#सं०_५
कभी तो पूछो तुम मुझसे
"क्या हुआ"..
मैं कहूँगा "कुछ नहीं"..
फिर लेकर हाथ मेरा अपने हाथों में,
एक प्यारी नज़र से दे��ना और पूछना "क्या हुआ"..
तेरे काँधे पर सर रखकर, थोड़ी भरी सी आँखों से,
मैं सारी बात बतला दूँगा..
#रत्नम्
#सं०_२
एक काश! तो रह ह�� जाती है न..
तेरे गए ज़माने हुए, पर एक आस तो रह ही जाती है न..
माना कि सब ख़तम हो चुका है वर्षों पहले..
पर वो जो था कुछ दरमियाँ, वो बात तो रह ही जाती है न....
#रत्नम्
@GitaPress ये "असामाजिक तत्व" स्वयं के लिए कुछ नहीं मांग रहे थे, वे बस लोगों से गीताप्रेस की दैनन्दिनी खरीदने का अनुरोध कर रहे थे. आप इनलोगों को धन्यवाद कहते हुए किसी अन्य प्रकार से इस बात का खंडन कर सकते थे, पर आपका शब्द दंभपूर्ण है. आपको इनलोगों से क्षमा माँगनी चाहिए.