🚨 Breaking: According to my CJP insider,
Abhijeet Dipke has issued this notification in his group outlining their plan.
- Buy fake Delhi Police uniforms.
- Wear bhagwa-coloured clothes.
- Carry blades and other weapons.
- Bring their children along.
- Keep children at the front while attacking anyone.
CJP's Plan:
- Provoke the police into taking action against them.
- Play the victim and display sympathy cards if the police retaliate.
- Attempt to bring regime change in India tomorrow.
It's time for Hindus to unite. Don't let Abhijeet Dipke manipulate you. If he wins tomorrow, India will go back to 2007, when Hindus couldn't even walk safely.”🙏
@IndianExpress और @ABPNews पहले ग़लत न्यूज फैलाते हैं फिर भूल सुधार कर लेते हैं तब तक विपक्ष उसको हथियार बना लेता हैं ये सब जान बूझकर किया जाता हैं पर सरकार इस पर मौन हैं फेंक न्यूज से देश में भले ही अराजकता फैले,इनकी कारगुजारियों से आम जनता का जीना दुभर हो गया हैं @narendramodi
बंगाल में जब भाजपा के कार्यकर्ता मारे जा रहे थे, उस समय तक 135 लोग मारे जा चुके थे। मैं तभी से आलोचना कर रहा था कि आप लोग आखिर कर क्या रहे हैं? उनकी कोई सूची तक नहीं थी। मैं एक दिन में बीस-बीस लोगों से मिला हूँ, आठ-दस लोगों के इंटरव्यू किए हैं। वे इंटरव्यू आपको आराम से मिल जाएंगे if not deleted.
मुझे उसी समय भागवत की नीचता भी दिख गई थी, जब उन्होंने मुझसे कहा था कि संघ ने हिंदुओं का ठेका ले रखा है क्या?
भाई, उन लोगों का नाम लेकर आपने क्या किया? आप डराते रहे कि कोई और मर जाएगा, इसको मार दिया, उसको मार दिया। लेकिन उनके लिए किया क्या? उनसे मिलने के लिए 26 जनवरी को बुला लिया, बस यही सब करते रहे। क्या भाजपा का कार्यकर्ता नहीं मर रहा था? क्या एक पत्रकार के तौर पर हम इस पर चुप रह जाते? नहीं रह सकते, हमारी आत्मा कचोटती है।
मैं उस पत्नी से मिला हूँ, जिसके पति की गर्दन काटकर धड़ फेंक दिया गया और सिर को एक टोपी में रखकर किसी अनजान ट्रेन में छोड़ दिया गया। सिर्फ इसलिए, क्योंकि वह भाजपा का कार्यकर्ता था।
इसलिए मुझे देशभक्ति और राष्ट्रवाद का ज्ञान मत दीजिए। इतने वर्षों से घास नहीं छील रहा हूँ। मैं किसी घटिया कॉलेज का बीटेक इंजीनियर नहीं था, जो फेल होकर पत्रकारिता में आ गया। मैं जो करता हूँ, पूरे कन्विक्शन के साथ करता हूँ। और उसकी एक पूरी प्रक्रिया है। मैं जिस विषय को पकड़ता हूँ, उसके लिए पूरी दुनिया एक तरफ हो जाए, तब भी मैं पीछे हटने वाला नहीं हूँ।
ट्रोल से हमको घंटा फर्क नहीं पड़ता। नौ-दस महीने से ट्रोल झेल रहे हैं, क्या उखाड़ लिया मेरा? YouTube और Twitter पर मेरी इंगेजमेंट बढ़ी है, लोग अधिक जुड़ रहे हैं। तुम्हारी रैलियों में लोगों की संख्या घट रही है, तुम्हारी थू-थू हो रही है।
एक मिनट को मान लेता हूँ कि योगी जी 350 सीटों के साथ वापसी करेंगे, जैसा बहुत सारे लोग कह रहे हैं। ठीक है, जीत भी जाएँ, तब भी UGC उचित नहीं हो जाएगा। दोनों अलग चीजें हैं। हो सकता है लोगों को UGC से फर्क नहीं पड़ता हो, लेकिन एक व्यक्ति और पत्रकार के तौर पर मुझे तो फर्क पड़ेगा।
मान लीजिए, राजनीतिक रूप से मैं गलत साबित हो जाऊँ। दिल्ली यूनिवर्सिटी में ABVP जीत गई, तो क्या इसका मतलब यह है कि वहाँ के विद्यार्थियों को UGC याद नहीं है या वे इसे मुद्दा नहीं मानते? यह तो हमारे मुँह पर सबसे बड़ा तमाचा है। मानेंगे या नहीं? लेकिन उस तमाचे के बाद भी मेरा प्रश्न वही है, क्या UGC के प्रावधान उचित हैं? इस बिंदु पर सोचिए।
IT सेल वालों का जीवन दूसरों पर लांछन लगाने में निकल गया और ये हमें ज्ञान देंगे!
