वनस्पति जगत से जुड़ा एक ऐसा पत्ता जो जलने पर बाती और बुझने पर धूप सा परिणाम देता है..
क्या आप भी इसको पूर्व में जानते थे??
इसकी खोज पांडवों के द्वारा की गई और फिर बाद में यह उनके ही नाम से विख्यात हुई..
इस विलक्षण गुण के कारण ही इसको..1/2
जब इनकीं शादी हो रही थी तब कुछ भारत के लोगो ने इनकीं हँसी उड़ाई थी कि पैसा बोलता है
आज इनका टेलेन्ट देखिये ।
धाराप्रवाह बोलने वाले अनंत अम्बानी का भाषण, शब्दों का चयन काबिले तारीफ
अविश्वसनीय है
बहुत ही ज्ञानवर्धक और रोचक वीडियो…
इस वीडियो में भारतीय कागजी मुद्रा के पुराने से लेकर वर्तमान स्वरूप तक के सफर को बेहद दिलचस्प और सरल तरीके से प्रस्तुत किया गया है। यह वीडियो न केवल हमारी मुद्रा में समय के साथ आए बदलावों को समझने का अवसर देता है, बल्कि भारत के आर्थिक और ऐतिहासिक विकास की झलक भी दिखाता है।
आप भी इस वीडियो को जरूर देखें और अपने बच्चों को भी दिखाएं, ताकि वे हमारी भारतीय मुद्रा के इतिहास, उसके बदलते स्वरूप और उसके विकास को रोचक तरीके से समझ सकें।
सामाजिक संगठन इस ओर ध्यान दे🙏
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भविष्य की एक ज्वलंत समस्या
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👉🏿 जब बच्चों का विवाह
20 साल में होता था, तो
एक सदी में 5 पीढ़ियाँ होती थीं.
👉🏿 जब बच्चों का विवाह
25 साल में होता था, तो
एक सदी में 4 पीढ़ियाँ होती थीं.
👉🏿 अब बच्चों का विवाह
30 साल में होता है, तो
एक सदी में 3 पीढ़ियाँ होती हैं.
👉🏿 सोचने वाली बात है.
क्या हमारा समाज
अगली सदी तक जीवित रहेगा ?
आज एक अजीब सा
अंधेरा फैल रहा है.
🏚️ गली-मोहल्ले वीरान हैं,
आस-पास के घर खाली हैं.
आज घरों में बच्चों की आवाज कम
पति-पत्नी की आवाज
ज्यादा सुनाई देती है.
★ लड़कियाँ 30-35 साल तक
कुंवारी हैं.
★ लड़के 35 साल के बाद भी
कुँवारें घूम रहे हैं.
★ देर से शादी ...
फिर सम्बंध विच्छेद (तलाक)
टूटते परिवार ...
दुखी माँ-बाप.
माता-पिता अकेले..
पूरी पीढ़ी खालीपन अनुभव करती है.
🤷🏻♀️ क्या हम इसे
"पढ़ा-लिखा समाज" कहें या
"स्वयं को नुकसान पहुँचाने वाला समाज"
💁🏻♂️ यह तो जनसंख्या कम करने की
एक खामोश साज़िश है.
★ अगर 50 जोड़ों में
सिर्फ़ एक बच्चा हो
तो अगली पीढ़ी में
सिर्फ़ नाममात्र के बच्चे होंगे.
👉 अगर ऐसा ही चलता रहा,
तो तीसरी पीढ़ी लगभग
गायब हो जाएगी.
👉 मोहल्ले,गलियाँ खाली पड़ी हैं.
सब लोग रोड़ पर हैं.
जीवन का आधा समय तो
रोड़ पर ही बीत जाता है.
★ गाँव के गाँव खत्म हो रहे हैं.
★ शहरों में ऊँची इमारतें हैं, लेकिन
संयुक्त परिवार प्रथा समाप्त हो गयी है.
👉 नई बहुएं
"सिर्फ़ एक ही बच्चा" चाहती हैं.
🤷🏻♀️ क्या यही समाज है ?
❓ क्या यही हमारे पुरखों की
विरासत है ?
👉 सच तो यह है, कि ....
बच्चे अब प्यार की निशानी नहीं रहे.
बल्कि बच्चे पैदा करना ...
एक मजबूरी सी है.
⚖️ सबसे बड़ी गलती —
लड़की के पिता की है,
वही पिता जिसने
20-22 साल की उम्र में
विवाह करके
परिवार बसाया था.
अब वही पिता 30 साल की उम्र तक
अपनी बेटी का विवाह न करके
बहादुरी दिखा रहे हैं.
👉 परिणाम ????
लड़के लड़कियाँ डिप्रेशन में जा रहे हैं.
👉 आज बच्चों का सही समय पर
विवाह नहीं हो रहा है, और
न सही समय पर
कोई नौकरी मिल रही है.
👉 समाज धीरे-धीरे
समाप्त होता जा रहा है.
👉 इसी कारण बच्चे
समाज के साथ नहीं
अकेले रहना पसंद करते हैं.
यानी एकल परिवार
यहाँ तक कि बच्चे भी नहीं चाहिए.
★ देर से शादी करना
★ देर से बच्चा करना, फिर
एक बच्चे के बाद
मेडिकल और लालन-पालन का
बहाना करना.
💁🏻♀️ यह आम बात हो गई है.
हजारों जवान लड़के लड़कियाँ
उम्र के कारण कुंवारे घूम रहे हैं.
समाज के समझदार लोग
चुप्पी साधे हुए हैं.
★ विवाह, परिवार, बच्चे –
इन सब को बोझ समझा जा रहा है.
🎈 विवाह ... कोई दुनियावी बंधन नहीं
यह घर परिवार और समाज का
स्तम्भ है.
🎈 प्रजाति, सभ्यता और संस्कार को
आगे बढ़ाने का एक तरीका है.
💥 अब हम सब को समझने का
समय आ गया है.
🫵 बच्चों को ‘हद से ज्यादा'
आजादी दे कर हमने उनकी
समझ छीन ली.
★ विवाह टलता रहा, और जब हुआ,
तब तक बहुत देर हो चुकी थी.
फिर वही अकेलापन
🫵 लड़के लड़कियों के लिए
विवाह की सही उम्र
🔹 लड़कों के लिए 25 साल से पहले
🔸 लड़कियों की 20 साल से पहले.
🚩 वर्ना इतिहास लिखेगा ...
“वह हिंदू समाज, जिसने चुपचाप
स्वयं को खत्म कर लिया.”
सोचो और समझदारी दिखाओ.
अपने बच्चों का विवाह
समय पर कीजिये.
🙏
क्योंकि ... परिवार नहीं बचा, तो
समाज को भी देर सवेर
ध्वस्त होते देर नहीं लगनी है.
यही कारण है ...डेविड सेलबॉर्न और
बिल वार्नर जैसे लेखक
यह कहने पर मजबूर हो जाते हैं , कि
★ इस्लाम के मज़बूत
फैमिली सिस्टम की वजह से ...
देर सवेर ... अधिकांश देश
*◆ इस्लाम से हार जायेंगे. ◆*
★
भारत में भी हिन्दू परिवार परम्परा का
पतन होना प्रारम्भ हो चुका है.
रक्त के 5 रिश्ते
समाप्त होने की कगार पर हैं.
