मेरी बिल्डिंग के भाग आज खुल जाएंग���,
राहुल आएंगे
वो रोम आएंगे आएंगे, रोम आएंगे!!
•••
तो भारत मे कांग्रेस बुरी तरह से चुनाव हार चुकी थी। बच्चे बच्चे को पता था कि चुनाव हारते ही राहुल, सोनिया प्रियंका सब इ��ली भाग जायेंगे।
इसलिए 2014 की उस उस सुबह, रोम की गली गली मे यही बाजा बज रहा था। सारे इटालियन बड़े खुश थे। कह रहे थे कि हमारी बेटी प्यार मोहब्बत के चक्कर मे, उस गोडसे- सावरकर के देश चली गई थी। अब वह आखिर लौटकर आ जाएगी।
तो सोनिया की चाची ने कमरा साफ किया, चादरें बदलीं, रसोई में पिज्जा पकाने लगी।
सोंधी खुशबु आ रही थी।
•••
कजिन, मेहमानों को लेने एयरपोर्ट चला गया। तीन घंटे खड़ा रहा। बोर्ड पर न सोनिया ��ाइनो का नाम आया, न राउल विंची का। उसने सोचा, शायद अगली फ्लाइट में होंगे। आखिर इण्डिया के लाखों अंधभक्तो का यकीन गलत तो हो नहीं सकता।
लेकिन दिन हफ्ते मे बदला, हफ्ते महीने मे,
औऱ महीने साल मे बदल गए। पिज्जा फेंक दिया गया। चादरे फिर धूल फाकने लगी।
••••
2019 आया।
राहुल सूट बूट की सरकार औऱ चौकीदार चोर का नारा लगा रहे थे। सरकार की हालत पतली थी, लोग नोटबंदी के 50 दिन बाद से ही चौराहे पर इंतजार कर रहे थे।
लेकिन जैसे ही पुलवामा हुआ, अंधभक्त फिर उम्मीद से भर गए। दरअसल ऐसी घटनाओ का चुनाव के समय होना, शुभ होता है। औऱ उन्हें नॉन बायलॉजिकल ने परसनली एश्योर भी किया था, कि चुनाव हारते ही राहुल, सोनिया प्रियंका सब इटली भाग जायेंगे।
•••
तो 2019 की उस सुबह, रोम की उसी गली मे फिर वही बाजा बज रहा था- रोम आएंगे आएंगे, रोम आएंगे!!
इस बार तो पड़ोसी भी आ गए। किसी ने फूल लाए, किसी ने झंडा, किसी ने खाली सूटकेस। कजिन फिर एयरपोर्ट गया। बैठा रहा। टर्मिनल की कॉफी इतनी पी ली, कि बरिस्ता की वेट्रेस उसे सीजनल एम्प्लॉई समझने लगा। फ्लाइटें आईं, गईं, जैतून का तेल आया, पर्यटक आए, एक कुत्ता ��ी आया।
राहुल नहीं आए।
सीटें बढ़ी, पर वे हारे थे । फिर भी रोम की फ्लाइट नहीं पकड़ी। नाराज इटालियन मौसी ने उस दिन फैसला किया, अब पिज्जा नहीं बनेगा।
••••
2024 में इटली में उत्साह कम था। पर भारत मे भक्तो को झूमकर उम्मीद थी कि इस बार 400 पार होगा, औऱ राहुल सोनिया इटली भाग जायेंगे।
नतीजे आये। बत्ती गुल हो गई।
लंगड़ी सरकार बनी। उधर रोम मे कजिन ने, होपिंग अगेंस्ट होप, एक बार एयरपोर्ट जाने की सोची।
पर इ�� बार चमत्कार हुआ। इण्डिया से सचमुच फ्लाइट आई। रेड कारपेट बिछा। प्लेन का दरवाजा खुला। कजिन की खुशी का कोई छोर नहीं था।
•••••
फिर उसने देखा- मेलोडी चॉकलेट का डिब्बा लिए एक बूढ़ा आदमी धीरे-धीरे सीढ़ियां उतर रहा था।
वो रोम आएंगे आएंगे, रोम आएंगे!!
जो पुरुष प्यार कर सकता है,
वह सब कुछ कर सकता है।
किसी को देखना, चाहना, जाति-धर्म-संस्कृति और देश की सीमाओं को पार कर उसे राजी करना, फिर निभाना। आपको क्या लगता है, आसान है??
जिगर चाहिए जनाब.. अपने आपको खत्म करन��� का। प्रेम गली अति सांकरी, जामे दो न समाहिं ..
●●
प्रेम विवाह के जोड़ो में आपको कुछ अलग मिलेगा। वे या तो शुरुआती कुछ वर्षों में बर्बाद हो जाते हैं, या फिर बेहद परिपूर्ण जीवन जीते हैं।
इसलिए, कि विवाह पूर्व जो खूबसूरत लगता है, उंसके लिए सजना , संवरना, एक दूजे को देखना, आंखों में बातें, उसे सराहना..
उसकी हंसी पर अपने सुख, अपना अहम निछावर कर देना। तब ये असल नही होता।
आपका एक अस्थायी रूप है, अभिनय है�� आपके व्यक्तित्व के उजले पक्षों का सबसे बेहतरीन प्रस्तुतिकरण। पर जब विवाह हो जाता है, तो स्थायी रूप से यह अभिनय बेहद कठिन होता है।
●●
ट्रॉफी पाने के बाद, मेहनत रुक जाती है। जब अब आप मूल स्वभाव पर लौट जाते हैं। गुस्सा, अहम, आत्मकेंद्रित फैसले..
तो रिश्ता टूट जाता है।
क्योकि आप "बदल" गए। आपसे र��श्ता ही उस किरदार को सच मानकर बनाया गया है, जो अभिनय था। प्रेम विवाह इसलिए असफल होते हैं।
पर जो सफल हुए, ऐसे जोड़े, अपने बेस्ट प्रस्तुतिकरण को अपनी आदत में ढाल लेते हैं। केयर, डेडिकेशन, मुस्कुराहट, सह लेना.. ये स्थायी हो जाते है।
●●
प्रेम इस तरह इंसान की अच्छाइयों को स्थायित्व देता है।
प्रेम अब आदत है, आपका व्यक्तित्व होता है। आपका स्वभाव, भोजन और उच्छवास है। वह आपके साथ चलता है, हाथों में हाथ ��िए, या आपके आगे, आपके पीछे ..बस प्रेम चलता है।
मित्र, पुत्र, परिवार, रिश्तेदार, टीम, वर्कप्लेस, देश विदेश.. आपके दायरे में हर करीबी आपके प्रेम के झरने की कलकल में मदहोश होता है। उस झरने से दो अंजुल पीकर तृप्त होता है।
जब आपसे मिलकर लौटता है तो भीगी उंगलियों में आपकी खुशबू होती हैं।
आपकी छाप.. आपकी निशानी,
या कहिये आपका विजिटिंग कार्ड।
●●
उसे प्रेम की कद्र है, तो वह आपको भी उतना प्रेम लौटा कर जाए���ा। इस लौटते प्रेम से आपकी भी दुनिया, आपका वातावरण, वर्कप्लेस, देश, और भी खुशनुमा, और भी समृद्ध होता जाता है।
अब आप आत्मविश्वासी होते हैं, मजबूत होते है, भरोसा करते है, टीम बनाते हैं, लीड करते है, खूबसूरत बोलते है, खूबसूरत रोते है। आपकी उदासी भी खूबसूरत होती है।
और हां, कभी कभार आ ही जाने वाले क्षणिक गुस्से में भी प्यार ही झलकेगा।
●●
राजीव को बस पांच साल मिले। प्रशासनिक रूप से वे बेहद कल्पनाशील,सफल थे, राजनैतिक रूप से उतने ह�� अल्हड़। अंततः छलने वाले मित्रो और सलाहकारो पर उनका भरोसा भी प्रेम का एक रूप है।
उनके दौर के कुछ फैसले सम्प्रदायिक राजनीति की जड़ में माने जाते है। मगर ये कोई भी नही कह सकता कि राजीव साम्प्रदायिक व्यक्ति थे। प्रेमिल व्यक्ति वैसा हो ही नही सकता।
और हां, अगर वे जी जाते, साम्प्रदायिकता को थाम भी लेते। देश की धारा आज कुछ और ही होती।
कोई शक ??
