25 जून, 1975 का दिन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का वह काला अध्याय है, जब 'आपातकाल' थोप कर देश की संवैधानिक आत्मा को कुचलने का प्रयास किया गया।
��त्ता के अहंकार में कांग्रेस द्वारा थोपे गए 'आपातकाल' के अंधकार ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता व नागरिक अधिकारों को गहरी चोट पहुंचाई।
उस कठिन दौर में कठोर यातनाएं सहकर लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले सभी महान लोकतंत्र सेनानियों को कोटिश: नमन।
आपातकाल पर शाह कमीशन ने अपनी रिपोर���ट में कहा है कि प्रतिदिन के कार्यों में सेंसरशिप का दखल दिशा-निर्देशों से भी कही ज़्यादा था। सेंसर के आदेश तानाशाही वाले ��ोते थे। #Emergency1975
#संविधान_की_हत्या
आपातकाल में सरकार से अलग राय रखने वाले अखबारों और पत्रिकाओं को विज्ञाप��� नहीं दिया गया। जबकि सरकार का प्रचार करने वाले अखबारों और पत्रिकाओं को खुले हाथों से विज्ञापन लूटाए गए।
#Emergency1975
#संविधान_की_हत्या
आपातकाल में श्री जयप्रकाश नारायण ने अपनी गिरफ्तारी से पूर्व लोक संघर्ष समिति का आंदोलन चलाने के लिए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पूर्णकालिक कार्यकर्ता श्री नानाजी देशमुख को ज़िम्मेदारी सौपी थी।
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लोक संघर्ष समिति का आंदोलन चलाने के लिए जब नानाजी देशमुख गिरफ्तार हो गए तो नेतृत्व की ज़िम्मेदारी श्री सुंदर सिंह भण्डारी को सर्वसम्मति से सौपी गयी।
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आपातकाल के दौरान सत्याग्रह करने वाले कुल 1,30,000 सत्याग्रहियों में से 100000 से अधिक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के थे। (H॰V॰ Sheshadri, Kratiroop Sangh Darshan, p. 492) .#Emergency1975#संविधान_की_हत्या
आपातकाल के दौरान मीसा के अधीन जो 30,000 लोग बंदी बनाए गए, उनमें से 25000 से अधिक संघ के स्वयंसेवक थे।(H॰V॰ Sheshadri, Kratiroop Sangh Darshan, p. 492). #Emergency1975#संविधान_की_हत्या
#विनम्र_श्रद्धांजलि
किताबों के पन्नों मे�� सपने सजाए थे,
कलम से तकदीरें बनाने आए थे।
अलीगंज की उस शाम ने छीन ली हंसी,
बुझ गए ��ो चिराग जो रौशन जमाने आए थे।
घर से निकले थे पढ़ने की आस लिए,
लौटकर ना आए मां की प्यास लिए।
धुएं में खो गईं कुछ हँसती आवाजें,
छोड़ गए सवाल,