ताऊ, चाचा, बुआ, मामा
मौसी जैसे रिश्ते
आने वाले समय में
देखने-सुनने को नहीं मिलेंगे l
कुमार स्कन्दगुप्त का भारत
हूण जाति की नृशंसता इतनी थी कि चीन से लेकर महान रोमन साम्राज्य तक काँप उठे थे। इस अकेली बर्बर जाति का आतंक इतना था कि उसने उस समय के किसी भी बड़े साम्राज्य को रौंदे बिना नहीं छोड़ा।
चीन का विशाल साम्राज्य तो इतना भयाक्रांत हुआ कि उसने हूणों से लड़ने का विचार ही छोड़ दिया और रक्षात्मक होकर खुद को ऊँचे ऊँचे सैकड़ों किलोमीटर की दीवार से घेर लिया।
जब चीन आत्मसमर्पित हुआ तो ये हूण अपनी एक टुकड़ी के साथ यूरोप की ओर दौड़ पड़ा। "आटिला" नाम के उसके सेनापति ने पोलैंड को मिट्टी में मिला दिया फिर एक एक कर यूरोप के बाकी देशों में खून की नदियाँ बहा दी। इन हूणों के कारण विशाल रोमन साम्राज्य मिट्टी में मिल गया तो इस विजयोन्माद में उन हूणों की टुकड़ी ने भारत का भी रुख किया और गांधार प्रदेश पहुँच गये।
वहां विजय प्राप्त कर जब वो सिंध को निगलने आगे बढ़े तो वहां उसे रोकने के लिए वैदिक सूर्य कुमारगुप्त का महान प्रतापी राज्य खड़ा था।
कुमारगुप्त ने इन बर्बर हूणों के समूल नाश के लिए किसी और सेनापति को न भेजकर अपने पुत्र राजकुमार स्कंद को भेजा। हूणों की विशाल और बर्बर टोली को स्कंद ने रौंद दिया और जन वो हूणजयी होकर पाटलिपुत्र लौटे तो वहां उनके स्वागत में वृद्ध पिता कुमारगुप्त ने अश्वमेध यज्ञ किया।
फिर कुमारगुप्त के स्वर्गवासी होने के बाद स्कंद भारत के सम्राट बने।
स्कंद के शासन के उत्तरार्ध में हूणों ने फिर से अपनी शक्ति संकलित की और "खिंखिल" नाम के सेनापति के नेतृत्व में फिर से भारत पर हमलावर हो गया। भारत की सेना शुरुआत में जब परास्त होने लगी तो स्कंद स्वयं ही सेना का संचालन करने पश्चिम भारत की ओर चल पड़े। उधर वो युद्ध में हूणों से जूझ रहे थे और इधर उनके धूर्त भाई पुरुगुप्त ने सत्ता पर छल से कब्जा कर लिया।
सत्ता हड़पे जाने की सूचना महाराज स्कंद को पहुँचा तो उनके सामने दो रास्ते थे।
एक था कि वापस जाकर अपने सौतेले भाई से वापस सत्ता छीन लें और दूसरा ये कि हूणों को युद्ध में धूल चटाये।
महान सम्राट विक्रमादित्य के पौत्र और हिन्दू धर्मध्वजा रक्षक सम्राट स्कंद ने दूसरा विकल्प चुना और युद्ध भूमि में वीरगति को प्राप्त हुये।
दूसरा विकल्प इसलिये चुना क्योंकि अगर वो सत्ता की सोचते और लौट जाते तो बर्बर हूणों के कारण न जाने कितने लोगों को अपनी जान देनी पड़ती, न जाने कितनी ललनाओं की इज़्ज़त लूटी जाती और न जाने कितने देवालय टूटते।
पहले अपनी सत्ता और फिर अपने प्राण की बलि देकर स्कंद ने सबको बचा लिया और मृत्यु पाकर अमर हो गये।
पाटलिपुत्र का महान वैभवशाली सम्राट अपनी राजधानी से हजारों किलोमीटर दूर पंजाब में बलिदान हुये पर बलिदान होने से पहले उन्होंने हूण सेनापति "खिंखिल" को भारत की सीमा से मीलों दूर खदेड़ दिया और धर्म तथा राष्ट्र की सुरक्षा सुनिश्चित की।
स्कंद का व्यक्तित्व चरित्र और राष्ट्रीय चरित्र उन सबके लिए पाथेय है जो सत्ता को सब कुछ समझते हुये राष्ट्र और धर्म की सुरक्षा से मुँह मोड़ लेते हैं पर दुर्भाग्य कि भारत में किसी ने इतिहास से न तो कभी कुछ सीखा और न सीखेंगे।
और ये हो भी क्यों न क्योंकि आज भारत में कितने हैं जिन्हें महान सम्राट स्कंद की ये गाथा याद है और अगर नहीं है तो फिर किसी और से ये उम्मीद करना कि उनका चरित्र स्कंद के चरित्र का अनुगमन करेगा हास्यास्पद ही हैं।
Courtesy shivananda mishra
थ्रेड 2/2
तो झोल ये था कि जैसे ही Order Delivered' मार्क हुआ,
Swiggy ने अपना छोटा सा Commission काटा और बाकी के लाखों रुपये सीधे उस Bank Account में Transfer कर दिए,
जो Scammer ने अपने Fake Restaurant से लिंक कर रखा था,
आपके Credit Card का पैसा बिना किसी रोक-टोक के सीधे ठग की जेब में Legal Money बनकर पहुंच गया,
खुद को सुरक्षित रखने के लिए तुरंत ये 3 आसान Settings तुरंत बदलें,
Card Controls तुरंत अपने Net Banking ऐप में जाएं। Online Transactions (E-com) की Daily Limit सिर्फ ₹2,000 सेट कर दें,
कोई OTP चुरा भी ले तो बड़ा Financial Fraud नहीं कर पाएगा,
No OTP on Call यह नियम गांठ बांध लीजिए,
कोई भी Bank किसी भी Charge को माफ करने के लिए फोन पर OTP नहीं मांगता,
ऐसा Cyber Fraud Call आते ही तुरंत Cut कर दें,
Biometric Lock अपने सभी Payment और Food Delivery Apps पर Fingerprint Lock हमेशा ON रखें,
ताकि कोई आपके फोन को टच भी न कर सके।
🥺
बाज़ार चिल्ला-चिल्ला कर कह रहा है कि ,
आप जो दूध पी रहे हैं, वह नकली है...
आप जो पनीर खा रहे हैं, वह नकली है...
आप जो घी इस्तेमाल कर रहे हैं, वह भी नकली है...
लेकिन अफसोस… आप सुनना ही नहीं चाहते।
जब कोई आपको पनीर ₹800 किलो देना चाहता है, तो आप लेने से मना कर देते हैं;
और ₹300 किलो वाला पनीर खरीद लाते हैं।
आप यह सोचने की ज़रूरत ही नहीं समझते कि कितने दूध से कितना पनीर बनेगा और उस दूध की असल कीमत कितनी होगी।
इसी तरह, कितने किलो दूध से कितना घी निकलता है, यह सामान्य ज्ञान का सवाल है, लेकिन आप उस गणित को जोड़ना नहीं चाहते।
आप चाहते हैं कि ₹500-700 किलो वाला घी शुद्ध हो, जबकि यह असंभव है।
शहद 🍯 का तो मैं प्रत्यक्ष उदाहरण दे सकता हूँ।
बड़ी-बड़ी ब्रांडेड कंपनियां तमाम खर्च निकालने के बाद भी आपको ₹300 किलो से कम का शहद बेच रही हैं।
लेकिन एक असली मधुमक्खी पालक ₹500 किलो से कम पर शहद उपलब्ध करा ही नहीं सकता।
यानी, बाज़ार आपको लगातार आगाह कर रहा है कि आप किस स्तर का माल खा रहे हैं।
मिलावटखोरों को प्रोत्साहन आप ही दे रहे हैं, सिर्फ सस्ते के लालच में।
अगर आप असली और शुद्ध सामान बेचने वालों की हौसला-अफ़ज़ाई करेंगे, तो मिलावट करने वाले धीरे-धीरे हतोत्साहित हो जाएंगे।
आज की प्रतियोगिता में शुद्ध व्यापारी हाशिए पर जा रहे हैं, और मिलावटी माल वाले फल-फूल रहे हैं।
आईए… बदलाव की शुरुआत हमसे हो।
सिर्फ सरकार पर भरोसा मत कीजिए,
जन-जागरण का जिम्मा हम सबको उठाना होगा।
जागो ग्राहक जागो।
।
एक पंडितजी को नदी में तर्पण करते देख एक फकीर अपनी बाल्टी से पानी गिराकर जाप करने लगा कि..
"मेरी प्यासी गाय को पानी मिले।"
पंडितजी के पूछने पर उस फकीर ने कहा कि...
जब आपके चढाये जल और भोग आपके पुरखों को मिल जाते हैं तो मेरी गाय को भी मिल जाएगा.
इस पर पंडितजी बहुत लज्जित हुए।"
यह मनगढंत कहानी सुनाकर एक इंजीनियर मित्र जोर से ठठाकर हँसने लगे और मुझसे बोले कि -
"सब पाखण्ड है जी..!"
शायद मैं कुछ ज्यादा ही सहिष्णु हूँ...
इसीलिए, लोग मुझसे ऐसी बकवास करने से पहले ज्यादा सोचते नहीं है क्योंकि, पहले मैं सामने वाली की पूरी बात सुन लेता हूँ... उसके बाद ही उसे जबाब देता हूँ.
खैर... मैने कुछ कहा नहीं ....
