क्या हमारे धनकुबेर मंत्री, सांसद और एमएलए एक किसान जगदीश सैनी से कुछ सीखेंगे?
बच्चों को छत नहीं मिली तो इस किसान ने पहले साढ़े तीन करोड़ की जमीन दे दी और भ्रष्टाचारियों का बनाया स्कूल भवन गिर गया तो उन्होंने अब अपने घर का आधा हिस्सा उसी स्कूल को दे दिया। हमारी विधानसभा और संसद में जगदीश सैनी को होना चाहिए या उन्हें जो आज वहाँ बैठे हैं और जिनके कारण तीन दशक यानी छह सरकारों के समय से इस स्कूल के हालात इतने बदतर हैं।
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आप राहुल चौधरी के बनाए इस विडियो को देखिए।
राहुल चौधरी कोई पत्रकार नहीं है। लेकिन यह मुझ जैसे कितने ही पत्रकारों को शर्मसार कर रहा है। हम पत्रकारों के चेहरे से तो इस लड़के ने सारे नकाब हटा ही दिए हैं, हमारे जनप्रतिनिधियों की असलियत भी इसने खोल कर रख दी है।
राहुल चौधरी की अभिव्यक्ति अनगढ़ हो सकती है, उसकी दृष्टि नहीं। उसके पास शायद प्रेस-कार्ड नहीं, जो कि मेरे पास भी नहीं; लेकिन इस लड़के के पास वह नागरिक चेतना है, जो कई बार बड़े-बड़े न्यूज़रूमों और हम जैसे पेशेवर पत्रकारों की आँखों से भी ओझल हो जाती है।
और मैं यह बात गहरी आत्मग्लानि के साथ लिख रहा हूँ।
मैं जिस जयसिंहपुरा में रहता हूँ, उससे पांच सौ मीटर दूर डेहर की ढाणी का यह सच शर्मसार करता है।
जिस सत्य को एक सजग युवा नागरिक ने देख लिया, उसे मैं नहीं देख पाया, जबकि अपने को पत्रकार समझता हूँ। पत्रकारिता की पहली कसौटी शायद यही है कि हम अपने आसपास के अदृश्य दुःख को देख सकें; इस कसौटी पर यह मेरी निजी विफलता और शर्मिंदगी है।
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यह कहानी एक किसान जगदीश सैनी की है। उन्होंने 1997-98 में, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री जी के आह्वान पर हर बस्ती के निकट विद्यालय खोलने की सरकारी मुहिम चली, तब विद्यालय के पास अपनी जमीन नहीं थी। जगदीश सैनी ने सात सौ वर्गगज का अपना कॉर्नर प्लॉट विद्यालय को दे दिया। आज उस जमीन का बाजार-मूल्य करीब साढ़े तीन करोड़ रुपये है। यों किसी दान का मूल्य बाजार तय नहीं करता, लेकिन सरकारी अफसरों, शिक्षा विभाग, इलाके के विधायकों और सांसदों और 1997 से अब तक रहे शिक्षा मंत्रियों की कृतघ्नता का परिमाण समझने के लिए यह आँकड़ा जरूरी है।
जगदीश सैनी के उसी कॉर्नर प्लाॅट पर राजधानी के ही एक हिस्से में यह विद्यालय भवन बना। यह इतना जल्दी ढह गया तो आप समझ सकते हैं कि कितने भ्रष्ट और बेईमान लोगों ने इसे बनाया होगा। एक सामान्य शिक्षित, लेकिन नैतिक आभा से दिपदिपाते किसान और सरकारों में बैठे लोगों की नीयत की तुलना इससे की जा सकती है।
भवन बना, लेकिन समय, उपेक्षा और प्रशासनिक आपाराधिक उदासीनता के बीच वह जर्जर होता गया। लगभग डेढ़ वर्ष पहले एक शिक्षिका बच्चों को पढ़ा रही थीं। संयोग से वे और बच्चे कमरे से बाहर निकले ही थे कि छत धड़ाम से गिर पड़ी। कुर्सियाँ-मेजें मलबे में दब गईं। मृत्यु उनसे केवल कुछ लम्हों के अंतर से लौट गई। यदि बच्चे वहीं बैठे रह जाते तो आज हम इसे किसी भयानक “हादसे” का नाम देकर संवेदना प्रकट कर रहे होते, जबकि वह हादसा नहीं, वर्षों की संस्थागत लापरवाही से तैयार की गई संभावित हत्या होती।
विद्यालय की छत गिर गई, पर व्यवस्था की नींद आज तक नहीं टूटी। बच्चों को कोई सुरक्षित भवन नहीं मिला। तब उसी जगदीश सैनी ने, जो पहले ही करोड़ों की जमीन दे चुके थे, अपने घर के दो कमरे विद्यालय के लिए खोल दिए। उन्होंने पहले अपनी जमीन दी; अब अपना घर भी दे दिया।
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यह केवल उनकी विशालहृदयता की कहानी नहीं है। यह हमारे शासन, प्रशासन और जनप्रतिनिधित्व के माथे पर लगा हुआ कलंक है।
सरपंच कहाँ था?
