जो मेरे घर कभी नहीं आएँगे
मैं उनसे मिलने
उनके पास चला जाऊँगा।
एक उफनती नदी कभी नहीं आएगी मेरे घर
नदी जैसे लोगों से मिलने
नदी किनारे जाऊँगा
कुछ तैरूँगा और डूब जाऊँगा
पहाड़, टीले, चट्टानें, तालाब
असंख्य पेड़, खेत
कभी नहीं आएँगे मेरे घर
खेत-खलिहानों जैसे लोगों से मिलने
गाँव-गाँव, जंगल-गलियाँ जाऊँगा।
जो लगातार काम में लगे हैं
मैं फ़ुरसत से नहीं
उनसे एक ज़रूरी काम की तरह
मिलता रहूँगा—
इसे मैं अकेली आख़िरी इच्छा की तरह
सबसे पहली इच्छा रखना चाहूँगा।
~ विनोद कुमार शुक्ल
पटना ज़िले के सभी ज़िलेवासियों, प्रशासन, मीडिया के साथी तथा हमारे पटना पुलिस परिवार को एक बार फिर हृदय से आभार। इस कार्यकाल में आप सभी का योगदान अत्यंत सराहनीय रहा।
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■उत्तर प्रदेश के मुज़फ़्फ़रनगर के रहने वाले अतुल को आईआईटी धनबाद में सीट मिली ,लेकिन उनके परिवार को फीस के 17 हज़ार 500 रुपये जुटाने में इतना वक़्त लग गया कि सीट ही कैंसिल हो गई.
फिर कैसे सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अतुल को आईआईटी में एडमिशन मिला..