दिल्ली के जंतर मंतर पर चल रहे कॉकरोच जनता पार्टी के विरोध प्रदर्शन को फिल्मी दुनिया से बड़ा समर्थन मिलने लगा है. सलमान खान, आलिया भट्ट, सोनू सूद और नसीरुद्दीन शाह जैसे बड़े एक्टर्स भी अब स्टूडेंट्स के समर्थन में आ गए हैं. वहीं मुंबई और दिल्ली में हुए प्रदर्शनों में भी कई एक्टर्स शामिल हुए.
रिपोर्ट: बीबीसी न्यूज़ हिन्दी
वीडियो एडिटर: कार्तिक
यही है वो पुलिस वाला जिसने जंतर मंतर पर डंडे से एक महिला के पीछे
गलत जगह खींच मारी थी
मान लिया सरकार के टुकड़ों पर पलने के लिए लाठीचार्ज करना पड़ता है,
पर गलत जगह पे वार करना
इस सरकारी पिल्ले की नीच मानसिकता है।
#GodNightWednesday
एक अमीर महिला का दर्द सुनिए
"मैं भारत की टॉप अर्निंग पावर में आती हूं , मैं 40 % टैक्स देती हूं , मैं यहां इसलिए आई क्योंकि आज जो भी हूं मैं एजुकेशन के बदौलत हूं सबकों ये मौका मिले इसलिए मैं आज नहीं डर सकती हूं "
आज जंतर-मंतर से सैकड़ों छात्रों को हिरासत में लिया गया, जिनमें से लगभग 80 छात्रों को दिल्ली पुलिस छत्रसाल स्टेडियम लेकर गई। उन्हें वहाँ रात लगभग 9 से 9:30 बजे तक रखा गया और उसके बाद अलग-अलग पुलिस वाहनों में बैठाकर विभिन्न पुलिस स्टेशनों में ले जाया गया।
रात लगभग 12:30 बजे से 1 बजे के बीच हमें कुछ छात्रों के परिवारजनों का फोन आया। उन्होंने बताया कि लगभग 6–7 छात्रों को मुखर्जी नगर थाने लाया गया है। परिवार वालों का आरोप था कि उन्हें अपने बच्चों से मिलने नहीं दिया जा रहा, कई छात्रों के फोन तोड़ दिए गए हैं और पुलिस अधिकारी यह तक बताने को तैयार नहीं हैं कि उन्हें केवल हिरासत में लिया गया है या गिरफ्तार किया गया है, अथवा उनके विरुद्ध कोई FIR दर्ज की गई है। यहाँ तक कि वकीलों को भी उनसे मिलने की अनुमति नहीं दी जा रही थी।
रात लगभग 2 बजे हम मुखर्जी नगर थाने पहुँचे। वहाँ जो हुआ, उसे देखकर यकीन करना मुश्किल था कि जिस पुलिस को हम कानून का रक्षक मानते हैं, वह कभी-कभी नागरिकों के अधिकारों के प्रति इतना असंवेदनशील व्यवहार भी कर सकती है।
हमने पहले बिना कैमरा चालू किए लगभग 15 मिनट तक अधिकारियों से बातचीत करने और जानकारी लेने की कोशिश की। लेकिन किसी भी अधिकारी ने कोई उत्तर देने से इनकार कर दिया। मजबूर होकर हमें कैमरा चालू करना पड़ा।
हमने देखा कि छात्रों को अलग-अलग पुलिस वाहनों में बैठाया जा रहा था और उन्हें किसी अन्य स्थान पर ले जाने की तैयारी हो रही थी। जब पूछा गया कि उन्हें कहाँ और क्यों ले जाया जा रहा है, तो कोई स्पष्ट उत्तर नहीं मिला। कई पुलिस अधिकारी कैमरे से अपना चेहरा छिपाते दिखाई दिए। हमने थाना प्रभारी से मिलने की भी कोशिश की, लेकिन उन्होंने भी मिलने से मना कर दिया।
इसी पुलिस स्टेशन में महात्मा गांधी की तस्वीर लगी हुई है और डी.के. बसु (D.K. Basu) दिशानिर्देशों का उल्लेख भी किया गया है। कानून स्पष्ट है—किसी व्यक्ति को हिरासत में लेने पर उसके परिवार को सूचित किया जाना चाहिए और उसे अपनी पसंद के वकील से मिलने तथा कानूनी सलाह लेने का अवसर दिया जाना चाहिए।
पुलिस का कहना था कि छात्रों को मेडिकल परीक्षण के लिए ले जाया जा रहा है। लेकिन यदि उन्हें कई घंटे पहले ही हिरासत में लिया गया था, तो रात 2 बजे अचानक मेडिकल कराने की आवश्यकता क्यों पड़ी? इस प्रश्न का भी किसी के पास कोई उत्तर नहीं था।
