@PurohitVishwas@brajeshlive सब कानून नेता अपनी सहूलियत के लिए बनाते हैं
नेता दो जगह से एलेक्शन लड़ सकता है
जनता दो जगह वोट नहीं दे सकती
नेता को जेल में रहकर एलेक्शन लड़ने का अधिकार है
जनता को जेल में रहकर वोट डालने का अधिकार नहीं है
राघव चड्ढा की बात से सहमत हो तो रीट्वीट करते जाओ, अगर उठाई गई आवाज कानों तक पहुंच गई तो सिम बंद होने की धमकी मिलना बंद हो जाएगी।
बात में इतना दम है जब सबकुछ अपना है
रिचार्ज करना है नहीं करना है ये फैसला भी अपना होना चाहिए।
उमर ख़ालिद ने कैसे प्लानिंग बनाई, वीडियो में प्लानिंग बनाता हुआ पहली बार नज़र आया...😠
जो लोग पूछ रहे थे कि उमर ख़ालिद के ख़िलाफ़ सबूत कहाँ है, वीडियो कहाँ है, उन सबकी बोलती बंद हो जाएगी इस वीडियो को देखकर 😐
और भी कोई सबूत चाहिए सबूत गैंग को 😠
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दूध नहीं,सफेद ज़हर..
मुंबई का अंधेरी पश्चिम कपासवाड़ी में मिलावटी दूध माफिया का काला सच देखें।आर्थिक राजधानी में शुद्ध दूध मिलना भी किसी जंग से कम नहीं।अंधेरी पश्चिम के कपासवाड़ी परिसर में खुलेआम मिलावटी दूध का गोरखधंधा फल-फूल रहा है,जो सीधे आम जनता खासतौर पर बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों की सेहत से खिलवाड़ कर रहा है।बच्चों के गिलास में ज़हर,सिस्टम की आँखों पर पट्टी!
नकली दूध तैयार करने के लिए,खतरनाक पदार्थों का इस्तेमाल
डिटर्जेंट पाउडर
यूरिया
साबुन का घोल
रिफाइंड ऑयल
सिंथेटिक केमिकल
एक लीटर दूध में पानी मिलाकर दो लीटर बनाया जा रहा है और वही दूध मासूम बच्चों के घरों तक पहुँचाया जा रहा है?
चौंकाने वाला खुलासा यह है कि...
दूध सेंटर से दूध सीधे ग्राहकों के घर नहीं जाता,बल्कि पहले दूध माफिया अपने अड्डे पर दूध की थैलियाँ ले जाते हैं,ओरिजिनल थैली खोलकर मिलावट करते हैं,फिर उसी दूध से दो थैलियां बना सप्लाई करते हैं।
सेहत पर जानलेवा असर
किडनी फेल होने का खतरा
लिवर डैमेज
बच्चों की ग्रोथ रुकना
महिलाओं में कैल्शियम की कमी
पेट,त्वचा और आंखों की गंभीर बीमारियां
डॉक्टरों का कहना है कि लंबे समय तक ऐसा दूध पीने से धीरे-धीरे शरीर अंदर से खत्म हो जाता है?
झारखंड के एक डॉक्टर अनुज कुमार ने पीएमओ को टैग करते हुए लिखा है 👇🏻
कैंसर एक ऐसी बीमारी है जिसने करोड़ों घर तबाह किए हैं। सिर्फ़ मरीज़ ही नहीं बल्कि मरीज़ के परिवारों को। 😭
दवाइयों का खर्च वहन करते-करते लोग टूट जाते हैं। और कैसे नहीं टूटेंगे? अगर ₹600 की दवाई पर सरकार ने छूट दे रखी है ₹12,000 MRP रखने की। 🤯
जी हाँ! दवाई है Paclitaxel। रिटेलर खरीदते हैं ₹600 में और MRP है ₹12,000.
एक मरीज़ को कई बार 20-30 vial की ज़रूरत पड़ती है।
और ये कोई एक दवाई की बात नहीं। कीमोथेरेपी की ज़्यादातर दवाइयों का यही हाल है।
200% मार्जिन भी समझ में आता है लेकिन 1900% margin ? वो कैंसर जैसी बीमारी में, जिसका इलाज वैसे भी काफ़ी लंबा चलता है??
ग़रीब तो मर ही जाएगा ना? 🤔
यह तो ठीक नहीं है ना साहब ?😡@PMOIndia
क्या यह लूट जायज़ है?
