हैरां हूं दिल को रोऊँ कि पीटूँ जिगर को मैं
तारीफ नहीं, डॉ मनमोहन सिंह पर तंज कस रहे हैं वाजपेयी। राजनीति है, ठीक है। पर भाषा देखिए, कि आज लोगों को लग रहा है कि यह तो तारीफ हुई। विरोध तो चीख-चिल्ला कर, गालियां-धमकी देकर, व्यक्तिगत टिप्पणी और छींटाकशी से किया जाता है। दुखद
Moment when Atal Bihari Vajpayee praised Dr Manmohan Singh for the budget.
Dr Manmohan Singh thought about the country, putting politics aside—this is what real leadership looks like. 🫡
आई हैवन्ट डाइड येट!!
लन्दन, पार्लियामेंट स्क्वेयर पर टहलते हुए अचानक गांधी दिखे। आश्चर्य हुआ।ब्रिटिश क्राउन का सबसे बड़ा ज्वेल- हिंदुस्तान!! जिसने अंग्रेजों से छीना,
उस शख्स की तांबे की सजीव मूर्ति,अंग्रेजो ने अपनी संसद के सामने.. ऐसी आइकॉनिक लोकेशन पर लगाई है?
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मूर्ति की जानकारी न थी, कहीं पढ़ा न था। खोजा, तो पता चला, अभी 2015 में ही लगी। PM डेविड कैमरॉन ने, गांधी के अफ्रीका से भारत लौटने के शताब्दी वर्ष पर, अनावरण किया।
क्या ही विडंबना है, कि जब गांधी को नकारने का बवंडर भारत मे उठा, दुनिया में उनकी स्वीकृति बढ़ती जा रही है।
ये गांधी भारत का आइकन नही है। ये तो उनका निजी दैवत्व है।ईसा की आराधना, फिलिस्तीन की पूजा नही होती। फिलिस्तीन ईसा का, तो भारत गांधी का, रंगमंच भर है।
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रामचन्द्र गुहा ने 2013 में गांधी की जीवनी लिखी। प्रचार के लिए अमेरिका गये। कमरा साफ करने आये होटल कर्मचारी ने किताब पर तस्वीर देखी, पूछा- यह युवा गांधी हैं न??
वकील की पोशाक वाले गांधी को पहचाने जाने से विस्मित गुहा ने हामी भरी। कर्मचारी बोला- मेरे देश मे गांधी का बड़ा सम्मान है।
तो पूछने की बारी गुहा की थी- तुम्हारा देश??
-"डोमिनिकन रिपब्लिक"
गांधी ने डोमिनिक रिपब्लिक का नाम न सुना हो। लेकिन आज, डोमिनिकन रिपब्लिक को, गांधी का पता है।
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क्योकि गांधी का संदेश सत्य, सहिष्णुता, सत्याग्रह और मनुष्यता है। इनमे बुध्द, और ईसा की सततता है। ये सन्देश, किसी पॉलिटिशियन की यादगार स्पीच नही। जीवन है, जीवन शैली है।
उस दुनिया ने दो महायुद्ध देखे। पाया, कि जब भाषा,धर्म,रंग,रेस की उच्चता का झगड़ा, मानवता को विनाश के मुहाने तक ले जाये। तो थके मन को गांधी, मनुष्यता की तरफ लौटा लाते हैं।
अगर अमेरिका और तमाम यूरोप, गांधी को मानवता की रिसेंट मेमरी का मसीहा समझता है। तो भारत भूमि की इसमे हिस्सेदारी नहीं।
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गांधी की महानता, उनसे अभय में है। महान वही, जिसकी विशालताआतंकित न करे। जिसकी आप, आलोचना कर सकें।
तौल सकें। गांधी की अहिंसा को स्त्रैण बताया गया। निर्णयों पर सवाल हुए, यौन व्यवहार पर टिप्पणियां हुईं। गांधी पर तो हर किस्म का विमर्श खुला है।
पर चीन में माओ, पाकिस्तान में जिन्ना, वियतनाम में होची की आलोचना का विमर्श खुला नही। लिंकन और फ्रैंकलिन पर सवाल कर नही सकते।गांधी, नकारने के लिए उपलब्ध हैं।
उन्हें मानिये, मत मानिये। पर आप देखते है कि गांधी से दूर जाता हर मार्ग भयावह है। वह नफरत, विनाश की तरफ जाता है। कौतुक में आप कुछ दूर जाते हैं, औऱ खून का गुबार देख लौट आते हैं।