बस, सामने मेज पर से 'कैलकुलेटर' उठाकर एक नंबर डायल किया...
और, अपने कान से लगा लिया.
बात न हो सकी... तो, उस इंजीनियर साहब से शिकायत की.
इस पर वे इंजीनियर साहब भड़क गए.
और, बोले- " ये क्या मज़ाक है...??? 'कैलकुलेटर' में मोबाइल का फंक्शन भला कैसे काम करेगा..???"
तब मैंने कहा.... तुमने सही कहा...
वही तो मैं भी कह रहा हूँ कि.... स्थूल शरीर छोड़ चुके लोगों के लिए बनी व्यवस्था जीवित प्राणियों पर कैसे काम करेगी ???
इस पर इंजीनियर साहब अपनी झेंप मिटाते हुए कहने लगे-
"ये सब पाखण्ड है , अगर ये सच है... तो, इसे सिद्ध करके दिखाइए"
इस पर मैने कहा.... ये सब छोड़िए
और, ये बताइए कि न्युक्लीअर पर न्युट्रान के बम्बारमेण्ट करने से क्या ऊर्जा निकलती है ?
वो बोले - " बिल्कुल ! इट्स कॉल्ड एटॉमिक एनर्जी।"
फिर, मैने उन्हें एक चॉक और पेपरवेट देकर कहा, अब आपके हाथ में बहुत सारे न्युक्लीयर्स भी हैं और न्युट्रांस भी...!
अब आप इसमें से एनर्जी निकाल के दिखाइए...!!
साहब समझ गए और तनिक लजा भी गए एवं बोले-
"जी , एक काम याद आ गया; बाद में बात करते हैं "
कहने का मतलब है कि..... यदि, हम किसी विषय/तथ्य को प्रत्यक्षतः सिद्ध नहीं कर सकते तो इसका अर्थ है कि हमारे पास समुचित ज्ञान, संसाधन वा अनुकूल परिस्थितियाँ नहीं है ,
इसका मतलब ये कतई नहीं कि वह तथ्य ही गलत है.
क्योंकि, सिद्धांत रूप से तो हवा में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन दोनों मौजूद है..
फिर , हवा से ही पानी क्यों नहीं बना लेते ???
अब आप हवा से पानी नहीं बना रहे हैं तो... इसका मतलब ये थोड़े ना घोषित कर दोगे कि हवा में हाइड्रोजन और ऑक्सीजन ही नहीं है.
उसी तरह... हमारे द्वारा श्रद्धा से किए गए सभी कर्म दान आदि भी आध्यात्मिक ऊर्जा के रूप में हमारे पितरों तक अवश्य पहुँचते हैं.
इसीलिए, व्यर्थ के कुतर्को मे फँसकर अपने धर्म व संस्कार के प्रति कुण्ठा न पालें...!
और हाँ...
जहाँ तक रह गई वैज्ञानिकता की बात तो....
क्या आपने किसी भी दिन पीपल और बरगद के पौधे लगाए हैं...या, किसी को लगाते हुए देखा है?
क्या फिर पीपल या बरगद के बीज मिलते हैं ?
इसका जवाब है नहीं....
ऐसा इसीलिए है क्योंकि... बरगद या पीपल की कलम जितनी चाहे उतनी रोपने की कोशिश करो परंतु वह नहीं लगेगी.
इसका कारण यह है कि प्रकृति ने यह दोनों उपयोगी वृक्षों को लगाने के लिए अलग ही व्यवस्था कर रखी है.
जब कौए इन दोनों वृक्षों के फल को खाते हैं तो उनके पेट में ही बीज की प्रोसेसिंग होती है और तब जाकर बीज उगने लायक होते हैं.
उसके पश्चात कौवे जहां-जहां बीट करते हैं, वहां वहां पर यह दोनों वृक्ष उगते हैं.
और... किसी को भी बताने की आवश्यकता नहीं है कि पीपल जगत का एकमात्र ऐसा वृक्ष है जो round-the-clock ऑक्सीजन (O2) देता है और वहीं बरगद के औषधि गुण अपरम्पार है.
साथ ही आप में से बहुत लोगों को यह मालूम ही होगा कि मादा कौआ भादो महीने में अंडा देती है और नवजात बच्चा पैदा होता है.
तो, इस नयी पीढ़ी के उपयोगी पक्षी को पौष्टिक और भरपूर आहार मिलना जरूरी है...
शायद, इसलिए ऋषि मुनियों ने कौवों के नवजात बच्चों के लिए हर छत पर श्राघ्द के रूप मे पौष्टिक आहार की व्यवस्था कर दी होगी.
जिससे कि कौवों की नई जनरेशन का पालन पोषण हो जाये......
इसीलिए.... श्राघ्द का तर्पण करना न सिर्फ हमारी आस्था का विषय है बल्कि यह प्रकृति के रक्षण के लिए नितांत आवश्यक है.
साथ ही... जब आप पीपल के पेड़ को देखोगे तो अपने पूर्वज तो याद आएंगे ही क्योंकि उन्होंने श्राद्ध दिया था इसीलिए यह दोनों उपयोगी पेड़ हम देख रहे हैं.
अतः.... सनातन धर्म और उसकी परंपराओं पे उंगली उठाने वालों से इतना ही कहना है कि....
उस समय भी हमारे ऋषि मुनियों को मालूम था कि धरती गोल है और हमारे सौरमंडल में 9 ग्रह हैं.
साथ ही... हमें ये भी पता था कि किस बीमारी का इलाज क्या है...
कौन सी चीज खाने लायक है और कौन सी नहीं...?
अपनी संस्कृति और आस्था बनाये रखें|
🙏
।
#औ_का
Turkiye के प्रसिद्ध न्यूरोसर्जन Dr. Ali Zırh द्वारा Parkinson’s के एक मरीज की,की गई डीप ब्रेन स्टिमुलेशन सर्जरी की दुनिया भर के चिकित्सा जगत में चर्चा है.
DBS को ब्रेन पेसमेकर' भी कहते हैं और यह सर्जरी न्यूरोलॉजिकल बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए एक वरदान है.
DBS दुनिया की पहली सर्जरी नहीं है। इसका इस्तेमाल दुनिया भर में 1990 के दशक से हो रहा है लेकिन जब लोग पहली बार किसी मरीज को ऑपरेशन टेबल पर होश में रहते हुए, सर्जरी के तुरंत बाद अपनी कांपती उंगलियों और हाथों पर पूर्ण नियंत्रण पाते देखते हैं, तो यह किसी चमत्कार जैसा लगता है.
पार्किंसंस बीमारी में मरीज के हाथ-पैर इस हद तक कांपते हैं कि वह एक चम्मच पानी भी खुद नहीं पी सकता. लेकिन इस सर्जरी के दौरान जैसे ही डॉक्टर मस्तिष्क के सटीक बिंदु पर इलेक्ट्रोड रखकर हल्का इलेक्ट्रिकल करंट चालू करते हैं, मरीज के हाथों का कंपकंपाना और जकड़न कुछ ही सेकंड में रुक जाती है.
यह बदलाव इतना तुरंत और हैरान कर देने वाला होता है कि देखने वाले के लिए यह किसी जादू जैसा लगता है.
सर्जरी टेबल पर मरीज का जगा रहना और डॉक्टर के सवालों का जवाब देना, कभी-कभी गाना गाना, मोबाइल चलाना या सेल्फी वीडियो बनाना–लोगों के लिए बहुत अनूठा दृश्य होता है.
मस्तिष्क में दर्द के रिसेप्टर्स नहीं होते, इसलिए सिर का बाहरी हिस्सा सुन्न करने के बाद मरीज को दर्द का अहसास नहीं होता.
डॉक्टर मरीज की खोपड़ी में सूक्ष्म छेद करके मस्तिष्क के उस विशेष हिस्से जैसे Subthalamic Nucleus में बेहद पतले इलेक्ट्रोड डालते हैं, जो शरीर के कंपन, अकड़न और संतुलन को नियंत्रित करता है.
इन तारों को त्वचा के नीचे से लाते हुए छाती के ऊपरी हिस्से में लगे एक छोटे उपकरण न्यूरोस्टिमुलेटर या बैटरी से जोड़ दिया जाता है.
यह बैटरी मस्तिष्क के असामान्य या गड़बड़ सिग्नल देने वाले हिस्सों को लगातार हल्के इलेक्ट्रिकल पल्स भेजती है. इससे मस्तिष्क के वे सिग्नल रुक जाते हैं जो कपकंपी और जकड़न पैदा करते हैं.