●●
राजीव के परिवार में प्रेम की वही धारा बहती है। रा���ीव की हत्या के बाद तीस बरसो में उन्होंने क्या नही देखा। सत्ता का स��ख, अपमान का सागर। बच्चो का चाइल्डहुड ट्रामा, उससे उबरना, डूबना , झूलना, सँघर्ष करना, सामना करना..।
चाहे आप उनके तरीकों और स्मार्टनेस पर सवाल उठा लें।जो मोहब्बत भरे रिश्ते पर छुरी चलाकर, दुश्मन के बगलगीर हो गए, उन्हें सलाम करें, और भरोसा करने वाले को पप्पू कह लें। उनके जूते, कपड़े, भाषा, जीवन शैली पर बदनाम करें, एब्यूज करें, लांछन लगाएं।
गाली दें।
मगर उनकी आंखों में नफरत कभी नही मिलेगी।
राहुल, सोनिया, प्रियंका की आंखों में प्रेम वह भाव दिखता है, जो भाव पिता की विरासत है - प्यार की विरासत, राजीव की विरासत।
●●
और जिसके पास प्यार की विरासत हो,वह सब कुछ कर सकता है
सोनिया के राजीव को मेरी स्मरणांजली
❤️
लिखता हूँ, फिर भूल जाता हूँ।
कभी वह किसी की वाल पर, किसी ग्रुप मे, किसी व्हाट्सप मैसेज के रूप मे दिखता है, तो अपनी लिखावट का आज भी जिन्दा होना अच्छा लगता है -
मगर इतने बरसो बाद उसका आज भी रिलेवेंट बना होना, क���ीं ज्यादा बुरा लगता है।
••••
कचोटता है, कि इतने साफ संदेश के बावजूद इतने बरसो मे कोई असर नहीं दिखा।
देखिए जरा कि अख़लाक़ की लिंचिंग से कहानी लिखी, वह एक स्वतंत्र भारद्वाज का नाम जोड़ते ही ताज़ी हो गयी।
मन्दिर आंदोलन के कोठारी बन्धुओ के लहू से बनी धारा मे कासगंज का चंदन, रामभक्त गोपाल औऱ स्वतंत्र भारद्वाज नई नई कड़ी बनकर जुड़ते जा रहे है।
इन कड़ियों का बदस्तूर जुड़ते जाना, बताता है एक पित���, परिवार, शिक्षक, समाज, व्यवस्था, कानून, धर्म हर रूप मे फेल हो गए हैं।
प���ढ़ी दर पीढ़ी, बार बार फेल हो रहे हैं।
•••
मैं धार्मिक शख्स नहीं, लेकिन कर्मफल के सिद्धांत को मानता हूँ। बाबरी मामला, सुप्रीम कोर्ट ने न्यायपूर्ण भले साबित कर दिया हो। मगर सबसे ऊँची, उस ईश्वर की अदालत ने खिलाफ फैसला दिया है।
औऱ बाबरी का शाप, इस देश पर , हिन्दू बच्चो पर , हमारी अगली पीढ़ीयो पर,सर चढ़कर बोल रहा है। आप तर्क दें, गालियां दें,
अस्वीकार करें..
लेकिन सजा तो भुगत ही रहे हैँ न..
••••
जो यु���ा, डेमोग्राफीक डिवीडेंट बनकर हमें विश्व मे सबसे अग्रिम पंक्ति मे ले जाने वाला था। वह पंद्रहवी सदी के पोंगा पंथ मे डूबकर जश्न मना रहा है।
बर्बाद है, किसी का सर फोड़कर, बच जाने का जश्न मना रहा है। उसे खून का स्वाद हमने चखाया है।
यह फलसफा, जेहन मे, हमने बिठाया है। जो, हुआ, जो हो रहा है, जो होगा, वह वही इंसानी लहू की आवाज है, जिससे हम पिंटोअस पाइलेट की तरह, बार बार हाथ धोकर भी पीछा नहीं छुड़ा पा रहे हैं।
थैंक्स @vo_barbareek (आशु)
इस प्रस्तुति के लिए
❤️🙏
शेम शेम राहुल!!!
राहुल गाँधी पर ST/SC एक्ट मे मुकदमा हुआ है। तीन संगीन, गैर जमानती संज्ञेय धाराओ मे। औऱ राहुल कानून से बचते हुए भाग रहे हैं।
•••
राहुल गाँधी ने, कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की रैली के बाद, उस स्थल को शुद्धिकरण की निंदा की, औऱ इसे दलित वर्ग से आने वाले खड़गे का जातिसूचक अपमान बताया।
इस पर एक उत्तराखंड के दलित कार्यकर्ता अमित कुमार ने हल्दवानी थाने मे रपट लिखाई कि साफ सफाई शुद्धि के सामान्य कार्य को, राहुल ने जाति आधारित नफ़रत बताकर, समाज मे वैमनस्य फैलाने की कोशिश की, औऱ धार्मिक भवनाओ का अपमान किया।
सो 3 धाराओ मे मुकदमा हुआ है।
•••
एक धारा है - BNS 196
इसके के तहत जुर्म का मतलब है, धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र आदि के आधार पर समूहों के बीच दुश्मनी, नफरत या वैमनस्य फैलाना या फ���लाने की कोशिश करना। आप बोलकर, लिखकर, संकेत से या इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भी ऐसा करें तो यह धारा लगती है।
इसमें सामान्य सजा अधिकतम 3 वर्ष कैद या जुर्माना या दोनो है। यह संज्ञेय औऱ गैर-जमानती अपराध है।
•••
दूसरी धारा - BNS 299के तहत जानबूझकर और दुर्भावना से किसी वर्ग की धार्मिक भावना ठेस पहुँचाने का अपराध है।
इसमें सजा आमतौर पर 3 वर्ष तक कैद या जुर्माना या दोनों है। FIR के पाठ में पुलिस ने इसे धार्मि��� भावना ठेस पहुंचने से लगाया है।
•••
तीसरी धारा है अनुसूचित जाति/जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम धारा 3(1)(q)जिसमे कोई गैर-SC/ST व्यक्ति किसी लोक सेवक को झूठी या तुच्छ जानकारी दे, जिससे वह अधिकारी अपनी कानूनी शक्ति का इस्तेमाल कर किसी SC/ST व्यक्ति को चोट या परेशानी पहुँचाए।
सजा न्यूनतम 6 महीने, अधिकतम 5 वर्ष और जुर्माना। SC/ST एक्ट के कई अपराध कठोर होते हैं। अग्रिम जमानत पर भी प्रतिबंध होता है।
•••••
ऐसे संगीन अपराधों मे हल्द्वानी की पुलिस ने जुर्म कायम ��र लिया है। औऱ सरगर्मी से मुल्जिम राहुल की तलाश कर रही है।
अंतिम समाचार मिलने तक मुल्जिम राहुल, कानून की पकड़ से फरार था। खुफिया खबरों के अनुसार उसके नई दिल्ली मे 10 जनपथ के आसपास कही छुपे होने की पुख्ता सूचना मिली है।
•••
लीडर ऑफ़ अपोजिशन के संवैधानिक पद पर बैठे शख्स को पहले तो ऐसे जघन्य अपराध मे शरीक नहीं होना चाहिए। औऱ अगर अपराध कर ही दिया है, तो स्वयं के टीए डीए पर हल्दवानी जाकर सरेन्डर करना चाहिए।
आखिर जिसके परनाना 9 साल जेल मे रहे, उसका दो तीन साल तो जेल मे बनता है।
••••
रविवार को अपराध दर्ज हो गया है।
लेकिन अभी तक वे हल्दवानी थाने जाकर, कर्मठ उत्तराखंड पुलिस (मित्रता, सेवा और सुरक्षा) के सम्मुख सरेन्डर नहीं किया है। इस बात से मै अत्यंत क्षोभ मे हूँ।
पुलिस को उन्हें बेड़ियों मे जकड़कर, घसीटते हुए लेकर जाना चाहिए। व्यक्ति बड़ा या छोटा, कानून के सम्मुख बराबर है।
फिलहाल मै र��हुल गाँधी से अपना समर्थ�� वापस लेने पर गंभीरता से विचाररत हूँ।
शेम शेम राहुल!!!