हाँ। आप मनुष्य है, तो आपको गांधी की ओर ही लौटना है।
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क्योकि गांधी आपकी ताकत है। गांधी, भीरुओ की ताकत है। आम, डरपोक, शांति चाहने वाला व्यक्ति, विरोध से डरता है, क्रांति से डरता है, हथियार उठाकर बढ़ने से डरता है।
जो कानून, पुलिस, जेल, सरकार और मौत से डरता है। गांधी उसे वहीं से उठाते हैं।
अहिंसक रहकर, निडरता से दिल की कहने का आग्रह करते हैं। निडरता, सत्य खुलने से,कर्तव्य जागने से आती है।औरों का दर्द महसूस करने, उसे दूर करने की जिम्मेदारी से आती है।
गांधी आपकी करुणा को जगाते हैँ। चरखा कातने को कहते है, कपड़ो की होली जलवाते हैं, नमक बनवाते हैं। मामूली कामों को प्रतिरोध का प्रतीक, और क्रांति का हथियार बना, हाथ मे थमा देते हैं।
आप जो बंदूक उठाने, हत्या करने से डरते हैं, बम नही चलाना चाहते, तकली चलाते हैं। आपके जैसे लाखों लोग चलाते हैं।अब चरखा सबका रंग है, मजहब है, भाषा है। यह एकीकृत प्रतिरोध है।
ये काम तो कोई गुनाह नही। इसके लिए आप जेल भी जाएं, तो भीतर अपराध बोध नही, गर्व होगा। और जब जेल जाना गर्व की बात बन जाये..
तो उस कौम को भला कब तक दबाया जा सकता है। यही बूंद बूंद प्रतिरोध का सागर,उस ब्साम्राज्य को बहा ले गया है।
जिसका सूर्य अस्त नही होता था।
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उसी पार्लियामेंट स्क्वेयर में चर्चिल की भी मूर्ति है। जिसने जमकर युद्ध लड़ा, साम्राज्य बचाया। वह चर्चिल, जिसने बंगाल का सारा चावल ब्रिटेन मंगाकर, 4 लाख लोगों को भूखा मार दिया।
जब इन मौतों की सूचना आई, तो फाइल नोटिंग पर पूछा- वाय हैवन्ट गांधी डाइड येट ???
लेकिन गांधी मरा नही। वह फैल गया, दुनिया के हर कोने में। आज ब्रिटेन सिकुड़ चुका है, और जितने देशो में गांधी की मूर्तियां लग चुकी, उस साम्राज्य में सूरज अस्त नही होता।
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आज भारत से उन्हें हटाने की कोशिशें है। लेकिन गांधी जरा भी नहीं हिलता। वह अपने कातिलों से निगाहें मिला रहा है,
ठठा रहा है, हिंदुस्तान में।
मैं देखता हूँ, वह लन्दन की संसद को भी देखकर मुस्कुरा रहा है। अगर आप सहसा सुन सकें, तो धीमी, गम्भीर सी आवाज आती है..
नो। आई हैवन्ट डाइड येट!!!!
जंगल मे अशिक्षा थी।
जानवरों ने शिक्षा का महत्व समझ लिया, और स्कूल खोल दिया। मिलजुलकर सिलेबस तय हुआ। समानता लायी जाएगी, सबको सब कुछ सिखाया जायेगा।
तो सबको सब कुछ सिखाया गया, एग्जाम हुए।
रिजल्ट आया।
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मछली तैरने में फुल मार्क्स, उड़ने दौड़ने में फेल हो गयी। पक्षी उड़ने में पास हुए, मगर तमाम कोचिंग ट्यूशन के बावजूद तैर न सके। कोयल गायन में फर्स्ट क्लास रही, और कुत्ते फेल हो गए।
अब कुत्तों में बड़ा असंतोष फैला।
वे अगले सत्र में भौकने को सिलेबस में रखने की मांग करने लगे। सबको बताया- भौंकना मौलिक अधिकार है। हमारी स्वतंत्रता है। फंडामेंटल डॉगी राइट है।
बिन भौकन सब सून..
क्या अब एक कुत्ता अपने ही जंगल मे भौंक भी नही सकता ??
आंदोलन फैल गया।
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बड़ा समर्थन मिला।
भौकना उत्तम कर्म होता है। न कोई सुर, न ताल, न तुक, न राग, न द्वेष। ना नियम की सीमा हो, न छंद का हो बंधन ...