“मैं भी असमंजस में हूँ। मोदी जी को हारते नहीं देखना चाहता। मैं चाहता हूँ कि स्थिति बदले।”
यही भाव मेरे भी थे। लेकिन हम अपनी बात ठीक करवाने के लिए दबाव किस पर बनाएँ?
तिलचट्टे बीस-तीस दिन बैठे, सरकार झुक गई और ठीक उसी माँग को माना, जिसे मैं फरवरी से उठा रहा था। मैं अपनी बात छोड़ दूँ? बाकी लोग भी प्रधान के इस्तीफे की माँग कर रहे थे। वह सांकेतिक माँग थी, उसे मान लेते, लेकिन वह भी नहीं हुआ।
हम तो लगातार वही बात उठा रहे हैं। UGC पर आज भी स्टे लगा हुआ है। हम जानते हैं कि स्टे क्यों लगा हुआ है। सात महीने में दूसरी तारीख मिलती है। वामपंथियों को राहत दिलानी हो तो तीन दिन में तीन बार तारीख मिल जाएगी, लेकिन जिस UGC का करोड़ों विद्यार्थियों पर असर पड़ना है, उस पर सरकार सात महीने में दूसरी तारीख लेती है?
और उसमें भी दो लाइन बोलकर भूल जाएँ कि हम रीकंसिडर कर रहे हैं, it can go both ways। आप चाहते हैं कि फिर एक तारीख आए, उसके बाद कोई और तारीख मिले, फिर मार्च के बाद की कोई तारीख आ जाए। तब तक हम यही बोलते रहें कि स्टे लगा हुआ है।
फिर मोहन भागवत से बुलवा लेंगे कि कोई कानून है ही नहीं, जैसे हमें पता ही नहीं कि कानून क्या है और नियमावली क्या है। गिरिराज सिंह से बुलवाया जा रहा है, तो…
जब ये सब कुछ चल रहा था, सबको दिख रहा था कि जो गलत है, सो गलत है, लेकिन किसी बड़े हैंडल ने नहीं लिखा।
चाटुकारों ने कहा, दो दिन बोल लो अजीत भारती, लेकिन तीसरे-चौथे दिन भी बोल रहे हो? तुम्हारी माँ की चिता की आग भी ठंडी नहीं हुई।
दाह संस्कार के बाद मैं चार-पाँच दिन घर में था। संभवतः मैंने फोन तक नहीं देखा, किसी पर प्रतिक्रिया नहीं दी। आकाश ने मुझे रोते-रोते बताया कि क्या-क्या लिखा जा रहा था। वह कह रहा था कि मैंने सब रखा हुआ है, और यह बताते-बताते रो रहा था। मैंने आज तक नहीं देखा कि किसने क्या लिखा था। मुझे लगता है, क्यों देखना? ईश्वर सबका हिसाब करेगा। ईश्वर नहीं, तो समय करेगा, और उनका हिसाब हो भी रहा है।
लेकिन उसके बाद भी आप कहाँ रुक गए, भाई? देश में हर दिन 42 बच्चे आत्महत्या करते हैं। NEET के कारण इतने बच्चे मरे, पेपर लीक के कारण इतना कुछ हुआ। सरकार ने क्या किया? स्कूलों और कॉलेजों में काउंसलर लगाए? नहीं लगाए। कोई नीति देखी आपने?