नेहरू जी इतने बड़े वामपंथी थे..
कि सड़को पर भी बाएं साइड मे चलने को, ट्रैफिक रूल बना दिया।
हद तो यह कि कोई दक्षिणपंथी यदि दाएं दाएं चलना चाहे, तो उस पर पुलिस "रॉंग साइड " कहकर जुर्माना कर देती है।
••••
इस तरह, बड़ी सूक्ष्म चतुराई से, उन्होंने लोगो को वामपंथ के सही, दक्षिण पंथ के गलत होने की मानसिक ट्रेनिंग दी है।
परन्तु वाम को सही समझने से, उसी राह चलने से, धीरे धीरे इंसान दिमागी नक्सली होता जाता है।याने सड़क पर बाएं चलने का हमारी संस्कृति औ�� राष्ट्रीयता पर विघटन कारी असर पड़ता है।।
••°
अब अपने अंतिम कार्यकाल के बचे खुचे दौर मे, मोदी जी को इस प्रमुख सड़क सुधार पर ध्यान देना चाहिए।
मै इंतजार मे हूँ, कि एक दिन 8 बजे टीवी पर आकर घोषणा करें कि अब से सड़क के लेफ्ट मे चलना कैंसिल।
सबको दाएं चलना होगा।
औऱ स्टीयरिंग व्हील भी दाएँ साइड ही होगा।
🙏❤️
नेता वो होता है
जो अपने केबिनेट मेंबर्स, पार्टी अध्यक्ष और तमाम दूस���े सहयोगियों को धकिया कर, कैमरे की जद से बाहर फेंकवा देता है। और खुद स्पॉटलाइट मे..
शेर की तरह अकेला चलता है।
••
लेकिन जो युवाओं औऱ महिलाओ को आगे कर, उन्हें ताकत देने के लिए, खुद चुपचाप पीछे खड़ा हो जाता है उसे नेता नहीं,
महज, फैसिलिटेटर समझना चाहिए।
••
और 21 वीं सदी के हिंदुस्तान को नेता नहीं,
नई पीढ़ी की क्षमताओं को, चुपचाप पीछे रहकर ताकत देने वाला फैसिलिटेटर ही चाहिए।।
वेल्डन राहुल!!
❤️🥰
थाने, औऱ कचहरी मे आप खडे हो गए जनता के लिए, तो सही नेता हो गए।
••
चुनाव विकास से नह���ं, कनेक्ट से जीते जाते हैं।
तहसील के मामूली काम, थाने मे सुनवाई मे दिए सहयोग का क्या महत्व होता है, सामान्य तौर पर डाय��ेस्टी, उच्च शिक्षित या ब्यूरोक्रेटिक बैकग्राऊँड से निकले नेता यह बात कभी नहीं समझ पाते।
दूसरी तरफ स्टूडेंट पॉलिटिक्स या जनसंघर्ष से निकले नेताओ को यह समझ, घुट्टी मे मिली होती है। इसलिए राजनीती मे वे रेजिलियेंट होते हैँ। कठिन समय गले पड़ जाये, तो भी बार बार बाउंस बैक होते हैं।
••
तो डायनेस्ट शिरोमणि राहुल को, थाने मे एफ़आईआर के लिए खडे होते देखना सुखद है। बाकी के कांग्रेसी नेता भी यह करने ���गे, तो कांग्रेस को
अबकी बार - 400 पार होते देर न लगेगी।
जेहनी नक्सल..
आजादी की वर्षगांठ पर लाल किले से नया शब्द प्रचलन में आया है। प्रधानमंत्री ने बताया है कि हथियारबंद नक्सली तो खत्म हो चुके हैं। लेकिन अब अगला मिशन..
"जेहनी नक्सलियों से हिंदुस्तान को बचाना है"
••
तब मुझे बरबस, जार्ज औरवेल का 1984 उपन्यास याद आता है। थॉट क्राइम इस उपन्यास में एक केंद्रीय अवधारणा है। यह सत्ताधारी पार्टी, और उसके सुप्रीमों - "बिग ब्रदर" के खिलाफ कोई भी विचार, भावना या संदेह रखने का अपराध है। चाहे वह व्यक्त न भी किया गया हो।
ओशिनिया नाम के इस टोटलिटेरियन स्टेट में पार्टी की विचारधारा से अलग के सोचना ही अपराध है। दल का मानना है कि विचार ही विद्रोह की जड़ है। इसलिए जनता के शरीर पर नियंत्रण के साथ-साथ, दिमाग पर भी एब्सलूट कंट्रोल जरूरी है।
जो विचार बिग ब्रदर या पार्टी पर सवाल उठा��े हों। जो स्वतंत्र सोच, व्यक्तिगत यादें, प्रेम, को बढ़ावा देते हों। जो लोग ��डबलथिंक” न कर पाते हों (जैसे एक विदेशी महिला का अपमान करना, और दूसरी विदेशी महिला के उल्लेख पर स्त्री सम्मान की दुहाई देना ),
या “न्यूस्पीक” ( सरकार द्वारा निर्धारित, एक छोटा शब्दकोष) से बाहर के शब्द सोचना, सरकार के बने निर्देशों ( जैसे 2+2= 5) पर शक करना थॉट क्राइम है।
••
विचारों पर कंट्रोल के लिए बाकायदा एक थॉट पुलिस है। वह टेलीस्क्रीन, माइक्रोफोन, आपके बच्चों और पड़ोसियों के माध्यम से लगातार नि���रानी करती है।
कोई भी चेहरे का भाव, मुस्कान, या डायरी में लिखा शब्द थॉट क्राइम साबित हो सकता है। उस देश में यह सबसे खतरनाक, बुनियादी अपराध है। पार्टी सिर्फ शरीर नहीं, बल्कि दिमाग को “ठीक” करना चाहती है।वह ठीक न हो सके..
तो व्यक्ति का अस्तित्व मिटा दिया जाता है।
••
नॉवेल के हीरो और हीरोइन को थॉट क्राइम के लिए गिरफ्तार किया जाता है। वहाँ प्रेम अपराध है, अगर बिग ब्रदर के अलावे किसी से भी किया जाय��
म���नीस्ट्री ऑफ लव में हीरो को यातना गृह में ले जाया जाता है। जहाँ उसकी सबसे भय को इस्तेमाल करके उसकी इच्छाशक्ति तोड़ दी जाती है। अंततः वह अपराध की सम्पूर्ण जिम्मेदारी हीरोइन पर डालकर, उसे मौतघर भेजवा देता है।
खुद की जान बचाकर, बिग ब्रदर से सच्चा प्यार करने लगता है।
••
थाट मूलतः एक थॉट है। जेहन में कुछ भी आ सकता है, जो समय, काल, नैतिकता या नियमों के अनुरूप हो सकता है, और नहीं भी।
इसके एक्सप्रेशन ���ा इम्प्लीमेंटेशन का दबाव किस तरह बनाया जाता है, स्टेट की प्रतिकिया उससे तय होती है। मसलन इस देश में ख़ालिस्तान माँगा गया, नही मिला। कश्मीर की आजादी मांगी गयी, नहीं दी गयी।
उन मांगों मे हिंसा थी, धमक थी। इस देश की एकता अखंडता तोड़ने का भाव था।इनका दमन, स्टेट को करना चाहिए। वेल एन्ड गुड..