कमेंट में अपनी राय दे 💬👇
भाई @RailMinIndia@IRCTCOFFICIAL1 ये बताओ,
1▪️जब वेटिंग टिकट बिना हमारी गलती के चार्ट बनते ही ऑटो-कैंसिल हो जाता है और कोई यात्रा नहीं होती, तो ₹60 चार्ज + GST क्यों काटते हो ?
2▪️बुकिंग के वक्त पूरा पैसा लेते हो और कन्फर्मेशन की गारंटी भी नहीं देते और जब कोई यात्रा नहीं होती , तो फिर 25-30% सर्विस चार्ज क्यों काट लेते हो ?
3▪️वर्ष 2022-23 में केवल टिकट कैंसिलेशन से ही 2110 करोड़ कमाए थे , फिर भी रोते रहते हो की रेल घाटे में चल रही है ?
ये अन्याय कब तक चलेगा?
जनता से बिना सेवा दिए हजारों करोड़ वसूलना,
क्या राष्ट्रसेवा है या खुला डाका?
चर्चा करिए और जवाब दीजिए।
एक आम मिडिल क्लास परिवार में 5 से 8 सदस्य होते हैं। सबके पास स्मार्टफोन तो है, लेकिन सबको इंटरनेट की जरूरत नहीं होती।
फिर भी टेलीकॉम कंपनियाँ ऐसे दिखाती हैं जैसे हर व्यक्ति को रोज़ाना 2GB डेटा चाहिए।
हकीकत यह है कि बहुत से बुजुर्ग, महिलाएं या बच्चे सिर्फ कॉल करने या व्हाट्सएप चलाने के लिए फोन रखते हैं।
उन्हें न वीडियो स्ट्रीमिंग चाहिए, न भारी इंटरनेट पैक। लेकिन कंपनियाँ ऐसे महंगे प्लान देती हैं कि लोगों को 350 से 900 रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं — सिर्फ कॉल करने के लिए।
रिलायंस जियो, एयरटेल, वोडाफोन जैसी कंपनियाँ जनता से "डेटा रेवेन्यू" के नाम पर जबरदस्ती वसूली कर रही हैं।
लोगों के पास छोटे रिचार्ज का विकल्प तक नहीं बचा है। पहले 49, 79, 99 रुपये के कॉलिंग पैक मिलते थे — अब सब खत्म।
सरकार और TRAI को हस्तक्षेप करना चाहिए ताकि कंपनियाँ अलग-अलग श्रेणी के लोगों के लिए प्लान लाएँ —>>
1. केवल कॉलिंग प्लान (100 रुपये के अंदर)
2. लिमिटेड डेटा + कॉलिंग (जरूरत भर का डेटा)
3. प्रीमियम डेटा यूजर (जो वीडियो या काम के लिए इंटरनेट चाहिए)
हर कोई डिजिटल इंडिया का हिस्सा बनना चाहता है, पर मजबूरी में महंगे प्लान लेकर जीना डिजिटल नहीं, लूट है।
कॉलिंग सेवा एक जरूरत है, कोई लग्ज़री नहीं — और इसे आम आदमी की पहुंच में लाना सरकार और कंपनियों की जिम्मेदारी है।
आइए हम सब मिलकर @IRCTCofficial और @RailMinIndia से
कुछ खुरपेंची सवाल पूछते है 👇
1. जब टिकट के पैसे पूरे लिए जाते हैं तो सफर अधूरा क्यों मिलता है?
2. बिना टिकट वालों को स्लीपर और AC में चढ़ने कौन देता है?
3. ट्रेनें हर दिन घंटों लेट क्यों होती हैं, और कोई मुआवज़ा क्यों नहीं देता?
4. स्लीपर और जनरल में सुरक्षा का जिम्मा कौन लेगा — चोरी, झगड़े, महिलाओं की परेशानी का?
5. टॉयलेट और सफाई पर इतना बजट खर्च होता है, फिर गंदगी क्यों कायम है?
6. रेलवे ऐप और वेबसाइट टिकट बुकिंग में बार-बार फेल क्यों होती है?
7. स्टेशनों पर पीने का पानी, वेटिंग रूम, और फूड क्वालिटी इतनी घटिया क्यों है?
8. ट्रेन में मेडिकल इमरजेंसी पर कोई सिस्टम क्यों नहीं है?