यह एक तरह की महामारी है। सोचिए, देश में हर दिन 40-42 बच्चे आत्महत्या कर रहे हों, क्या यह पैनिक की स्थिति नहीं है? बच्चे आत्महत्या क्यों करते हैं? मार्गदर्शन की कमी भी इसकी एक वजह हो सकती है।
साहिल वाकोड़े क्यों चला गया? यार, नकल किसने नहीं की अपने जीवन में? अधिकांश लोगों ने की है, 5% को छोड़ दीजिए। कोई कम करता है, कोई ज्यादा, कोई बहुत ज्यादा। बच्चे आपस में हँसी-मजाक में बताते भी हैं कि कैसे फोन निकालकर देख लिया और टीचर पकड़ने ही वाले थे। पकड़ भी लिया तो हँसकर बात खत्म कर दी, मुर्गा बन गए, जो भी सजा मिली, भुगत ली।
लेकिन वह बच्चा मानसिक रूप से कितना अशक्त रहा होगा, अगर इस घटना के बाद उसने आत्महत्या कर ली? उसे काउंसलिंग मिलती, उसे समझाया जाता कि यार, ये सब जीवन के कुछ उतार-चढ़ाव हैं। आगे तुम्हारे जीवन में बहुत कुछ है। अगले सेमेस्टर में सारे पेपर दे देना, ऑड का ऑड में, इवन का इवन। कोई उसे यह समझा देता, तो शायद उस बच्चे का जीवन बच सकता था।
लेकिन आपने देखा, सरकार ने इस पर दो लाइन बोलीं। मैं NEET वाले मामले की बात कर रहा हूँ, साहिल वाकोड़े की आत्महत्या से पहले की। कह दिया, मेरी जिम्मेदारी नहीं है। कोई समाधान दिया आपने? नहीं दिया।
People are looking for a remedy. लोग समाधान चाहते हैं, इलाज चाहते हैं। क्या आपने कभी सोचा कि शिक्षाविदों को बैठाकर इस पर चर्चा की जाए? प्रधानमंत्री को इस पर विचार करना चाहिए।
मैं जिन बातों के लिए प्रधानमंत्री की तारीफ किया करता था कि वे बच्चों से सीधे संवाद करते हैं, अब मुझे लगता है कि कहीं यह सब सिर्फ दिखावा तो नहीं है? बच्चों से बात करने की छवि बननी चाहिए, लेकिन क्या वास्तव में उनकी समस्याओं को समझा भी जा रहा है?
अगर आप बच्चों को लेकर गंभीर हैं, तो इस आँकड़े को कैसे अनदेखा कर सकते हैं? आपके देश में हर दिन 42 बच्चे मर रहे हैं, आधी लड़कियाँ, आधे लड़के। इसके लिए कोई नीति होनी चाहिए या नहीं?
स्टूडेंट काउंसलर होने चाहिए। शिक्षकों को काउंसलिंग की ट्रेनिंग मिलनी चाहिए। हर 100-50 बच्चों पर एक मनोवैज्ञानिक जैसा विशेषज्ञ होना चाहिए, जो बच्चों से संवाद करे, उनकी समस्याएँ समझे और समय रहते उनकी मदद करे। लेकिन आपने यह पूरा क्षेत्र ही छोड़ रखा है।
यही मैं कह रहा हूँ, कहने को मेरे पास बहुत कुछ है। इस विषय पर मैं लगातार, हर दिन बोल सकता हूँ, लिख सकता हूँ, और आप बोर भी नहीं होंगे।
निशु आजाद के एक-एक ट्वीट पर हर जिले में ईशनिंदा कानून के तहत BNS 299/IPC 295A में केस होना चाहिए। ‘हिन्दू लीगल फंड’ को इसमें मोबिलाइज किया जाए।
इसके बाप पर काउंटर FIR होनी चाहिए। उसको बहुत ‘दो मिनट पुलिस नहीं आती’ करना है न, क्या @DelhiPolice इतनी नकारी है कि कोई भी गुंडा प्रवृत्ति का व्यक्ति खुलेआम वीडियो बना कर धमकी देगा?