लेकिन इसी देश में झारखंड, उत्तराखंड, तेलंगाना की मांग पूरी हुई। जो मिली - शांतिपूर्ण आंदोलनों से, भारत के संविधान के तहत, उनके हको हुकूक के सम्मान में।
••
मांग सिख करे, मुस्लिम करे, वामपंथी करे, रामपंथी करे। वह उचित मांग हो, या अनुचित मांग हो। बातचीत, विचार विमर्श, नेगोशियेशन, एजीटेशन के दायरे में है- तो अपराध नहीं। यह लोकतंत्र का बुनियादी फलसफा है।
याद रहे, इस देश में संविधान बदलने, तिरंगे के अशुभ होने, और चरित्रहनन को अपनी वैचारिकी बनाने वाले संगठन को भी 100 साल तक एक्सप्रेशन की आजादी थी। अगर थॉट ही क्राइम होता, तो संविधान विरोधी ये लोग गाँधी हत्या के बाद विचार के आधार पर जेलों में सड़ा दिए जाने थे।
••
लाल किले से हमने बहुत से खराब भाषण सुने हैं लेकिन पौन सदी के इतिहास में, लोकतंत्र के विरुद्ध इस तरह का थाट क्राइम करते हुए, पहली बार करते हुए किसी प्रधान सेवक को पाया है।
विचार करना अपराध हो जाए। रेजीम विच हंटिंग करने लगे, लेबल लगाने लगे, तो समझ लीजिये की उसके मस्तिष्क म���ं तानाशाही का चरम कौध चुका है।
••
दूसरी तरफ एक और शख्स है,
जो कहता है की जरूरत पड़ी तो मै आरएसएस के एक्सप्रेशन की भी रक्षा करूंगा। यह आवाज उस लोकतान्त्रिक भारत की है, जिसे दिमागी नक्सल करार दिया जा चुका है।
लाल किले के प्राचीर से देश में साफ साफ बाइनरी खड़ी कर दी गयी है। अब आप बेदिमाग दंगाइयो को चुनें, या दिमागी नक्सल को। अब मिडिल ग्राउंड कुछ बचा नही है।
••
साफ तय करे, हिचक छोड़ दें। आपको यह देश, देश नए सवे��े, नई आशा के साथ 2084 की तरफ लेकर जाना है
या जार्ज औरवेल के 1984 की तरफ..??
🙏
अहमदाबाद में प्लेग फैला।
मजदूर शहर छोड़कर भागने लगे। फैक्ट्रियां बन्द होने का खतरा था। सेठो ने दांव खेला- मजदूरी दोगुनी कर दी।
जो केवल पेट और तन भर का कमाते थे, उन्हें उम्मीद दिखी। रुक गए, जान पर खेलकर। चिमनियों से धुंआ नही रुका। प्लेग के बावजूद अहमदाबाद की मिलें चलती रही।
और जब प्लेग खत्म हो गया,
मजदूरी वापस घटा दी गई।
●●
मजदूरों ने विरोध किया। गांधी से सहायता मांगी�� गांधी ने मलिकों बात की। वे नही माने, तो मजदूरों के साथ बैठकर उन्होंने हड़ताल का आव्हान किया।
मिलें रुक गयी।
अब सेठों ने फिर दांव खेला।
जो मजदूर, हड़ताल में शामिल थे, उन्हें नौकरी से निकालने लगे। मजदूर डर गए। हड़ताल से खिसक कर वापस काम पर लौटने लगे। अब गांधी ने वो किया..
जो अनोखा था।
●●
अनशन पर बैठ गए। सेठों के खिलाफ नही, अपने ही उन समर्थकों के खिलाफ, जो मिलो में जाकर वापस काम करने लगे थे। अब ��जदूरों को शर्म आयी।
एक एक कर सारे लौट आये।
गांधी ने अनशन तोड़ा।
अहमदाबाद की मिलो की वो हड़ताल, ऐतिहासिक थी। चंपारण में किसानों की लड़ाई लड़��े के बाद, गांधी का यह दूसरा समर था- मजदूरों के लिए।
अपने ही देशवासी सेठों से लड़ गए। धनपतियों को झुकना पड़ा। मजदूरी की नई दरें तय हुई।
●●
नेहा का यह उदास मुखमण्डल देखकर बुरा लगा।
जिनके संघर्ष के शामिल होने गयी, उन्ही में से किसी ने मुंह पर स्याही फेंक दी। कारण पूछने पर वामपन्थी, देशद्रोही, उमर खालिद समर्थक होने के इल्जाम धर दिये।
लेकिन आंदोलन, एक्टिविज्म, न्याय की लड़ाई में ऐसा अक्सर होता है। कि जिसके लिए आप लड़ते हैं, वही कम्प्रोमाइज्ड हो जाता है।
कारण भय, भ्रम, या लोभ- कुछ भी हो, मगर यह लड़ने वाले के बिलीफ सिस्टम को तोड़ता है।
उदास करता है।
●●
कभी गांधी ने इसका स्वाद चखा, आज नेहा ने चखा है। लेकिन इस युवा लड़की ने जब संघर्ष, औऱ नेतृत्व की राह, राह चुनी है, तो उसे ऐसे बिट्रियल का से निराश नही होना चाहिए।
कर्मण्येवाधिकारस्ते, मा फलेषु कदा��नम!! 1918 में अहमदाबाद के गांधी की तरह, अपने भीतर की रोशनी पर, अपने उद्देश्य की पवित्रता पर यकीन रखकर वह आगे बढ़ती रहे। यही संदेश है।
और शुभकामनाएं हैं।
द पॉवर विदाउट एकांऊंबिलिटी..
भारत की सर्वशक्तिमान संस्था, संसद है। वह सरकार गठन कराती है, उसे बजट देती है, उसके कानून का निरीक्षण और एप्रूवल करती है। उसके खर्चो तथा नीतियों की स्क्रूटनी करती है।
●●
लोकसभा, राज्यसभा और राष्���्रपति के मिलन से संसद बनती है। उसे सर्वोच्च शक्ति, जनता जनार्दन देती है।
हर मंत्री, हर अफसर, हर संवैधानिक दायित्व निर्वहन करने वाला, संसद के अधीनस्थ है। यह संसदीय लोकतंत्र का सिद्धांत है। इसलिये यह, सर्वोच्च संस्था अपने कामकाज के लिए, साल के 180 दिन से अधिक बैठा करती थी।
●●
याने हर दूसरे दिन संसद बैठती। प्रधानमंत्री नेहरू सदन में बैठते, बात करते, सदन को कन्विंस करते। उसके फैसले सर माथे पर रखते। भले ही वह, उनके अपने मत से भिन्न क्यो न हो।
सवाल, आलोचना, सुझाव और डिस्कशन की घुट्टी, भारत के जनप्रतिनिधियों को आजादी की लड़ाई से मिली थी। जिसे अपनी राजव्यवस्था में भी समाहित किया।
●●
इसके बाद की पीढियो में राजनीतिक सुविधा और सत्ता को अबाधित रखने की चाहत झलकने लगी। सदन के सत्रों के दिन घटने लगे।प्रश्नों की संख्या पर नियंत्रण होने लगा। पीएसी के सम्मुख रखी जाने वाली सीएजी की रिपोर्ट्स घटी।
कभी डॉक्टर अम्बेडकर ने नेहरू सरकार से इस्तीफा दिया। कारण बताया- नेहरू ��े हिन्दू कोड बिल पर पूरा साथ नही दिया। उन्होंने डेट्स के साथ साबित किया कि नेहरू ने मात्र 12 दिन इस बिल पर चर्चा करवाई।
आज के दौर में किसी बिल पर 12 घण्टे चर्चा हो.. तो बहुत है। सरकारें, नाममात्र के डिस्कशन के बाद, चटपट मत विभाजन करके, बहुमत के दम पर बिल पास कराने लगी।
●●
तो 90 के दशक विपक्ष ने नया तरीका निकाला।
वह सदन ही बाधित कर देता।
शोर, शराबा, प्रदर्शन, विवाद इसके तरीके थे। तब भाजपा विपक्ष के के���द्र में थी। उसके पिछली पंक्ति के सांसद, सदन बाधित करने के मास्टर थे।
आज वह लोग सत्ता में हैं।
अग्रपंक्ति में है।
और अपनी मास्टरी के अनुरूप वक्ताओं के बीच टोकाटाकी, चीख पुकार से भाषणों में में बाधा डालते हैं। बहस चलने नही देते, फिर चटपट मत विभाजन।
●●
विश्व में शायद अकेली संसद होगी, जिसमे सत्ता पक्ष ही शोर मचाकर समय बर्बाद करता है। यह तरीका, उनके बॉस- आरएसएस, मोदी-शाह को बड़ा मुफीद है।
क्योकि उनकी जड़े आजादी के आंदोलन से नही, शाखा से है। जहां ऊपर से आया आदेश, सर माथे लेना होता है। संघ दीक्षितो की सरकार चाहती है, कि संसद भी शाखा की तरह, प्रवचन सुने, और ठप्पा लगाए।
कोई सवाल न पूछे, बहस न करे। उन्हें एकांउंटीबिलिटी की न तो आदत है, न इसका प्रशिक्षण। वे तो आम जनता, छात्र और किसान से भी आज्ञापालन की आशा रखते है।
●●
और राहुल गांधी, उन्हें उन्ही के खेल में पछाड़ रहे हैं।
परिसीमन बिल पास कराने को आतुर सरकार ने सारे गणित-सेट करके रखे हैं। पार्टियां तोड़ ली, संख्या जमा ली, सत्र बुला लिया। लेकिन राहुल हैं- कि संसद चलने ही नही दे रहे।
बहाना, गृहमंत्री से एकांउंटीबिलिटी मांगने का।
जिसके पास जो है नही, वह मांग रहे हैं।
●●
अमित शाह, जिस चीज से सबसे ज्यादा नावाकिफ है, वह एकांउंटीबिलिटी है। उनकी तमाम शक्ति, प्रधानमंत्री से आती है। जनता, संसद, पार्टी या लोकप्रियता से नही।
उनसे अगर कोई जवाब मांग सकता है, या प्रोटेक���ट कर सकता है, तो वह प्रधानमंत्री खुद है। दिक्कत यह कि उन्हें खुद साँप सूंघा हुआ है। दोनों जने सदन से भाग रहे हैं।
●●
दरअसल, स्क्रिप्टेड इंटरव्यू, कैमरे के सामने मोनोलॉग, ऊंचे मंच से मुंह पर पट्टी बांधे श्रोताओं के सामने, लम्बा लम्बा भाषण देने के लिए संघ के वर्कर खूब प्रशिक्षित होते है।
पर उनका हर कार्यकर्ता- द्विपक्षीय सम्वाद में हांफने लगता है, धमकाने लगता है। और जल्द ही बगलें झांकते हुए भाग खड़ा होता है।
दोषपूर्ण ट्रेनिंग, गलत माइंडसेट- संघ दीक्षितो को संसदीय लोकतंत्र में शासन के अयोग्य बनाता है। तानाशाही वे भले पोल पोट या ईदी अमीन से बेहतर चला लें, लेकिन संसदीय लोकतंत्र तो जवाबदेही मांगेगा।
व्हेयर दे फेल स्पेक्टिकुलरली..
