राजस्थान में 2 महीने में 18 प्रेग्नेंट महिलाओं की मौत हो गई.
पत्रकारों ने सवाल पूछा तो स्वास्थ्य मंत्री कहते हैं- जवाब ब्रेक के बाद!!
फिर हंसने लगे.
तनिक भी शर्म नहीं है 🥺😳
Nobody wants #Journalism to die. The person who can save this today is @sudhirchaudhary. Convince him to end his farcical show on TV. Take him to Tihar.
If Sudhir wants to make a point, he can start by becoming an official party spokesperson but please spare Journalism. Don't turn your profession into political campaign tool.
जंतर-मंतर पर सोनम वांगचुक के अनशन का आज 18वां दिन है।
18 दिनों से देश सुन रहा है, लेकिन सत्ता खामोश है।
अगर सरकार छात्रों और जनता की आवाज़ का जवाब नहीं दे सकती, तो ज़िम्मेदारी तय होनी चाहिए। संबंधित मंत्री को अपने पद पर बने रहने का नैतिक अधिकार नहीं बचता—उन्हें इस्तीफ़ा देना चाहिए।
और यदि इस लंबे अनशन के दौरान सोनम वांगचुक की सेहत को कोई गंभीर नुकसान पहुँचता है या कोई अनहोनी होती है, तो इसकी नैतिक और राजनीतिक ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार की होगी। तब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, भाजपा सरकार और संबंधित मंत्रालय को देश के सामने जवाब देना होगा कि 18 दिनों तक एक शांतिपूर्ण आंदोलन की अनदेखी क्यों की गई।
लोकतंत्र में संवाद ही समाधान का रास्ता है, खामोशी नहीं।
2 महीने में 18 गर्भवती महिलाओं की अस्पतालों में मौत हो जाती है, 50 से ज़्यादा महिलाओं की तबीयत खराब हो जाती है, और जब राजस्थान के इस स्वास्थ्य मंत्री से सवाल पूछे जाते हैं, तो इन साहब का जवाब आता है Let's meet after the break.
साहब राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री है ! और एक संवेदनहीन व्यक्ति भी, जिसे अपने पद की गरिमा और उसकी जिम्मेदारी का मजाक बनाकर रखा है।
आप हमारे जैसे प्रतियोगी छात्रों के लिए वर्तमान भारत में महात्मा गांधी जी के समान है।
एक ऐसा इंसान जिसमें गांधी जी की तरह हाशिए पर स्थित लोगों के लिए कुछ कर गुजरने की ललक है।
@Wangchuk66 more power to you SIR.........
वरना इसी बहस में आपका मुद्दा उलझ कर रह जाता कि भारत जोड़ो यात्रा में शामिल होने के लिए राहुल ने किसी को ट्रोल नहीं किया। राहुल गांधी महीनों पैदल चले जा रहे हैं। ये क्यों नहीं आ रहे हैं, वो क्यों नहीं आ रहे हैं।बहुत से आपके समर्थक भी जंतर मंतर नहीं आ सके होंगे। मूल बात है कि क्या इस देश में पेपर लीक से डॉक्टर बनना मंज़ूर है? क्या लाखों रुपये देकर सॉल्वर से मेडिकल परीक्षा पास की जा सकती है? धर्मेंद्र प्रधान को काफ़ी समय मिला है अपने मंत्रालय में। वे एक ईमानदार परीक्षा व्यवस्था देने में नाकाम रहे हैं। शिक्षा की हालत तक तो बात ही नहीं पहुँची है। वाइस चांसलर के रैकेट का अध्ययन ही नहीं है कि कौन लोग बनाए जाते हैं और संस्थान की साख ज़ीरो होने के बाद भी हीरो बनकर सालों साल से पद पर बने रहते हैं।
शिक्षा राजनीतिक मुद्दा है। ग़ैर राजनीतिक कहने का कोई मतलब नहीं है। यह सच है कि भारत का युवा शिक्षा से पीड़ित है फिर भी उसका राजनीतिक मुद्दा नहीं है। इसलिए इस मुद्दे पर लड़ना दीवार से सर टकराना है। यही चुनौती आपकी है और राहुल गांधी की भी होने वाली है, जो शिक्षा का मुद्दा लेकर राज्यों में रैली करने जा रहे हैं। हो सकता है आपकी तरह उन्हें भी युवाओं से हताशा का सामना करना पड़े। क्या राहुल गांधी शिक्षा के मुद्दे पर राजनीति में हलचल मचा देंगे?उन्हें कोशिश तो करनी ही चाहिए। धर्म का मुद्दा लेकर राहुल निकलते तो उनकी पार्टी के हज़ारों विधायक हो गए होते। सबसे आसान है धर्म की राजनीति और असंभव है शिक्षा के मुद्दे पर देश को झकझोर देने की राजनीति। शिक्षा का मसला संवेदनशील होता तो आज भारत कबाड़ कॉलेजों का महासागर नहीं होता।
सोनम वांगचुक के साथ नेहा, मनीष, दानिश, आमीन, दीपक, ह्रषिकेश अनशन पर हैं। सभी के स्वास्थ्य की चिंता है। सभी ने शानदार कोशिश की है और सभी से अपील है कि अनशन तोड़ दें।
The person who can save Sonam Wangchuk’s life today is NARENDRA MODI. Convince him to end his Ego Strike.
