहाँ वो समाज के नल से पानी नहीं पी सकते। आज भी उनकी बारात गाँव के बीच से नहीं निकल सकती।
सोचिए... जिस समाज ने किसी इंसान को जन्म के आधार पर ही सम्मान से वंचित कर दिया हो, उस मानसिक और सामाजिक दूरी का क्या ?
इसका मतलब यह भी नहीं कि आज का आरक्षण सिस्टम बिल्कुल परफेक्ट है।मैं खुद मानता हूँ कि Reforms की ज़रूरत है।?
जैसे General वर्ग में EWS आया।
जैसे OBC में Creamy Layer और Non-Creamy Layer का सिद्धांत आया।
SC/ST आरक्षण में जिन परिवारों की कई पीढ़ियाँ शिक्षा और अवसरों के माध्यम से आगे बढ़ चुकी हैं, उनके बारे में भी नीति-निर्माण के स्तर पर चर्चा हो सकती है।
लेकिन एक बात समझिए।
जब राजनीति आज भी जाति पर होती है...
जब समाज में आज भी जाति पूछी जाती है...
जब सामाजिक भेदभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ...तब केवल यह कहना कि "आरक्षण पूरी तरह खत्म कर दो और सब कुछ सिर्फ़ आर्थिक आधार पर कर दो"
मेरा मानना है कि देश को दो अतियों से बचना होगा।
एक - 'कुछ मत बदलो।'
दूसरी -'सब खत्म कर दो।
'सही रास्ता है- सुधार (Reform), डेटा के आधार पर नीति, और सामाजिक न्याय के साथ समान अवसर।
क्योंकि किसी भी नीति का उद्देश्य समाज को बाँटना नहीं, बल्कि एक दिन ऐसी स्थिति तक पहुँचाना होना चाहिए जहाँ किसी विशेष सहायता की आवश्यकता ही न रह जाए।
"जब अभिजीत दिपके ने कहा, मुझे पीटो तो हम रोने लगे.. मैंने कहा मुझे भी पिटना चाहिए.. मेरे शरीर की मांसपेशियां मेरी आत्मा से लड़ने लग गईं.. कैसे खड़े हो!! कैसे बैठे हो झुग्गी के अंदर.. चलो यार, पिटाई खाएंगे दिल्ली पुलिस की.. मैं जंतर-मंतर भागा.."
जंतर-मंतर पर युवाओं का आंदोलन भले खत्म हो गया हो लेकिन उसके निशान हमेशा जिंदा रहेंगे..
और दिल्ली की झुग्गी-झोपड़ी में रहने वाले मोहम्मद इरफान की ये बातें युवाओं के दिल और दिमाग में हमेशा गूंजती रहेंगी..
मोहम्मद इरफान बता रहा है कि वो स्कूल नहीं गया.. पढ़ाई नहीं की.. जो कुछ सीखा इसी समाज से सीखा है..
इरफान की बातें बड़ी गहरी हैं.. भीतर तक चोट करती हैं.. सोचने को मजबूर करती हैं..
इरफान कह रहा है, नये-नवेले कमिश्नर आए हैं.. बड़े जोश में हैं.. बहुत बड़ी व्यवस्था और ताकत और धन बल है, मारेंगे.. चलो मार खाएंगे.. ये लोकतंत्र का रास्ता नहीं है.. लोकतंत्र में संवाद होना चाहिए.. कोई आपसे सहमत हो या न हो!! दोनों के लिए.. चलिए बात करते हैं.. कुछ गलतफहमी है तो उसे दूर करते हैं.. इसमें कोई बुराई नहीं है लेकिन किसी को अपमानित करना!! आये, उठाया, कपड़ा ढका.. ले गए.. और मीडिया ने खबर चला दी, वांगचुक को उठा लिया.. आतंकवादी था!! बदमाश था!! गुंडा था!! बदमाश था!! क्या था?? इस देश का महान पर्यावरण एक्टिविस्ट था.. शिक्षाविद था.. सम्मानित नागरिक था.. कितने आविष्कार किया भारतीय सेना के लिए, देश के लिए, महान साइंटिस्ट था.. उठा लिया.. उठा लिया.. उठा लिया.. जिस आंदोलन से, तमाम आंदोलन से हमारी आत्मा जुड़ जाती है.. हम जन संघर्ष से पैदा हुए लोग हैं.. स्कूल और किताबों का ज्ञान नहीं है हमारे पास.. जो बोल रहे हैं, वो जीवन से जुड़ा हुआ है.. आत्मा रो पड़ी जब हम उस लाइन को पढ़ते हैं.. पीपल आफ इंडिया.. हम भारत के लोग.. भारत को संपन्न, प्रभुत्वसंपन्न समाज, धर्मनिरपेक्ष राज्य बनाने के लिए सदा.........