दे वांट- पॉवर विदाउट एकांऊंबिलिटी
🙏
Journalist –– What will you say about Indian news media?
Alakh Pandey 🔥 –– I have ZERO hopes from the mainstream TV media
Journalist –– Why?
Alakh Pandey 🗿 –– "They are literally giving angles of foreign funding to this student protest. I am done with them"
Godi media is facing all time high credibility crisis. People like AOK, CT, RL are responsible
और कुछ लोग कहते हैं
"आजादी चरखे से नही आई थी"
●●
यह देश आज भी गांधी का है।
साहस का है
न्याय, सत्य और अहिंसा का है।
इस बेटी की तनी हुई मुट्ठी
गांधी की विरासत है।
ये बच्चे गांधी की विरासत हैं।
ये देश गांधी का रंगमंच है।
ये जिगरा, ये ये मुस्का���, ये आत्मविश्वास -
इनके फेफड़ों में भरी हुई..
गांधी की सांसों ने पैदा किया है।
●●
ये बेफिक्री, ये निर्भयता-
मौत और जेल के डर को कुचल कर,
एक आजाद पीढ़ी ने हासिल किया था।
इसे थाती बनाकर हमने अपने बच्चो को सौंपा है।
इसकी रचना मुट्ठी भर नमक, पाव भर कपास से हुई थी।जो चरखे की तीलियों के घूर्णन से बुनी गयी थी। आज प्रमाण सामने है। देखे, जिन्हें भी संशय हो.
कि आजादी चरखे से नही आई थी?
❤️
मेरा अज़्म इतना बुलंद है कि पराए शोलों का डर नहीं
मुझे ख़ौफ़ आतश-ए-गुल से है ये कहीं चमन को जला न दे
"My resolve is so high that I fear no external flames,
I only fear the fire within the rose, lest it burn down the garden itself."
~ Shakeel Badayuni
@INCIndia@RahulGandhi
ये प्रतिरोध सिर्फ शिक्षामंत्री,
या सरकार के प्रति नही उफ़न रहा।
ध्यान से देखिए।
आपको बहुतेरी तहें मिलेंगी।
●●
बच्चों का यह विद्रोह उन मां बाप के प्रति है, जो अंधभक्ति में लीन है। उन रिश्तेदारों, अंकलों और शिक्षकों के प्रति है, जिनके झूठ उजागर हो चुके हैं।
उन दोस्तों से है, जो देशभक्ति, और धर्म के नाम पर गन्द फैला रहे हैं। उन नेतानुमा गुंडों, और छुटभैयों के प्रति है, जो पार्टी का वस्त्र पहन, राम के नाम पर धंधा कर रहे हैं। उस मीडिया से भी है, धर्म की अफीम बांटकर दानव बन गया है।
●●
इस सबकी शुरुआत, एक गैरजिम्मेदार चीफ जस्टिस की दंभ भरी टिप्पणी से हुई। तो इस विद्रोह में ज्युडिशयरी के प्रति अविश्वास सबसे पहले शामिल है।
और जवाब में पुलिस की लाठियां, सरकार का कहर- सिर्फ अपने सर्वाइवल के लिए नही, अपने सारे सहयोगियों की तरफ़ से है।
ये डंडे- मीडिया की तरफ से है।
उस नेता, उस ट्रोल, उस पड़ोसी,
उस शिक्षक, उस जज,
उस मां उसके बाप की तरफ से हैं-
जिसने सरकार को इतनी मगरूरियत की इजाजत दी है।
●●
बहुत सहा इन्होंने, धीमे स्वर में पीड़ा बताई। पर अब झिझक टूट रही है। वह कंप्लाई करने से साफ इनकार कर रहा है। समाज को, सत्ता को, मां को और बाप को जवाब दे रहा है।
रो रहा है, चीख रहा है।
आप जेन जी कहते है साहब?? उस भीड़ से जोड़ते है, जिसने पड़ोसी देशों में सत्ताएं उखाड़ फेंकी। मगर मुझे तो सारे मासूम, असहाय नौनिहाल दिखाई देते है।
ये भगतसिंह नही..
ये टोटल रिवलोल्यूशन को नही उतरे।
●●
सिर्फ सुनवाई चाहते है,
फेयर एग्जाम चाहते है।
अगर हम यह भी नही दे सकते.. तो उस ���ूरी पीढ़ी को, जो दस साल में इस देश की रीढ़ होगी, आज ही तोड़ देंगे। हम अपने हाथों, अपने हठ में- अपनी अस्थाई कुंठाओ में
हिंदुस्तान का मुस्तकबिल मिटा देंगे।
●●
यह लड़ाई, कांग्रेस- भाजपा नहीं।
केजरीवाल या राहुल का सवाल नही।
इसका कैनवस बड़ा है। हमारी, आपकी जिंदगियों से, और हमारी राजनीतिक प्रतिबद्धताओं ��े बड़ा है। इन्हें सहलाइये, इनके साथ आइये।
और अपनी स्वाभाविक ट्रेनिंग से वशीभूत हो, इन्हें देशद्रोही, अराजक, फॉरेन फंडेड, पोलिटिकल टूलकिट बताने से बाज आइये। वरना जब ये घर, कॉलेज, कोचिंग में लौटेंगे, तो आप इनसे निगाह मिलाने के काबिल न होंगे।
आपके और इनके बीच, ये दरार..