डॉक्टर दिमाग की हर उस Cell की विद्युत तरंगों को एक लाउडस्पीकर के जरिए सुनते हैं जो बीमारी फैला रही है. मरीज जब उंगलियां हिलाता है या बोलता है, तो डॉक्टर Subthalamic Nucleus की पहचान 80 माइक्रोन से भी कम मार्जिन के साथ सटीक रूप से कर पाते हैं.
DBS सर्जरी पार्किंसंस को जड़ से तो खत्म नहीं करती, लेकिन यह बीमारी के लक्षणों को 10 से 15 साल पीछे जरूर धकेल देती है जो मरीज व्हीलचेयर या दूसरों की मदद पर निर्भर हो चुके होते हैं, वे दोबारा आत्मनिर्भर होकर अपनी सामान्य जिंदगी जीने लगते हैं.
दवाओं की भारी खुराक और उनके साइड-इफेक्ट्स पर निर्भरता काफी कम हो जाती है.
@dralizirh
#MedicalScience #DeepBrainStimulation #ParkinsonsAwareness #DrAliZırh #Neurology #HealthTech #BrainSurgery
I have listened to this song almost a 100 times since last night. Even Movies with a massive 100 crore budget doesn’t have such music. Amazing choice @filmervishal ji.
राजीव गांधी की हत्या 21 मई 1991 को हुई और ठीक एक महीने बाद 21 जून 1991 को 'राजीव गांधी फाउंडेशन' नाम से एक NGO बनाया गया। जी हां, राजीव गांधी की हत्या के सिर्फ एक महीने बाद। सोनिया गांधी ने 1993 में ब्रिटेन में राजीव गांधी फाउंडेशन की ब्रांच खोली और ब्रिटेन सरकार ने उनकी उपस्थिति में इसके संबंध में प्रस्ताव पारित किया। 1993 में सोनिया गांधी जी राजीव गांधी फाउंडेशन से जुड़े काम के लिए अमेरिका गईं काम क्या था ये जानकारी नहीं मिली। उसी साल 1993 में ही जोर्ज सोरोस ने न्यूयॉर्क में ओपन सोसाइटी फाउंडेशन की स्थापना की "संयोग"?
दिसंबर 1994 में फोरम ऑफ डेमोक्रेटिक लीडर्स इन द एशिया-पैसिफिक (FDL-AP) नाम से एक NGO शुरू किया गया। कुछ अन्य लक्ष्यों के अलावा इस NGO का मुख्य लक्ष्य था 'स्वतंत्र कश्मीर'। राजीव गांधी फाउंडेशन की अध्यक्ष के रूप में सोनिया गांधी इस फोरम की सह-अध्यक्ष थीं। FDL-AP के लगभग सभी सदस्य अमेरिका समर्थक थे। सोरोस फाउंडेशन (ओपन सोसाइटी फाउंडेशन) इस NGO के प्रमुख फंडकर्ताओं में से एक था। जी हां फ्री कश्मीर उद्देश्य वाले NGO को सोरोस फाउंडेशन फंड कर रहा था और सोनिया जी उसमें शामिल हुई थीं।
वर्ष 1999 में कंधार विमान अपहरण की घटना हुई थी। कंधार पहुंचने से पहले विमान ईंधन भरने के लिए UAE में उतरा था। UAE के अधिकारियों ने अमेरिकी राजदूत को हवाई अड्डे में प्रवेश करने की अनुमति दी लेकिन भारतीय राजदूत को नहीं। क्या यह चौंकाने वाली बात नहीं है। उसके बाद विमान को लेकर आतंकी अफगानिस्तान के कंधार पहुंचे जो उस समय तालिबान के अधीन था। यहां एक और तथ्य यह है कि रूस का मुकाबला करने के लिए अमेरिका उन दिनों तालिबान का समर्थन कर रहा था। विमान अपहरणकर्ताओं ने शुरुआत में 36 आतंकवादियों की रिहाई की मांग की थी लेकिन सौदेबाजी के बाद मसूद अजहर समेत 3 आतंकवादियों की रिहाई पर बात बनी। 36 की उस सूची में एक नाम आतंकी 'लतीफ' का था लेकिन उसे रिहा नहीं किया गया। FBI को मसूद अज़हर में विशेष रुचि थी। FBI ने 1995 से 1998 के बीच कई बार उसका साक्षात्कार लिया था जब वह भारतीय जेल में था। रिहाई के बाद आतंकी मसूद अजहर ISI की मदद से पाकिस्तान पहुंचा और जैश-ए-मोहम्मद नामक आतंकी संगठन शुरू किया जिसका लक्ष्य भी 'फ्री कश्मीर' है।
जून 2001 में सोनिया गांधी जी अपने सहयोगियों (मनमोहन सिंह, नटवर सिंह, मुरली देवड़ा, जयराम रमेश) के साथ पांच दिनों के लिए अमेरिका गईं लेकिन वहां पहुंचने से पहले उन्होंने ब्रिटेन एवं आइसलैंड का दौरा किया ये दोनों ही देश Tax Havens हैं। अमेरिका में सोनिया गांधी ने विदेशी संबंधों की काउंसिल और हेनरी किसिंजर के साथ बंद कमरे में बैठक की। इस दौरे में सोनिया गांधी के सहयोगी नटवर सिंह के अनुसार, सोनिया गांधी को वहां बहुत ख़ास लोगों से मिलने की उम्मीद थी। ये ख़ास लोग कौन थे उन्होंने इसका खुलासा नहीं किया। कुछ ही महीनों बाद 13 दिसंबर 2001 को 'जैश-ए-मोहम्मद' के आतंकवादियों ने भारतीय संसद पर हमला किया। जब संसद पर हमला हुआ तो हमले से पहले ही सोनिया गांधी संसद से निकल गई थीं।
2004 चुनाव जीतने के बाद सोनिया गांधी ने सरकार चलाने के लिए एक NAC का गठन किया। हर्ष मंदर और अरुंधति रॉय इस NAC का हिस्सा थे। दिलचस्प बात यह है कि वे दोनों भारत में जॉर्ज सोरोस के लिए काम करते थे। एक NGO, 'HRLN' राजीव गांधी फाउंडेशन के साथ मिलकर शहरी नक्सलियों व अलगाववादियों के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहा है। यहां तक कि इस NGO को सोरोस और अमेरिका से भी फंड मिला है।
2004 में सत्ता में आने के बाद सोनिया गांधी का पहला फैसला आतंकवाद विरोधी कानून पोटा को खत्म करना था। 28 मई 2010 को UPA सरकार ने सद्भावना के तौर पर 25 आतंकवादियों को रिहा किया। इसमें सबसे ज़्यादा चौंकाने वाली बात यह थी कि 'लतीफ़' को भी रिहा कर दिया गया जिसका नाम मसूद अज़हर के साथ लिस्ट में था और उसे उस समय रिहा नहीं किया गया था।
RTI रिपोर्ट के अनुसार, सरकार के पास 2004 से 2014 के बीच सोनिया गांधी की विदेश यात्राओं का कोई रिकॉर्ड नहीं है। 2011 के बाद, सोनिया गांधी ने 'मेडिकल' कारणों से कई बार अमेरिका का दौरा किया। यह जानकारी भी कांग्रेस प्रवक्ताओं द्वारा ही दी गई और वह भी उनके भारत छोड़ने के बाद। इसी प्रकार, 30 नवंबर 2015 को वह 'मेडिकल चेकअप' के लिए तीन दिनों के लिए अमेरिका गईं। 2 जनवरी 2016 को पठानकोट में हमला हुआ था। क्या आपको पता है कि उस हमले का मुख्य आतंकी कौन था वही 'लतीफ' जिसे 2010 में UPA सरकार ने सद्भावना के तौर पर रिहा कर दिया था।😡
नरेंद्र मोदी के आने के बाद देश को पहली बार पता चला है कि कश्मीर वैली की जनसंख्या 53 लाख है। जम्मू रीजन की जनसंख्या 69 लाख है और लद्दाख की जनसंख्या 5 लाख है।