इरफान की बातें काफी लंबी हैं लेकिन इतना जरूर है जंतर-मंतर पर युवाओं के प्रोटेस्ट ने देश को जेनज़ी की खुली सोच से रूबरू कराया है..
"When Abhijeet Dipke said, 'Beat me,' I started crying. I said, 'I should be beaten too.' My muscles started fighting my soul. How are you standing? How are you sitting inside this slum? Come on, friend, let the Delhi Police beat you up. I ran to Jantar Mantar."
The youth protest at Jantar Mantar may have ended, but its scars will live on forever.
And these words of Mohammad Irfan, a Delhi slum dweller, will forever resonate in the hearts and minds of the youth.
Mohammad Irfan is telling that he did not go to school, did not study, whatever he learned, he learned from this society.
Irfan's words are very deep, they hurt deeply, they force one to think.
Irfan is saying, the new commissioner has come.. he is very enthusiastic.. he has a huge system and power and financial strength, they will kill.. let's get killed.. this is not the way of democracy.. there should be dialogue in democracy.. whether someone agrees with you or not!! for both.. let's talk.. if there is some misunderstanding then let's clear it.. there is nothing wrong in it but insulting someone!! they came, picked him up, covered him with a cloth.. took him away.. and the media ran the news, Wangchuk was picked up.. he was a terrorist!! he was a scoundrel!! he was a goon!! he was a scoundrel!! what was he??
He was a great environmental activist of this country.. he was an educationist.. he was a respected citizen.. he made so many inventions for the Indian Army, for the country, he was a great scientist.. he took it up.. he took it up.. he took it up.. our soul gets connected to the movement, to all the movements.. we are people born out of the people's struggle.. we do not have the knowledge of school and books.. what he is saying is connected to life.. the soul cried when we read that line.. People of India.. we the people of India.. always to make India a prosperous, sovereign society, a secular state.........
Irfan's words are quite long but it is certain that the youth protest at Jantar Mantar has introduced the country to the open-mindedness of Jenzi.
#JantarMantar #Delhi #Protest #Youth #Slums #Irfan #Talent
मिलिए उस मोहम्मद इरफ़ान से, जो जंतर-मंतर के उस वायरल वीडियो से पूरे देश में पहचाना जा रहा है, जिसमें वह संविधान की प्रस्तावना को जिस आत्मविश्वास, लय और भाव के साथ सुनाता है, वह आसपास खड़े हर व्यक्ति को कुछ पल के लिए ठहरकर सुनने पर मजबूर कर देता है।
एक टूटे-फूटे घर में रहने वाला यह युवा लोकतांत्रिक मूल्यों को केवल पढ़ता नहीं, बल्कि उन्हें अपने जीवन में जीने की कोशिश करता है। सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद उसने अपने सपनों का साथ नहीं छोड़ा है।
इरफ़ान को केवल उसकी प्रतिभा के अनुरूप सही अवसर, उचित मार्गदर्शन और मंच मिलने की देर है। उसके भीतर सीखने की भूख, बोलने की क्षमता और आगे बढ़ने का जज़्बा है। यक़ीन मानिए, एक बार उसे अवसर मिल गया तो वह अपनी मेहनत और काबिलियत के दम पर अपनी मंज़िल खुद बना लेगा।
देश की असली ताकत ऐसे ही युवाओं में छिपी है। ज़रूरत सिर्फ़ उन्हें पहचानने, उन पर भरोसा करने और उनका हाथ थामने की है।
@yadavakhilesh गरीब मजदूर जो रोज कमाता है वो आंदोलन नहीं कर सकता क्योंकि आंदोलन करेगा तो उसका घर कौन चलाएगा,,,इसलिए वो गरीब ही रह जाता है ,,उसकी बात तो लोग करते लेकिन अधिकारों की नहीं ।