पत्थर की लकीर हो चुकी होगी।
🙏
1942 का भारत छोड़ो आंदोलन, आजादी के इतिहास का सबसे खूनी, हिंसक आंदोलन था।
टोन्थेम रि��ोर्ट कहती है-
आंदोलन में 550 से अधिक थानों पर हमले हुए। उनपर कब्जा कर लिया गया, या जला दिये गए। 332 रेलवे स्टेशन में तोड़फोड़ हुई। 109 स्थानों पर रेल की पटरी उखाड़ी।
309 सरकारी इमारतें आगजनी से क्षतिग्रस्त हुई। 11,285 टेलीग्राफ/टेलीफोन लाइनें डिस्टर्ब हुए, सैकड़ों मील लाइनें काटी गईं। देश में 664 बम विस्फोट हुए।
49 पुलिसकर्मी मरे,1,363 घायल हुए। बलिया, तामलुक, मिदनापुर, सतारा में तो प्रशासन आंदोलनकारियो को सत्ता सौपकर चलता बना। वहां महीनों समानांतर सरकारे चली।
●●
दमन के लिए सरकार को एड़ी चोटी लगानी पड़ी। 91,836 गिरफ्तारीयां हुई। जिसमे अनाधिकृत डिटेन शामिल नही। 538 बार फायरिंग हुई। 3000 से अधिक लोग मरे।
गंभीर रूप से घायल दसियों हजार थे। सेना की 57 बटालियन तैनात करनी पड़ी। समूचे गाँवों पर जुर्माना करके 90 लाख वसूले गए। कई गांवों ��ो जलाया या नष्ट किया गया।
पटना भागलपुर मुंगेर तालचेर नदिया में तो एयरफ़ोर्स की मदद से मशीनगनिंग की गयी। वाइसराय लिनलिथगो में इसे1857 के बाद का सबसे भीषण विद्रोह कहा।
सवाल यह कि गांधी के आंदोलन में, गांधी के जीतेजी इतनी हिंसा औऱ प्रतिहिंसा- भला सम्भव कैसे हुई???
★★
8 अगस्त को गांधी ने आंदोलन की शुरुआत की। करो या मरो का नारा दिया। अगली सुबह वे गिरफ्तार हो गए।
साथ मे पूरी कांग्रेस, उसके लीडर, दे��� मे, प्रदेश में, शहरों और गांवों में गिरफ्तार किये गए। सरकार ने सोचा- नेताओ को गिरफ्तार कर लो, जनता ठंडी।
और आंदोलन खत्म.
जो उल्टा पड़ गया।
●●
गांधी, इसके पहले असहयोग औऱ सविनय अवज्ञा के दो राष्ट्रव्यापी आंदोलन कर चुके थे। चौरी चौरा हिंसा होते ही पहला आंदोलन वापस ले लिया।
दूसरे आंदोलन में भी हिंसा की छिटपुट घटनाएं हुई, मगर ज्यादातर उनके मूवमेंट अनुशासित थे। ��ीडर तब भी गिरफ्तार हुए, छूटे, फिर पकड़े गए। सरकार ने डेमोक्रेटिक चैनल खुले रखे। गांधी को गद्दार न कहा।
बकिंघम पैलेस में चाय पिलाई।
कांग्रेस के सांगठनिक ढांचे ने आंदोलन को नियंत्रित रखा। और यह नियंत्रण इसलिए कि उन्हें भी आजाद भारत चाहिए था..
लेकिन अराजक औऱ हिंसक भारत नही।
●●
लीडर जब आंदोलन शुरू करता है, तो इतिहास उसके सिर पर, एक जिम्मेदारी भी रख देता है। यह कि आने वाली पीढियां-उसकी सफलता ��ी नही, उसके तरीको की भी स्क्रूटनी करेंगी।
लोगो को अराजकता की राह दिखाकर, हिंसा और लाशो को सीढ़ी बनाकर हासिल गयी सफलता, तो राम का नाम भी दागदार बना देती है। ऐसे में गांधी को हिंदुस्तान की आजादी पवित्र रखनी थी।
तो उसे त्याग, तपस्या औऱ अनुशासन से हासिल करना था।
●●
लेकिन जब गांधी ही जेल में डाल दिया गया, तो अराजकता को रोकने वाला कोई नही था। अपनी लगाई आग में ब्रिटिश सत्ता जल गई। उसके संसाधन उलझ गए���
खूनी दमन चक्र भी जनस��लाब रोक न सका। लंदन में अगली सरकार ने आते ही, भारत की सत्ता सम्हालने से हाथ खींच लिए। गलती सिर्फ एक-
जनता को लीडर लेस बनाना,
और क्राउन ज्वेल इंडिया
सर का बोझ बन गया।
●●
लीडरशिप वेक्यूम बनाने को सिर्फ जेल नही, और भी तऱीके हैं। आप डराकर चुप करा दें, खरीदकर मिला लें, या मॉर्निंग वॉक पर गोली मरवा दें।
यह न मुश्किल हो, तो पप्पू, टोंटीचोर, गद्दार या चरित्रहीन साबित कर सकते हैं। मगर उसके बाद, याद रहे, ��ब आक्रोश का लावा फूटेगा- उसे नियंत्रण में रखने वाला कोई न होगा।
लीडरलेस आंदोलन- किसी भी सरकार के लिए 1942 की तरह हजार मुंह का राक्षस बन जायेगा। और जो दिल्ली मे हुआ, ऐसी ही लीडरलेस भीड़ का नतीजा था।
●●
शुक्र है, हमारे युवाओं की डेमोक्रेटिक ट्रेनिंग इतनी मजबूत है, कि कोई बदसूरत अराजकता निर्मित न हुई। लेकिन भाजपा, आरएसएस और उनके जडमूर्ख अहंकारी समर्थकों के लिए खतरे की घण्टी बज गयी है।
वे समझ नही पाते, कि कोई सरकार या प्रशासक, अनंत काल तक लोकप्रिय नही रह सकता। 5-10 या बीस साल बाद, गिनाई जा सकने वाली तमाम उपलब्धियो के बावजूद जनता में ऊब, और विकल्प की छटपटाहट बढ़ती है।
गलतियां भी जमा होती जाती है। जो एक समय फटकर निकलती है। डेमोक्रेसी में यह गुस्सा, चुनाव के रास्ते निकलता है। सबको फ्रेश शुरुआत का अवसर देता है।
तो मेच्योर नेता और राजनीतिक दल समझते हैं कि समय समय पर चुनाव हारना- "एक ब्लेसिंग है"
●●
लेकिन आजन्म सत्ता चाहने वाले नही। वे नशे में विरोध की जगह, विरोधी ही खत्म करने लगते हैं। तब भीड़ के निरंकुश होने का रास्ता भी खोलते हैं।
तब देर सवेर इस पॉवर हंगरी, आत्मविश्वासहीन, तानाशाह की सत्ता का यही हश्र होना है। जो अपने दल/विचारधारा के प्रति गहरी नफरत की खाई खोदने के बाद, अब वह बेतहाशा निरंकुश भीड़ की तरफ दौड़ रही है।
कभी नही लौटने के लिए।
पश्चिम से धूल का गुबार उठ रहा था।
गठबंधन की सेना रावी की ओर बढ़ रही थी। दस जनों के ध्वज हवा में लहरा रहे थे। दूसरी ओर सुदास अपनी छोटी सेना के साथ नदी के किनारे खड़ा था।
उसे मालूम था, कि आज हारे,
तो भरत जन का नाम इतिहास से मिट जाएगा।
●●
सिंधु घाटी सभ्यता समाप्त हो चुकी थी। इस वक्त समाज कबीलों में बंटा था, परिवार मिलकर एक कुल बनाते थे, कुलों से मिलकर बनता था ग्राम जिसे ग्रामाधिपति संचालित करते।
ऐसे कई ग्राम से मिलकर एक विश बनता- एथनिकली इसे एक गोत्र समूह कह सकते हैं। और विशों से मिलकर जन बनता- इसे एक ट्राइब समझ लें।
ये जन, सप्तसिंधु प्रदेश में- याने सतलुज, ब्यास, झेलम, रावी, चिनाब, सरस्वती- जिसे 1947 के पहले का कश्मीर और पंजाब समझिए- नदियों द्वारा बनाई सीमाओं के बीच विकसित होते गए।
पशुधन, उपजाऊ भूमि और व्यापारिक मार्गों पर अधिकार के लिए इनके बीच समय-समय पर संघर्ष होते रहते थे।
●●
इलाके में पुरु एक प्रभावशाली ट्राइब थी। लेकिन इनके भीतर ही एक विश विशेष रूप से बलशाली हो गया। अलग जन बना, जिसे भरत जन कहते। इनका लीडर था- सुदास!!