कश्मीर का क्षेत्रफल राज्य के कुल क्षेत्रफल का 16% है, जम्मू का क्षेत्रफल 25% है और बाकी 59% क्षेत्रफल लद्दाख का है।
सोचने वाली बात यह है कि न तो कश्मीर वैली क्षेत्रफल के हिसाब से ज्यादा है, न ही जनसंख्या के हिसाब से। लेकिन नेहरू ने कश्मीर वैली को 47 विधानसभा सीटें दे दीं, तथा जम्मू और लद्दाख को मिलाकर 43 सीटें।
मतलब, अगर कोई जम्मू और लद्दाख की सारी सीटें भी जीत ले, तब भी सत्ता नहीं पा सकता।
ऐसा घिनौना खेल देश के साथ खेला गया। कांग्रेस के काले कारनामे इतने हैं कि देश को सदियों तक दर्द देते रहेंगे।
इस पर क्या आपका ख़ून नहीं खौल रहा? हो सके तो बताना अवश्य।
राष्ट्रहित सर्वोपरि।
वंदे मातरम् 🇮🇳🙏
सौ बात की एक बात ये कि ‘नॉटी बॉय’ ने इस बार कोई शरारत नहीं की। ख़बर तो शायद आपको पता चल ही गई होगी कि भारत ने अपनी नई सैटेलाइट EOS-05 लॉन्च कर दी। और ये कोई छोटी-मोटी रूटीन बात नहीं है। ये मत समझना कि सैटेलाइट तो लॉन्च होती रहती हैं तो एक और हो गई होगी। ये उपलब्धि है क्या ये अच्छी तरह समझने की ज़रूरत है और सबको समझाने की ज़रूरत है। तो पहले तो क्लियर कर लेते हैं कि ये ‘नॉटी बॉय’ क्या है? ये जिसको ‘नॉटी बॉय’ कहा जा रहा है वो असल में सैटेलाइट को नहीं कह रहे हैं। उपग्रह को नहीं कह रहे हैं। सैटेलाइट तो जैसा आप जानते हो कि उसको कहते हैं जो पृथ्वी के चक्कर लगाती रहती है ऊपर अंतरिक्ष में। जैसे चांद। चांद भी एक सैटेलाइट है, उपग्रह है पृथ्वी का। पृथ्वी के चक्कर लगाता रहता है। वो प्रकृति की बनाई हुई सैटेलाइट है। और ऐसी ही सैटेलाइट इंसान बना कर अंतरिक्ष में छोड़ता रहता है और वो पृथ्वी के चक्कर काटती रहती हैं और कई काम करती रहती हैं अलग-अलग तरह के। और अंतरिक्ष में सैटेलाइट को छोड़कर आता है रॉकेट। पृथ्वी से जो जाता हुआ दिखता है धुआं छोड़ता हुआ वो होता है रॉकेट। रॉकेट के साथ भेजते हैं सैटेलाइट को। रॉकेट वायुमंडल यानी ऐटमस्फ़ीयर को चीरता हुआ अंतरिक्ष में जाता है सैटेलाइट लेकर और सैटेलाइट एक ख़ास जगह पर ऐसी स्पीड से छोड़ देता है कि वो पृथ्वी के चक्कर काटना शुरू कर देती है। तो ये जो नई सैटेलाइट भारत ने भेजी है अंतरिक्ष में इसको जो रॉकेट लेकर गया है इसको वैज्ञानिक कहने लग गए थे ‘नॉटी बॉय’। शरारती लड़का। पहले ये कई बार ट्राय किया जा चुका लेकिन वो भटक जाता था ऊफर जा कर, उस गाने वाले ऋतिक रौशन की तरह, कि इधर चला मैं उधर चला। तो नाम दे दिया था वैज्ञानिकों ने ‘नॉटी बॉय’। इस बार सटीक जगह पहुंचा, जितनी ऊंचाई पर सैटेलाइट को पहुंचाना था वहां पहुंचाकर आया तो वैज्ञानिकों की जान में जान भी आई और संतुष्टि भी हुई कि तकनीक में जो बदलाव किये थे इस ‘नॉटी बॉय’ के वो कामयाब रहे, वो ना इधर गया ना उधर गया और सैटेलाइट अपनी कक्षा में पहुंच गई। अब आ जाइए असली कहानी पर। सैटेलाइट। EOS-05, EOS मतलब ‘अर्थ ऑब्ज़रवेशन सैटेलाइट’ और 05 का मतलब तो नंबर 5, यानी इससे पहले चार और ‘अर्थ ऑब्ज़रवेशन सैटेलाइट’ भेजी जा चुकी हैं ये EOS-05 है। अर्थ ऑब्ज़रवेशन सैटेलाइट मतलब ये ऊपर से अर्थ को ऑब्ज़र्व करेगी। नज़र रखेगी। नज़र रखेगी मतलब क्या? फ़ोटो खींचेगी? लाइव तस्वीरें भेजेगी? जैसे हम सुनते हैं कि ऊपर से सैटेलाइट ने देख लिया कि नीचे क्या हो रहा है? पाकिस्तान में क्या हो रहा है, चीन में क्या हो रहा है, वैसे? जी, कुछ-कुछ वैसा ही। लेकिन ये उससे भी ख़ास है। क्योंकि ये सैटेलाइट ‘जियोस्टेशनरी’ है। जियोस्टेशनरी मतलब ये ऊपर स्टेशनरी रहेगी, यानी एक ही जगह पर खड़ी रहेगी और लगातार तस्वीरें भेजती रहेगी। ये बहुत ही ऐडवांस्ड क़िस्म की सैटेलाइट होती है जो ऊपर एक ही जगह पर टिकी रहे। क्योंकि आपने सुना होगा कि सैटेलाइट ऊपर से चक्कर लगाती हुई गई और तस्वीर खींच कर भेज दी नीचे कंट्रोल सेंटर में। और फिर अगले चक्कर में आई और फिर तस्वीर खींचकर भेज दी। और ऐसे देख कर पता चलता था कि पहले क्या पोज़िशन थी और अब क्या पोज़िशन है किसी जगह की। जैसे अभी नेपाल की बाढ़ की तस्वीर आई कि पहले इस जगह पर एक बिल्डिंग खड़ी थी तिब्बत के बॉर्डर पर। और फिर अगली तस्वीर में दिखा कि बिल्डिंग बाढ़ के बाद ग़ायब हो गयी। यानी पहले सैटेलाइट ने की जो तस्वीर थी उसमें बिल्डिंग थी और फिर जब चक्कर लगा कर सैटेलाइट उसी जगह के ऊपर आई तो वो बिल्डिंग नहीं थी। लेकिन अगर जियोस्टेशनरी सैटेलाइट होती तो सैटेलाइट उसी जगह पर ऊपर टिकी रहती, हिलती नहीं, और लगातार तस्वीर आती रहती तो दिख जाता कि कैसे बिल्डिंग बही बाढ़ में। मतलब जैसे कैमरा लगा हुआ है जो लगातार नज़र बनाए हुए है ऊपर। ऐसी सैटेलाइट अब ऊपर अंतरिक्ष में स्थापित कर दी है भारत ने। लेकिन ऊपर पतंग की तरह एक ही जगह पर कैसे सैटेलाइट को टिका सकते हैं? वो तो चक्कर काट रही है ना ऊपर तभी तो अपनी कक्षा में बनी रहती है। तो जब चक्कर काटेगी तो टिकी कैसे रहेगी? तो यही तो असली कमाल है। और ये कमाल किया जाता है सैटेलाइट को एक बिल्कुल ख़ास पॉयंट पर छोड़ कर अंतरिक्ष में। ISRO के नॉटी बॉय रॉकेट ने वही कमाल कर के दिखाया है। इसको ऐसे समझिए कि जैसे पृथ्वी एक बॉल है और उस बॉल के चारों तरफ़ सैटेलाइट घूम रही है। तो जितना पृथ्वी की बॉल के पास होगी उसको उतना तेज़ी से चक्कर लगाना पड़ेगा। यानी कोई 8 घंटे में चक्कर लगाएगी, थोड़ी और दूर होगी तो 12 घंटे में चक्कर लगाएगी, और दूर होगी तो 18 घंटे में एक चक्कर लगाएगी। जितना दूर से चक्कर लगाएंगे तो चक्कर का रास्ता यानी सैटेलाइट की कक्षा बड़ी होती जाएगी और उतना ज़्यादा टाइम लगता जाएगा। अब इसमें एक चीज़ और नोट कर लीजिए। याद रखिये पृथ्वी भी घूमे जा रही। मतलब पृथ्वी की जो बॉल है वो स्पिन भी तो हो रही