9. लाखों की कमाई के बावजूद पुराने कोच और टूटी सीटें क्यों चल रही हैं?
10. आखिर रेलवे में जवाबदेही किसकी है — यात्री की या अधिकारियों की?
एक ही कंपनी इंडिया में बीमारी बेच रही और अमेरिका में हेल्थ कांशियस प्रोडक्ट्स,
क्योंकि यहां पर रखवाली करने सो रहे और वहां पर नए हेल्थ पैरामीटर्स पर काम हो रहा ।
कब तक Telecom कपानियों की जनता से मनमानी लूट जारी रहेगी?
क्यों हर टेलीकॉम कंपनी जबरदस्ती डेटा पैक थोप रही है, जबकि करोड़ों गरीब लोगों को उसकी जरूरत ही नहीं?
👉 सिर्फ कॉल करने वालों के लिए सस्ता वॉयस प्लान क्यों नहीं है?
👉 30 दिन का न्यूनतम रिचार्ज प्लान सभी कंपनियों पर लागू क्यों नहीं किया जाता?
👉 क्या सरकार जानबूझकर चुप है क्योंकि इन कंपनियों से भारी चंदा आता है?
👉 TRAI और दूरसंचार मंत्रालय आखिर कर क्या रहे हैं — क्या उन्हें नहीं दिखता कि ये “मोनोपॉली” बन चुकी है?
👉 जो लोग सिर्फ कॉल करना चाहते हैं, उनसे हर महीने 200–300 रुपए वसूलना क्या लूट नहीं है?
👉 क्या अब मोबाइल रखना भी अमीरों का हक़ बन जाएगा?
जनता पूछ रही है — जब डेटा नहीं चाहिए तो डेटा के नाम पर मजबूरी क्यों?
सरकार जवाब दे, ये कंपनियां नहीं — पब्लिक प्रॉब्लम बन चुकी हैं।
जब आप थर्ड AC का टिकट बुक करते हैं और चार्ट बनने के बाद आपको RAC टिकट मिलता है तो आप उम्मीद करते हैं कि जैसे ही सीट खाली होगी , रेलवे आपको पूरी सीट देगा। लेकिन हक़ीकत कुछ और है।
कई यात्रियों ने लिखा है कि TT साहब सीट खाली होते ही RAC वालों को देने की बजाय, बिना टिकट यात्रियों को पैसे लेकर सीट दे देते हैं। यह खुली रिश्वतखोरी है और रेलवे की साख पर सीधा दाग।
सोचिए —>>
आप फुल किराया देकर यात्रा कर रहे हैं, फिर भी आधा सोना, आधा बैठना पड़ता है।
TT कहता है सीट नहीं है, जबकि असल में वो सीट किसी कैश वाले बिना टिकट यात्री को दे चुका होता है।
यात्री को ये तक नहीं पता चलता कि कौन-सी सीट खाली हुई, क्योंकि कोई पारदर्शी सिस्टम नहीं है।
अब सवाल है —>>
क्या TT की नैतिक और प्रशासनिक जिम्मेदारी नहीं बनती कि जो यात्री पूरा किराया दे चुका है, उसे प्राथमिकता दी जाए?