और सुदास ने अपना इलाका, धन वैभव बढ़ाना शुरू किया। पहला उल्लेखनीय युद्ध यदु और तुर्वसु जनजातियों से लड़ा। यह हरीयूपीया का युद्ध कहा जाता है, जो संभवतः हरियाणा की तरफ किसी स्थान पर घटित हुआ। इससे उसकी शक्ति, मान्यता और इलाकों में वृद्धि हुई।
लेकिन इस बात ने पड़ोस के जनों को चिंतित भी किया। सुदास के राजगुरू और स्ट्रेटजिक थिंकर थे विश्वामित्र। मगर धीरे धीरे दोनों में मतभेद बढ़े,
और एक दूसरे थिंकर, वशिष्ठ का प्रभाव बढ़ने लगा।
●●
क्षुब्ध विश्वामित्र ने सुदास का साथ छोड़ दिया, अथवा सुदास ने उन्हें निकाला - स्पष्ट नहीं है। लेकिन यहां से इन दो व्यक्तियों के बीच कट्टर प्रतिद्वंद्विता का आरंभ हो जाता है। जिसे अलग अलग तरीके से विभिन्न पुराणों और आख्यानों ने चित्रित किया है।
बहरहाल, क्रुद्ध विश्वामित्र ने सुदास का नाश करने का पूरा यत्न किया। वे सभी जनों के राजाओं में मिले, और एक विशाल संयुक्त मोर्चा गठित किया। इस मोर्चे में पुरु, अनु, द्रुह्यु, यदु, तुर्वसु, और उनके साथ अनार्य कबीले जैसे अलीन, पक्थ, भलानस, शिव तथा विशाणिन जन शामिल थे��
सबका एक ही उद्देश्य था -
भरत जन की शक्ति को समाप्त करना।
●●
युद्ध सज चुका था।
कहते है यह यह युद्ध आधुनिक भारत पाक सीमा के पास मनुसा नाम की जगह पर रावी के किनारे हुआ। युद्ध का समय, संभवतः ईसा से 1200 साल पहले का है।
तो गठबंधन की विशाल सेना सेना पश्चिम से बढ़ती हुई रावी किनारे पर पहुँच गई। दूसरी ओर राजा सुदास अपनी कोई 4000 की सेना के साथ मोर्चा संभाले खड़ा था। गठबंधन की योजना थी कि नदी पार कर उसे चारों ओर से घेर लिया ज��ए।
संख्या बल, और हालात पक्ष में थे, उन्हें विजय का भरोसा था। वे नदी पार कर सुदास पर हमला करने बढ़े। तभी प्रकृति ने अप्रत्याशित करवट ली।
●●
ऋग्वेद कहता है - महर्षि वशिष्ठ ने यज्ञ सम्पन्न किया और इंद्र से विजय की प्रार्थना की। अब इंद्र का प्रताप हो या कोई फ्लैश फ्लड,..
शांत रावी, देखते ही देखते उफनती धारा में बदल गई। सैनिक तीव्र प्रवाह में फँस गए। रथ बहने लगे। घोड़े नियंत्रण खो बैठे। सैनिक पंक्��ियाँ अस्त-व्यस्त हो गईं।
युद्ध की द���शा बदल गई। सुदास की सेना टूट पड़ी।
बिखर चुकी विरोधी सेना उसका सामना नहीं कर सकी। निर्णय कुछ ही देर में हो गया, और दशराज्ञ संघ पराजित हुआ। ऋग्वेद कहता है कि इसमे दशराज्ञ पक्ष के 6666 सैनिक मरे।
यह भरत जन की असाधारण विजय थी।
●●
इस विजय के साथ सप्तसिंधु की राजनीति बदल गई। भरत जन अब केवल एक जन नहीं था, वह क्षेत्र की सबसे प्रभावशाली शक्ति बन चुका था।
आने वाली पीढ़ियों में भरत और पुरु जनों के बीच प��नः निकटता बढ़ी।
और इसी मेल से विकसित हुआ कुरु राज्य।
जिसने उत्तर वैदिक काल में वैदिक संस्कृति को संगठित स्वरूप प्रदान किया। आख्यानों के अनुसार यही कुरु परंपरा आगे चलकर हस्तिनापुर, शांतनु, भीष्म, पांडव और कौरवों तक पहुँचती है,
जिनकी कथा हमें महाभारत में मिलती है।
●●
मध्यकाल के पूर्व, विशेषकर इस्लामी वारियर्स के आने तक, भारत में लिखित इतिहास की परंपरा नहीं रही है।
जो भी इतिहास है, वह सि��्कों, प्रस्तर अभिलेखों, विदेशी यात्रियों के वृत्त��ंतों, वैदिक साहित्य, पुराणों, बौद्ध तथा जैन धार्मिक साहित्य से उपजा है। ये ग्रंथ भी अपने धर्म के समर्थक राजाओं के बारे में अतिरंजना करते हैं।
साहित्य रचना में अनेक घटनाओं का घालमेल, पात्रों का पुनर्संयोजन, और समाज को उपदेश देने के लिए काल्पनिक दैवत्व से जुड़े तथ्य होने की भरपूर संभावना होती है। ऐसे में कवि की कल्पना और वास्तविक घटनाक्रमों में नाटकीय अंतर होते हैं।
लेकिन वैदिक साहित्य म���ं यदि किसी युद्ध का वर्णन सबसे अधिक वास्तविक, ऐतिहासिक और समकालीन प्रतीत होता है, तो वह सुदास और दस राजाओं के बीच लड़ा गया युद्ध है।
●●
आज तीन हजार वर्ष बाद, दशराज्ञ युद्ध केवल ऋग्वेद का एक प्रसंग नहीं। सत्ता, नेतृत्व, कूटनीति, गठबंधन और अवसर की पहचान का पहला भारतीय पाठ है।
समय अवश्य बदल गया है, पर इतिहास का यह नियम आज भी नहीं बदला..भाग्य उनका साथ देता है..
जो शत्रु की विशालता से खौफ खाऐ बगैर, अपनी पहचान बनाने को संघर्ष करते हैं।
वो भगत, जिसे आप नही जानते..
उसे जानते हैं, जिसने सांडर्स को मारा, नेशनल असेम्बली में बम फेंका। "हिंसा का नायक" जिसने मुख्यधारा के आंदोलन से अलग राह चुनने की हिमाकत की।
वो भगतसिंह, जिसे फांसी के तख्ते पर चढ़ा दिया..