है। पृथ्वी भी घूम रही है और उसके चारों तरफ़ सैटेलाइट चक्कर लगा रही है। तो अगर समझो 10 घंटे में कोई सैटेलाइट एक चक्कर लगा कर वहीं आती है तो नीचे पृथ्वी पर वही जगह नहीं होती। पृथ्वी ख़ुद घूम चुकी होती है। तो सैटेलाइट के नीचे नई जगह आ जाती है। अब आइए उस कमाल पर जो किया गया है। अगर सैटेलाइट इतनी दूरी पर छोड़ी जाए कि वो अपना एक चक्कर एकदम एक्ज़ैक्ट 24 घंटे में पूरा करे, तो क्या होगा? पृथ्वी को भी अपनी धुरी पर पूरा एक राउंड घूमने में 24 घंटे लगते हैं। तभी तो 24 घंटे बाद सेम टाइम हो जाता है। तो पृथ्वी भी अपनी धुरी पर 24 घंटे में एक बार घूमेगी और सैटेलाइट भी बिल्कुल उतने ही टाइम में, 24 घंटे में एक चक्कर अगर पूरा करेगी। तो सैटेलाइट की स्पीड पृथ्वी के घूमने की स्पीड से बिलकुल मैच कर जाएगी। तो पृथ्वी पर जैसे-जैसे भारत वाला एरिया घूमता रहेगा, बिलकुल वैसे-वैसे उसके साथ-साथ सैटेलाइट अंतरिक्ष में घूमती रहेगी। तो क्या होगा? ऐसा लगेगा कि सैटेलाइट ठीक वहीं पर चिपकी हुई है अंतरिक्ष में, वहीं टिकी हुई है। जैसे पृथ्वी की बॉल से किसी ने डोर से पतंग बांध रखी हो। जहां-जहां भारत घूमेगा साथ-साथ डोर के पतंग भी घूमेगी। तो ये कमाल किया गया इस सैटेलाइट को अंतरिक्ष में भेजकर। वो भारत पाकिस्तान चीन तिब्बत के इस पूरे इलाक़े के ऊपर ही बनी रहेगी। असल में चक्कर काट रही है, लेकिन बिलकुल उसी स्पीड से चक्कर काट रही है जिस स्पीड से पृथ्वी घूम रही है, इसलिए वो हमेशा भारत के ऊपर ही बनी रहेगी। ये करने के लिए क्या पड़ता है। ये कैलकुलेट किया गया कि अगर सैटेलाइट को एक्ज़ैक्ट 35,786 किलोमीटर ऊपर छोड़ कर आओ कक्षा में, ना इधर, ना उधर, तो ये एक चक्कर एक्ज़ैक्ट 24 घंटे में काटेगी और पृथ्वी की एक ही जगह के ऊपर बनी रहेगी। और ये नॉटी बॉय रॉकेट इसे एक्ज़ैक्ट उसी 35,786 किलोमीटर की ऊचाई पर सटीक छोड़ कर आने में कामयाब रहा। नीचे वाली छोटी कक्षा की सैटेलाइटें तेजी से दौड़ती हैं, एक जगह से निकल जाती हैं, फिर घंटों या दिनों बाद लौटती हैं उसी जगह पर। ये सैटेलाइट एक ही जगह पर, एक ही बड़े इलाके पर टिकी रहेगी। यानी कैमरा लग गया इस पूरे भारत के आसपास के इलाक़े पर भारत का। कहीं बाढ़ बढ़ रही है तो तुरंत दिख जाएगा। कहीं तूफ़ान आ रहा है तो तुरंत दिख जाएगी कि उस साइड से हवाएं इतने स्पीड से बढ़ती चली आ रही हैं। पूरे भारत का एरिया स्कैन कर लेगी सिर्फ़ 10-15 मिनट में। पूरा। किसी एक ख़ास जगह की तस्वीर तो कुछ ही मिनटों में मिल जाएगी। बाक़ी सैटेलाइट ये करने में कई दिन लगा देती हैं क्योंकि वो एक जगह पर टिकती नहीं और फिर अगले चक्कर में आ कर काम पूरा करती हैं। ये कैमरा तो लगातार ऊपर लगा ही हुआ। तो अगर कुछ नीचे बदल रहा है तो बदलता हुआ दिख जाएगा। ऐसा नहीं कि नीचे कोई गाड़ी होगी वो चलती हुई दिख जाएगी। या सेना के टैंक दिख जाएंगे। क्योंकि 36 हज़ार किलोमीटर की दूरी पर रखने का एक नुक़सान ये है कि इसका कैमरा उतना डीटेल में तो नहीं जा सकता। तो ये जो सबसे छोटी चीज़ देख सकता है वो 42 मीटर की होनी चाहिए। 42 मीटर यानी ये किसी स्टेडियम जितनी बिल्डिंग और उससे बड़ी चीज़ों को तो अलग देख सकता है लेकिन उससे छोटी चीज़ें ब्लर हो जाएंगी इसकी तस्वीर में। जो सैटेलाइट नीचे चक्कर काटती हैं, वो तो डीटेल में देख लेती है। लेकिन क्योंकि इसको एक ही जगह के ऊपर रखना था तो 35,786 किलोमीटर की दूर पर रखना था। लेकिन इसमें कैमरा बहुत ही ख़ास लगाया गया है। और इस कैमरा हैऔऱ व ह औरqJ हाइपरस्पेक्ट्रल कैमरा। वो क्या करता है। वो वैसी तस्वीर नहीं खींचता जैसी आंखों को दिखती है। ये कैमरा क्या करता है कि पहचान सकता है कि जिस चीज़ की तस्वीर है उसका मैटीरियल क्या है। मतलब अगर खेत की फ़सल है तो पौधे स्वस्थ है या मुरझाई हुए हैं। वो दिखा देगा। मिट्टी गीली है या सूखी है। पानी साफ है या मैला है। धुआं है या बादल है। ये सब साधारण तस्वीर में एक जैसे लग सकते हैं, लेकिन इस कैमरे में हर चीज की अलग छाप बन जाती है। यानी ये मटीरियल पकड़ लेता है कैमरा। इसलिए यह सिर्फ फोटो नहीं खींचता, धरती को पढ़ लेता है। पढ़ता है, पहचानता है, फर्क बताता है। आप बोलोगे इसका फ़ायदा क्या? तो समझिए बॉर्डर पर कोई मिसाइलें छिपा कर रखी हुई हैं, या सोचो टैंक खड़े हैं पाकिस्तान के या चीन के। और उनके ऊपर घास-फूस लगाकर उनको छुपा रखा है ताकि सैटेलाइट की तस्वीरें पकड़ न सकें। तो दूसरी सैटेलाइट की तस्वीरों में तो ऊपर से यही दिखेगा कि घास-फूस का ढेर है। लेकिन इस सैटेलाइट में लगा है हाइपरस्पेक्ट्रल कैमरा। वो बता देगा कि ये जो घास-फूस का ढेर है इसके नीचे तो लोहे का मटीरियल है। यानी कुछ छुपा हुआ है। और टैंक पकड़ में आ जाएगा। ये कैमरा ज़मीन के नीचे के खनिज के संकेत दे सकता है। तेल है, कोयला है, सोना है, पानी है, सब के संकेत दे सकता है ताकि पता चल सके कि खुदाई करनी है तो कहां करनी है। और ये कैमरा दिखा देगात laतlla त नदी का फैलाव, बाढ़ का पानी, चक्रवात का बादल, जंगल की आग, सब कुछ। आपदा के समय इंतजार नहीं करना पड़ेगा कि अगले चक्कर में सैटेलाइट कब आएगी। मौसम, समुद्र, जंगल, सीमा के बड़े इलाके पर एक ही नजर टिकी रहेगी। घटना घटते हुए दिखेगी, घटने के बाद नहीं। लगातार निगरानी हो सकेगी। साथ-साथ निगरानी, साथ-साथ चेतावनी, साथ-साथ मदद। ये कमाल कर सकने वाले देशों में अब भारत भी शामिल हो गया। और चीन में, नेपाल में, बांग्लादेश में, श्री लंका में, पाकिस्तान में, जब वो कहेंगे ना कि ऊपरवाला सब देख रहा है। तो वो ऊपरवाला होगा भारत का कैमरा। वेल डल नॉटी बॉय। सौ बात की एक बात।
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गाय व भैंस के दूध में अंतर जो बहुत कम लोग जानते हैं !