रेलवे की प्रतिष्ठा जनता के भरोसे पर टिकी है, न कि TT के “कलेक्शन” पर।
इस पूरे खेल को खत्म करने के लिए ज़रूरी कदम —>>
1. लाइव सीट अपडेट सिस्टम — हर कोच की खाली सीटें रेलवे ऐप पर रीयल-टाइम दिखें।
2. CCTV निगरानी — TT की हर सीट अलॉटमेंट कैमरे में रिकॉर्ड हो।
3. डिजिटल लॉग — हर सीट असाइनमेंट का डेटा पब्लिक रिकॉर्ड में जाए, ताकि गड़बड़ी पकड़ी जा सके।
4. यात्री शिकायत पोर्टल पर फास्ट-ट्रैक एक्शन रिश्वत साबित होते ही तत्काल सस्पेंशन और जुर्माना।
5. जनता को जागरूकता —>> यात्रियों को सिखाएं कि वे सीट की स्थिति कैसे चेक कर सकते हैं (NTES या IRCTC पर “Chart Vacancy” फीचर)।
अब टीम खुरपेंच ने इस मामले की जांच शुरू कर दी है।
अगर किसी TT की ऐसी हरकत का सबूत मिला
तो उसे समझ में आ जाएगा कि “सीट बेचने” की कमाई कितनी महंगी पड़ सकती है।
रेलवे, सुन लो — जनता को एडजस्ट नहीं, इंसाफ चाहिए।
नमस्ते। विकसित देशों में सरकारें सख्त कानूनी ढांचे से बंधी होती हैं, जहां सड़क रखरखाव, रोशनी व पार्किंग जैसी विफलताओं पर नागरिक मुकदमा दायर कर सकते हैं—जैसे अमेरिका में टॉर्ट क्लेम एक्ट या ब्रिटेन में हाईवे मेंटेनेंस ड्यूटीज के उल्लंघन पर। स्वतंत्र एजेंसियां नियमित ऑडिट करती हैं, प्रदर्शन मानकों की अनदेखी पर जुर्माना या अधिकारी हटाए जाते हैं। पारदर्शिता कानून (FOIA जैसा) और मीडिया/चुनावी दबाव जनता को जवाबदेही सुनिश्चित करते हैं, भारत से अलग जहां प्रवर्तन कमजोर है।
बिना हेलमेट... जुर्माना 1000/-
नो पार्किंग में पार्किंग करना... जुर्माना 3000/-
मोटरसाइकिल का बीमा नही ... जुर्माना 1000/-
शराब पी कर वाहन चलाना... जुर्माना 10000/-
नो एंट्री में वाहन चलाना... जुर्माना 5000/-
मोबाईल फोन पे बात करना... जुर्माना 2000/-
प्रदूषण सर्टिफिकेट नहीं... जुर्माना 1100/-
ट्रिपल सीट ड्राइविंग... जुर्माना 2000/-
खराब सिग्नल... कोई जिम्मेदार नहीं है!
पार्किंग की व्यवस्था नहीं... कोई जिम्मेदारी नहीं है!
सड़क पर गड्ढ़े... कोई जिम्मेदार नहीं है!
अतिक्रमित फुटपाथ... कोई जिम्मेदार नहीं है!
सड़क पर रोशनी नहीं... कोई जिम्मेदार नहीं है!
सड़क पर कचरा बह रहा है...कोई जिम्मेदार नहीं है!
सड़कों पर लाइट के खंभे नहीं... कोई जिम्मेदार नहीं है!
सड़क के मेनहोल में गिर के मर जाये...कोई ज़िम्मेदार नहीं!
महीनों से खुदी सड़क ... कोई जिम्मेदार नहीं है!
गड्ढों में गिर कर आप गिरो चोटिल हो जाएँ... कोई जिम्मेदार नही है!
आवारा गायें जानवर टकरा जाए कुत्ता काट ले... कोई जिम्मेदार नहीं!
ऐसा लगता है कि जनता ही एकमात्र अपराधी है और जुर्माना देने के लिए उत्तरदायी है। प्रशासन, निगम और सरकार कोई जिम्मेदार नहीं है। उनके लिए कोई नियम लागू नहीं होते हैं। वे किसी भी चूक के लिए कभी ज़िम्मेदार नहीं हैं।
क्या उन्हें दोषी नहीं ठहराया जाना चाहिए ????
नागरिक केवल काम करेंगे... दर्द का सामना करेंगे... टैक्स चुकाना होगा... जुर्माने का भुगतान करेगा... सरकार की जेब भरें... और उन्हें फिर से सत्ता में आने के लिए वोट दें !
@IRCTCofficial@Bharangar320 पानी का bottle लेने के लिए क्या PNR no होना जरूरी है जो PNR no. मांग रहे हैं @IRCTCofficial । General coach में सफर करने वाले या प्लेटफार्म टिकट ले कर किसी को छोड़ने वाले भी तो प्लेटफार्म से पानी का bottle ले सकते हैं।
मैनपुरी में एक दबंग सर्राफा व्यवसायी के हौसले बुलंद हैं. सर्राफा व्यवसायी के यहां काम करने वाले दलित मजदूर की ज़मीन को सर्राफा व्यवसायी ने अपने साथियों के साथ मिलकर उसकी जमीन को धोखाधड़ी से अपने नाम करा लिया और फिर उस मजदूर को गायब भी कर दिया. लेकिन जब इसका विरोध दलित परिवार ने किया तो फिर उसके भाई को घायल कर दिया. #mainpuri #landdispute #dalit #upnews #mainpuri #mainpurinews #dalits