यह वीडियो लगभग 17 मिनट का है, लेकिन यदि आप इसे पूरा देखेंगे तो समझ पाएँगे कि किस प्रकार जवाबदेही की जगह केवल “ऊपर से आदेश है” कहकर संवैधानिक और कानूनी दायित्वों से बचने की कोशिश की जाती है।
कई छात्रों ने आशंका व्यक्त की है कि जंतर-मंतर से हिरासत में लिए गए छात्रों के विरुद्ध झूठे या अनुचित FIR दर्ज किए जा रहे हैं। परिवारजनों ने हमें यह भी बताया कि जब उन्होंने पुलिस अधिकारियों से जानकारी माँगी तो उन्हें कहा गया कि “घर चले जाइए, नहीं तो आपके ऊपर भी FIR दर्ज कर दी जाएगी।”
यदि कोई सामान्य नागरिक अपने हिरासत में लिए गए बेटे, बेटी, भाई या बहन से मिलने की भी कोशिश न कर सके और पुलिस का रवैया ऐसा हो, तो सोचिए उन परिवारों पर क्या बीतती होगी।
यदि इस देश के युवा शांतिपूर्ण ढंग से अपने अधिकारों की माँग कर रहे हैं, तो क्या उनके साथ लाठीचार्ज करना और आधी रात को इस प्रकार का व्यवहार करना उचित है? क्या पुलिस की भी कोई जवाबदेही नहीं है?
हर अधिकारी का केवल एक ही उत्तर था - “ऊपर से आदेश है।” लेकिन यह “ऊपर” कौन है? आदेश किसने दिए? और क्या कोई भी आदेश संविधान और कानून से ऊपर हो सकता है?
यह वीडियो लंबा है, लेकिन यदि संभव हो तो इसे पूरा अवश्य देखिए। विशेष रूप से मेरे सभी अधिवक्ता साथियों और कानूनी समुदाय से मेरा आग्रह है कि इस पर अपनी आवाज़ उठाएँ। कानून-व्यवस्था की पहली सीढ़ी एक पुलिस थाना होता है। यदि राजधानी दिल्ली में, हर विरोध प्रदर्शन के दौरान, पुलिस मानवाधिकारों और कानूनी दिशानिर्देशों की अनदेखी करती रहे, तो यह केवल प्रदर्शनकारियों का नहीं बल्कि पूरे विधि-तंत्र का प्रश्न बन जाता है।
यदि देश की राजधानी में यह स्थिति है, तो देश के दूर-दराज़ इलाकों में नागरिकों के साथ क्या हो रहा होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है।
सवाल बड़े हैं। लड़ाई लंबी है। लेकिन जहाँ भी नागरिकों के अधिकारों की रक्षा की आवश्यकता होगी, हम अपने साथियों के साथ खड़े रहेंगे।
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मोदी ही नहीं चाहिए ये clear हो गया है.. मोदीजी आप क्यों ज़बरदस्ती लोगों के मम्मी पापा मसीहा बने हो, लोग नहीं चाहते है आपको.. इतना मौज काट लिया है झूठ फरेब करके, अब देश को बख्स दो न प्लीज
सलूट इस लड़के को...
पुलिस लाठी मार रही है लेकिन वह पुलिस की बर्बरता अपने मोबाइल में रिकॉर्ड कर रहा है... कितना मारोगे दिल्ली पुलिस यह बच्चे तुम्हारी लाठी से डरने वाले नहीं
भारी बारिश नार्थ सिक्कम में तिस्ता नदी ने वही रौद्र रूप धारण किया है, जो अक्तूबर 2023 में किया था। बारिश और बादल फटने की घटनाओं से तिस्ता का जलस्तर 35-40 फीट बढ़ा है। कई रोड और ब्रिज बह गए हैं। एक मिलिट्री कैंप लैंडस्लाइड के बाद 3 की मौत और छह जवान लापता हैं। 2023 में तिस्ता नदी की बाढ़ में 18 लोगों की मौत और लगभग 98 लोग लापता हुए थे, जिसमें 22 सेना का जवान भी शामिल थे।
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अहमदाबाद में साबरमती नदी को साफ करने के लिए, नदी के पूरे पानी को निकाला गया है, 12th may से 5th जून तक नदी को साफ किया जाएगा। 6 साल के बाद ये सफाई की जा रही है #sabarmati#riverfront#साबरमती#ahemdabad#अहमदाबाद
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જય જય શ્રી રામ.