पहले रोहित वेमुला, फिर पायल तड़वी और अब IIT बॉम्बे में बीटेक द्वितीय वर्ष के दलित समाज के छात्र साहिल वाकोड़े की संस्थानिक हत्या क्या दलित समाज के छात्र इन बड़े-बड़े संस्थानों में मरने के लिए जाते हैं?? साल दर साल समय आगे बढ़ता गया लेकिन देश के बड़े शिक्षण संस्थानों में जातिवाद
◾️आरक्षण का दायरा अब बढ़ना चाहिए
◾️एससी (SC) आरक्षण 21% से बढ़ाकर 30% करना चाहिए।
◾️एसटी (ST) आरक्षण 6% से बढ़ाकर 15% करना चाहिए।
◾️ओबीसी (OBC) आरक्षण 27% से बढ़ाकर 55% करना चाहिए।
◾️सवर्ण(EWS) आरक्षण को समाप्त कर देना चाहिए।
क्योंकि यह बरसों से 100% आरक्षण लेते आए हैं
रिपोस्ट 🫵 😡😡
कोरी चमार को आगे बढ़ने नहीं देंगे ,जूता मारके आरक्षण खत्म कराएंगे वीडियो ,उत्तर प्रदेश जिला जालौन का बताया जा रहा हे @Uppolice@jalaunpolice तत्काल एक्शन लें ओर कड़ी कार्यवाही करें
वंचितों की हिस्सेदारी के विरोधियों का दोहरा चरित्र देश के सामने है। पहले ‘आरक्षण हटाओ’ और अब ‘आरक्षण में सुधार’ की मांग करने वालों से तत्काल “सौहार्दपूर्ण वार्ता” लेकिन अपने संवैधानिक अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने वाले छात्रों पर लाठीचार्ज, आख़िर ये कैसा सौहार्द है, नड्डा जी?
एक तरफ वार्ता की तस्वीरें, दूसरी तरफ छात्रों पर लाठियाँ, यह दोहरा चरित्र अब किसी कीमत पर बर्दाश्त नहीं होगा।
24 सितंबर 1982 को मान्यवर कांशीराम साहब ने पूना पैक्ट के 50 साल पूरे होने पर पूरे देश में “धिक्कार दिवस” मनाया था। यह कोई साधारण विरोध नहीं था, बल्कि एक अकाट्य राजनीतिक और सामाजिक समझ का नायाब उदाहरण था।
परम पूज्य बाबा साहेब ने जिस पूना पैक्ट पर बड़े दुखी मन से हस्ताक्षर किए थे, आज उसी पूना पैक्ट का दुष्परिणाम “Depressed Classes (वंचित वर्ग)” के सामने है। यही कारण है कि जब केंद्रीय मंत्री जेपी नड्डा जी आरक्षण विरोधियों से मुलाकात करते हैं, तो बहुजन समाज के सामने कई गंभीर सवाल खड़े होते हैं।
किसान आंदोलन पर जिस सरकार ने 13 महीने बाद सुध ली, पेपर लीक के जनव्यापी आंदोलन के आंदोलनकारियों से नड्डा जी एक महीने बाद मिलने का समय निकाल पाए, लेकिन जैसे ही जातीय वर्चस्व बनाए रखने की जिद लिए कुछ मुट्ठीभर लोग भाजपा-RSS के दिल में छुपे एजेंडे को लेकर इकट्ठा होते हैं, तो तुरंत “सौहार्दपूर्ण वार्ता” होने लगती है।
सरकार को जवाब देना होगा कि ऐसे लोगों से आखिर क्या बात हुई और आरक्षण को लेकर सरकार का रुख क्या है?
आरक्षण कोई राजनीतिक खैरात नहीं, बल्कि सामाजिक गैर-बराबरी के रहते संविधान द्वारा सुनिश्चित प्रतिनिधित्व और सामाजिक न्याय की व्यवस्था है। जब तक भेदभाव और गैर-बराबरी कायम है, तब तक आरक्षण भी कायम रहेगा।
मुट्ठीभर जातंकवादियों की आड़ में वंचितों की संवैधानिक हिस्सेदारी को कमजोर करने की साजिश कर रहे सरकार के पिट्ठुओं, कान खोलकर सुन लो! भीम आर्मी-आजाद समाज पार्टी (कांशीराम) 24 सितंबर, पूना पैक्ट दिवस पर दिल्ली में एक बड़ा जनांदोलन करके संविधान की ताकत का एहसास कराएगी।
जय भीम! जय भारत! जय मंडल!
जय संविधान! जय आरक्षण!