जिनके नेतृत्व में सनातन की जड़ों से जुड़कर भारत आधुनिकता की ऊँचाइयों को छू रहा है।
ऐसे यशस्वी, ओजस्वी, तेजस्वी
मा० प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी को जन्मदिन की बहुत बहुत बधाई एवं हार्दिक शुभकामनाएँ 🎉🙏
The duo was already serving Bharat Mata & cooking the anti-nationals when today’s Dimagi Naxals couldn’t even spell the ABCD of politics.
(Going by 80s vibes 😎)
14 अगस्त 1947 की विभाजन विभीषिका को स्मरण करते हुए उन सभी परिवारों को नमन, जिन्होंने देश के विभाजन का दर्द सहा, अपनों को खोया और अपने धैर्य व साहस से इतिहास रचा।
यह दिन हमें मानवता, एकता और अखंड भारत के संकल्प की प्रेरणा देता है।
मुख्यमंत्री श्री @myogiadityanath जी 🙏
#विभाजनविभीषिकास्मृतिदिवस #PartitionHorrorsRemembranceDay
विभाजन को स्वीकार कर लिया गया ,
मगर विभाजकों को जाने भी नहीं दिया गया।
वैश्विक इतिहास में ऐसी आत्मघाती भूल दूसरी नहीं मिलती।
इस ऐतिहासिक विफलता के बावजूद महाभूल के सूत्रधार को 'महात्मा' मानना, हमारी चेतना की दूसरी सबसे बड़ी भूल थी।
और फिर पिता-चाचा के नाम पर एक परिवार का दशकों तक राज करना, हमारी बौद्धिक दासता की पराकाष्ठा रही है।
विडंबना देखिए,इस गुलामी से अभी तक हम मुक्त नहीं हुए हैं।
जब तक अंग्रेज़ियत मानसिकता का अस्तित्व है, तब तक हमारी स्वतंत्रता पूर्ण नहीं हो सकती। अंग्रेज़ चले गए, लेकिन उनकी भाषा, दृष्टि और जीवन-पद्धति का प्रभाव आज भी हमारे संस्थानों और सामाजिक व्यवहार में गहराई से दिखाई देता है। वास्तविक स्वतंत्रता केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं, बल्कि विदेशी मानसिकता से मुक्ति का नाम है। नेहरू चाचा को छोड़कर लगभग सभी क्रांतिकारियों को इस बात की चिंता थी कि अंग्रेज़ों के जाने के बाद भारत से अंग्रेजियत समाप्त होगी या नहीं।
वीर सावरकर जी ने सबसे पहले विदेशी वस्त्रों की होली जलाकर स्वदेशी चेतना को स्वर दिया था। तिलक जी ने अपने समाचार पत्र केसरी के माध्यम से इस राष्ट्रवादी कदम की सराहना की थी। बाद में गांधी ने भी यही काम किया और विदेशी वस्त्रों की होली जलाई।
विडंबना देखिए, जिन विदेशी वस्त्रों की होली कभी स्वतंत्रता-संग्राम का प्रतीक बनी थी, आज उन्हीं की चमक ने हमारे पहनावे और मानसिकता पर स्वदेशी से कहीं अधिक प्रभाव जमा लिया है। कड़वी सच्चाई है, भले हम स्वीकार करें या न करें।
और विडंबना इससे भी बड़ी है कि हमें यह विरोधाभास स्वीकार करने में लज्जा नहीं होती। हम स्वदेशी को जीवन में उतारने से अधिक स्वयं को स्वघोषित राष्ट्रवादी घोषित करने में उत्सुक रहते हैं, मानो राष्ट्रवाद आचरण से नहीं, एक-दूसरे से अधिक ऊँची आवाज़ में उसका दावा करने से सिद्ध होता हो। नेता से लेकर आम जनता तक यह बीमारी अधिकांश लोगों में देखने को मिलती है।
जिस दिन भारत अपने ऊपर चढ़ी विदेशी मानसिकता की अंतिम परत भी उतार देगा, उसी दिन स्वतंत्रता इतिहास की घटना भर नहीं रहेगी, बल्कि भारतीय चेतना का जीवंत अनुभव बन जाएगी। मुझे पता नहीं कि वह शुभ दिन कब आएगा।
जय हिंद
वन्दे मातरम्
#IndependenceDay
🙏🏽
लहज़ा बता देता है कि परवरिश कैसी है, और संस्कार बता देते हैं कि नस्ल कैसी है।
अच्छी जुबान और ऊँचे विचार तभी मिलते हैं जब घर में ...माँ 'नेक' और बाप 'एक' होते हैं।