जंगल में दर्जन भर कोयल हैं। उनको जब गाने का स्पेशल राइट मिला, तो क्या यह कोयलों का तुष्टिकरण करण नही था। भला उन्हें भौंकने की जिम्मेदारी क्यो नही दी गई।
बताओ, बताओ..
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याने ऐसा चौक चौराहों, भजन पूजन के पंडालों में फुसफुसाकर बताया गया। कानाफूसी चहुं ओर फैल गयी। फिर टीआरपी के चक्कर मे टीवी कूदा।
मीडिया में बैठे श्वानों की विभिन्न प्रजातियां भी दम खम से अपने स्पीशीज का साथ देने लगे।
जो साथ ने थे, उन पर कुत्तों ने हमला करके भगा दिया।
अब तो कुत्ता टाइम्स, कुत्ता न्यूज, Doggy Now पर बैठे कुत्तन-कुत्तनियाँ दिन रात भौकने की महिमा का गान करते,
और बुलाकर हर जानवर से पूछते की वह आखिर भौकने के खिलाफ क्यूँ है?
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कई बार, कुत्ते भेड़, बकरी, मछली, मुर्गा, हिरन का भेष बनाकर आते। उन्हें स्वतंत्र विश्लेषक बताकर, खूब भौंकवाया जाता।
अथक मेहनत से आखिरकार पूरा जंगल कन्विंस हो गया। कुत्तों की सरकार बन गयी। सभी प्रमुख पदों पर कुत्ते आरूढ़ हुए। मने यूँ समझो कि कुत्ता ही वीसी हुआ, कुत्ता ही प्रिंसिपल, कुत्ता शिक्षक हुआ..
और चौकीदार तो कुत्ता था ही।
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इस प्रकार सम्पूर्ण विद्यालय में कुत्तों का वर्चस्व हुआ। अब पहले मौके में सम्विधान संशोधन करके सिलेबस बदल दिया गया।
नये सिलेबस में भौकना अनिवार्य तथा एकमात्र विषय था। सभी जानवर अपनी बोली छोड़ भौंक रहे थे। मगर क्या ही खाकर कुत्तों से बेहतर भौकते।
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अब विद्यालय में भौंकश्री, भौकभूषन, भौकरत्न के पुरस्कार बंटते है।
और आश्चर्य की बात की कभी कभी मछली, पक्षी और घोड़े भी इनाम जीत जाते है, या जितवा दिये जाते हैं। इससे कुत्तों की निष्पक्षता पर यकीन बना रहता है।
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तो सिलेबस बदलने से बड़ा फर्क पड़ता है।
हमारे देश मे भी स्कूली दिनों में विज्ञान, गणित, एंटायर पोलिटिकल साइंस की किताब में छुपाकर..
मस्तराम, गुलशन नंदा और वेद प्रकाश शर्मा को पढ़ने वालो ने..
सुना है उन्हें सिलेबस ही बना दिया है।
#कुत्तकथा
मैं किसी तौर बना पाया नहीं काम का दुख
सो मिरे पास बचा भी तो फ़क़त नाम का दुख
घर में बैठूँ तो खटकती है ख़मोशी की सदा
दश्त को जाऊँ तो रहता है दर-ओ-बाम का दुख
रौशनी का ही मैं हिस्सा था मगर इस्म-ए-शफ़क
मेरे हिस्से में रहा सुब्ह का ग़म शाम का दुख
#आशु_झा 'नक़्क़ाश'✍️
@vo_barbareek
@TG_Perspective @dhruv_rathee Vo sab to theek hai Bhai par spelling tu ek bhi theek nahin likh paaya. Na Bharat ke states Kashmir aur Kerala ki, na Narsimha ki. Go back to school, it's still not too late.
ये भूतपूर्व डकैत पानसिंह तोमर की पोती हैँ,
झाँसी में रहती हैँ,
बिजली विभाग के JE विभव कुमार रावत इनके घर का स्मार्ट मीटर बदलने गए थे,
फिर क्या था,
पोती साहिबा के रगों में दौड़ रहा बागी खून
जाग उठा,
और उन्होंने JE साहब की बलबर पिटाई कर दी,
पानसिंह तोमर पर फ़िल्म बनी थी,
जो इरफ़ान खान की एक्टिंग के लिए आज भी याद की जाती है,