भैंस अपने बच्चे से पीठ फेर कर बैठती है चाहे उसके बच्चे को कुत्ते खा जायें वह नहीं बचायेगी,
जबकि गाय के बच्चे के पास अनजान आदमी तो क्या शेर भी आ जाये तो जान दे देगी, परन्तु जीते जी बच्चे पर आँच नही आने देगी।
इसीलिए उसके दूध में स्नेह का गुण भरपूर होता है।
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भैंस को गन्दगी पसन्द है, कीचड़ में लथपथ रहेगी,,
पर गाय अपने गोबर पर भी नहीं बैठेगी उसे स्वच्छता प्रिय है।
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भैंस को घर से 2 किमी दूर तालाब में छोड़कर आ जाओ वह घर नहीं आ सकती उसकी याददास्त जीरो है।
गाय को घर से 5 किमी दूर छोड़ दो।
वह घर का रास्ता जानती है,आ जायेगी।
गाय के दूध में स्मृति तेज है।
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दस भैंसों को बाँधकर 20 फुट दूर से उनके बच्चों को छोड़ दो, एक भी बच्चा अपनी माँ को नहीं पहचान सकता,
जबकि गौशालाओं में दिन भर गाय व बछड़े अलग-अलग शैड में रखते हैं, सायंकाल जब सबका माता से मिलन होता है तो सभी बच्चे (हजारों की स॔ख्या में) अपनी अपनी माँ को पहचान कर दूध पीते हैं, ये है गाय दूध की याददास्त।
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जब भैंस का दूध निकालते हैं तो भैंस सारा दूध दे देती है,
परन्तु गाय थोड़ा-सा दूध ऊपर चढ़ा लेती है, और जब उसके बच्चे को छोड़ेंगे तो उस चढ़ाये दूध को उतार देती है।
ये गुण माँ के हैं जो भैंस मे नहीं हैं।
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गली में बच्चे खेल रहे हों और भैंस भागती आ जाये तो बच्चों पर पैर अवश्य रखेगी…
लेकिन गाय आ जाये तो कभी भी बच्चों पर पैर नही रखेगी।
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भैंस धूप और गर्मी सहन नहीं कर सकती…
जबकि गाय मई जून में भी धूप में बैठ सकती है।
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भैंस का दूध तामसिक होता है….
जबकि गाय का सात्विक।
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भैंस का दूध आलस्य भरा होता है, उसका बच्चा दिन भर ऐसे पड़ा रहेगा जैसेे भाँग खाकर पड़ा हो।
जब दूध निकालने का समय होगा तो मालिक उसे उठायेगा…
परन्तु गाय का बछड़ा इतना उछलेगा कि आप रस्सा खोल नहीं पायेंगे।
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फिर भी लोग भैंस खरीदने में लाखों रुपए खर्च करते हैं….
जबकि गौमाता का दूध अमृत समान होता है !
जय सिया राम !
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#औ_का
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• रोड रेज से बचिए।
• सड़क पर अजनबियों को Civic Sense सिखाने की कोशिश मत कीजिए।
• जहाँ संभव हो, भीड़भाड़ से बचिए।
• सार्वजनिक जगह पर राजनीति की बहस से दूर रहिए।
• गलती हो जाए तो हाथ जोड़कर “सॉरी” बोलिए और आगे बढ़ जाइए।
लोग बेहद बेचैन, चिड़चिड़े और हिंसक होते जा रहे हैं।
रील्स, स्मार्टफोन, व्हाट्सऐप स्टेटस, फेसबुक, OTT हर वक्त मिलने वाला मनोरंजन और सस्ता डोपामिन भारतीयों का मानसिक संतुलन बिगाड़ रहा है।
न ढंग के पब्लिक पार्क,
न साफ़ नदियाँ, न झीलें,
न सुकून की कोई जगह।
नतीजा? पूरा भारत फोन में घुसा हुआ है।
यह दिमाग़ और ज़िंदगी की महामारी है...
शायद उससे भी ख़तरनाक।
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#औ_का
कुछ उन लोगों के लिए लिख रहा हूँ जिनके मन में कभी न कभी यह खयाल आया होगा कि एक रेस्तराँ खोलना चाहिए। फिर अगला सवाल आता है कि खोलें तो क्या खोलें? छोले-भटूरे, डोसा, चाट, पनीर, कबाब, बिरयानी?
हमारी कल्पना घूम-फिरकर लगभग इन्हीं चीज़ों के आसपास आकर रुक जाती है। बात भी गलत नहीं है, आदमी घर का खाना खाते-खाते ऊब जाता है तो बाहर खाने जाता है, लेकिन मज़ेदार बात यह है कि बाहर जाकर भी वह वही दस-पंद्रह चीज़ें खाता है जो हर दूसरे रेस्तराँ में मिल रही हैं।
लेकिन पिछले कुछ दिनों से मेरे मन में एक दूसरी बात चल रही है। बाहर के खाने को छोड़िए, हमारे अपने घरों में भी अब वह बहुत कुछ बनना बंद हो गया है जो हमारी माँएँ बनाया करती थीं।
हमारे यहाँ अम्मा ककोड़े बनाया करती थीं। अब मुझे नहीं मालूम कि आप में से कितने लोगों ने पिछले दस-पंद्रह साल में ककोड़े खाए हैं, लेकिन मुझे तो किसी रेस्तराँ के खाने की सूची में वे याद नहीं पड़ते। इसी तरह ग्वार की फली बनती थी, लेकिन केवल मसाला डालकर नहीं; अम्मा उसमें बेसन लपेटकर उसे हल्का सा तलती थीं और फिर मसाले के साथ बनाती थीं।
कटहल भी बनता था और कटहल बनाने के भी कई तरीके थे। उसके टुकड़ों को पहले हल्का सा तल लिया जाता था, कभी थोड़ा बेसन या सूजी लगाकर उसे कुरकुरा किया जाता था और कभी उसकी रसेदार सब्ज़ी बनती थी। आजकल कटहल को बेचने के लिए उसे न जाने क्या-क्या नाम दे दिए गए हैं।
कमल ककड़ी, जिसे हमारे यहाँ मुरार भी कहते थे, अब दिखाई ही कहाँ देती है। भरवाँ करेले का भी यही हाल है; आज किसी अच्छे रेस्तराँ में जाकर कहिए कि भरवाँ करेला खिलाइए तो संभव है वह खाने की सूची दोबारा आपके हाथ में पकड़ा दे। कचनार की कलियाँ, रतालू और ऐसी जाने कितनी चीज़ें थीं जो कभी सामान्य भोजन थीं और धीरे-धीरे हमारे खाने से ही गायब होती चली गईं।
और फिर आती है घुइयाँ। यह एक ऐसी सब्ज़ी है जिसके साथ मेरा रिश्ता बचपन से ही बड़ा पेचीदा रहा है, क्योंकि पिताजी को घुइयाँ बहुत पसंद थी और मुझे बिल्कुल नहीं। पिताजी हम से कहा करते थे, “लफंडर, तुम्हारे चक्कर में तुम्हारी अम्मा घुइयाँ बनाती ही नहीं हैं।” अब अम्मा करें तो क्या करें, एक तरफ पति हैं जिन्हें घुइयाँ पसंद है और दूसरी तरफ बेटा है जो घुइयाँ देखते ही खाना छोड़ने को तैयार बैठा है।
अम्मा ने आखिर इसका भी रास्ता निकाल लिया। एक दिन उन्होंने बहुत कुरकुरे आलू बनाए, ऊपर नमक और लाल मिर्च डाली और हमारे सामने रख दी; हमने खाई तो बड़ी अच्छी लगी, बस स्वाद आलू से थोड़ा अलग था। पूछा कि यह कौन सा आलू है तो अम्मा ने बड़े आराम से बता दिया कि पहाड़ी आलू आया हुआ है। कुछ दिन हम पहाड़ी आलू बड़े मज़े से खाते रहे, फिर हमारे दिमाग में आया कि आलू तो अक्सर हम खुद लेकर आते हैं, यह पहाड़ी आलू घर में आखिर आ कहाँ से रहा है।
राज एक दिन पिताजी ने खोला कि बेटा, जिसे तुम इतने दिनों से पहाड़ी आलू समझकर खा रहे हो वह घुइयाँ है। इस तरह अम्मा ने हमें घुइयाँ खिला दी, हालाँकि समझौता यह रहा कि हम उसकी तली हुई शक्ल खाएँगे और पिताजी उसकी रसेदार सब्ज़ी खाएँगे।