Ask him to sack Dharmendra Pradhan.
No wonder you guys have downgraded India to 157th rank in the world.
ईमानदार पत्रकार उर्फ (..........) वैसे भी जब अन्ना हजारे आंदोलन पर बैठे थे तो उनकी उम्र 73 साल थी,
और अगर तुम्हारे पेट में इस आंदोलन को लेकर इतना ही मरोड़ है, तो फिर माइक लेकर बच्चों के भविष्य के लिए पेपर लीक पर सरकार से सवाल पूछ लो ना, न जाने कितने बच्चों ने सुसाइड कर लिया, सबकी भावनाओं के साथ मत खेलो तुम!
Hello
@Wangchuk66 जी एक संदेश आपके लिए
अब वो दौर चल रहा है जहां लड़ाइयाँ जिंदा रहकर लड़ी जानी चाहिए, न कि अनशन करके जिदंगी दांव पर लगाकर।
क्रांतिकारियों के बारे में हमने सुना है
और पढ़ा भी है
पर सोनम वांगचुक जी को देखकर लगता है
कि क्रांतिकारी ऐसे ही रहे होंगे
जो खुद जलकर दूसरों के जीवन में उजाला कर देते हैं
तो अब एक ही गुजारिश है मेरी
कि अनशन की टेंशन मत लीजिए
खाना खाइए
देश नहीं खोना चाहता है आपको,
आप जरूरी है बहुत,
पर्यावरण की लड़ाई भी अभी बाकी है याद है न आपको,
तो इन सभी लड़ाइयों से लड़ने के लिए जीना जरुरी है
जिसके लिए दिमाग के साथ साथ शरीर का भी स्वस्थ होना जरूरी है तब जीत संभव होगी
और शरीर स्वस्थ होने की पहली जरूरत भोजन ही है।
आप इस गलतफहमी में मत रहिए
कि अन्ना हज़ारे ने भी अनशन से सरकार को झुका दिया था तब सरकार पर नैतिक दबाव बनाया जा सकता था आज की सरकार वैसे नहीं है
सत्ता में बहुत ही ढीठ लोग हैं इस समय,
इन पर कोई असर नहीं होगा
भले आप अपनी जिदंगी दांव पर लगा दे
भूख हड़ताल से इस सरकार को बिल्कुल झुकाया नहीं जा सकता क्योंकि मैने अपनी आंखों से देखा है किसान आंदोलन में सैकड़ों किसानों को शहीद होते हुए,
निरंकुश सरकार को कोई असर नहीं हुआ था
बल्कि सरकार ने यहां तक कह दिया था
"मेरे लिए मरे हैं क्या"
तो plz
अनशन तोड़िए
छात्रों को,लद्दाख की जनता को और इस देश को जरूरत है आपकी।
सभी बहुत चिंतित हैं। सरकार को बात करनी चाहिए। सरकार नहीं करती है तो समाज को आगे आना चाहिए। सोनम के साथ-साथ छात्र भी अनशन पर बैठे हैं। कितने साल तक परीक्षाओं में चोरी और धांधली को यह देश स्वीकार करेगा। 13 साल बीत गए फिर भी परीक्षाएँ विश्वसनीय नहीं हो सकी हैं। बात केवल परीक्षा की नहीं है, पढ़ाई के मामले में भी जो नुकसान हुआ है, वहाँ से वापसी करना संभव नहीं है।
इसी अवसर पर गंगा की सफाई और अविरलता को लेकर प्रो जी डी अग्रवाल के अनशन को याद करने की ज़रूरत है। 2018 में 109 दिनों के अनशन के बाद उनकी मौत हो गई थी। तब काफी सवाल उठे थे। मीडिया की पुरानी रिपोर्ट आप देख सकते हैं। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी को तीन तीन पत्र लिखे। उन पत्रों को निकाल कर पढ़ सकते हैं। गंगा के लिए प्रो जी डी अग्रवाल ने जान दे दी और गंगा के नाम पर राजनीति करने वालों ने उन्हें भुला दिया। गंगा की समस्याओं का समाधान करने के बजाए गंगा के घाट पर आरती का आयोजन कर लोगों के सवालों की धारा मोड़ दी गई। अच्छा होता कि प्रो जी डी अग्रवाल को सुना जाता, गंगा भी साफ होती और तब उसके किनारे आरती की शोभा और दिव्य होती। जो मीडिया जंतर मंतर नहीं जा पा रहा है वह गंगा के नाम पर प्रो जी डी अग्रवाल के अनशन की कहानी के पन्ने फिर से पलट सकता है। गंगा के लिए तो बोल ही सकते हैं।