उस क्षेत्र के विधायक ने क्या किया?
शिक्षा विभाग कहाँ था?
पूर्व और वर्तमान सरकारों की निगरानी व्यवस्था किस काम की थी?
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वर्तमान जनप्रतिनिधियों की तत्काल जिम्मेदारी है, लेकिन उनसे पहले पदों पर बैठे लोग भी अपने गिरेबान में झाँकें। किसी विद्यालय का भवन एक दिन में खंडहर नहीं बनता; उसकी हर दरार वर्षों तक सत्ता की आँखों के सामने चौड़ी होती है।
मैं राजस्थान के सभी विधायकों से आग्रह करता हूँ कि उनके निर्वाचन क्षेत्र में यदि किसी विद्यालय के बच्चों को सुरक्षित जगह उपलब्ध नहीं है तो मंत्री, विधायक, सांसद और अन्य जनप्रतिनिधि अपने विशाल सरकारी आवासों अथवा निजी घरों का एक हिस्सा उनके लिए खोल दें। और वहाँ जगदीश सैनी का बड़ा सारा चित्र लगाएँ और अपने जिन आकाओं के फोटो लगा रखे हैं, उन्हें कूड़ेदान में फेंक दें, ताकि प्रतिदिन याद रहे कि जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी एक साधारण नागरिक अपने कंधों पर ढो रहा है।
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राजस्थान विधानसभा के सामने विधायकों के लिए पाँच सितारा होटलों को मात देने वाले आलीशान आवास खड़े हैं। राजस्थान इंटरनेशनल सेंटर है, कॉन्स्टीट्यूशन क्लब है और सत्ता की प्रत्येक आवश्यकता के लिए भव्य इमारतें हैं। इस प्रदेश के वक्ष परा बोझ बने नेताओं के लिए विशालकाय सरकारी भवन और लवाजमे हैं। लेकिन हमारी शिक्षा और चेतना के केंद्र आज अपने हालात पर आंसू बहा रहे हैं।
विडंबना देखिए, सत्ता को छत चाहिए तो राज्य महल खड़े कर देता है; बच्चों को छत चाहिए तो जगदीश सैनी को अपना घर खाली करना पड़ता है। यही एक सच हमारी विकास-प्राथमिकताओं का पूरा रिपोर्ट-कार्ड है।
मैं जगदीश सैनी को प्रणाम करता हूँ। लेकिन हमारा प्रणाम सरकार को उसके दायित्व से मुक्त नहीं कर सकता। इस विद्यालय के लिए तत्काल सुरक्षित वैकल्पिक भवन, नए निर्माण की समयबद्ध स्वीकृति और इस दीर्घ उपेक्षा की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
जगदीश सैनी की उदारता पर गर्व कीजिए; और उस व्यवस्था पर लज्जित भी होइए, जिसने एक नागरिक को विद्यालय के लिए पहले अपनी जमीन और फिर अपना घर देना पड़ा। लेकिन जनता के पैसे से जनता के परिश्रम से कमाए पैसे को भ्रष्टाचार और अपने वैभव के लिए खर्च करते हैं, यह जाने कब शर्मसार करेगा।
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इन हालात के लिए निश्चित ही शिक्षा मंत्री मदन दिलावर दोषी हैं। उन्हें जो जिम्मेदार ठहराया जा रहा है, वह ग़लत नहीं है। एकदम सही है। उनकी भाषा भी ख़राब है। लेकिन क्या वे अहंकारी भी कभी थोड़ा शर्मसार होंगे, जिनके कार्यकाल में यही सब इसी तरह हो रहा था और उन्होंने मदन दिलावर से भी गहरी आँखें मूंद रखी थीं?