उसकी रसेदार सब्ज़ी में राई और सरसों के तेल का स्वाद होता था, लेकिन वह थोड़ी चिपचिपी होती थी और वह बात मेरे बचपन के दिमाग में कभी ठीक से बैठी नहीं। पिताजी को वही बहुत पसंद थी और हम अपनी तली हुई घुइयाँ में प्रसन्न थे।
बेसन के गट्टे का तो मैं क्या ही लिखूँ। बेसन के गट्टे की सब्ज़ी के ऊपर तो मैंने पूरी कहानी लिख डाली थी, क्योंकि वह मेरे लिए केवल एक सब्ज़ी नहीं है बल्कि अम्मा की उन यादों में से एक है जिन्हें भोजन से अलग करके देख ही नहीं सकता। बीमारी के बाद भी उनका सबसे पहला सवाल यही रहता था कि खाना खा लिया, और बाद के दिनों में जब उन्होंने मुझे अपने हाथ से खाना बनाना सिखाया तो गट्टे की सब्ज़ी मेरे लिए स्वाद से कहीं आगे की चीज़ बन चुकी थी। शायद जिसने वह कहानी पढ़ी होगी, उसे समझ में आएगा कि किसी एक मामूली सी सब्ज़ी में कभी-कभी आदमी की आधी जिंदगी कैसे रखी होती है।
असल में हमारी माँओं का खाना केवल व्यंजनों की सूची नहीं था। किसी सब्ज़ी के साथ पिताजी की पसंद जुड़ी हुई थी, किसी के साथ बच्चे की जिद, किसी के साथ मौसम, किसी के साथ त्योहार और किसी के साथ वह दिन जब घर में ज्यादा कुछ नहीं था तो उसी से भोजन बन गया।
तो मेरे मन में यह विचार आया कि कोई इन सबको लेकर एक अच्छा, ऊँचे स्तर का रेस्तराँ क्यों नहीं खोलता। ध्यान रहे, मैं किसी बनावटी “देसी ढाबे” की बात नहीं कर रहा हूँ जहाँ दीवार पर टूटी चारपाई लटका दी, पीतल का लोटा रख दिया और समझ लिया कि गाँव तैयार हो गया। मैं एक खूबसूरत, सलीकेदार, अच्छे स्तर के रेस्तराँ की बात कर रहा हूँ जहाँ खाने की सूची में वही सब्ज़ियाँ हों जो धीरे-धीरे हमारे घरों से चली गईं।
कंस की मृत्यु के पश्चात उसका ससुर जरासंध बहुत क्रोधित हुआ। उसने श्रीकृष्ण और बलराम को पराजित करने के लिए मथुरा पर 17 बार आक्रमण किया। 😎
हर बार पराजित होने के बाद वह अपने विचारों का समर्थन करने वाले तमाम राजाओं से संपर्क करता, उनका महागठबंधन बनाता और फिर मथुरा पर आक्रमण करता।
श्रीकृष्ण हर बार उसकी पूरी सेना का संहार कर देते, लेकिन जरासंध को जीवित छोड़ देते।
यह देखकर बलराम जी बहुत क्रोधित हुए और श्रीकृष्ण से बोले:
“भ्राताश्री, बार-बार हारने के बाद भी जरासंध पृथ्वी के कोने-कोने से दुष्टों को खोजकर महागठबंधन बनाता है और हमारे विरुद्ध आक्रमण करता है। आप उसकी पूरी सेना का अंत कर देते हैं, लेकिन असली खुराफात करने वाले को ही छोड़ देते हैं?” 😎
तब श्रीकृष्ण मुस्कुराते हुए बोले:
“हे भ्राताश्री, मैं जरासंध को बार-बार जानबूझकर इसलिए छोड़ देता हूँ क्योंकि यह पूरी पृथ्वी के दुष्टों को खोज-खोजकर एकजुट करता है और मेरे पास ले आता है।
मैं एक ही स्थान पर रहकर उन सभी दुष्टों का अंत कर देता हूँ। वरना मुझे उन्हें ढूँढ़ने के लिए पूरी पृथ्वी का चक्कर लगाना पड़ता। इस प्रकार ‘दुष्ट-दलन’ का मेरा कार्य जरासंध ने बहुत आसान कर दिया है।
जब सभी दुष्टों का अंत हो जाएगा, तब सबसे अंत में इसका भी अंत कर दिया जाएगा। आप चिंता न करें, भ्राताश्री।” 🙏
अब इस कथा को आज के राजनीतिक ‘महाठगबंधन’ से जोड़कर देखना है या नहीं, यह आप पर निर्भर है। 😃
मैंने तो आपको महाभारत की एक कथा सुनाई है।
बाकी इशारा समझने वालों के लिए काफी है! 😏🚩🇮🇳
🙏🚩🇮🇳
(साभार)
- 1020–1140, चालुक्यों बनाम परमारों का संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1100–1200, परमारों बनाम चौहानों का संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1150–1180, चालुक्यों बनाम चौहानों का संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1160–1180, चौहानों बनाम गहड़वालों का संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1200–1500, सिसोदियों बनाम राठौड़ों का संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1300–1400, सिसोदियों बनाम परमारों का संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1300–1500, सिसोदिया वंश के भीतर उत्तराधिकार के युद्ध: कोई जौहर नहीं
- 1300–1400, राठौड़ों बनाम परमारों का संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1350–1500, राठौड़ों बनाम भाटियों का संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1100–1300, कछवाहों बनाम चौहानों का संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1000–1200, चौहान वंश की विभिन्न शाखाओं के आंतरिक संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1100–1300, भाटियों बनाम जादौन का संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1100–1150, तोमर बनाम चौहान संघर्ष: कोई जौहर नहीं
- 1400–1500, राठौड़ों बनाम कछवाहों का संघर्ष: कोई जौहर नहीं
राजपूतों के बीच मुस्लिमों की किसी भी भागीदारी के बिना कम-से-कम दो दर्जन बड़े युद्ध लड़े गए। इनमें से एक भी युद्ध में किसी भी प्रकार का आत्मदाह नहीं हुआ। एक भी नहीं। न तो भारतीय और न ही विदेशी विवरणों में इसका एक भी उदाहरण मिलता है।
अब यह देखिए:
- 712–712, सिंध के राजा दाहिर बनाम मुहम्मद बिन क़ासिम: जौहर हुआ।
- 1232–1232, ग्वालियर (राजपूत) बनाम इल्तुतमिश: जौहर हुआ।
- 1301–1301, रणथंभौर बनाम अलाउद्दीन खिलजी: जौहर हुआ।
- 1299–1299, जैसलमेर बनाम अलाउद्दीन खिलजी: जौहर हुआ।
- 1303–1303, चित्तौड़ बनाम अलाउद्दीन खिलजी: चित्तौड़ का पहला जौहर।
- 1327–1327, कम्पिली बनाम मुहम्मद बिन तुगलक: जौहर हुआ।
- 1326–1326, जैसलमेर बनाम ग़ियासुद्दीन तुगलक: जौहर हुआ।
- 1486–1486, कुवा (कांकावती) बनाम महमूद बेगड़ा: जौहर हुआ।
- 1528–1528, चंदेरी बनाम बाबर: जौहर हुआ।
- 1535–1535, चित्तौड़ बनाम बहादुर शाह: चित्तौड़ का दूसरा जौहर।
- 1543–1543, रायसेन बनाम हुमायूँ: तीन जौहर हुए।
- 1568–1568, चित्तौड़ बनाम अकबर: चित्तौड़ का तीसरा जौहर।
- 1634–1634, बुंदेलखंड बनाम औरंगज़ेब: जौहर हुआ।
- 1710–1710, दद्दानाला बनाम मीर फ़ज़लुल्लाह: जौहर हुआ।
कोई भी जौहर का महिमामंडन नहीं करता। यह कोई उत्सव या मनोरंजन नहीं था।
हम इसका सम्मान करते हैं। नहीं, आत्मदाह का नहीं, बल्कि उस पीड़ादायक भावना का, जो इसके पीछे थी। हम इसका सम्मान इसलिए करते हैं क्योंकि इस भावना के माध्यम से हम अपने पूर्वजों की स्मृति को जीवित रखते हैं। जानते हैं क्यों?
क्योंकि जिन राक्षसी प्रवृत्तियों ने हमारे पूर्वजों को ऐसी चरम परिस्थितियों तक पहुँचाया था, वे आज भी हमारे बीच जीवित हैं और साँस ले रही हैं।
और उनमें ज़रा भी बदलाव नहीं आया है।
जब कोई व्यक्ति आपके स्पर्श को स्वीकार करने की अपेक्षा मृत्यु को चुनना पसंद करे, तो आखिर आप हैं क्या?