Saturday Off not approved for Bankers, yet call on Sunday for Social Campaigns.
Kucch toh sharm kar lo, jo 6 din lagatar kaam kar rhe, unhe sunday ko bhi bula rahe, woh bhi non banking works ke liye @ChiefIba@ChairmanIba
वह दिन ज्यादा दूर नहीं कि आपको गर्मियों में घर ठंडे रखने के लिए महंगे AC और बिजली के मोटे बिल से मुक्ति मिल जाएगी।
Earth Air Tunnel से...
हमारे पैरों के नीचे मौजूद मिट्टी का तापमान करीब पूरा साल 20°C से 25°C बना रहता है। यह होता है मिट्टी की तापमान सोखने की बेहिसाब क्षमता से।
एक साधारण एयर सप्लाई फैन लगाने भर से यह संभव है। कनाडा और ज़िम्बाब्वे में इसे सफलतापूर्वक आजमाया जा चुका है।
हमारे यहाँ राजस्थान की कुछ पुरानी इमारतों में यह तकनीक पाई गई है। केवल कुछ पाइप और एक या दो फैन, और ऊर्जा बिल एक चौथाई हो जाएगा।
कॉर्पोरेट जगत इसे आगे नहीं बढ़ने देना चाहता, इसके हितों पर बहुत गंभीर असर पड़ेगा। यह इतना साधारण समाधान है, लेकिन सरकारें लोगों तक पहुँचने नहीं देंगी।
कल नोएडा की सड़कों पर जो हुआ, वो इस देश के श्रमिकों की आख़िरी चीख़ थी - जिसकी हर आवाज़ को अनसुना किया गया, जो मांगते-मांगते थक गया।
नोएडा में काम करने वाले एक मज़दूर की ₹12,000 महीने की तनख्वाह,₹4,000-7,000 किराया। जब तक ₹300 की सालाना बढ़ोतरी मिलती है, मकान मालिक ₹500 सालाना किराया बढ़ा देता है।
तनख्वाह बढ़ने तक ये बेलगाम महंगाई ज़िंदगी का गला घोंट देती है, कर्ज़ की गहराई में डुबा देती है - यही है “विकसित भारत” का सच।
एक महिला मज़दूर ने कहा - “गैस के दाम बढ़ते हैं, पर हमारी तनख्वाह नहीं।” इन लोगों ने शायद इस गैस संकट के दौरान अपने घर का चूल्हा जलाने के लिए ₹5000 का भी सिलेंडर खरीदा होगा।
यह सिर्फ़ नोएडा की बात नहीं है। और यह सिर्फ़ भारत की भी बात नहीं है। दुनियाभर में ईंधन की कीमतें आसमान छू रही हैं - पश्चिम एशिया में युद्ध की वजह से सप्लाई चेन टूट गई है।
मगर, अमेरिका के टैरिफ़ वॉर, वैश्विक महंगाई, टूटती सप्लाई चेन - इसका बोझ Modi जी के “मित्र” उद्योगपतियों पर नहीं पड़ा। इसकी सबसे बड़ी मार पड़ी है उस मज़दूर पर जो दिहाड़ी कमाता है, तभी रोज़ खाता है।
वो मज़दूर, जो किसी युद्ध का हिस्सा नहीं, जिसने कोई नीति नहीं बनाई - जिसने बस काम किया। चुपचाप। बिना शिकायत। और उसके बदले अपना हक मांगने पर उन्हें मिलता क्या है? दबाव और अत्याचार।
एक और ज़रूरी मुद्दा - मोदी सरकार ने 4 लेबर कोड जल्दबाज़ी में बिना संवाद नवंबर, 2025 से लागू कर, काम का समय 12 घंटे तक बढ़ा दिया।
जो मज़दूर हर रोज़ 12-12 घंटे खड़े होकर काम करता है फिर भी बच्चों की स्कूल फ़ीस क़र्ज़ लेकर भरता है - क्या उसकी मांग ग़ैरवाजिब है? और जो उसका हक़ हर रोज़ मार रहा है - वो “विकास” कर रहा है?
नोएडा का मज़दूर ₹20,000 माँग रहा है। यह कोई लालच नहीं - यह उसका अधिकार, उसकी जिंदगी का एकमात्र आधार है।
मैं हर उस मज़दूर के साथ हूं - जो इस देश की रीढ़ है और जिसे इस सरकार ने बोझ समझ लिया है।
शिक्षा, सशक्तिकरण का ज़रिया नहीं रही…
व्यवसाय और मुनाफ़े का ज़रिया बन चुकी हैं…!!
अगर इस देश को बर्बाद होते नहीं देखना चाहते हो…
तो इस व्यवस्था को जल्द से जल्द बदलो…!!
वरना भविष्य बेहद भयावह होने जा रहा है…!!!
Class 1 के बच्चे को 20 किताब पढ़ा रहे हैं हम,
फिर भी 20 साल बाद ये बच्चे बेरोजगारी की लाइन में खड़े हो जाते हैं..?
समस्या क्या हैं..? दोषी कौन हैं..?
स्कूल सिर्फ़ बोरा भर के किताब बेच रहे हैं, किताबों की संख्या से बच्चे की योग्यता बढ़ेगी इसका कोई सम्बन्ध नहीं हैं
निजी स्कूलों की मनमानी कब रुकेगी?
"स्कूल से जो किताबें आई है वो सोने की है। चांदी के पन्ने हैं। सीप के मोतियों से अक्षर लिखे हैं।"
"NCERT की बुक 60 रुपए तो निजी स्कूल की 530 की। कोई नियम कायदे ही नहीं है।"
कौन रोकेगा इस लूट को?
जूनियर क्लास में 1 किताब की कीमत 900 रुपए
सभी किताबों की कीमत 12000
दिल्ली के निजी स्कूलों में बच्चों को पढ़ाने के लिए किडनी, गुर्दा, जमीन सबकुछ बेचना पड़ेगा।