उसकी बात नही करूँगा।
●●
1907 में जन्मे भगत का बचपन 1910-20 का वो दशक है, जब देश मे राष्ट्रीयता उभर रही थी। मगर सब कुछ अपरिपक्व था। ब्रिटिश राज उरूज पर, और गोखले सुधार समझौते की कोशिशों में थे।
बाल, पाल, लाल गरम दल तो थे। मगर अपनी धार्मिक साम्प���रदायिक पहचानो के इर्द गिर्द राष्ट्रीयता बुन रहे थे। उनका सपना, अधिक से अधिक होमरूल था।
तब गांधी का आगमन, विदेशी प्रवासी से कांग्रेस का असल लीडर बनने की यात्रा। जो चंपारण से शुरू हुई- बेलगाम में पूरी हुई। भगत इस सत्य और अहिंसा के प्रयोग का साक्षी है।
वह दूसरा प्रयोग, इटली का देख रहा है। यह नया राष्ट्रवाद है- वन नेशन-वन पार्टी, वन लीडर- फासिज्म सर उठा रहा है। पर इस वक्त तीसरा प्रयोग भी हो रहा है���
रूस की क्रांति।
जनता के हाथों, एक साम्राज्य का खात्मा, दुनिया की पहली जनवादी सरकार। तो कम्युनिज्म भी उस दौर की नई नई जादुई खोज था। 17 साल का किशोर भगत, यह राजनीति देख रहा है।
●●
और समाज को भी-
गरीबी, जातपांत, छुआछूत,
अंधविश्वास, धर्म,
साम्प्रदायिकता, नफरत।
वह पढ़ता है- विवेकानंद, दयानंद, रवींद्रनाथ टैगोर और विश्व के क्रांतिकारियों की जीवनियां। जब पढा, सुना, बातें की उनके बारे में, तो जेहन में विचार श्रृंखला बनती गयी।
उसे लिखना शुरू किया।
1923 में महज 16-17 साल की उम्र में भगतसिंह ने पत्रकारिता शुरू की। पहला यादगार आर्टिकल,पंजाबी भाषा और लिपि की समस्या पर था। 1924 में प्रकाशित हुआ और पंजाब हिंदी साहित्य सम्मेलन में 50 रुपये का प्रथम पुरस्कार जीता। सनद रहे, तब सोना 20 रुपये तोला था।
●●
उनके लेखन में ऊर्जा थी, रवानी और बगावत का पुट भी।
शुरुआती लेख, उस वक्त की खबरों पर कमेंट्री, क��रांतिकारियों की शहादत, उनकी बहादुरी और बलिदान पर केंद्रित होते। यह खतरनाक था। ब्रिटिश नजरें हर शब्द पर थीं।
तो छद्मनामों का इस्तेमाल शुरू किया-
कभी बलवंत, कभी विद्रोही, कभी रंजीत,
कभी बी.एस. सिंधु।
उन्होंने चंद पत्रिका के विशेषांक में फांसी के शहीदों पर ��िखा और डैन ब्रीन की किताब, "माई फाइट फ़ॉर आयरिश फ्रीडम" का हिंदी अनुवाद किया। तब उन्होंने महसूस किया कि कलम, बन्दूक से ज्यादा मारक है। लिखा भी-
व्यक्तियों को मारना आसान है,
लेकिन विचारों को नहीं मारा जा सकता
●●
भगतसिंह पत्रकार ने आर्टिकल ही नही लिखे, वे सम्पादक भी थे। ब्याह से बचने के लिए 19 की उम्र में जब घर से भागे, तो कानपुर पहुंचे। यहां "प्रताप" नाम के हिंदी अखबार में रिपोर्टर की नौकरी की।
मालिक और संपादक थे- गणेश शंकर विद्यार्थी
ख्यातनाम पत्रकार, आजादी का लड़ाका, कांग्रेस नेता।
विद्यार्थी ने प्रताप को 1913 में शुरू किया था। अखबार किसानों, मजदूरों और शोषितों की आवाज था। भगत रिपोर्टिंग के साथ-साथ लेख भी लिखते। बलवंत के छद्मनाम से, मार्च 1926 में बब्बर अकाली आंदोलन पर लेख लिखा।।
उन सिख क्रांतिकारियों की बहादुरी का वर्णन किया जिन्होंने अंग्रेजों और भ्रष्ट महंतों के खिलाफ लड़ाई लड़ी। पाठकों से आग्रह किया कि वे शहीदों के त्या�� की कल्पना करें- कि वह कितनी खूबसूरत, मोहक और पवित्र दृष्टि रही होगी।
●●
इस दौरान जब विद्यार्थी गिरफ्तार हुए तो करीब तीन माह, भगतसिंह ही प्रताप के मुख्य सम्पादक औऱ पब्लिशर रहे। बार बार सामाजिक मुद्दों को छुआ, क्रांतिकारी चेतना जगाई।
1926-28 में पंजाब लौटे। तब 21-22 की उम्र थी। मगर लेखन, और विचार मंज चुके थे। यहाँ वे विद्यार्थी, कीर्ति औऱ अकाली में लिखने,सम्पादन करने लगे।
कीर्ति- वर्कर्स एन्ड पीजे��ट पार्टी का मुखपत्र था। भगतसिंह यहाँ उप-संपादक थे। सरदार सोहन सिंह की यह पत्रिका क्रांतिकारी और मार्क्सवादी विचारों का केंद्र थी।
●●
कीर्ति में भगतसिंह के लेख- महत्वपूर्ण दस्तावेज हैं। मई 1927 में उन्होंने विद्रोही के छद्मनाम से, काकोरी के शहीदों- बिस्मिल, और अशफाक पर लिखा।
जून 1928 में “अछूत का सवाल” लिखा। जो जातिगत भेदभाव और सामाजिक न्याय पर गहरा विश्लेषण था। उन्होंने सांप्रदायिक दंगों औ�� उनके इलाज पर लेख लिखा।
मई से सितंबर 1928 तक अराजकतावाद (Anarchism) नाम की एक सीरीज लिखी। जहां एनार्की का मतलब, राज्यविहीन,शोषणमुक्त समाज है। उन्होंने इसे भारतीय अवधारणा “वसुधैव कुटुंबकम” से जोड़ा।
●●
जिस "अकाली" नाम के पंजाबी अखबार संपादन किया, उसके संस्थापक मास्टर सुंदर सिंह लयलपुरी थे। यह सिख राष्ट्रवाद और अकाली आंदोलन से जुड़ा था। भगत सिंह ने यहां भी क्रांतिकारी विचार फैलाए।
बंदे मातरम (उर्दू, अमृतसर) में भी उन्होंने लिखा। संपादन से जुड़े। दिल्ली भागते समय वीर अर्जुन में भी काम किया।
●●
जेल में भी उन्होंने नोटबुक भरी।
लेनिन, ट्रॉट्स्की आदि के उद्धरण, अपने विचार। लाहौर जेल में लगभग दो साल भी लिखते हुए गुजारे। “मैं नास्तिक क्यों हूँ”, To young political workers, कई पत्र, चार किताबें..
जो खो गईं। लेकिन नोटबुक बची। जेल में कलम किताबों ने उन्हें जिंदा रखा। जाति, धर्म, शोषण के खिलाफ चली उनकी कलम के।लेख आज भी उतने ही प्रासंगिक है।
The Political Writings of Bhagat Singh, जेल नोटबुक पब्लिश्ड है। पब्लिक डोमेन में है।
●●
भगत सिंह की पत्रकारिता आज पढ़ें, तो मालूम होगा कि सत्ता का खेल सदा एक सा रहता है। धर्म, राष्ट्र, भाषा, जाति के नाम पर लोग मोहरे बनाए जाते हैं।
लेकिन जो इतिहास पढ़ता है, वह भविष्य देखता है। भगत सिंह ने कलम उठाकर बताया, कि युवा मोहरा बनने को अभिशप्त नही।
वे खिलाड़ी भी बन सकते हैं।
●●
कुछ दिनों पूर्व शहर में पत्रकार दिवस मनाने, और नारद मुन�� को भारत का प्रथम पत्रकार बताने का प्रहसन देखा। एक पूरी जमात, राजकीय संरक्षण में उन्हें पत्रकारिता का आदि पुरुष बताने का हास्यास्पद शो करती है।
पत्रकारिता, इधर की बात उधर करना,
कानाफूसी, पोडकॉस्ट और बतकही नही होती।
सच्ची पत्रकारिता जनता की आवाज होती है। वह समाज और सत्ता पर ब्लेड चलाकर उसका मवाद निचोड देती है। यह क्रूर, कठिन - मगर सात्विक कर्म है।तो भारत मे पत्रकारिता में उस स्तर का कोई आदि पुरुष चुनना हो, नारद नही,
ब���झिझक भगतसिंह को चुनिये।
●●
क्योकि कुल जमा 23 साल जीने वाला यह छोकरा- चार भाषाओं- हिंदी, उर्दू, पंजाबी और अंग्रेजी- में वेटरन पत्रकार हो चुका था। पर आप, सिर्फ उस भगतसिंह जानते हैं, जिसने सांडर्स का कत्ल किया।
जिसने नेशनल असेम्बली में बम फेंका। हिंसा का वो नायक जिसने गांधी के आंदोलन से अलग राह चुनने की हिमाकत की।
पर आज ध्वस्त हो रहे लोकतंत्र में, उस भगतसिंह की तस्वीर लगी टी शर्ट पहनने से बात नह�� बनेगी। हमे टीवी स्क्रीन पर, यू ट्यूब चैनलों में, और हमारे बीच कलम, कैमरा, मोबाइल, सोशल मीडिया लेकर घूम रहे हर व्यक्ति के भीतर "पत्रकार भगतसिंह" की जरूरत है।
क्योकि लोकतंत्र उन लोगों से बचता है,
जो सच लिखने का साहस रखते हों।