मदन दिलावर एक दलित हैं और इसीलिए उन पर हमले आसान हैं, लेकिन मदन दिलावर जैसे ही अपराधों और उनसे भी खराब भाषा वाले उच्च और प्रभावशाली जातियों के नेताओं के कामकाज के तौरतरीकों पर कोई नहीं बोलता, जो नौनिहालों के शिक्षा केंद्रों, कॉलेजों, महाविद्यालयों और विश्वविद्यालयों की बदहाली को अनदेखा करके लग्जरी होटलों को शर्मसार करते नभस्पर्शी भवन अपने नेताओं, अफसरों और कोटरी के लोगों को खुश करने के लिए खड़े करते हैं या मंदिरों पर सब कुछ लुटा रहे हैं। ईश्वर तो कण कण में है अगर है तो उसका कोई क्या मंदिर बनाएगा। लेकिन भारतीय ज्ञान परंपरा और आदि शंकराचार्य से लेकर पुनर्जागरण काल तके सच्चे संन्यासियों की भाषा में कहें तो अगर कोई सच्चा मंदिर है और जो ब्रह्म के समस्त द्वार खोलता है, तर्क और विवेक तथा वैज्ञानिक सोच देता है तो वे स्कूल, कॉलेज और यूनिवर्सिटीज या पुस्तकालय हैं।
तो जगदीश सैनी को प्रणाम कीजिए और अपने सरकारी घरों के हिस्से उन बच्चों के लिए खोल दीजिए, जो विद्यार्जन के लिए अपने घर से निकले हुए हैं।
कात्यायन स्मृति में आज के हालात के लिए कितना उपुयक्त कहा गया है :
नृपाधमः स विज्ञेयस्त्याज्यं तस्य च शासनम्।
यत्र बालाश्च बालिकाः सुखेन नाधीयन्ते वै॥
एयरलाइन होटल, सिरोही में रामझरोखा सहित चार मामलों की जांच रिपोर्ट को लेकर पत्रकार वार्ता में गंभीर सवाल उठाए। जांच रिपोर्ट को बदनीयती से तैयार किए जाने के आरोपों के बीच मुख्यमंत्री जी से स्वतंत्र, निष्पक्ष एवं उच्च स्तरीय जांच की मांग की गई है। जनहित से जुड़े मामलों में पारदर्शिता और जवाबदेही जरूरी है।
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कालन्द्री थाना क्षेत्र के सिरोडकी गांव में विनाराम जी मेघवाल के सुपुत्र की मौत के मामले को लेकर थाने के बाहर मेघवाल समाज के धरने में शिरकत की।
पुलिस अधिकारियों से वार्ता के बाद निष्पक्ष कार्रवाई एवं पोस्टमार्टम करवाने पर सहमति बनी। इस दौरान समाजजनों के साथ खड़े रहकर न्याय की मांग को मजबूती से रखा।
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Sirohi में सियासत गरम! 🔥
पूर्व विधायक संयम लोढ़ा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में मंत्री और उनके बेटे के नार्को टेस्ट की मांग उठाई। साथ ही पट्टा विवाद, राम झरोखा प्रकरण, ₹1500 करोड़ के विकास कार्यों और NH-168 बाईपास को लेकर सरकार पर गंभीर सवाल खड़े किए।
लोढ़ा ने कहा—“सच्चाई सामने आनी चाहिए।”
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स्त्री के अस्तित्व, सम्मान और अधिकारों को लेकर इससे खूबसूरत संवाद शायद भारतीय इतिहास में पहले कभी नहीं हुआ होगा।
श्री राहुल गांधी जी की यह संवेदनशील और विचारोत्तेजक बातचीत हर व्यक्ति को जरूर सुननी चाहिए। यह सिर्फ महिलाओं की बात नहीं, बल्कि एक बेहतर और समानता आधारित समाज की बात है।
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राजस्थान में हो रहे निकाय चुनाव में सियासी दलों में टिकट पाने के दावेदार उत्साह के साथ आवेदन कर रहे है. काग्रेस ने आवदकों से कोई शुल्क तय नहीं किया है लेकिन मारवाड वाले जिले के एक अध्यक्ष जी ने पांच हजार रूपये प्रति टिकटार्थियों लेने का फरमान जारी कर चांदी काट ली है. जिसकी खूब चर्चा है.
फूफाजी कृपया ध्यान दे.