जब इनको FIR-FIR ही खेलना है, तो यही सही। फिर देखते हैं कि रावण और राहुल कितने थाने घेर लेता है। नरेन्द्र मोदी ने जो बवासीर बना दिया है, वह अब हिन्दू समाज हर दिन झेल रहा है। दुर्भाग्य यह है कि जो इसका प्रयोग कर रहे हैं वो मोदी के वोटर हैं ही नहीं।
India is home to over 2,000 unreached people groups.
That’s nearly 1.4 BILLION people who have little to no access to the Gospel—many who have never heard the name of Jesus even once.
No churches.
No Bibles.
No witness.
This isn’t just a statistic—it’s a call.
“Go into all the world and preach the Gospel…” — Mark 16:15
Let it start with us. 🔥🙏
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India was always a Hindu civilization. Other religions came later, converted many by the sword. The Muslims wanted a separate nation, India was partitioned as muslims used violence and killing to get partition. What remained was a Hindu nation where our forefathers decided that they wanted a modern republic which protected the freedom of religion for all faiths, not the hateful regime the Muslims created. The India of today is a Hindu civilizational nation, a modern republic with full freedom of religion guaranteed by a constitution which we the people, gave to ourselves out of a peaceful choice.
People who say ‘We’ fought for freedom should know their history, their support and the violence of the Muslim league and Muslims who wanted a separate nation and partition. It is this India alone which protects and guarantees the freedom of religion because it is built on Hindu values and Hindus accept the right of all to practice a faith of their choice, not the Muslims of Pak and BD who support a theocracy, practice a religion which denies the right to others to freely practice a religion of their choice, say daily that their God is the only God. They have driven the Hindus and other faiths out and treat them as second class citizens and in Pak by law.
People who say ‘We’ fought for freedom got their Pakistan which they wanted.
Let us not have these bigots who support fundamentalists, who support those who kill Hindus propagate a fake history.
फैक्ट चेक-
अरफा ने जिन नामों की सूची प्रस्तुत की है उनमें से अब्दुल गफ्फार खान ने खैदाई खिदमगार आंदोलन चलाया. उनको सीमांत गांधी भी कहा गया परंतु वह आंदोलन पश्तूनों के बीच सामाजिक सुधार को लेकर था. इसको स्वतंत्रता आंदोलन नहीं कह सकते.
गफ्फार खान आजादी के तुरंत बाद भारत छोड़कर पाकिस्तान चले गए थे. उन्होंने फरवरी 1948 में पाकिस्तान की संविधान सभा के सदस्य के रूप में वफादारी की शपथ ली थी. यह अलग बात है कि पाकिस्तान सरकार से उनकी बनी नहीं लेकिन वो भारतीय नहीं थे. न भारत को लेकर उनकी आस्था थी. उन्होंने अपने लोगों के लिए समाज सेवा की.
हाकिम अजमल खान- हाकिम अजमल खान कितने बड़े स्वतंत्रता सेनानी थे इसका अंदाजा इस बात से लगा लीजिए कि ब्रिटिश सरकार द्वारा इनको 'हाज़िक-उल-मुल्क' (Best doctor of The Country) खिताब से नवाजा जा चुका है. अंग्रेजों के साथी रहे बाद में उम्मा के नाम पर खिलाफत आंदोलन से जुड़े. 1919 में वे मुस्लिम लीग के अध्यक्ष बने, वही मुस्लिम लीग जिसने पाकिस्तान बनाने के लिए हिंदुओं के देश में हिंदुओं का रक्त बहाया. मुसलमानों का साथ प्राप्त करने के लिए गांधी जी ने उनको कांग्रेस से जोड़ा.
हसरत मोहानी-हसरत मोहानी उन मुस्लिम नेताओं में से थे जिन्होंने मुसलमानों के लिए एक अलग देश पाकिस्तान की जोर शोर से वकालत की. 1946 में मुस्लिम लीग के टिकट पर यूपी से चुनाव जीते थे. फिर जब पाकिस्तान बना वे भारत में ही रहे क्योंकि उनको लगता था भारत अब भी बहुत विशाल है और उसके और भी टुकड़े होने चाहिए. पाकिस्तान में उनके सम्मान में कराची में एक कॉलोनी और एक सड़क का नाम हसरत मोहानी रोड रखा गया है.
मौलाना महमूद हसन देवबंदी - मित्रों दारुल उलूम देवबंद का तो जानते ही हैं आप... राष्ट्रविरोधी तत्वों का गढ़ रहा है. यहीं के छात्र रहे मौलाना महमूद हसन देवबंदी ने रेशमी पत्र आंदोलन चलाया. असल में ये तुर्की (ओटोमन साम्राज्य) के लिए चलाया गया आंदोलन था. आप कहेंगे लेकिन इसको भारत में चलाया गया उत्तर है हाँ, क्योंकि भारत में उस समय ब्रिटिश शासन था. यह आंदोलन ब्रिटिश शासन के विरुद्ध तो था लेकिन भारतीय हिंदुओं के लिए नहीं था. उद्देश्य ब्रिटिश सत्ता की समाप्ति थी लेकिन देश को इस्लामिक बनाए रखना भी था.
असल में अंग्रेजों के आने से पहले देश के बड़े हिस्से पर मुसलमानों का शासन था. अंग्रेजों के आने के बाद धीरे-धीरे मुस्लिम शासक और नवाब न केवल कमजोर हुए बल्कि शक्तिहीन होकर सत्ता से बेदखल भी हुए. सत्ता पर अंग्रेजों ने कब्जा करना शुरू किया. तो इन मुस्लिमों को सत्ता पाने के लिए अंग्रेजों से ही लड़ना था. यही स्थिति स्थानीय हिंदू शासकों की थी.
धीरे-धीरे राजतंत्र समाप्त हो गया. परंतु अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष चलता रहा. इस संघर्ष ने जब आंदोलन का रूप धरा तो आमजन भी इससे जुड़े. जैसे-जैसे देश की आजादी का समय निकट आने लगा मुसलमानों ने अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया. अधिकतर मुसलमानों ने पाकिस्तान बनाने के लिए वोट किया. मुस्लिम लीग सभी मुस्लिम बहुल इलाकों में जीत गई थी.
100 बात की एक बात तो यही है कि यदि मुसलमानों की आस्था भारत में ही थी तो पाकिस्तान बना ही क्यों?
रूबिका लियाकत को सिर्फ इसलिए टारगेट किया जाता है क्योंकि यह हमेशा सत्य का साथ देती है।
भारत में रहकर भारतीय सभ्यता संस्कृति को समझती है और उसका सम्मान करती है।
लेकिन, मोहम्मद जुबैर जैसे घुसपैठिए जो गांधी और नेहरू की वजह से भारत में रह गए, वह हमेशा भारतीय सभ्यता संस्कृति का मजाक उड़ाते है तथा रूबिका लियाकत जैसे राष्ट्रवादी पत्रकारों को टारगेट करते है, जुबैर जैसे लोग भारतीय संस्कृति के लिए घातक है।
भारत का हर राष्ट्रवादी नागरिक रूबिका लियाकत और उनकी निड़र पत्रकारिता का सम्मान करते हैं।
“Previous governments compromised NATIONAL SECURITY for politics.” — PM Narendra Modi in Gandhinagar
If security is politics’ tool, who holds decision-power?
#IndianPolitics#NationalSecurity#WhoDecides